न्यू मीडिया में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं शोध को समर्पित अव्यावसायिक अकादमिक अभिक्रम

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

सृजन ऑस्ट्रेलिया | SRIJAN AUSTRALIA

6 मैपलटन वे, टारनेट, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से प्रकाशित, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित, बहुविषयक अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका

A Multidisciplinary Peer Reviewed International E-Journal Published from 6 Mapleton Way, Tarneit, Victoria, Australia

डॉ. शैलेश शुक्ला

सुप्रसिद्ध कवि, न्यू मीडिया विशेषज्ञ एवं
प्रधान संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

सुप्रसिद्ध चित्रकार, समाजसेवी एवं
मुख्य संपादक, सृजन ऑस्ट्रेलिया

संवाद

[“संवाद” मनुष्य की मूलभूत जरूरत है, इसके बिना मनुष्य रह पाना ही मुश्किल हो जाता है। विशेष रूप से बुजुर्गों के लिए जिंदा रहने की चाह की तरह होता है “संवाद”]
अच्छा आओ कुछ बात करते है।
प्रश्न: तुम किसके लिए कमाते हो?
उत्तर: परिवार के लिए
प्रश्न: परिवार कौन?
उत्तर: मेरे बीबी- बच्चे
प्रश्न: सिर्फ बीबी- बच्चे क्यों? माँ – बाप, भाई- बहन क्यों नहीं?
उत्तर: वो तो अपना कमा रहे है/ उनका वे जाने/वो भी तो मुझे या मेरे बच्चों को कुछ नहीं देते। अब बहुत हुआ भाई….
प्रश्न : तुम देते हो क्या उनके बच्चों को? अच्छा छोड़ो यह,
ये बताओ, तुम्हारे बच्चे जब अपने बच्चों के बारे में सोचने लगेंगे तब तुम कहाँ जाओगे?
उत्तर : इनकी माँ की… इतनी हिम्मत है क्या? मेरी कमाई पर मुझे ही आँख दिखाएंगे? ऐसा कभी नहीं होगा, मेरे बच्चे ऐसे नहीं होंगे। संस्कार देना होता है बच्चों को, पढ़ा- लिखा कर आदमी बनाना होता है, तब बच्चे जीवनभर सम्मान देते है।

प्रश्न: मतलब तुम्हारे माँ- बाप ने तुम्हे संस्कार नहीं दिया? जितना उनकी औकात थी, बुद्धि थी पढ़ाया नहीं? कभी तुम्हारे पिता भी तो ऐसा ही कहते थे कि उनके बेटे ऐसे नहीं होंगे, तुम्हे याद नहीं है वो दिन जब खेतों में काम करते हुए तुम्हारे पिता कहते थे कि वह तुम्हे पढा- लिखा कर बड़ा आदमी बनाएंगे। जब तुम शहर पढ़ने जा रहे थे तो उस समय गाँव के नदी में पानी भरा था,तुम्हारे पिता तुम्हे कंधे पर बैठा कर नदी पार कराए थे। तब तुम भी कहते थे कि तुम ऐसा काम करोगे कि आप छाती खुशी से चौडी हो जाएगी, लेकिन तुम तो बिल्कुल उल्टा बन चुके हो।

उत्तर: नहीं, मैं ऐसा नहीं बना हूँ, और मेरे संस्कार अच्छे है, मैंने जीवन में संघर्ष किया है और सीखा है संस्कार- व्यवहार। मेरे साथ मेरे बाप ने गलत किया है, खुद के जिन्दगी में किये क्या है वे? बर्बाद करने के अलावा। मेरे भाइयों ने मेरे साथ गलत किया है। अब बस भाई मैं जीवन भर इनलोगों में ही उलझा रहूँगा तो मेरे बेटे को पढ़ने- लिखने के लाले पड़ जायेंगे, मेरी बेटी है, कौन देगा खर्च पढ़ाने- लिखाने और शादी करने के?

