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एल सी कुमार की पाँच कविताएँ

           1 मैं कौन हूं

मैं अजनबी हूं लिखना मेरा शौक है

लोग कहते हैं मैं कवि हूं

सुबह उठ कर धोता हूं अंधकार

किरणों से करता हूं प्रकाश

लोग कहते हैं मैं रवि हूं

यूं तो करता हूं मैं मदद अक्सर

लोगो लोगों के बीच फंसकर

करता हूं समस्याओं का समाधान अक्सर

लोग कहते हैं मैं अनुभवी हूं

कौन कहता है आसान है जिंदगी

बड़े संभाल कर करनी होती है बंदगी

सही मायनों में परेशानी से जूझता है इंसान

शायद इसी को कहते हैं असली जिंदगी

जी तो लेता मैं भी अगर आसान होता

जर जमीन कारवां आम होता

लगती है चीजें सवारने को

बन जाता नवाब अगर साजू समान होता

सोच कर उठता हूं रोज कि आज क्या करें

जिए नई जिंदगी या रोजमर्रा की तरह मरे

कर लूंगा काम मेहनत से सभी

फिर भी ऐसो आराम है मुझ से परे

क्यों होना परेशान जब कोई काम नहीं आसान

चलो चलें, करले मेहनत इसी दरमियान

करेंगे काम मेहनत ईमानदारी से

बस यही तो है मेरा अरमान

काट लेंगे बची कुची जिंदगी को

भूलकर द्वंद्व शर्मिंदगी को

छूकर उम्मीदों की बुलंदगी को

कर लो जीवन अपनी मुट्ठी में

अब बचा नहीं कुछ आसान

क्या हुआ, कुछ समझे मेहरबान

 

    2 सरकारी नौकरी

 

बढ़ती जा रही है बेकारी

नौकरी चाहिए सरकारी

घट रही है शिक्षा बढ़ रही है भिक्षा

शिक्षा पाना नहीं काम आसान

जाने कितने कोशिश करते

लिखते पढ़ते मेहनत करते

पर सब को नहीं मिलता शिक्षा ज्ञान

जब पड़ जाते हैं बच्चे

ख्वाब देखते अच्छे-अच्छे

कि बस मिल जाए नौकरी सरकारी

कहलायेंगे फिर सरकारी कर्मचारी

लेकिन ख्वाब नहीं थे सच्चे

नहीं आए दिन अच्छे अच्छे

भटक रहे हैं लिख पढ़ बच्चे

लेकर अरमान नौकरी पाने की

जिद है कुछ कर जाने की

जलवा जोश दिखाने की

अपना टैलेंट दिखाने की

यहां बड़ी है मारामारी

बस मिल जाए नौकरी सरकारी

मोल नहीं है ज्ञान का

युग कहते विज्ञान का

घूमने दुनिया सारी

बन बैठे सब व्यापारी

नहीं मिली नौकरी सरकारी

अब चलो निजी क्षेत्र में जाएंगे

वहां अपना लक आजमा आएंगे

और अपने टैलेंट के बल पर यहां तो नौकरी पाएंगे

घरवालों की दो रोटी का शायद इंतजाम कर पाएंगे

यहां पड़े हैं बंद सब काम

नहीं कोई नया निर्माण

मालिक भी अब कर्मचारी

नहीं मिली नौकरी सरकारी

कैसे मिलता हमको काम

 

Entrepreneur भी बेकार पड़े हैं

नौकरी की इंतजार में खड़े हैं

नहीं मिलेगा अब कोई काम

सब तो निजीकरण के पीछे पड़े

और हम भी बेरोजगार हैं

इसीलिए कंपनी के बाहर खड़े हैं

कर लेते व्यापार अगर पैसे होते

बन जाता साधन एरनिंग का

अपना बहुमूल्य समय हम ना खोते

और चल जाता व्यवसाय हमारा

हम ने किसी से कम होते

देखे थे हमने सपने कभी

हम भी उन में से चुन लेते

करके तिरस्कार नौकरी का

अपने सपनों को बुन लेते

यह जीवन है चलते जाने का

पथ पर आगे बढ़ने का

आएंगी मुसीबतें रुक रुक कर

ठहर नहीं जाना पर पथ पर

पा लेना विजय इन सब पर

क्योंकि नया समय अब आने का

छोड़ ना तू कुछ अब कल पर

 

