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अफलातून लगा है

22 22 22 22
ग़ज़ल

वह तो अफलातून लगा है।
पशुता गर नाखून लगा है।।

भ्रष्टाचार बढ़ाने वाले,
उनके मुँह में खून लगा है।

जाड़े के दिन पाँव पसारे,
यानि सलाई-ऊन लगा है।

सोच-विचार अगर होता है,
तो मुझको मजमून लगा है।

बात अगर पानी की है तब,
मोती-मानुष-चून लगा है।

झूठा सच्चा एक बराबर,
तब अंधा कानून लगा है।

लू-लपटों का राज हुआ है,
क्योंकि महीना जून लगा है।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर मप्र




अतीत से वर्तमान : नवगीत वाङ्मय

इक्कीसवीं सदी में देखा गया है कि लगभग हर दो-तीन वर्ष में नवगीत के संकलन प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें कुछ वृहद संकलन हैं, तो कुछ संक्षिप्त हैं। इन संकलनों के द्वारा नवगीत सृजन के समसामयिक परिदृश्य को प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है। इस क्रम में सद्यः प्रकाशित संकलन- ‘नवगीत वाङ्मय’ यशस्वी नवगीतकार एवं संपादक डॉ अवनीश सिंह चौहान के संपादन में प्रकाशित हुआ है। यह संकलन चार उपशीर्षकों में संयोजित है। पहला भाग- ‘समारंभ’ है, जिसमें क्रमशः जन्मतिथि के अनुसार डॉ शम्भुनाथ सिंह, डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया एवं राजेंद्र प्रसाद प्रसाद सिंह शामिल है। इन वरिष्ठ नवगीतकारों के तीन-तीन नवगीत उद्धृत हैं। दूसरा भाग- ‘नवरंग’ है, जिसमें गुलाब सिंह, मयंक श्रीवास्तव, शांति सुमन, राम सेंगर, नचिकेता, वीरेंद्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, विनय भदौरिया एवं रमाकांत शामिल हैं। इन सभी के नौ-नौ नवगीत उद्धृत हैं। तीसरा भाग- ‘अथ-बोध’ है, जिसमें नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर एवं ‘नये-पुराने’ पत्रिका के संपादक दिनेश सिंह का आलेख- ‘गीत की संघर्षशील जयी चेतना’ पठनीय है। अंतिम भाग में वरिष्ठ नवगीतकार डॉ मधुसूदन साहा जी से डॉ अवनीश सिंह चौहान द्वारा लिया गया विशिष्ट साक्षात्कार है। यानी कि पूरे संकलन में अतीत से वर्तमान तक नवगीत की दशा-दिशा का बोध होता है।

भूमिका- ‘प्रसंगवश’ में संपादक डॉ अवनीश जी द्वारा संक्षिप्त, किंतु सारगर्भित समालोचनात्मक आलेख प्रस्तुत किया गया है। आजकल नवगीत पर केंद्रित कतिपय प्रसंगों को अलग रखकर देखें, तो यह विमर्श अत्यंत प्रभावी एवं उपयोगी है। कहने को तो कोई भी संकलन या ग्रंथ परिपूर्ण नहीं होता है-‘रामचरितमानस’ भी नहीं है। यहाँ आधुनिक कवि मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ को भी उदाहरणस्वरूप दिया जा सकता है। ‘नवगीत वाङ्मय’ में अवनीश जी ने अपने ‘वाङ्मय कौशल’ का भरपूर उपयोग किया है। ‘वाङ्मुख से साक्षात्कार तक’ यह संकलन ध्यानाकर्षक है। खास बात यह भी है कि संपादक अवनीश सिंह चौहान स्वयं नवगीत के अच्छे रचनाकार हैं। पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों में छपते रहते हैं। इनका नवगीत संग्रह- ‘टुकड़ा कागज़ का’ प्रकाशित है, फिर भी अपने आप को इस संकलन से अलग रखा है। आज के समय में लोभ-संवरण कोई आसान कार्य नहीं है। सच्चाई है कि कुछ रचनाकार जब आलेख लिखते हैं, तब उन्हें अपनी रचनाओं के उदाहरण देने में थोड़ी भी हिचक नहीं होती है।

अब प्रश्न उठता है कि क्या संकलन में शामिल सभी नवगीतकार वाङ्मय निपुण हैं? अगर हैं, तो कहा जा सकता है कि समय को देखने और पहचानने की दृष्टि अलग-अलग होगी ही। निहितार्थ नगण्य अपवादों के होते हुए भी संपादक को ‘नवगीत वाङ्मय’ के सृजन परिदृश्य को प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। संपादक डॉ अवनीश सिंह चौहान ने जिन तब और अब के कवियों को समग्र रूप में सम्मिलित करने का कठिन प्रयास किया है और इसके माध्यम से उन्होंने जिस संपादन कौशल का परिचय दिया है, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। ‘प्रसंगवश’ में डॉ अवनीश जी साफ-साफ कहते भी हैं- “समय-समय पर प्रबुद्ध नवगीतकारों के साथ-साथ समर्पित सम्पादकों ने भी समाज-निर्माण के उद्देश्य से नवगीत की वैश्विक चेतना का विस्तार करने की भरपूर कोशिश की है। ऐसी ही एक छोटी-सी कोशिश के रूप में इस ‘नवगीत वाङ्मय’ को देखा जा सकता है।”

जाहिर है कि ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।’ छोटी-सी कोशिश एक गिलहरी ने की, पुरुषोत्तम राम का आशीर्वचन मिला था। गीत एक ऐसी विधा है, जिसे कोई खारिज नहीं कर सकता है। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह कहते हैं- “यदि विद्यापति को हिंदी का पहला कवि माना जाए, तो हिंदी कविता का उदय ही गीत से हुआ, जिसका विकास आगे चलकर संतो और भक्तों की वाणी में हुआ” (प्रगति और समाज, पृ. 109)। समयानुसार गीत की काया बदली, किंतु आत्मा नहीं। कभी इसका स्वर मंद भी हुआ, किंतु बंद नहीं हुआ। गीत के स्वर्णकाल को आज भी याद किया जाता है। स्वर्णकाल से भी गीतकारों को संतुष्टि नहीं मिली, इसका कारण भी भिन्न-भिन्न विद्वानों के द्वारा स्पष्ट किया जाता रहा है। आजादी के बाद औद्योगिकीकरण, आधुनिकतावाद, बाजारवाद एवं उत्तर संस्कृति जैसी अवधारणाएँ पूरी दुनिया में फैलने लगीं। इसका प्रभाव साहित्य पर भी होने लगा। नई कहानी, नई कविता, नवगीत इत्यादि इस बदलती दुनिया की ही देन है। यह भी सही है कि नई कविता की प्रतिक्रिया में गीत को नवगीत कहा गया। 1958 में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने ‘गीतंगिनी’ पत्रिका में ऐसे गीतों को नवगीत संज्ञा से प्रतिपादित किया। प्रारंभ में नामकरण का श्रेय लेने के लिए ‘वाक्-युद्ध’ भी होता रहा। अनुसंधान में प्रमाण की आवश्यकता होती है, नवगीत की प्रगति में डॉ शम्भुनाथ सिंह का ऐतिहासिक योगदान है। इस प्रसंग में जनवाद के वरिष्ठ गीतकार रमेश रंजक लिखते हैं- “गीतंगिनी’ की भूमिका में प्रकाशित नवगीत के इस ‘मेनिफेस्टो’ को वाराणसी से प्रकाशित होने वाली ‘वासंती’ मासिक पत्रिका के ‘नये गीत : नये स्वर’ लेख माला (1961-62) में डॉ शम्भुनाथ सिंह ने कुछ और आगे इस प्रकार बढ़ाया – गीत रचना की परंपरा-पद्धति और भाव-बोध को छोड़कर नवीन पद्धति और विचारों के नवीन आयामों तथा नवीन भाव सारणियों को अभिव्यक्त करने वाले गीत जब भी और जिस युग में लिखे जाएंगे, नवगीत कहलाएंगे” (नये गीत का उद्भव एवं विकास, पृ. 109)। प्रारंभ से अब तक नवगीत हम-ग्रस्त है। यह नवगीत की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। नवगीत को शिखर तक ले जाने के लिए इस हम को दूर करना होगा। स्वस्थ आलोचना किसी भी विधा के लिए आवश्यक है। वह हम-ग्रस्त नहीं होनी चाहिए। हम दावे से नहीं कह सकते हैं कि किंतु देखा जाता है कि कुछ लोग व्यक्तिगत जीवन में कुछ, सर्जना में कुछ और होते हैं। गीत उद्योग का सांचा लेकर बैठे रहते हैं, ताकि बड़ी उपलब्धि प्राप्त की जा सके।