प्रश्न : भाइयों की छोड़ो, वे तो तुम्हारे जैसे ही होंगे, बाप गलत हो सकता है क्या? माँ- बाप अपने बच्चों को पालन – पोषण करते है। तुम भी तो अपने बच्चों का पालन- पोषण ही करते हो न? इससे ज्यादा क्या करते हो? तुम्हारे माँ- पिता ने भी तुम्हारा पालन- पोषण किया होगा, तभी इतने बड़े हुए हो, उनके पास जितना था, जैसी बुद्धि थी वैसे ही पालन किया है, लेकिन पालन तो किया है जरूर। अच्छा,तुम कितने साल के थे जब तुम्हे लगा कि तुम्हारे पिता गलत है/ कुछ नहीं किये जीवन में/बर्बाद किये है सब? उन्हे इस बात की सज़ा दी जानी चाहिए? कब लगा तुम्हे?

उत्तर : अ.. ब…. कब क्या? मुझे शुरू से पता था, लेकिन मैं कुछ नहीं बोलता था। मैं बोलता भी तो वो सुनते थोड़े, अपने- आप को बहुत बुद्धिमान समझते है। बुद्धिमानी में ही सब चौपट हो गया।
प्रश्न : शुरू से मतलब? तुम्हारे शादी के बाद से न? उसके पहले तो सब ठीक ही था ना? और वैसे ही बुद्धिमान तुम भी तो बनते हो न? कि सब काम अपने बेटों से इजाजत लेकर करते हो?

उत्तर : अरे यार, प्रॉब्लम बहुत पहले से है, पहले कौन सा वो कुछ उखाड़ लिए थे? जो भी किया है मैने ही किया है, शादी से पहले भी मैं ही सब करता था। इस घर में सबकुछ मैंने ही किया है। किसी ने कुछ नहीं किया है।

प्रश्न: क्यों किया? किसके लिए किया?

उत्तर : अपने परिवार के लिए किया, माँ- बाप के खुशी के लिए किया, परिवार के इज्जत/प्रतिष्ठा के लिए किया, मुझे क्या पता था कि मेरा सब लेकर मुझे ठेंगा दिखा देगा सब। मेरे साथ छल- कपट होगा, मैंने इज्जत के लिए वो सब किया था, कोई इज्जत करता है क्या मेरा?

प्रश्न : माँ -बाप को अब खुशी की जरूरत नहीं है क्या? तुम्हे तब पता नहीं था और अब कैसे पता है कि तुम्हरा बेटा/बेटी तुम्हारी सब कमाई खाकर एक दिन ठेंगा नहीं दिखा देंगे? अगर तुम्हारी पुरी कमाई पर तुम्हारे पिता का अधिकार नहीं है तो तुम्हारे कमाई पर तुम्हारे बच्चों का अधिकार कैसे हो सकता है? और सम्मान पाने के लिए सम्मान देना पड़ता है न? तुम सम्मान पाना चाहते हो या अपनी धाक जमाना चाहते हो? धाक किस पर जमाना चाहते हो? उन पर जिनके सामने तुम नंगे दौड़ते थे?

उत्तर : ………..मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है….. तुम क्या बोल रहे हो ? मैं बड़ा हूँ घर में, मेरा सम्मान नहीं होना चाहिए क्या? मैंने अपनी सारी जिन्दगी की कमाई इन्हे दे दी, मेरे भाइयों को मेरा सम्मान नहीं करना चाहिए क्या?

प्रश्न : तुम अपने से बड़ों का सम्मान करते हो? जिसने अपनी पुरी जिन्दगी ही तुम पर खर्च कर दिया हो, उसका सम्मान करते हो क्या? अभी तो अपने पिता को मूर्ख, सब नाश करने वाला बोल रहे थे। यही सम्मान होता है क्या? बचपन की बात याद करो, जो कुछ तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए रोज करते थे, वह उनके लिए तुम कर सकते हो क्या? उनको स्नान करा सकते हो? मान लो उनका पैखाना निकल गया धोती में ही😢
तुम साफ कर दोगे क्या, बिना कुछ बोले, खुशी- खुशी। अच्छा अभी थोड़े दिनों पहले की ही बात करो, तुम्हारे लिए/तुम्हारे परिवार के लिए वो दिनभर चल कर जो काम करते थे, वही काम तुम उनके लिए कर सकते हो क्या?

