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मीनाक्षी डबास की नई कविता: रिमझिम-रिमिझम

रिमझिम रिमझिम

 बरसे फुहार

 मन नाचे मेरा

 करे पुकार l

रिमझिम रिमझिम

 बरसो पानी

 भू पर लिख दो 

फिर नई कहानी 

रिमझिम रिमझिम

 कदम बढ़ाए

डालों को तुम 

चलो भिगोएं l

रिमझिम रिमझिम 

मधम मधम 

मिट्टी के कण में 

बस जाओ 

रिमझिम रिमझिम 

नाच नाच के 

नदियों से तुम 

आन मिलो, अब 

रिमझिम रिमझिम

 कूद फांद के 

चट्टानों से भिड़ जाओ 

रिमझिम रिमझिम 

नाच नाच के

बच्चों का भी 

जी बहलाओ 

 मीनाक्षी डबास “मन” 

(हिंदी प्रवक्ता)

राजकीय सह शिक्षा विद्यालय पश्चिम विहार 

शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली 




सुखबीर दुहन की नई कविता- हालात-ए-किसान

हालात ए किसान

यह जो तेरे घर में अन्न आया है।
जरा सोचो किसने पसीना बहाया है।
चाह मिटायी , चिन्ता पाई , चैन की नींद ना आई,
तुझे दिया, खुद न खाया, बासी रोटी से भूख मिटाई।
भोर उठा , मुंह न धोया ,मिट्टी से सनी काया ,
फटे कपड़े टूटी चप्पल ,आदर भी ना पाया।
दीनहीन लगता रहता, हाथ में न कमाई,
खेत-खलिहानों में ही पूरी जिंदगी बिताई।
थका मांदा लगा रहता ,इसने ना चैन पाया,
कभी सूखा ,कभी बाढ़, ओलों ने बड़ा सताया।
जलती धूप , चमकती बिजली, ठंड इसे काम से न रोक पाई,
स्वयं ना बचे भले तूफानों से, मगर अपनी फसल बचाई ।
यह जो तेरे घर में अन्न आया है,
एक किसान ने पसीना बहाया है।

-डॉ. सुखबीर दुहन, हिसार




मनीष खारी की नई कविता -मेरे बच्चों के लिए

जिस दिन तुम खुद को अकेला पाओ,

घबराओ ,डर जाओ और

उसका सामना ना कर पाओ।

उस दिन एक बार हिम्मत करके

अपने माता -पिता के पास जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन उनके गले लग जाना।

तुम्हारा माथा सहलाएंगे,

सब समझ जाएंगे

जिस दिन असफल हो जाओ , 

फिर से खड़े ना हो पाओ

पूरी दुनिया को अपने खिलाफ पाओ,

उस दि न हिम्मत करके, स्कूल चले जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन टीचर से मिलना ,दोस्तों को याद करना,

बचपन जहाँ बिताया उस नर्सरी विंग में जाना

ढूँढना अपने सबसे प्यार शिक्षक को,

 उसके सामने खड़े हो जाना

वो थपथपाएगा तुम्हारी पीठ ,तुम्हें देगा शाबाशी 

और सब ठीक हो जाएगा।

जिस दिन कुछ समझ ना पाओ ,हँसते -हँसते रोने लग जाओ

आँखों के सामने सिर्फ़ अँधेरा ही पाओ

उस दिन हिम्मत करके अपने भाई -बहन के पास जाना 

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन,उनके साथ बचपन याद करना ,

कैसे लड़ते थे ,खेलते थे ,गिरते थे , सब सुनना सुनाना

 तुम्हारे कंधे पर उनका हाथ होगा,

और देखना सब बदल जाएगा।

जिस दिन तुम हारना चाहो , किसी से मिलना ना चाहो

और हमेशा के लिए गुम हो जाना चाहो

उस दिन हिम्मत करके ,शीशे के सामने खड़े हो जाना

हो सकता है तुम्हें थोड़ा -सा अजीब लगे

लेकिन

खुद से आँखें मिलाना ,आँसू बहाना

दिल खोल कर बातें करना खुद से

चाहे तो झूठे दिलासे देना ,कोई भी हथकंडा अपनाना

लेकिन

खुद को एक बार ज़रूर मनाना।

दिल को मजबूत करना और फिर से बाहर आना

मेरे बच्चों हो सकता है तुम्हें अजीब लगे

लेकिन एक बार यह जरूर आज़माना

 

-मनीष खारी




अमूल्य त्रिपाठी की नई कविता – “तेरी मुहब्बत”

वो रातें मुझे पसंद है,
वो बातें मुझे पसंद है,
तेरी मुहब्बत की हर,
यादें मुझे पसंद है।