बहरहाल, ‘नवगीत वाङ्मय’ के ‘समारंभ’ में जन्म-तिथि क्रमानुसार तीन वरिष्ठ नवगीतकार प्रारंभिक दौर के हैं। इन तीन नवगीतकारों के तीन-तीन नवगीत उद्धृत है। मूलतः उनके नवगीतों में सामाजिक प्रतिबद्धता है, जीवन यथार्थ तथा मानवीय रिश्तों के पुनर्गठन की चेतना है। अमानवता के प्रति रोष है, किंतु उथल-पुथल मचाने वाला शोर नहीं है। युग-समय एवं आदमी के मर्म को महसूस कर जो रचनाएँ होती हैं, वैसी रचनाएँ इतिहास में स्थाई रहती हैं। डॉ शम्भुनाथ सिंह के नवगीत जातीय परंपरा को पुष्ट करते हैं- “देश हैं हम/ महज राजधानी नहीं।/ हम नगर थे कभी/ खण्डहर हो गए/ जनपदों में बिखर/ गाँव, घर हो गए/ हम जमीं पर लिखे/ आसमाँ के तले/ एक इतिहास जीवित/ कहानी नहीं।/ हम बदलते हुए भी/ न बदले कभी/ लड़खड़ाए कभी/ और सँभले कभी/ हम हजारों बरस से/ जिसे जी रहे/ ज़िन्दगी वह नई/ या पुरानी नहीं।“ 

‘हम’ बदलते हुए भी भीतर से नहीं बदले हैं। शम्भुनाथ जी अतीत को याद करते हुए वर्तमान में पहुंच जाते हैं। उन्होंने प्रायः अनदेखी और उपेक्षित सच्चाइयों को अपने नवगीत में संवेदनात्मक विमर्श का विषय बनाया है। उनकी आकांक्षा की जमीन उर्वर है। डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया इसे अपने ढंग से सुदृढ़ करते हैं- “अपनी शर्तों पर जीने की/ एक चाह सबमें रहती है/ किन्तु जिंदगी अनुबंधों के/ अनचाहे आश्रय गहती है/ क्या-क्या कहना, क्या-क्या सुनना/ क्या-क्या करना पड़ता है।/ समझौतों की सुइयाँ मिलतीं/ धन के धागे भी मिल जाते/ सम्बंधों के फटे वस्त्र तो/ सिलने को हैं सिल भी जाते/ सीवन, कौन कहाँ कब उधड़े/ इतना डरना पड़ता है।” स्थिति स्पष्ट है कि समझौतों की सुई एवं धन के धागे के बीच जिंदगी उलझ कर रह गई है। पैबंद लगाकर कब तक जिया जा सकता है। शिवबहादुर जी के नवगीतों में जीवन की समग्रता तक पहुँचने का खुला प्रयास मिलता है।

नवगीत संज्ञा के प्रणेता राजेंद्र प्रसाद सिंह को आधुनिकता की आँधी में जातीय विरासत को बचा लेने की चिंता है- “उतरे जहाज से जो/ जीवन के नये-नये बटखरे/ मैं तुलने लगी उन्हीं से/ फिर वायुयान से उतरे/ जो संबंधों के ग्रह-तारे/ मैं जुड़ने लगी उन्हीं से/ मैं आधुनिका हूँ संदेही/ — तुम क्या हो?” यहाँ आधुनिका कौन है? समय की रंगत में पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण है। याद करें आदि कवि विद्यापति को- “देसिल बयना सब जन मिट्ठा।” आज आधुनिकता के दौर में शहर गाँव में प्रवेश कर गया है। युगबोध से संपृक्त ‘समारंभ’ के नवगीतकारों को मूल रूप से अपनी संस्कृति को बचा लेने की चिंता है।

‘नवरंग’ उपशीर्षक ‘नवगीत वाङ्मय’ का द्वितीय अध्याय है। ‘नवरंग’ में नौ रचनाकारों के नौ-नौ नवगीत हैं। उम्र के हिसाब से सात पुराने एवं दो नये नवगीतकार हैं। सभी समान विचारधारा के हैं। लिखने की भाव-भंगिमाएँ अलग-अलग हैं। इनमें सबसे पहले गुलाब सिंह जी हैं। गुलाब सिंह भीड़ से अलग रहते हैं। तटस्थ भाव से चुपचाप समय की रंगत को करीने से व्यक्त करते हैं –

छंदों में जीने के सुख संग/ शब्दों की विभुता

दर्द और दुख भी गाने की/ न्यारी उत्सुकता

भाव, कल्पना, संवेदन/ ले भीतर बसा प्रयाग।

और-

सघन भीड़ में बचे ‘आदमी’/ उसका आदमकद हो

गए प्यार का नए गीत में/ आगम ही ध्रुवपद हो

धुले मैल, निखरे मानवता/ चमक उठे बेदाग।

स्पष्ट है कि गीत का वंशज नवगीत है। नवगीतकार गुलाब सिंह ‘नये गीत’ के लिए ‘गीत’ को खारिज करना नहीं चाहते हैं। शायद इसीलिये वे ‘धुले मैल, निखरे मानवता’ की सुन्दर कामना करते हैं।

ऐसी ही कामना के पक्षधर कवि मयंक श्रीवास्तव जी हैं, जो बेबाक कह भी देते हैं- ‘गीत और नवगीत की पीड़ा में कोई विशेष फर्क नहीं होता है।’ यह बात किसी बड़े कवि की पहचान के लिए काफी है। मयंक जी के नवगीतों में, जो सामाजिक ताना-बाना है, वह औरों से अलग है। वे अपने आसपास के बिम्बों से बड़ी इमारत खड़ी करते हैं। वे सरल भाषा में संश्लिष्ट कहने वाले कवि हैं- “कोलाहल में एक बात/ यह मुझको भी कहने दो/ मेरा गाँव अगर छोटा है/ छोटा ही रहने दो।/ बड़े नगर की देख रोशनी/ बेसुध हो जाएगा/ पता नहीं है किस बंगले में/ पूरा खो जाएगा/ जब तक भी बह सके/ हवा पावन होकर बहने दो।” मयंक जी हार नहीं मानते हैं, उम्मीद में जीते हैं, थोड़े में गुजारा करना जानते हैं, आशान्वित भी हैं कि एक रोज विद्रूप समय भी बदलेगा।

नवगीत की प्रथम कवयित्री डॉ शान्ति सुमन ने अपनी राह खुद बनायी है। वे घर, परिवार, प्रकृति से बिंब लेकर सामाजिक असमानता के विरोध में गीत-नवगीत रचती रही हैं। वे कभी-कभी समय की प्रतिकूलता से जूझते हुए अतिक्रमण भी करती हैं- “दहशतों की नींद सोयी/ हर गली, हर मोड़/ देर कुछ जीकर मरा है/ रोशनी का मोर/ छू गया हो पाँव जैसे आग से/ धुंआ, कुहरा, रैन-छल-सी जिंदगी।” आलोचक डॉ रेवती रमण के शब्दों में “शांति सुमन नवगीत की अकेली कवयित्री मान्य हैं। इनके नवगीतों का उपजीव्य मिथिला की जनपदीय संस्कृति है, जनपदीय पर्यावरण और जीवन द्रव्य उन्हें गीतमय सुलभ है।”

राम सेंगर जी ख्याति प्राप्त नवगीतकार हैं। उनकी दृष्टि साफ है। वे इस संकलन में अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहते भी हैं- “बौद्धिक विश्लेषण द्वारा जीवन स्थितियों के आर-पार देखने की सर्जनात्मक आत्म-दृष्टि नवगीत के पास है।” इसीलिये राम सेंगर जी कबीर की तरह खरी-खरी कहते हैं-