       3 जनप्रतिनिधि

 

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

डर की कमी हो और बाजुओं में दम हो

लड़ सके सभी के लिए ना किसी से कम हो

समझ सके सभी को और समझाने का दम हो

सुलझा सके उलझनों को ना कोई भ्रम हो

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

और बाजुओं में दम है

कह सके अपनी बात उतना बंदे में दम हो

उलझाएगी दुनिया तुम्हें समझाएगी दुनिया हमें

बात पर टिक जाए जो बंदे में ऐसा फन हो

वजूद ना हो पाए अपना दिखा पाए सबको सपना

निकालें काम अपना राम नाम जपना

ऐसा बंदे का मन हो

चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो

डर की कमी हो और हुनर में दम हो

 

    4 जिंदगी

 

हंसना ना कम कीजिएगा

गमों को कम पीजिएगा

हंसना अगर सीख लिए

जिंदगी मजे से जी लीजिएगा

आ जाए गमों का सैलाब कितना

हंसते हंसते सभी सह लीजिएगा

मुकद्दर में सभी के लिखा है हंसना

जिंदगी के पेचों वह झांसे में नहीं फसना

यह उलझाइगा गमों के दरिया में

किनारों को अपना घर बनाए रखना

मुश्किलें आती,जाती रहती हैं

हंसते हंसते इन्हें अपनी बनाए रखना

छूट जाए गर किनारा हंसने का

दोस्तों से संपर्क बनाए रखना

 

    5 मां की ममता

 

तेरा आंचल मां अलबेला है

मेरा जीवन इसमें खेला है

तू ममता की मूरत है श्याम सलोनी सूरत है

मैं जागूं तू जागे है मेरे पीछे पीछे भागे

तू ऐसी देवी मूरत है

मां तू ममता की सूरत है

मैं रोउ रो तो तू हंसती है

मेरे कन कन में तू बसती है

तू है तो मैं जिंदा हूं

तेरे रहते मैं एक परिंदा हूं

तू मेरा शुभ मुहूर्त है

मां तू ममता की मूरत है

जी चाहे तो उड़ जाऊं

मनचाहे मैं जो खाऊं

तेरा आंगन का मैं नन्ना हूं

कोरे जीवन का एक पन्ना हूं

मुझे तेरी बहुत जरूरत है

मां तू ममता की मूरत है

मेरे दिल में तू मेरे मन में तू

मेरा मान भी तू अभिमान भी

तू देवी मां की मूरत है

मां तू ममता की सूरत है

सब कुछ तो तुमसे सीख लिया

गिर गिर कर चलना सीख लिया

अब घर कोई नया बनाना है

मां तुझको वही बसाना है

तेरे साथ रहूं मैं जीवन भर तक

नहीं लगती ऐसी कोई सूरत है

मां तू ममता की मूरत है,

मां तू ममता की मूरत है




मानवीय एवं सामाजिक संवेदनाओं के आइने में पाटण की सांस्कृतिक विरासत पटोला हस्तकला एवं हस्तकला कारीगरः एक अध्ययन

मानवीय एवं सामाजिक संवेदनाओं के आइने में पाटण की सांस्कृतिक विरासत पटोला हस्तकला एवं हस्तकला कारीगरः एक अध्ययन

 

डॉ. लोकेश जैन एवं डॉ. देबेन्द्र दास

 