उत्तर: ……..लेकिन वो ऐसे कैसे जो मुँह में आए वो बोल सकते है यार? उनको इतना तैश आ रहा था बुढ़ापा में तो मेरा खून उनसे कम गरम है क्या? वो बुड्ढे हो गए है तो जो समझाया जाता है, मानते क्यों नहीं? उनके जैसे और भी तो बुड्ढे है, चुपचाप बैठे राम- राम करना चाहिए….

भाई खून में गर्मी होती है तो शरीर मेहनत करता है, होठों पर मुस्कुराहट होती है, जीवन में सबकुछ अपने मेहनत से पाने की चाह होती है। उमंग- उत्साह- उल्लास होता है जीवन में। किसी के लिए कुछ करके खुशी होती है। अपना खून दान कर भी मन प्रफुल्लित रहता है ( यह वैज्ञानिक सत्य है) खून की गरमी जब कम होने लगती है तो मुँह चलता है, अफसोस होता है, आदमी कंजूस हो जाता है, जीभ ज्यादा स्वाद माँगने लगती है, नकारात्मक सोच आता है, नींद- चैन- सुकूँ कम आता है, जीवन भर की बातें दिमाग में उछलती रहती है, अपने ही प्रियजनों से हड़प कर जल्दी से धनवान बनने की इच्छा जागृत होने लगती है। तुम्हारे लक्षण खून गरम होने के है या ठंडा, यह तुम सोच लो…. लेकिन उनका खून ठंडा हो रहा है, उनका लक्षण स्पष्ट है।
तुम्हारे पास पैसे थे तो तुमने खर्च किए, तुमने वो पैसा अपने पिता को दिया, तुम्हारे पिता ने उस पैसे से पूरे परिवार को संभाला क्योंकि उनके लिए वैसे ही वो परिवार था, जैसे तुम्हारे लिए तुम्हारे बीबी- बच्चे है। गलती हर इंसान से होती है, एक गलती के बाद दूसरी होती है, फिर तीसरी होती है… यह सिलसिला ही जिन्दगी है। गलतियों को भूल कर जिन्दगी को गले लगाना ही उदेश्य है जीवन का, जब तुम छोटे बच्चे थे तब तुम्हारी कितनी गलतियों को माफ कर भी तुम्हे अपने गोद में लेने वाले तुम्हारे माँ- बाप ही थे न? दूसरी बात जब किसी को यह लगने लगे कि उसकी सारी कमाई माँ- बाप और भाइयों पर खर्च हुआ है और अब वक्त आ गया है कि हिसाब कर वसूल किया जाए तो समझ लो तुम्हारा खून ठंडा हो रहा है, बेईमानी- इर्ष्या, क्रोध जैसे तमाम नकारात्मक विचार तुम पर हावी हो रहा है समय से पहले ही तुम्हारा मन थक गया है, पुराना हो गया है। यही सही समय है किसी ऐसे साबुन से नहाने की जो तुम्हारे मन को धो सके। देखो तुम्हारे घर में ऐसा कोई साबुन है क्या? अगर ना मिले तो अपने माँ- पिता के पास जाओ, उनके पास रहती है ऐसी साबुन। कैसे भी तुम उन्हे बता देना कि तुम्हारा मन गंदा हो गया है, धोना चाहता हूँ।यह सुविधा भी बस चंद सालों के लिए उपलब्ध है, उसके बाद तुम अपने पिता की तरह हो जाओगे, किसी साबुन से नहीं धुलेगा तुम्हारा मन।

Last Updated on January 5, 2021 by Manoranjan Kumar Tiwari

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