 

बने अलग माटी के ये सब/ नामी और गिरामी

गैरत बची रहे मत करना/ इनकी गोड़-गुलामी 

इनकी नीयत से टकराना/ लेश नहीं मिमियाना 

ठाकुर, बामन, बनियों में तुम/ ठहरे निरे छदामी

खाल न उधड़े, ये जो ठहरे/ बड़े-बड़े आसामी 

इनकी फितरत से टकराना/ खुद को ढाल बनाना।

आजादी के वर्षों बाद भी आम आदमी हाशिए पर खड़ा है। प्रतिरोध के स्वर गूँज रहे हैं। जन-मन के वरिष्ठ गीतकार नचिकेता जी समय यथार्थ एवं सुविधाभोगी वर्ग के प्रति रोष व्यक्त करते हैं- “यहाँ नहीं होती अब/ उत्सव-त्योहारों की बात/ ठर्रे-विस्की की बोतल में/ गर्क हुए जज्बात/ तुलसी-चौरा सूनेपन का/ है बन गया पड़ाव।/ युवा वर्ग को रहा नहीं/ गाँवों से तनिक लगाव/ अपनेपन की कब्र खोदता/ है चेहरे का भाव/ काम-धाम का/ टारगेट है लुधियाना-पंजाब।” पुस्तक में संकलित कुछ नवगीतों में नचिकेता जी का प्रेम और प्रकृति से भी गहरा लगाव दिखाई पड़ता है।

कहते हैं कि कविता की वापसी आठवें दशक में हुई थी। यही वह समय था जब ‘नवगीत दशक’ (सम्पादक- डॉ शम्भुनाथ सिंह) अपनी आभा बिखेर रहा था। दूसरी ओर रमेश रंजक एवं रवींद्र भ्रमर जैसे गीतकार अपना परचम लहरा रहे थे। इसी दौर में सुकंठ कवि वीरेंद्र आस्तिक धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर उभर रहे थे। आस्तिक जी बड़े सहज एवं ईमानदार नवगीतकार हैं। किसी खास ‘वाद’ से इनका जुड़ाव नहीं है। संवेदनशील हैं, सो इनके कवि की नजर हर तरफ रहती है। आस्तिक जी का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है- “हम जमीन पर ही रहते हैं/ अम्बर पास चला आता है।/ अपने आस-पास की सुविधा/ अपना सोना अपनी चांदी/ चाँद-सितारों जैसे बंधन/ और चाँदनी-सी आजादी/ हम शबनम में भींगे होते/ दिनकर पास चला आता है।/ हम न हिमालय की ऊँचाई/ नहीं मील के हम पत्थर हैं/ अपनी छाया के बाढ़े हम/ जैसे भी हैं हम सुन्दर हैं/ हम तो एक किनारे भर हैं/ सागर पास चला आता है।” भाषा, संवेदना एवं शिल्प की दृष्टि से वीरेंद्र आस्तिक एक सजग नवगीतकार हैं।

प्रेम, प्रकृति एवं मनुष्यता के पक्षधर डॉ बुद्धिनाथ मिश्र मेरे प्रिय नवगीतकार हैं। वे आदि कवि विद्यापति एवं जन-जन के कवि बाबा नागार्जुन के क्षेत्र से आते हैं। बुद्धिनाथ जी के नवगीतों में एक अद्भुत आकर्षण एवं मिठास है। कहा जाता है कि दुनिया की सबसे मीठी बोली मिथिला की ही है। शायद इसीलिये उनके नवगीत श्रोताओं एवं पाठकों को रोमांचित करते हैं। बुद्धिनाथ जी जीवन को समग्रता में लिखते हैं- “मैं वहीं हूँ जिस जगह पहले कभी था/ लोग कोसों दूर आगे बढ़ गए हैं।/ ज़िन्दगी यह, एक लड़की साँवली-सी/ पाँव में जिसने दिया है बाँध पत्थर/ दौड़ पाया मैं कहाँ उन की तरह ही/ राजधानी से जुड़ी पगडंडियों पर/

मैं समर्पित बीज-सा धरती गड़ा हूँ/ लोग संसद के कँगूरे चढ़ गए हैं।” और “दूर पर्वत पार से मुझको/ है बुलाता-सा पहाड़ी राग/ गर्म रखने के लिए बाकी/ है बची बस काँगड़ी की आग/ ओढ़कर बैठे सभी ऊँचे शिखर/ बहुत महँगी धूप के ऊनी दुशाले।”

अपने पिता की तरह जीवन की त्रासदियों के बीच डॉ विनय भदौरिया अपने नवगीत की छाप औरों से अलग छोड़ते हैं-

 

राम जाने सोच अपनी

किस दिशा को मुड़ गई

सड़क संसद भवन की

अब बीहड़ों से जुड़ गई

 

जानकार फिर भी बने अनजान

खो रहे दिन-दिन निजी पहचान

युग को क्या हुआ है

 

डॉ विनय जी प्रतीकात्मक भाषा में समय पर करारी चोट करते हैं, जबकि समय-सत्य को देखते-परखते हुए बेबाक लहजे में रमाकांत जी कुछ इस प्रकार से लिखते हैं-

महाभारत फिर न हो/ यह देखियेगा

फिर वही बातें/ वही चालें पुरानी

 

राजधानी में लुटी है/ द्रोपदी फिर

खेलती रस्साकसी/ नेकी-बदी फिर

 

कौन जीते, कौन हारे देखियेगा

धर्म ने फिर ओढ़ लीं खालें पुरानी।

 

कहना न होगा कि ‘नवगीत वाङ्मय’ में सम्मिलित सभी नवगीतकार समय की रंगत को अपनी-अपनी नजर से देख रहे हैं और व्यक्त कर रहे हैं।

संकलन के तृतीय अध्याय- ‘अथ-बोध’ में ‘नये-पुराने’ पत्रिका के यशस्वी संपादक दिनेश सिंह का आलेख- ‘गीत की संघर्षशील जयी चेतना’ बेहद पठनीय है। यह आलेख नवगीत लिखने-पढ़ने वालों के लिए बहुत उपयोगी भी है। यह कहना उचित ही है कि दिनेश सिंह ने ताउम्र नवगीत के लिए कोई समझौता नहीं किया। ऐसा विरले ही देखने को मिलता है।

अंतिम खण्ड- ‘साक्षात्कार’ का है- ‘नवगीत : न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अभिव्यक्ति।’ संपादक द्वारा पूरे गए प्रश्नों के जवाब डॉ मधुसूदन साहा ने बिना लाग-लपेट के खरे-खरे शब्दों में दिए हैं। गद्य लेखन की तरह ही, साहा जी के गीत-नवगीत भी सहज और सम्प्रेषणीय होते हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार में साहा जी पर्दे के भीतर से नहीं, पर्दा उठाकर अपनी बात रखते हैं; उन्होंने कई रहस्यों का पर्दाफाश भी किया है।

इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी नवगीतकार को छोटा या बड़ा नहीं दिखलाया गया है और न ही किसी की कमियों को गिनाया गया है। इसमें छः राज्यों से चुने गए नवगीतकारों की वैचारिकी एवं नवगीतों में क्या विशेषताएँ हैं, बस इसे ही संपादक ने बताने की कोशिश की है। संप्रेषित नवगीत, आलेख, साक्षात्कार संप्रेषण में कितना सफल हुए हैं, यह सब भी पाठकों पर छोड़ दिया गया है। ‘नवगीत वाङ्मय’ के यशस्वी संपादक डॉ अवनीश सिंह चौहान स्वयं हिंदी और अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हैं, इसलिए आशा है कि उनके पाठक भविष्य में ‘नवगीत वाङ्मय’ का मूल्यांकन करेंगे ही। इस श्रमसाध्य कार्य के लिए डॉ अवनीश सिंह चौहान को ढेर सारी बधाइयाँ।

 

पुस्तक : नवगीत वाङ्मय

संपादक : अवनीश सिंह चौहान

प्रकाशक : आथर्सप्रेस, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष : 2021 (संस्करण प्रथम, पेपर बैक)