सार संक्षिप्त

हिन्दी साहित्य जगत के मूर्धन्य उपन्यासकार मुंशी प्रेंमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के दर्द को छुआ, अन्दर तक उसकी सिरहन को महसूस किया तथा अदम्य साहस के साथ अपनी लेखनी से उस संवेदना को उकेर कर जनमानस को झकझोरने का जो भगीरथ कार्य किया। उसी तरह की मानवीय संवेदना से प्रेरित होकर ग्रामीण प्रबंधन से जुड़े शोधार्थी ने कबीर की तरह सुनहरे सपनों का ताना-बाना बुनने बाले अत्यंत मंहगी भौगोलिक संकेत वाली (जो क्षेत्र विशेष तक ही मर्यादित होने के कारण वैधानिक रूप से विशिष्टता लिए हुए है) पटोला-साड़ी हस्तकला एवं उसके कारीगरों की कथा-व्याथा तथा उनकी प्रवर्तमान व्यावसायिक, सामाजिक- आर्थिक स्थिति को  समझने एवं प्रबुद्ध समाज के समक्ष रखने का प्रयास किया है ताकि इन हुन्नरधारकों के भविष्य को बेहतर व सम्मानजनक बनाने हेतु समाज के विभिन्न पक्षकारों व हितधारकों के हृदय में, नीतिनियामकों में इनके प्रति गहरी व स्पष्ट समझ विकसित की जा सके।

कुंजी शब्द- भारतीय कला संस्कृति, पाटण की प्रभुता, पाटण का पर्यायवाची पटोला, पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाएं, पटोला कारीगरों का कार्य वातावरण, कारीगर समाज की मनो-सामाजिक दशा तथा जीवन यापन का परिदृश्य

 

भारतीय कला संस्कृति जगत पाटण का पटोला हस्तकला कारीगरी के आलोक मे…….

कला एक हस्तकला नहीं है अपितु कौशल्य से भरे समाज के रूप में हमारी गर्वीली पहचान है, हमारी समृद्ध गौरवशाली संस्कृति का आइना है, यह कलाकार द्वारा महसूस की गई अनुभूति का प्रसारण है।”

भारत देश सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा है। 64 कलाओं से परिपूर्ण समाज परस्पर पूरकता का पर्याय बना। इस व्यवस्था में विकन्द्रित रूप से समाज के सभी वर्गों का चहुँमुखी विकास हुआ। सभी हाथों को काम मिला, सभी की रचनात्मकता को निखरने का भरपूर अवसर मिला। यह ज्ञान व कौशल्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित तो हुआ ही साथ ही साथ देश काल परिस्थिति की वर्तमान व भावी आवश्यकता के अनुरूप इन कलाओं में नूतन अभिनव प्रयोग जुड़ते रहे लेकिन मानवीयता और मानवीय सुख सदैव इनके केन्द्र में रहे जिनका प्रकृति के अस्तित्व अथवा हितों के साथ शायद ही किंचित विरोधाभास रहा हो। हस्तकलाओं के दायरे में ऐसे समाज ने आकार लिया जो प्रकृति के साथ साथ जरूरतमंद तथा हासिए पर आ चुके लोगों के साथ चलने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रतिबद्धता व्यक्त करता था। इन हस्तकलाओं में सृजनशीलता के साथ सौन्दर्य बोध था, मानवीय संवेदनशीलता थी तथा जीवन के विविध प्रसंगों को जीवंत बनाने वाले रंग प्रसरे हुए थे जो कतिपय सामाजिक भेदभाव को गौण करते थे। समाज परस्पर इन हस्तकला धारकों का सम्मान करता था, उनमें सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करते हुए……। हर हुनर “एक सबके लिए, सब एक के लिए” की मूल सहकारी भावना पर संचालित होता था जिसमें सही मायनों  में “सबका साथ और सबका विकास” नियत होता था।

गुजरात राज्य में पाटण की भौगोलिक रूप से चिन्हित हस्तकला एवं हस्तशिल्पियों की सामाजिक – आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति के इस अध्ययन में इन कारीगरों की मनो-सामाजिक, व्यावसायिक स्थति को सांस्कृतिक एवं जीवन यापन के प्रतिमानों के परिप्रेक्ष्य में समझने की मूल विभावना समाहित रही है जिसमें इस कला संस्कृति को नई पीढ़ी तक ले जाने की संभावनाएं गर्भित हैं। मानवीय सामाजिक संवेदना के पटल पर किया गया यह विश्लेषण भारतीय कला संस्कृति एवं कारीगर समुदाय के उत्थान की भावी तस्वीर विविध कोणों से खींच सकेगा।

