प्रो. सुशील कुमार शर्मा बने संकायाध्यक्ष
(मानविकी एवं भाषा संकाय, मिजोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय)
आइजोल! भारत में उच्च शिक्षा और मानविकी अध्ययन के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में मिजोरम विश्वविद्यालय ने प्रख्यात हिंदी विद्वान, शिक्षाविद् , कुशल प्रशासक, वरिष्ठ साहित्यकार और समीक्षक प्रो. सुशील कुमार शर्मा को मानविकी एवं भाषा संकाय का संकायाध्यक्ष नियुक्त किया है। उनका कार्यकाल 1 जुलाई, 2026 से तीन वर्षों तक रहेगा। यह नियुक्ति प्रो. शर्मा के तीन दशक से अधिक लंबे शिक्षण, शोध, शैक्षणिक नेतृत्व, भाषा नीति निर्माण और सांस्कृतिक समन्वय में दिए गए उल्लेखनीय योगदान की स्वाभाविक और सम्मानजनक स्वीकृति है।
मिजोरम विश्वविद्यालय के मानविकी एवं भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष के रूप में प्रो. सुशील कुमार शर्मा की नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन-संघर्ष, समर्पण और उपलब्धियों का सम्मान है, जो शिक्षा, शोध, सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्रीय एकता को समर्पित रहा है। आज जब दुनिया भर के विश्वविद्यालय स्थानीय जरूरतों और वैश्विक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब प्रो. शर्मा का जीवन और कार्य एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनकी उपलब्धियाँ बताती हैं कि शैक्षणिक उत्कृष्टता, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता साथ-साथ चल सकती हैं। उनके नेतृत्व में मिजोरम विश्वविद्यालय का मानविकी एवं भाषा संकाय उन्नति के नए वैश्विक आयाम स्थापित करेगा।
प्रो. सुशील कुमार शर्मा समकालीन हिंदी जगत के उन चुनिंदा विद्वानों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने ज्ञान, शोध और संगठनात्मक क्षमता के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वर्तमान में वे मिजोरम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्रोफेसर (लेवल-15) के रूप में कार्यरत हैं। वे केवल शिक्षक नहीं हैं, बल्कि शोधकर्ता, प्रशासक, मार्गदर्शक और समाज के चिंतक के रूप में भी जाने जाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम.ए., एम.फिल. और पी-एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त करने वाले प्रो. शर्मा ने हिंदी साहित्य, भाषाविज्ञान, काव्यशास्त्र, अनुवाद, तुलनात्मक साहित्य, लोक साहित्य और प्रयोजनमूलक हिंदी जैसे अनेक क्षेत्रों में गहन अध्ययन और शोध किया है। यही कारण है कि उनका कार्य साहित्यिक आलोचना, सांस्कृतिक अध्ययन और भाषा शिक्षण के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है।
लगभग बत्तीस वर्षों से अधिक के अपने शिक्षण जीवन में प्रो. शर्मा ने भारतीय उच्च शिक्षा जगत में लगातार प्रगति की है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत सहायक प्राध्यापक (हिंदी) के रूप में की थी। वर्ष 2002 से उन्होंने पूर्वोत्तर पर्वतीय केंद्रीय विश्विद्यालय, शिलांग (मेघालय) में रीडर और एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवाएँ दीं। वर्ष 2010 में वे मिजोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइजोल (मिज़ोरम) में प्रोफेसर बने और वर्ष 2020 से वरिष्ठ प्रोफेसर (लेवल-15) के पद पर कार्यरत हैं। अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में उन्होंने विशेष रूप से उन क्षेत्रों में हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को मजबूत बनाने का कार्य किया, जहाँ हिंदी सामान्य जन-जीवन की भाषा नहीं है। उनके कार्य ने यह सिद्ध किया है कि भाषा केवल पढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद, राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक समझ का सशक्त साधन भी हो सकती है।
प्रो. शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को समझने और उन्हें व्यापक पहचान दिलाने का कार्य किया। पिछले दो दशकों से अधिक समय से वे मेघालय और मिजोरम जैसे हिंदीतर राज्यों में कार्य कर रहे हैं, जो अपनी भाषाई विविधता और समृद्ध लोक संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने स्वयं को केवल मुख्यधारा के साहित्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की मौखिक परंपराओं, भाषाओं, लोक साहित्य, सांस्कृतिक विरासत और लोक ज्ञान के अध्ययन को अपने शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उनके निर्देशन में अनेक शोध परियोजनाएँ और पी-एच.डी. शोध-कार्य- मिजो लोक साहित्य, मोनपा लोककथाओं, खासी लोक साहित्य, असमिया सांस्कृतिक परम्पराएं, पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं का व्यतिरेकी अध्ययन और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों पर केंद्रित रहे हैं। उनके प्रयासों से पूर्वोत्तर भारत की अनेक सांस्कृतिक धरोहरें राष्ट्रीय साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बनी हैं और इस क्षेत्र तथा शेष भारत के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु तैयार हुआ है।