चाँदनी रातों में तेरा,
खूबसूरत दमकता चेहरा,
इन आँखों को बड़ा पसंद है।

बारिश की बूँदों के बीच,
तेरा,यूँ भीगते जाना,
तेरी हर मुलाकात
मुझे पसंद है।

चेहरे पर गिरती लटों को,
यूँ हाथों से फेरना,
मुझे पसंद है।

मुहब्बत की बातों पर,
तेरा मुस्कुराना
मुझे पसंद है.
हर लहजा तेरा
मुझे पसंद है।




प्रभांशु कुमार की नई कविता-मेरे अंदर का दूसरा आदमी

मेरे अंदर का दूसरा आदमी

मेरा दूसरा रुप है,

वर्तमान परिदृश्य 

का सच्चा स्वरूप है।

रात में सो रहा होता हूं

उसी समय मेरे अंदर का दूसरा आदमी

अस्पताल के आईसीयू के बाहर 

ईश्वर से विनती 

कर रहा होता है।

जब मैं रोटी के टुकड़े

खा रहा होता हूं

तो मेरा दूसरा आदमी

किसी रेस्टोरेंट में

बिरयानी के स्वाद में

तल्लीन हो रहा होता है।

जब मैं मॉ की दवाई

खरीद रहा होता हूं

तो मेरे अंदर का दूसरा आदमी

अपनी प्रेयसी को 

को पत्र लिख रहा होता है।

और जब मैं

अपने विचारों की 

आकाशगंगा में

गोता लगा रहा होता हूं

तो मेरे अंदर का दूसरा आदमी

टेलीविजन पर रिमोट के

बटन बदल रहा होता है।

सोचिए मत, जरा विचारिए

मैं और मेरा दूसरा आदमी

दो नहीं एक है

बस विचारों से अनेक है।।

                                




प्रभांशु की नई कविता कूड़े वाला आदमी

वह आदमी
निराश नही है
अपनी जिन्दगी से
जो सड़क किनारे
कूड़े को उठाता हुआ
अपनी प्यासी आंखो से
कुछ दूढ़ता हुआ
फिर सड़क पर चलते
हंसते खिलखिलाते
धूलउड़ाते लोगों को टकटकी
निगाह से देखता
फिर कुछ सोचकर
नजरें दुबारा काम पर टिका लेता ।

शायद ये सब मेरे लिए नही
वह सोचता है
अखिर कमल को हर बार
कचरा क्यों मिलता है
वह आदमी
दौड़ के उसे उठाता
जैसे ईश्वर का प्रसाद मिल गया हो
जैसे तालाब किनारे
कमल खिल गया हो।
फिर सड़क पर लोग नही है,
प्लास्टिक के थैले नही है
और चल देता है
दूसरे कूड़े की ओर
शायद अपनी किस्मत को कोसते हुए
बस यही है मेरी जिन्दगी।

   मो०-9235795931,




पवन जांगड़ा का गीत, – “बेटी नाम कमावैगी”

बेटी की क्यूट स्माइल नै,

देख लाडो की प्रोफाइल नै

यो पापा होग्या फैन.

यो पापा होग्या फैन।

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी।

घर में जिसके होवै बेटी,रौनक घर में आवे।

प्यारी-प्यारी लागे बेटी,सबका मन हर्षावे। 

घर में जिसके होवै बेटी,रौनक घर में आवे।

प्यारी-प्यारी लागे बेटी,सबका मन हर्षावे। 

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल..

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल.

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी।


भ्रूण-हत्या की इस प्रथा में बेटी कर री फाइट,

घटती दिखे कद्र देश म्ह,, यो किसने दे दिया राईट!

भ्रूण-हत्या की इस प्रथा में बेटी कर री फाइट,

घटती दिखे कद्र देश म्ह,, यो किसने दे दिया राईट।

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल..

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल।

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी।

शिक्षा हो या खेल-जगत,सबमें बेटी नाम कमावै,

देख के फ़ोटो फ्रंट पेज प, मन में खुशियाँ छावै, 

शिक्षा हो या खेल-जगत,सबमें बेटी नाम कमावै,

देख के फ़ोटो फ्रंट पेज प, मन में खुशियाँ छावै।

बढ़ता मान पिता का, होती कद्र माता की गैल.

बढ़ता मान पिता का, होती कद्र माता की गैल।

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

पवन जांगड़ा कुलेरी आळा, मन में इच्छा ठारया,

जुग-जुग जीवै बेटी घर म्ह, या ही रीत चला रया,

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल..

तन्नै बेटे कर दिए फ़ैल।

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी..

र बेटी धूम मचावैगी, र बेटी नाम कमावैगी।

     




रानू चौधरी की नई कविता, यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न

किसानों की मुस्कराहट से

लहराते हैं खेत

खेतों के लहराने से

मुस्कराता है पूरा देश |

मुस्कान किसानों की

क्यों जाती दिख रही हैं

खेतों की हरियाली

क्यों गुम सी दिख रही हैं|

क्यों नहीं मिलता उन्हें

परिश्रम का फल

क्यों देनी पडती है

उन्हें अपनी जान

क्यों नहीं किया जाता

समस्याओं का समाधान।

तो कैसे रखें आशा

कि मुस्कराएगा हमारा

आने वाला हिन्दुस्तान |

                   – रानू चौधरी