इस शोध परक आलेख का एक ध्येय विरासत में मिली इस जी.आई. (भौगोलिक विस्तार तक परिसीमित) हस्तकला संबंधी ज्ञान को आगे ले जाने के उद्देश्य से समाज के सामने रखना है, इन कुशलताओं की बारीकी से आने वाली पीढ़ी को ससज्ज करना है ताकि समाज में हुन्नरधारकों के प्रति सम्मान व संवेदना के साथ इस हुनर व प्रतिभा को लुप्त होने से बचाया जा सके।

कोई भी ज्ञान अथवा कला तब विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती है जब उसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता को किन्हीं सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तथा व्यवस्थाकीय कारणों से क्षति पहुँचने लगे, वह आधुनिक प्रवाह के साथ गति न कर सके अथवा बाजार स्पर्धा के सामने टिके रहने का सामर्थ्य स्थापित न रख सके। सामाजिक परिवेश का भी प्रभाव इन हुनर (कला) के अस्तित्व की स्थिति को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। आज का समाज इस कला से एवं कला की विविध प्रक्रिया से जुड़े हुनरधारकों को किस नजरिए से देखता है, कितना सम्मान देता है, इसे समझना भी जरूरी हो जाता है क्योंकि यदि वह स्थिति सम्मानजनक होती है तो इस कला के साथ नई पीढ़ी को सहजता से जोड़ा जा सकता है अथवा जुड़ने की उत्कंठा को अच्क्षुण बनाए रखा जा सकता है अन्यथा इसमें वही लोग जुड़ते हैं जो बाहर कहीं सेट होने की योग्यता खो देते हैं जिसका अपेक्षाकृत विपरीत असर इन हुनरों की निर्माण प्रक्रिया एवं व्यावसायिक परिवेश पर पड़ता है जिसके चलते कला का अपेक्षित उत्थान सुनिश्चित नहीं हो पाता। यदि इन कलाओं के क्षेत्र में रुचि के साथ योग्य मानवशक्ति के जुड़ने की निरंतरता का सामाजिक-सांस्कृतिक अनुकूल एवं प्रोत्साहक वातावरण बना रहे तो ये कलाएं दीर्घकाल तक चिरंजीवी बनी रहती है तथा समृद्ध परंपरागत ज्ञान के द्वारा सफलता के सोपान चढ़ती रहती हैं।

अध्ययन के परिक्षेत्र में जीवनयापन अर्थात् आजीविका प्रतिमानों से जुड़ा आर्थिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि इस समुदाय को इससे बेहतर अर्थोपार्जन के अवसर मिलते हैं तो वह इस कला को अपने जीवनयापन का कार्यक्षेत्र नहीं बनाता और वर्षों से अर्जित प्रयोगजनित ज्ञान तथा प्रतिभा को छोड़ देने में जरा भी नहीं हिचकिचाता। समाजिक पक्ष तो इतना हावी है कि अन्यत्र स्रोत से कम आय मिलने के बावजूद भी कारीगर अपने परंपरागत हुनर में अपनी संतान को जोड़ना नहीं चाहते। इससे उनके रोटी-बेटी के संबंध प्रभावित होते हैं और “घर” की व्यवस्थाएं अस्तव्यस्त होने लगती हैं। यह भी देखने में आता है कि स्थानीय स्तर पर आजीविका के पर्याप्त साधन न होने  से, अन्यान्य आय के साधन न होने से वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी काम करने को मजबूर होता है, शोषित होते हुए भी शोषित होने का आभास नहीं कर पाता। उसे भय रहता है कि जितना उसे आज मिल रहा है, जिससे उसका जीवन येनकेन प्रकारेण चल रहा है उस पर संकट आ सकता है।