पृष्ठ : 174, मूल्य रु 350/-

 

डॉ रणजीत पटेल

अलकापुरी, भगवानपुर, मुजफ्फरपुर-842001 (बिहार)

मो. 94314 75283




जैसे हबूब गया

 
नवगीत-जैसे हबूब गया

 
सूरज निकला सुबह-सुबह
शाम को डूब गया।
 
किरणों ने 
दुनिया में
धूप की चादर फैलाई।
संगीत फूटा 
निर्झर से
कल-कल की ध्वनि आई।।
 
ये कैसी चहल-पहल थी कि
मन ही ऊब गया।
 
हवाएँ बर्फीली
तन में
सुईयाँ चुभाएँगी।
चिड़ियाँ गुम्बद पर
सुबह-सुबह
प्रभाती गाएँगी।।
 
धुला-धुला सा मौसम है
जैसे हबूब गया।
 
अंबर से बहारें
अप्सरा सी
बाग में उतरीं।
आज वसुंधरा
लग रही है
बिल्कुल साफ-सुथरी।।
 
और प्रेयसी के जीवन से
है महबूब गया।
 
अविनाश ब्यौहार
जबलपुर मप्र
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 



यातायात

 
यातायात-नवगीत

 
यातायात मन में
दु:ख-विषाद का
चल रहा है।
 
जगह-जगह हो रही
दुर्घटना है।
हो चाहे भोपाल
या पटना है।।
 
हैं कैसा समय
चाँदनी का
रूप जल रहा है।
 
धूल-धुंध में डूबी
हैं हवाएँ।
यहाँ पर पखेरू
मर्सिया गाएँ।।
 
घटाएँ घिरी हुई
और मौसम
बदल रहा है।
 
अविनाश ब्यौहार
जबलपुर मप्र



मीना कुमारी नाज़ की शायरी

मीना कुमारी नाज़ की शायरी
डॉ. वसीम अनवर

सहायक प्राध्यापक

उर्दू  एवं फारसी विभाग

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,  सागर, मध्य प्रदेश

[email protected]; 9301316075

            मीना कुमारी को एक अव़्वल दर्जा की फ़िल्मी अदाकारा के तौर पर सारी दुनिया जानती है। इन्होंने अपनी अदाकारी से मुख़्तलिफ़ इन्सानी कैफ़ियात, जज़्बात, एहसासात और तजुर्बात की तर्जुमानी की है। ट्रेजेडी क़ुईन के ख़िताब से नवाज़ी जाने वाली अदाकारा मीना कुमारी का असल नाम माहजबीं बानो था। वो बेहतरीन अलमीया (ट्रेजेडी) अदाकारा होने के साथ साथ एक काबिल-ए-तारीफ़ रक़ासा, अच्छी गुलूकारा और बाक़ायदा शायरा भी थीं। माहजबीं बानो, नाज़ तख़ल्लुस करतीं थीं। कहा जाता है कि तरक़्क़ी-पसंद शायर कैफ़ी आज़मी और राईटर शायर गुलज़ार से अपने अशआर पर इस्लाह लिया करती थीं। लेकिन मीना कुमारी का शायरी का आहंग कैफ़ी आज़मी के बजाय गुलज़ार से क़रीबतर है। गुलज़ार और मीना कुमारी के दरमयान एक जज़्बाती रिश्ता था। मौत से क़ब्ल मीना कुमारी ने तक़रीबन ढाई सौ निजी डायरीयां गुलज़ार को सौंप दी थीं। गुलज़ार ने इन डायरियों से मुंतख़ब कलाम को ‘’तन्हा चांद’’ के नाम से तर्तीब देकर छपवा दिया। मीना कुमारी नाज़ का मजमुआ ए कलाम ‘’तन्हा चांद’’ में उनकी नज़्में और ग़ज़लें शामिल हैं। मीना कुमारी को अदाकारी से ज़्यादा शायरी पसंद थी, इन्होंने एक मर्तबा इंटरव्यू देते हुए कहा था कि अदाकारी मेरा पेशा है और शायरी करना मेरा शौक़। फ़ुर्सत के लमहात वो अपने शौक़ के मुताबिक़ उर्दू के मयारी रसाइल-ओ-जराइद पढ़ कर और शेअर कह कर गुज़ारा करती थीं। मीना कुमारी को पढ़ने का बहुत शौक़ था, उनकी अपनी ज़ाती लाइब्रेरी भी थी। ग़ालिब और फ़ैज़ अहमद फैज़ उन के पसंदीदा शायर थे।
            मीना कुमारी नाज़ के शेअरी मजमुआ ए कलाम ‘’तन्हा चांद’’ का मुताला करने के बाद ये बात आसानी से कही जा सकती है कि उनके अशआर सतही फ़िल्मी गीतों से मुख़्तलिफ़ हैं। ये भी एक हक़ीक़त है कि उनकी कुछ नज़्में और ग़ज़लें सहल-ए-मुम्तना के ज़ुमरे में आती हैं। लेकिन मुताद्दिद नज़्में और ग़ज़लें हद दर्जा जानदार और पुर-असर हैं जो उन्हें उर्दू अदब के ऐवान में मुक़ाम दिला सकती हैं। अपने मुताल्लिक़ लिखती हैं:
राह देखा करेगा सदीयों तक
छोड़ जाऐंगे ये जहां तन्हा
       मीना कुमारी नाज़ ख़ुदादाद शायरा थीं, लेकिन ज़िंदगी उनके महबूब की तरह बेवफ़ाई कर गई। उनकी सलाहीयतों में थोड़ी सी पुख़्तगी की ज़रूरत थी। फिर भी उनकी बेहतरीन नज़्मों में ये कमी तक़रीबन नज़र नहीं आती है। मीना कुमारी नाज़ की तख़लीक़ात रूमानी, शख़्सी या दाख़िली किस्म की हैं। उनकी रूमानियत सेहतमंद, ज़िंदगी बख़श, तसन्ना ओ बनावट से आज़ाद है। उनका अंदाज़ बयान सादा और पुर कशिश है। जो बात दिल से निकलती है दिलों पर-असर करती है। तन्हाई की शिद्दत, ख़ुलूस-ओ-मुहब्बत की तलाश और हसरत-ओ-यास की अफ़्सुर्दगी मौजूद है। मीना कुमारी को फिल्मों से बेहद मक़बूलियत और इज़्ज़त हासिल हुई। लेकिन ज़िंदगी के गहरे मुशाहिदे ने उन्हें अफ़्सुर्दा बना दिया उनका महबूब उनके दल के क़रीब नहीं आ सका और वो तन्हा ही रहीं। इस तन्हाई को इन्होंने दिल की गहिराईयों से महसूस किया:
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस छिप गया तारा
थर थराता रहा धुआँ तन्हा
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा
इस तन्हाई को मिटाने के लिए वो हमेशा अपनों में अपने को तलाश करती रहीं, लेकिन उन्हें कोई हक़ीक़ी हमसफ़र नहीं मिल सका। वो इस वसीअ ख़ार-ज़ार दश्त-ए-हयात में उदास और तन्हा चलती रहीं:
उदासियों ने मेरी आत्मा को घेरा है
रुपहली चांदनी है और घुप अंधेरा है
कहीं कहीं कोई तारा कहीं कहीं जुगनू
जो मेरी रात थी वो आपका सवेरा है
ख़ुदा के वास्ते ग़म को भी तुम ना बहलाओ
उसे तो रहने दो मेरा, यही तो मेरा है
नज़्म टूटे रिश्ते झूठे नाते में इसी तन्हाई, बेगानगी और झूठे रिश्ते का इज़हार मिलता है। होशमंद दिमाग़ अकेले दिल के रोने की मुख़ालिफ़त कर रहा है:
टूट गए सब रिश्ते आख़िर
दिल अब अकेला रोय
नाहक़ जान ये खोए
इस दुनिया में कौन किसी का
झूठे सारे नाते
       मीना कुमारी नाज़ के बेशतर अशआर हैजानअंगेज़ी और जज़्बातीयत से पाक हैं। शायरा का दिल दोस्ती और इन्सानी रिश्तों के वहम से आज़ाद हो कर ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों से हमकिनार है। इन्होंने अपनी मुंतशिर ज़िंदगी के एहसास को कभी कभी बड़े ही जदीद और फ़नकाराना अंदाज़ में पेश किया है:
टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली
रिमझिम रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है अमृत भी है
आँखें हंस दें दिल रोया, ये अच्छी बरसात मिली
……………………
ना इंतिज़ार, ना आहट, ना तमन्ना, ना उम्मीद
ज़िंदगी है कि यूं बे-हिस हुई जाती है
इक इंतिज़ार मुजस्सिम का नाम ख़ामोशी
और एहसास ए बेकरां पे ये सरहद कैसी
ज़िंदगी किया है? कभी सोचने लगता है ज़हन
और फिर रूह पर छा जाते हैं
दर्द के साय, उदासी का धुआँ, दुख की घटा
दिल में रह-रह कर ख़्याल आता है
ज़िंदगी ये है? तो फिर मौत किसे कहते हैं?