एक सक्रिय और उत्पादक लेखक के रूप में भी प्रो. शर्मा का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने पाँच महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, पाँच पुस्तकों का संपादन किया है, 28 पुस्तक अध्याय लिखे हैं तथा यूजीसी-केयर और अन्य प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में इकसठ शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में रामचरितमानस में नारी, साहित्य विमर्श का विवेक, मधुमालती में प्रेम व्यंजना और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : दृष्टि और सृष्टि तथा चितन के विविध आयाम प्रमुख हैं। इन कृतियों ने हिंदी साहित्य की आलोचना को नई दृष्टि दी है तथा साहित्य को समाज, संस्कृति, स्त्री विमर्श और सौंदर्य-बोध के व्यापक संदर्भों से जोड़ने का कार्य किया है। आज उनकी पुस्तकें और शोध कार्य देशभर के विश्वविद्यालयों में अध्ययन और संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
अपने व्यक्तिगत शोध कार्यों के अतिरिक्त प्रो. शर्मा ने शोध संस्कृति के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके निर्देशन में चौदह शोधार्थियों ने पी-एच.डी. पूरी की है, पाँच विद्यार्थियों ने एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की है और अनेक स्नातकोत्तर शोध कार्य संपन्न हुए हैं। वर्तमान में भी कई शोधार्थी उनके मार्गदर्शन में शोध कर रहे हैं। उनके विद्यार्थियों के शोध विषयों में क्षेत्रीय साहित्य, तुलनात्मक भाषा अध्ययन, लोक साहित्य और आदिवासी ज्ञान परंपराएँ प्रमुख रही हैं। इस प्रकार उन्होंने एक ऐसी नई शोध पीढ़ी तैयार की है, जो भविष्य में भारतीय भाषाओं और लोक संस्कृतियों के संरक्षण तथा अध्ययन को आगे बढ़ा सकेगी।
प्रो. शर्मा का प्रभाव केवल कक्षा और शोध तक सीमित नहीं है। एक प्रशासक के रूप में भी उन्होंने अपनी असाधारण क्षमता का परिचय दिया है। वे दस वर्षों से अधिक समय तक विभागाध्यक्ष, हिंदी रहे हैं और तीन वर्षों तक मिजोरम विश्वविद्यालय के शिक्षा एवं मानविकी संकाय के संकायाध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की अनेक महत्वपूर्ण समितियों, शैक्षणिक परिषदों, अध्ययन मंडलों, शोध समितियों, पाठ्यक्रम निर्माण समितियों और चयन समितियों का नेतृत्व किया है। पाठ्यक्रम विकास, शिक्षकों की नियुक्ति, शोध की गुणवत्ता, संस्थागत योजना और शैक्षणिक प्रशासन के क्षेत्र में उनके योगदान को व्यापक रूप से सराहा जाता है। उनके सहयोगी उन्हें ऐसे शिक्षाविद के रूप में देखते हैं जो शैक्षणिक उत्कृष्टता और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करना जानते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रो. शर्मा की पहचान अत्यंत मजबूत रही है। वे भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य रह चुके हैं और सरकारी तथा शैक्षणिक क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे मिजोरम विश्वविद्यालय की राजभाषा कार्यान्वयन समिति के 2010 से उपाध्यक्ष भी हैं। इसके अतिरिक्त वे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) से पीयर टीम के अध्यक्ष, सदस्य समन्वयक और सदस्य के रूप में जुड़े रहे हैं। इन जिम्मेदारियों के माध्यम से उन्होंने भाषा नीति, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और विश्वविद्यालय प्रशासन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान है। उन्होंने विश्व मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस और फिजी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में उन्होंने शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं। इसके अतिरिक्त सिंगापुर और श्रीलंका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भी उन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति पर अपने विचार रखे हैं। भारतीय संस्कृति के विकास में हिंदी की भूमिका, वैश्विक हिंदी, अनुवाद और तुलनात्मक साहित्य जैसे विषयों पर उनके शोध-पत्रों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की प्रतिष्ठा को मजबूत किया है। वे हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रभावी वैश्विक प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हुए हैं।
उनकी सेवाओं और उपलब्धियों को देशभर की अनेक साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। उन्हें सृजन शिखर पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सम्मान, अंतरराष्ट्रीय प्रेमचंद सम्मान, हिंदी भाषा भूषण सम्मान, विश्व हिंदी सेवी सम्मान और आचार्य रामचंद्र शुक्ल राष्ट्रीय सम्मान सहित पच्चीस से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। ये सम्मान केवल उनकी विद्वता के लिए नहीं, बल्कि हिंदी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद को मजबूत बनाने में उनके योगदान के लिए भी दिए गए हैं। इसके साथ ही उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की प्रतिष्ठित एसोसिएटशिप भी प्राप्त हुई, जो देश के चुनिंदा विद्वानों को ही मिलती है।
विश्वविद्यालयों के बाहर भी प्रो. शर्मा ने समाज से अपना जुड़ाव बनाए रखा है। पिछले तीन दशकों से अधिक समय से उनके व्याख्यान, साहित्यिक चर्चाएँ, शैक्षणिक कार्यक्रम, बाल कथाएँ और सांस्कृतिक प्रसारण आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचते रहे हैं। उनका मानना है कि शिक्षा और साहित्य केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहिए। जटिल विषयों को सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता ने उन्हें आम लोगों और विद्वानों दोनों के बीच सम्मान दिलाया है। इस महत्वपूर्ण दायित्व हेतु विश्वविद्यालय परिवार ने हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं।
Last Updated on July 2, 2026 by srijanaustralia
- पूनम चतुर्वेदी
- संस्थापक
- अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन
- [email protected]
- आशियाना, लखनऊ, उत्तर प्रदेश