इसी कार्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य का भी सामने निकल कर आया है जिसकी कल्पना संशोधकों को शोध परियोजना निर्माण करते समय नहीं थी। इस कला की विविध प्रक्रियाओं में श्रमिक कारीगर की तरह काम करते हुए सतत एक ही स्थिति में रहने से और रासायनिकों का उपयोग बढ़ने से, प्रक्रियाजनित प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल रूप से निरंतर प्रभावित हो रहे हैं, जिसकी ये लोग सामान्यतया प्राथमिक स्टेज तक परवाह नहीं करते किन्तु कालान्तर में यह समस्या गंभीर बन जाती है और उनके कार्य की स्थिति को प्रभावित करने लगती है तथा कई बार जीवन को समय से पहले ही पूर्ण कर डालती है। इससे उसकी कार्यक्षमता और आय दोनों ही कम होने लगते हैं तथा जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता चला जाता है।

भारत के प्रमुख जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तशिल्प………

आयरन वुडन क्राफ्ट छत्तीसगढ़, चन्नापटना (कर्नाटक) के खिलौने गुड्डे गुड़ियां, मैसूर रेजवुड इनले, तमिलनाडु की परंपरागत क्राफ्ट, बोबलहेंड डांसिग डॉल तंजावुर, खुर्जा – बुलंदशहर पोटरी, राजस्थान की कठपुतली (स्ट्रिंग पपेट), आसाम की बांस से बनी क्राफ्ट, संखेड़ा फर्नीचर(गुजरात), रोगान प्रिन्ट कच्छ (गुजरात), रावण हस्त वीणा (राजस्थान), पेम्पार्थी शीट मेटल क्राफ्ट (तेलंगाना), करीमनगर सिल्वर फिलिग्री(तेलंगाना), विलियनुर टेराकोटा काम,   पुडुचेरी तंजावुर आर्ट प्लेट सी शैल क्राफ्ट, अंडमान, गोवा, उड़ीसा की एतिहासिक पिपली(पुरी) एप्लिक वर्क उड़ीसा, एतिहासिक कोर्णाक स्टोन कटिंग वर्क उड़ीसा, जयपुर ब्ल्युपोटरी(राजस्थान), आदिवासी कारीगर-बांस का कार्य- छत्तीसगढ़,       कोकोनट शैल क्राफ्ट-केरल (ब्रास एम्ब्रोइडरी), आंध्रप्रदेश काकुलम जिले की फूल  (ब्रास) आगरा की मार्बल की वस्तुएं            ,  टेराकोटा-आसाम (क्राफ्ट) के बर्तन दीपक, घंटी आदि वस्तुएं, सहारनपुर-उ. प्र. वुडन हस्तकला, अमृतसर की भरतकाम वाली मोजड़ी, नागरा तथा पंजाबी जूती, लेदर टॉयज म.प्र., कोल्हापुरी (महाराष्ट्र) चप्पल, सोलापुर (महाराष्ट्र) की चादर, फुलकारी साड़ी-पंजाब, कुल्लु शॉल- हिमाचल, किनल क्राफ्ट-कर्नाटक, मदुरकाठी- पश्चिमी बंगाल, मधुबनी पेंटिंग (परंपरागत चित्र), तथा गुजरात में पाटण की पटोला साड़ी, संखेड़ा फर्नीचर,खंभात के अगेट्स तथा तंगलिया शॉल, जामनगरी बंधनी, माता नी पछेड़ी उत्पाद आदि जी.आई. क्राफ्ट के प्रमुख उदाहरण हैं।             