       सच्ची मुहब्बत से मुताल्लिक़ नज़्में और ग़ज़लें बेहद जानदार और अच्छी हैं। इन अशआर में शायरा अपनी रूह की गहिराईयों से अपने एहसासात और तजुर्बात को क़लम-बंद करती है। मुहब्बत के हसीन लमहात को वो अपने दामन-ए-दिल से लिपटा कर बे-ख़ुद और सरशार नज़र आती है। मुहब्बत के मौज़ू पर उनकी कई अच्छी नज़्में हैं, जिनमें तजुर्बे की सच्चाई, बेपनाह जज़्बा ए मुहब्बत, नाक़ाबिल ए तशरीह कैफ़-ओ-सर-मस्ती, फ़ित्री तसलसुल, रवानी और पुरसोज़ आहंग मौजूद है:
मसर्रतों पे रिवाजों का सख़्त पहरा है
ना जाने कौनसी उम्मीद पे दिल ठहरा है
तेरी आँखों में झलकते हुए ग़म की क़सम
ए दोस्त दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है
…………………………
मेरे दर्द तमाम
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों से
तो इक मस्जिद-ए-वीराँ है मैं तेरी अज़ां
अज़ां जो
अपनी ही वीरानगी से टकराकर
ढकी छिपी हुई बेवा ज़मीं के दामन पर
पढ़े नमाज़, ख़ुदा जाने किस को सजदा करे
       मुहब्बत की सरमस्ती शायरा के दिल-ओ-दिमाग़ पर जारी-ओ-सारी है। उसने अपनी बेपनाह मुहब्बत का अमृत इन अशआर में उंडेल दिया है। ये शायरी मौसीक़ी और बातिनी आहंग से पुर है।
       मीना कुमारी नाज़ुकी कुछ नज़मों और ग़ज़लों में ख़्वाहिश-ए-नफ़सानी का ज़िक्र है, लेकिन हिजाब के साथ। इन अशआर में जिस्मानी लग़ज़िशों का एतराफ़ और शख़्सी ज़िंदगी का इन्किशाफ़ मिलता है:
हया से टूट के आह, कॉपती बरसात आई
आज इक़रार-ए-जुर्म कर ही लें वो रात आई
घटा से होटों ने झुक कर ज़मीं को चूम लिया
हाय उस मल्गुजे आँचल में कायनात आई
ठंडा छींटा पड़े जैसे दहकते लोहे पर
नूर की बूँद लबों से जो मेरे हाथ आई
इन अशआर में जिन्सी तजुर्बे का इज़हार निहायत ही उम्दा और फ़नकाराना है। मुहब्बत और ख़ाहिश नफ़सानी की तसकीन दोनों एक दूसरे की तकमील करती हैं। दहकते लोहे से शहवानी जिस्म की मुशाबहत बिलकुल साफ़ और मानी-ख़ेज़ है। इसी तरह की कुछ और मिसालें मुलाहिज़ा हों:
ओस से गीली गीली कासनी छाओं में
धानी धानी हथेली रात की चूम कर
चैन सा पा गए
चैन सा पा गए
रात घुटने लगी
दर्द बढ़ने लगे, ग़म सुलगने लगे, तन झुलसने लगे
ये कैसा पड़ाव है इस रात का?
दिल के चारों तरफ़ चैन ही चैन है
ना उधर नींद है ना उधर नींद है
……………………
मेरी रूह भी जिला ए वतन हो गई
मेरा जिस्म इक सेहन हो गया
कितना हल्का सा हल्का सा तन हो गया
जैसे शीशे का सारा बदन हो गया
मेरा दिल बेवतन बेवतन हो गया
नज़्म चाहत में भी इसी तरह की कैफ़ीयत का इज़हार मिलता है:
फिर से चाहत ने सर उठाया है
गर्म मिट्टी की तप्ती भाप जैसे
सर उठाए और प्यासी आँखों से
अपनी क़िस्मत का आसमां से सौदा करले
अपने झुलसे हुए बदन के लिए
इस की कुछ देर की साअत के लिए
नज़्म महंगी रात मैं इस तजुर्बा को पशेमानी के साथ पेश किया गया है:
जलती बुझती सी रोशनी के परे
हम ने एक रात ऐसी पाई थी
रूह को दाँत से जिसने काटा
जिसकी हर अदा मुस्कुराई थी
जिसकी भींची हुई हथेली से
सारे आतिश-फ़िशाँ उबल उठे
जिसके होंटों की सुर्ख़ी छूते ही
……………………
आग सी तमाम जंगलों में लगी
राख माथे पे चुटकी भर के रखी
ख़ून की ज्यूँ बिंदिया लगाई हो
किस क़दर जवान थी
मिसमिसी थी
महंगी थी वो रात
हमने जो रात यूंही पाई थी
       मीना कुमारी नाज़ की कुछ नज़्मों में फ़लसफ़ियाना रंग भी है। खिड़की, लम्हे, ख़मोशी, बादल और चट्टान, सुहानी ख़ामोशी, ग़म की तलाश, एक पत्थर और ख़ाली दुकान इसी तरह की नज़्में हैं। नज़्म लम्हे में वो कहती हैं कि लम्हे नाक़ाबिल गिरिफ़त हैं। बरसात की बूँदों की तरह हाथ से फिसल कर टूट जाते हैं। इसी तरह नज़्म खिड़की में शायरा ने ला-महदूद वक़्त के ला मुतनाही, ग़ैर वाज़िह पैकर को महसूस करते हुए यूं पेश किया है:
ज़माना है माज़ी
ज़माना है मुस्तक़बिल
और हाल एक वाहिमा है
किसी लम्हे को मैंने जब
छूना चाहा
फिसल कर वो ख़ुद बन गया एक माज़ी
       नज़्म ख़मोशी में भी वक़्त ही को समझने की कोशिश की गई है। उफ़ुक़ की कड़ी कहाँ से शुरू हो कर कहाँ ख़त्म होती है किसी को मालूम नहीं:
कहाँ शुरू हुए ये सिलसिले कहाँ टूटे
ना उस सिरे का पता है ना उस सिरे का पता
       ”ख़ाली दुकान में मौजूद माद्दी दुनिया को ख़ाली दुकान से तशबीह दी है। यहां शायरा को वो चीज़ नहीं मिलती जिसकी वो ख़रीदार हैं, वो प्यार का लम्स चाहती है जो बेचैन रूह को तसकीन दे सके। वक़्त की दुकान इस से ख़ाली है। यहां तो सिर्फ शौहरत के काग़ज़ी फूल, मसनुई मसर्रतों के खिलौने हैं।
नज़्म एक पत्थर और बच्चा में मुंजमिद झील के संजीदा पानी पर शरीर बचा के पत्थर फेंकने से फ़नकारा को बड़ी तकलीफ़ होती है। दर्द-आश्ना और हद दर्जा हस्सास दिल महसूस करता है कि बच्चा की इस हरकत ने झील को ज़ख्मी कर दिया है। फैली हुई लहरें झील का काँपता हुआ दिल है अगर दुनिया का हर फ़र्द इतना ही दर्द-आश्ना हो जाये तो ये दुनिया जन्नत बन जाये।
       नज़्म सुहानी ख़ामोशी में शायरा अपनी सुहानी मौत का तसव्वुर करती है। मौत शायरा के लिए भयानक नहीं, वो मानती है कि मौत के बाद अगरचे महिज़ खला है, सिर्फ तारीकी है, लेकिन वो तारीकी इस करब अंगेज़ उजाले से यक़ीनन बेहतर होगी।
       मीना कुमारी नाज़ की शायरी के बड़े हिस्से का शेअरी आहंग, गुलज़ार के शेअरी आहंग से क़रीब नज़र आता है। लेकिन कैफ़ी आज़मी की शायरी के असरात भी इन्होंने क़बूल किए हैं। मिसाल के तौर पर कुछ अशआर मुलाहिज़ा हों:
हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुपके से दवा जान के खाया होगा
(कैफ़ी आज़मी)
आबला-पा कोई इस दश्त में आया होगा
वर्ना आंधी में दिया किस ने जलाया होगा
ज़र्रे ज़र्रे पे जड़े होंगे कँवारे सज्दे
इक-इक बुत को ख़ुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए होंटों की बुझाई होगी
रिस्ते पानी को हथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरा पत्थर
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
(मीना कुमारी नाज़)
       बहैसीयत मजमूई मीना कुमारी नाज़ एक ख़ुदादाद शायरा थीं। अगर ज़िंदगी वफ़ा करती और उन्हें तख़लीक़ी सफ़र के लिए कुछ वक़्त और मिला होता तो वो उर्दू की और भी अच्छी शायरा हो सकती थीं। उनकी शायरी एक सच्चे दिल की आवाज़ है, जिसमें सादगी, कशिश, हज़न-ओ-मलाल, करब-ओ-अंदोह के अनासिर, अफ़्सुर्दगी और सेहत मंद रूमानियत मौजूद है। अगर वो अदाकारा ना होतीं और सिर्फ अपनी शायरी छोड़कर इस दुनिया से रुख़स्त हो जातीं तो भी ये शायरी उनका नाम रोशन करने के लिए काफ़ी थी।
٭

