संदीप सिंधवाल की कविता – ‘मेरा मैं’

ये जो माटी ढेर है, ‘मैं’ माया का दास। माया गई तो मैं भी, खाक बचा अब पास।। मैं श्रेष्ठ हूं तो सिद्घ कर, मैं अच्छी नहीं बात। सबका मालिक एक है, इंसां की इक जात।। मिट्टी में मिल जाता मैं, कुछ ना जाता संग। एक परमात्मा सच है, सब उसके ही अंग।। सभी से …

संदीप सिंधवाल की कविता – ‘मेरा मैं’ Read More »