इसके अलावा लोंग पी कोल्ड पोटरी हाथ से बनाई जाती है जिसमें रसोई के बर्तन एवं शो पीस बनाए जाते हैं।  तथा तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के निर्मल शहर के कुशल कारीगरों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले खिलौने, पेंटिग और फर्नीचर जी.आई. श्रेणी में रखे गए हैं। अरनमुला कन्नडी, केरल (अरनमुला नामक छोटे से शहर में हाथ से बनाया जाने वाला शीशा है जिस पर धातु का कार्य किया जाता है। इसका उपयोग अरनमुला पार्थसारथी मंदिर में रखने हेतु किया जाता है), धोकरा छत्तीसगढ़ (धोकरा वेक्स मेटल पर बनाए जाने वाला एक प्रसिद्ध क्राफ्ट है जिसमें घोड़ा और हाथी का समावेश किया जाता है) कोंडापल्ली टॉयज आंध्र प्रदेश- विजयवाड़ा के पास कोंडापल्ली गांव में बने ये खिलौने अपनी विशिष्ट थीम व शैली के कारण जी. आई. में पंजीकृत होने जा रहे हैं। तथा कर्नाटक मेटल पीस (कर्नाटक के बिद्रीवेर कस्बे में मेटल से बनने वाली यह वस्तु विश्व विख्यात है जिसका भी निर्यात किया जाता है।)

पाटण की पटोला हस्तशिल्पः एतिहासिक परिवेश…….

पटोला गुजरात की संस्कृति में पूरी तरह रच बस कर सिने गीतों तक पहुँच गया है- छेलाजी रे मारु हाटु पाटणथी पटोला मोंघा लावजो। जनमानस में पाटण का पटोला पाटण की पहचान का पर्याय बन चुका है।  रेशम के कीड़े से तैयार अत्यन्त नरम और पतले रेशम से तैयार पटोला वस्त्र दुनिया में अति विशिष्ट है। कहा जाता है कि इसकी शोध चीन में हुई थी। वर्षों तक चीन ने रेशम से कपड़े बनाने की पद्धति को गुप्त रखा और बहुत नफा कमाया। प्राचीन समय में भारत का रेशम से बना यह पटोला कपड़ा इस गुणवत्ता के लिए विख्यात था कि उसे अंगूठी में आर पार किया जा सकता था। अहिंसा में मानने वाले लोग रेशम के कीड़े को मारकर तैयार किए गए इस कपड़े का उपयोग नहीं करते थे।

पटोला बनाने की कला लगभग 900 साल पुरानी है। प्राचीन काल में डिजाइन वाला कपड़ा बनाने की  कोई पद्धति नहीं थी तब बांधणी पर कलर करने की कला पाटण के सालवी परिवारों ने अपनी सूझबूझ व हुनर के द्वारा विकसित की थी। इन परिवारों का मूल निवास तो वर्तमान महाराष्ट्र था जहाँ जालना शहर में यह कला विकसित हुई थी। वहाँ के 700 सालवी परिवारों ने 11वी सदी में पाटण के शासक कुमारपाल देसाई के यहाँ राजाश्रय प्राप्त कर इस कला का चहुँमुखी विकास किया जिसके कारण पाटण विश्व के मानचित्र पर एक अलग प्रतिष्ठा के रूप में उभर कर सामने आया। कालक्रम में इन सालवी परिवारों की संख्या घटती चली गई जिससे इस विशिष्ट कला का अस्तित्व खतरे में लगने लगा। वर्तमान में पटोला बनाने वाले मात्र तीन सालवी परिवार हैं जो मालिक और कारीगर दोनों की भूमिका में हैं। अन्य जाति के कारीगर इसकी ताणी और पाटी बांधना, धागा बांधना आदि प्रक्रिया से जुड़े हैं। बुनाई में सालवी परिवार के पुरुष हैं। सालवी परिवारों ने दूसरों को काम सिखाया भी है।

पाटण का पटोला पूर्ण रूप से हस्तशिल्प होने के कारण कुटीर उद्योग के रूप में आकार ले चुका है। मँहगा होने के बावजूद अपनी लोकप्रियता के कारण कोरोना महामारी काल में भी यह हस्तशिल्प उद्योग अपने अस्तित्व को संरक्षित बनाए रख सका है।अति विशिष्ट कामगीरी के स्वरूप के कारण इसकी मांग में बहुत अधिक विचलन उत्पन्न नहीं हुए हैं। पटोला काम में इस समय साड़ी के अलावा दुपट्टा, रूमाल, स्कॉर्फ, टाई, छोटे-बड़े पर्स जिनका उपयोग जैन समुदाय द्वारा मंदिर में पूजा के उपक्रम से किया जाता है, आदि का उत्पादन भी शुरु किया गया है। पटोला की डिजाइन रेशम के तार से तैयार की जाती है जो कर्नाटक से मंगाया जाता है। पटोला की साड़ी को दोनों तरफ से पहना जा सकता है। एक साड़ी की कीमत सवा लाख से लेकर 5 लाख तक होती है। कीमत का यह अंतर डिजाइन की विशिष्टता और डिजाइन के अनुरूप कार्य में लगने वाले समय की अधिकता के कारण होता है। हर श्रीमंत नारी का यह सपना होता है कि वह अपने जीवन में ऑरीजनल पटोला अवश्य पहने क्योंकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है।