 

 

 

 

٭٭

Dr. Waseem Anwar

Assistant Professor

Department of Urdu

Dr. Harisingh Gour Vishwavidyalaya Sagar MP

[email protected], 9301316075




हाइकु

माँ हो कर ही

जाना जा सकता है

माँ का होना भी

 

काँधे पे पेट

सिर पर गठरी

कोरोना यात्रा

 

धूप से लड़े

हमको छाया देने

पिता सा पेड़

 

जीवन छोड़

लाशों को ही चाहती

ये गिद्ध वृति

 

उलूक यारी

उजाले की क़ीमत

अंधेरा तारी

 

अयानों हेतु

सयानों का छलावा

मौत भी मोक्ष

 

बैल ? तो कोल्हू

जो खाने हों बादाम ?

बन जा मिट्ठु ।

 

फिर पुकारे

मन अँगुलीमाल

आओ ना बुद्ध !

 

पेड़ पिता

सौंपते अंतस भी

फले औलाद

 

पेड़ से पन्ना

पन्ने पे माँडा पेड़

बचाने पेड़

 

धेले बिकते

इंसान यहाँ पर

महँगाई है ?

 

नहीं कहता

वो जो नहीं सहता

कथा बिवाई

 

लगे इधर

और मिले उधर

राज की नीति

 

यक़ीं का खेल

माटी की गुल्लक में

सोने के सिक्के

 

बिन लश्कर

प्यार से जग जीते

वो कलंदर

 

मेघ गठरी

बाँटे पनियाँ मोती

कहाए वर्षा

 

बढ़ती हुई

जनसंख्या दिखाती

आदमी कमी

 

मर्जी हमारी

जब चाहे कह  दें

गधे को बाप |

 

टँगोगे उल्टा

जब कभी करोगे

वल्गल यारी |

छुपती रहे

दम्भ चढ़ी, पाँ जली

फूँकूँ रावण




कस्तूरी

कस्तूरी

मेरीकस्तूरी

मुझे देती रही भटकन

……… उम्रभर

जो मरा

तो जाना

कि

मारा भी गया

इसी के लिए




अभिषेक करें जनवाणी का

अभिषेक करें जन वाणी का

================

  अभिषेक करें जन वाणी का

  नागरी का, दीव्यागीर्वाणी का

  ओंकार जन्मा, संस्कृत सृष्टा

  जग वन्दिनी, देवनन्दिनी

  खलिहानखनक, मात वाणी का

  अभिषेक करें जन वाणी का |

  हिमाला ताज़, सागर लाज़

  थार की थाती, वाङ्ग ज्योति

  सिन्ध स्वरा, देहात वाणी का।

  अभिषेक करें जन वाणी का |

  सलोनीसरल, मृदुलतरल

  जन भारती, राष्ट्र आरती

  तम तिरोहिता, जन कल्याणी का।

  अभिषेक करें जन वाणी का |

  संस्कृति दर्पण, इतिहास दर्शन

  सृजन गंगा,   भक्ति उमंगा

  सर्वस्व अर्पणा, वीणापाणी का।

  अभिषेक करें जन वाणी का |

  संधान करें, व्यवहार करें

  सम्मान करें, जय गान करें

  निज भाषा, राष्ट्र वाणी का |

  अभिषेक करें जन वाणी का |

  चरणाभिषेक करें, वीणापाणी का।




श्रेष्ठ इक्यावन कविताएँ : हिन्दी कविता का वैश्विक प्रतिबिम्ब – डॉ सम्राट् सुधा

भारत -रत्न , पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर गत वर्ष आयोजित अंतरराष्ट्रीय अटल काव्य- लेखन प्रतियोगिता में चयनित 51 कविताओं का संग्रह ‘श्रेष्ठ इक्यावन कविताएं’ इसी माह प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की सभी कविताएं अटल जी पर नहीं हैं, परन्तु भारतीयता और भारतीय मूल्यों के उनके विचारों का ही ये सभी कविताएं उत्कृष्ट प्रतिबिंब हैं।

समीक्षा से पूर्व यह बता देना समीचीन होगा कि ऊपर्युक्त प्रतियोगिता का आयोजन सृजन आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई-पत्रिका द्वारा किया गया था। उसमें प्राप्त लगभग 1500 कविताओं में से चयनित ये 51 कविताएं हैं, जिनका प्रकाशन सिक्किम विश्वविद्यालय की उद्यानिकी विभाग की असिस्टेन्ट प्रोफेसर डॉ. सुजाता उपाध्याय और प्रकाशन संस्थान न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन के वित्तीय सहयोग से सम्भव हुआ और इसमें प्रतियोगियों से प्रतिभाग से लेकर पुस्तक दिये जाने तक कोई धनराशि नहीं ली गयी।

इस काव्य -संग्रह की कविता ‘ पानी’ में कवयित्री डॉ. स्मृति आंनद समाज में व्याप्त बाज़ारवाद एवं क्रूरता पर करारी चोट करती हैं-
“काले घेरों में कैद
उन आँखों में
तुम्हारी वेदना के लिए
तब न होगा पानी
क्योंकि वह मर चुकी होगी
सदियों पहले
उसकी हो चुकी होगी हत्या।”

प्रभु श्रीराम जैसा नहीं बन पाने की दशा में उन-सा तनिक ही बन जाने का सन्देश देती है ऋषि देव तिवारी की रचना ‘ तुम राम नहीं बन सकते तो’-
“निंदित कर्मों के बीच फंसे
सत्कर्मों के अभिराम बनो
तुम राम नहीं बन सकते तो
कण के एक भाग-सा राम बनो !”

देश की अस्मिता एवं प्रकृति को उभारती है अजय कुमार पाण्डेय की रचना ‘ देश।’ एक अंश द्रष्टव्य है –
“देश नहीं होता केवल
राजमार्ग से गांवों तक
देश नहीं बनता है केवल
अट्टालिकाओं की छांवों तक।”

देश की पुरातम महिमा को प्रतिष्ठित करने के स्वर मनीषी मित्तल की कविता ‘ भाषा के भगवान्’ में दृष्टिगोचर होते हैं –
“कर प्रयास भारत को फिर से
सोने की चिड़िया बनाना है
अखंड भारत का कर निर्माण
राम राज्य फिर से लाना है ।”

कोरोनकाल में अपने घर लौटते व्यक्ति की मनोदशा को स्वर देती है इन पंक्तियों के लेखक की कविता ‘ कालचक्र के माथे पर।’ ये अंश द्रष्टव्य हैं-
“मैंने उससे दुखड़ा पूछा
आंखें उसकी उबल गयीं
भीतर की जिज्ञासा मेरी
मरु बनी और सिमट गयी
मैंने कामकाज का पूछा
गला उसका रुँध गया
बिना कहे वो सारा कहकर
कहना था जो चला गया !”

संग्रह में सम्मति के रूप में विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरीशस के महासचिव प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र के कविता एवं कवि के संदर्भ में विचार पठनीय हैं।
संग्रह की सभी कविताएं काव्यात्मक मानक पर कितनी उपयुक्त हैं ,इससे अधिक महत्त्व इस बात का है कि संग्रह का प्रकाशन बेल्लारी ( कर्नाटक ) के एक फाउंडेशन ने किया है। इस संग्रह में हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अतिरिक्त अहिन्दी भाषी ही नहीं , विदेशों में भी हिन्दी में रचना कर रहे रचनाकारों की रचनाएं हैं।इस दृष्टि से हिन्दी के देशीय एवं वैश्विक रचनाकर्म को समझने का यह संग्रह एक माध्यम है। इसी रूप में काव्य – संग्रह ‘श्रेष्ठ इक्यावन कविताएं’ पढ़ा व समझा जाएगा , ऐसी आशा है !

■ समीक्षित कृति : श्रेष्ठ इक्यावन कविताएँ
■ सम्पादक : डॉ. शैलेश शुक्ला
■ प्रकाशक : न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन, बेल्लारी ( कर्नाटक )।
■ मूल्य : ₹ 251
■ समीक्षक : डॉ. सम्राट् सुधा




रज्जो /RAJJO

                        रज्जो

 रात के दस बज रहे होंगे। कॉलनी के गेट से होकर आ रही मिलिट्री हॉस्पिटल की वैन देखकर हैरान रह गयी | इस समय कौन सी इमरजेंसी है ? अजीत को बुलाने जैसे ही मुडी , तब तक वैन हमारे क्वार्टर के सामने आ चुकी थी।

‘मास्टरनी, मास्टर जी को बुलाइए ज़रा ‘ तिवारी की आवाज।

वैन का सायरन सुनकर तब तक अजीत भी  दरवाजे तक पहुंच चुका था। तिवारी से बात करते वक्त अजित के चेहरे पर दिखी घबराहट ने दिल की धड़कन और बढ़ा दी ।

‘दुर्गा प्रसाद की बीवी अस्पताल में है,तुम जल्दी तैयार हो जाओ |’ अजित ने कहा |

क्या उसकी डेलिवेरी हो गयी ?’ मैंने खुशी-खुशी पूछा |

‘ नहीं उसका एक्सीडेंट हो गया है | केरोसीन से शरीर पूरा जल गया है  | बचने की कोई उम्मीद नहीं | वह तुम से मिलना चाहती है |’ अजी उसी रौ में बताता  जा रहा था ,मैं कुछ बता  नहीं पायी , वहीँ कि वहीँ जड़ होकर खडी रही | कब वान पर चढी ,कब हम अस्पताल पहुंचे ,होश ही नहीं रहा |      

रज्जो… रजवंती… कुलवंदसिंह कॉलोनी के नए क्वार्टर में मेरी मदद के लिए आयी थी वह । लान्स नायिक दुर्गा प्रसाद की पत्नी। शादी के बाद जब मैं पटियाला पहुंची तो ऐसा लग रहा था  जैसे मेरी जड़ें ही उखड़ गई हों। कुलवंद सिंह कॉलोनी के 25 क्वार्टरों में एक में भी कोई मलयाली परिवार नहीं था । एकमात्र सांत्वना थी अजी का साथ  और प्यार | रजवंती, जिसे सब रज्जो बुलाती थी, मास्टरजी की पत्नी को गृहकार्य में मदद करने के लिए आयी थी ।  गेहूँवा रंग, रूखे – सूखे बाल ,गोल-गोल सुडौल गाल और पान के दाग भरे दांत …और सबसे आकर्षक थी उसकी वे बड़ी-बड़ी आँखें हर चीज़ को उत्सुकता से देखती थी | जब वह अपने गंदे दांतों को दिखाकर  हंसती थी , तो लगता था कि उसकी  आंखें भी हंसने लगती हैं ।

नयी जगह और नए परिवेश से परिचित होने में  रज्जो ने ही मेरी मदद की थी । हिंदी में एम .ए किया है तो क्या हुआ , स्थानीय भाषा के बिना बाजार जाना बहुत मुश्किल था । अपने व्यस्त काम  के दौरान अजी हमेशा मेरे  साथ आ भी नहीं पाते थे। वहीं पर रज्जो का साथ काम आया | उसके साथ मैंने यात्रा करना सीखा, बाज़ार जाकर चीज़ें खरीदना सीखा  और वहां के निवासियों के साथ हिल-मिलकर रहना भी सीखा । इसके साथ मुझे एक नाम भी मिला ‘मास्टरनी’ ।     

इसी बीच अनपढ़ रज्जो को हिंदी पढ़ाने का जिम्मा उठाया था मैंने  । सिर्फ एक टाइम पास के लिए शुरू किया था  ,पर  इसने मेरी जिंदगी ही बदल दी। रज्जो के बाद श्रीरामनगर के  सिपाहियों की पत्नियां एक-एक कर पढ़ने आने लगीं । कुछ   तो अपने बच्चों को भी साथ ले आयी  तो  कुछ   बूढ़ी माताओं को |  बुजुर्गों के लिए  साक्षरता क्लास  और बच्चों के लिए ट्यूशन … मेरे  अध्यापन  करियर की शुरुआत वहीँ पर हुई | पाँच साल से लेकर पचपन साल  की उम्र तक के शिष्य बने | रज्जो सबकी मुखिया थी । अपने गाँव  से इतनी दूर आकर जो अजनबीपन और अलगाव का बोध दिल में उग आया था वह धीरे-धीरे बदलने लगा । मैं वहां पूरी तरह रम गयी  । मेरे  इस बदलाव से सबसे बड़ी  राहत अजी को ही मिली थी , अब तो रोज़ उन्हें मेरी शिकायत सुननी नहीं पड़ती  थी | मज़ाक –मज़ाक में उनके दोस्त भी कहा करते थे , ‘ मास्टरजी ,अब तो आप से भी पोपुलर हो गयी है  मास्टरनी |  आर्मी वूमेन वेलफेयर एसोसिएशन के सहयोग से महिलाओं के लिए कई काम करने में मुझे सक्षम बनाया था रज्जो के लिए शुरू की गयी साक्षरता क्लास  |      

इस बीच, इस एहसास ने कि हमारे जीवन में एक नया मेहमान आ रहा है, जीवन को और भी खुशहाल बना दिया | खुशखबरी रज्जो को सुनायी ,फिर तो एक परछाई की तरह वह मेरे पीछे ही रही | सचमुच एक माँ की तरह |  ‘मास्टरनी , आपको लड़का होगा लड़का ।’  हर दिन जब वह यह कहती रही तो उसे चिढाने के लिए मैंने कहा, ‘लड़की पैदा हुई  तो क्या होगा ? हमें तो लडकी चाहिए | ‘ उसके चेहरे की मुस्कान तुरंत फीकी पड़ गई थी | बाद में हमारा वह नन्हा सपना जब पेट में ही ख़तम हो गया  तो मुझे दिलासा  देने के लिए वह दिन रात मेरे साथ रही | उन्हीं दिनों उसने मुझे अपनी कहानी सुनायी थी |       

        चौदह साल की थी वह जब  उसकी शादी दुर्गाप्रसाद के साथ हुई थी | महाराष्ट्र के गाँवों में छोटी उम्र में ही लडकी-लड़के का ब्याह होता है | शादी के बाद वह गर्भवती हुई , गाँव के डाक्टर ने स्कैन करके बताया कि लडकी होनेवाली है | इसीलिये पति ने उसका गर्भपात करवाया | एक बार नहीं तीन-तीन  बार। सास  उसे यह कहकर कोसती थी कि लड़कों को जन्म न देनेवाली  परिवार के लिए अभिशाप है। उसके हर काम में वह मीन-मेख निकालती थी ,खरी खोटी सुनाती थी | अब तो सास उसे  ससुराल आने ही नहीं देती | छुट्टियों में जब दुर्गा प्रसाद गाँव जाता है  तो रज्जो यहीं क्वार्टर्स में ही रहती है । अब वह फिर से मां बननेवाली है | पर अपने पति से उसने यह बात छुपायी है |

‘मैं माँ बनना चाहती हूँ मास्टरनी, कितनी बार अपने बच्चों को यूं मारती रहूँ ? अब चाहे लड़का हो या लडकी ,मुझे इसे जनाना है |’  इसलिए  उसने अभी तक अपने पति को यह जानकारी नहीं दी है।

‘ पर कब तक रज्जो ?’ मैंने पूछा | ‘कुछ महीने बाद उसे अपने आप ही पता चलेगा |’  मैंने उसे सलाह दी कि एक और गर्भपात उसके जीवन को खतरे में डाल देगा और इसलिए ऐसा नहीं होने देना चाहिए चाहे कुछ भी हो जाए।      

रात को मैंने रज्जो के बारे में अजीत को बताया | अजीत ने दुर्गा प्रसाद को बुलाकर बात की | मास्टरजी के सामने तो सिरर हिलाकर वह सब कुछ सुनता रहा | मास्टरजी के साथ वह बहस नहीं कर सकता था |

रज्जो उसके बाद भी घर आती रही |  कल जब मैंने उसे देखा तो उसकी आँखों में बड़ी थकान थी। आठवां महीना था और इसलिए मैंने उसे यह कहकर वापस भेज दिया कि अब काम पर न आना। उसे आराम की ज़रुरत थी | वह फिर वहीं खड़ी रही मानो कुछ कहना बाकी हो । मैं बच्चों की  ट्यूशन में इतनी व्यस्त थी  कि उनकी ओर  ध्यान देने का समय नहीं था और यह भी पता नहीं चला कि वह कब लौट गयी ।     

‘सुमा , चलो,उतरो ..अस्पताल आ गया ।‘ अजीत की आवाज़ एकदम चौंकानेवाली थी …मेरा ह्रदय जोर-जोर से धड़कने लगा | मारे भय के मैं कांप रही थी | रज्जो का सामना कैसे करूँ ?

‘मैं क्या कर सकती हूँ अजी , रज्जो ने मुझसे मिलने को क्यों कहा है …आखिर उसको यह एक्सीडेंट हुआ कैसे ?’’ मैं रो रही थी |

” ये सब उस  साले दुर्गाप्रसाद की करामत है ‘..अजी की आवाज़ में रोष था | उसने बेचारी रज्जो के शरीर पर केरिसिन डालकर जलाया था | गाँव में किसी डाक्टर को दिखाया तो उसने बताया पेट में लडकी है … गर्भपात अब संभव नहीं  है, क्योंकि यह आठवां महीना है… बस ‘’ कहते –कहते अजी की साँसें फूल रही  थी |

‘ सुमा ,केवल तुम्हें  अंदर जाने की अनुमति है । पड़ोसियों से थोड़ी सी जानकारी ही मिली  है | उसी के तहत  आर्मी  पुलिस ने दुर्गा को  हिरासत में ले लिया है , पर  रजवंती ने अब तक कोई बयान नहीं दिया है। उसका बयान ही दुर्गा को सज़ा दे सकता है | इसीलिये तुम्हें लाया गया | तुमसे तो रज्जो सब कुछ बतायेगी न |’  अजीत की बातों से उसे हादसे की पूरी जानकारी मिली |  

तो क्या यही आपत्ति जताने के लिए कल वह घर में आयी थी ? मैंने टाल दिया था उसे … क्या मैं उसे बचा सकती थी ? दिमाग में कई प्रश्न एक साथ आने  लगे | क्या मैं बचा सकती थी उसे ?

सहसा अजीत ने पीछे से पुकारा,       “उस साले को  ऐसे मत छोड़ो सुमा , रज्जो से बयान दिलवाना ज़रूर  |’

आई सी यू वार्ड की तीखी गंध नाक में भर रही थी | भय के मारे मैं  थर-थर कांप रही थी | पुलिस ने सीधे मुझे रज्जो को पास  पहुंचाया |

ओह..कितना भयानक था वह दृश्य …सिर्फ ..सिर्फ एक बार ही उस अध जले  चेहरे देख पाया  | रज्जो के चेहरे का एक हिस्सा पूरी तरह विकृत हो गया था | शरीर पूरा ढका हुआ था ताकि और कुछ दिखाई न दे | वेदना से वह कराहती जा रही थी | मुझसे रहा नहीं गया | सर चकरा रहा था कि पुलिस ने पकड़ लिया और पास की कुर्सी पर बिठा दिया।     

‘मैडम, ज्यादा वक्त  नहीं है उसके पास  और गला पूरा जल गया है कि वह ठीक से बोल भी नहीं सकती …जल्दी  पूछ लीजिये  कि क्या हुआ।’

रज्जो की अध खुली आँखों में देखकर मैंने  पुकारा, “रज्जो!”

असहनीय पीड़ा के बावजूद उस के चेहरे पर हल्की मुस्कान सा हल्की सी लहर  छलकने लगी |

“रज्जो , ये सब हुआ कैसे ?  …दुर्गा ने ऐसा क्यों किया?”उसकी होंठ धीरे-धीरे हिलने लगी।

‘ मास्टरनी , तुम आयी  मुझसे मिलने…’ आँखों से आंसू बराबर बहने लगे …|.    ‘ अब तो सबकुछ  खत्म हो गया, मास्टरनी ! अच्छा ही हुआ मेरी बच्ची पैदा नहीं हुई | नहीं तो उसे भी ..’ उसकी पतली आवाज गले में अटक गयी |

मैंने सवाल दोहराया.. ‘रज्जो,  क्या दुर्गा ने यह जघन्य अपराध किया था?  क्या उसे तुम्हारे गर्भ में पल रहे बच्चे की याद ही नहीं आयी?’

यही मेरी नियति है मास्टरनी , हमारे यहाँ स्त्रियों  की यही किस्मत है। किसे दोष दे?’  उसकी आवाज़ इतनी पतली थी , ठीक समझ नहीं पा रहा था | लेकिन उसकी वे बड़ी-बड़ी आंखें मुझसे बराबर बोलती जा रही थी । उसे यह खबर सुकून दे रही थी कि उसकी बच्ची ऐसे समाज में पैदा ही नहीं हुई, नहीं तो वह उसीकी कहानी दोहराती | पति के खिलाफ बयान देकर वह उसे दंड दिलाना भी नहीं चाहती ? किसलिए ? किसके लिए ? इस क्रूर समाज से शायद उसका यही प्रतिकार था | शायद उसे क्षमा करने का महारत हासिल था |  उसकी आँखों से आंसू की ऐसी लड़ी निकल रही थी जिसमें मेरे सारे सवालों का जवाब थे। न जाने कब वे आँखें निश्चल हो गईं । पहली बार किसी की मौत अपनी आँखों से देख रही थी | रज्जो मर चुकी है , …यह विचार मेरी रूह को कंपा रही थी | कल तक मेरा साया बनकर चलनेवाली,मेरी सहेली .. वह  हम सब को छोड़कर जा चुकी है   … अब तो सास उसे कोई श्राप नहीं देगी ,पति ताने नहीं मारेंगे , …कोई नहीं कोसेंगे उसको ….अपने सारे दुःख –दर्द से उसे छुटकारा मिल चुकी है । रोम-रोम में असहनीय पीड़ा सहकर भी वह अपने पति के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोली  जिसने  कभी भी उससे प्यार नहीं किया,कभी उसे अपना नहीं माना |     

कई साल बीत चुके हैं पर आज भी रज्जो की आंसू भरी निगाहें मेरे दिल और दिमाग में ताज़ी हैं |   क्या स्त्री होना इतना बड़ा जुर्म है ?लडकी पैदा करवाना क्या श्राप है |