पटोला हस्तशिल्पः एक विशिष्ट महत्वपर्ण कला

सरल नहीं पटोला तैयार करना। एक के बाद एक लगभग 20 छोटी बड़ी प्रक्रियाओं- ताणी बांधना, डिजाइन बनाना, धागा बांधना, कलर काम, बुनाई. फनिशिंग आदि से गुजर कर पटोला तैयार होता है। यदि 4 व्यक्ति एक साथ काम करें तो एक पटोला साड़ी तैयार करने में 4-6 महीने का समय लग जाता है क्योंकि इसकी उप प्रक्रियाओं की संख्या अधिक हैं एवं हर एक प्रक्रिया सावधानी की दरकार रखती है किसी भी स्तर हुई जरा सी चूक मेहनत, पूँजी व समय को व्यर्थ कर देती है।

इसमें किसी मशीन या टेक्नोलोजी का उपयोग नहीं होता। इसके लिए बाहर के राज्य से बढ़िया क्वालिटी का नरम मुलायम रेशम मंगाया जाता है।पटोला बनाने हेतु डिजाइन तय कर लेने के पश्चात पहले रेशम के तारों को सीधा करके गिनकर रखा जाता है और उससे ताणी तैयार की जाती है फिर डिजाइन के अनुसार तार बांधने का कार्य हाथ से किया जाता है। इस पट्टी पर एक निश्चित माप के आधार पर डिजाइन के अनुसार धागा बांधा जाता है ताकि बिना बंधे हुए हिस्से पर कलर किया जा सके। साड़ी में जितने कलर होते हैं उतनी ही बार उसे धागा बांधने और कलर करने की प्रक्रिया से गुजरना होता हैं। इस पूरी प्रक्रिया में डिजाइन व माप बहुत ध्यान रखा जाता है कि एक भी धागा कम ज्यादा न हो जाय। नहीं तो वह आगे बुनाई के लिए नहीं जा सकेगा।

एक साड़ी(5मीटर) में आड़े तार 25000-26000 तथा खड़े तार 5000-6000 के करीब होते हैं। इसके पश्चात डिजाइन के हिसाब के अलग अलग कलर एक-एक करके किए जाते हैं जिसके लिए बड़ी सावधानी से शेष भाग को बांधा जाता है। एक से अधिक कलर होने की दशा में इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है क्योंकि डिजाइन हर बार अलग कलर हिसाब से धागे से गिनकर गांठ बांधनी होती हैं। एक डिजाइन 6 तार से बनी होती है। प्राकृतिक रंग के लिए विभिन्न वनस्तपतियों- हरडे. बोडी की लाख, आवंला, हल्दी, हरी तथा नील जैसी वनस्पति के रंगों का उपयोग किया जाता है। इसका खर्च प्रायः अधिक आता है इसलिए वैकल्पिक रूप से रासायनिक रंगों का भी उपयोग होने लगा है।

संशोधन प्रवधि-

पटोला जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तकला और उससे जुड़े कारीगरों की सामाजिक, आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति को समझने के  लिए पाटण के छोटे-बड़े व्यावसायिक उपक्रमों में कार्यरत कारीगरों में से 48 उत्तरदाताओं का यदच्छ पद्धति से चयन किया गया जिसमें इस उत्पाद की विविध प्रक्रियाओं से जुड़े कुशल, अर्द्ध–कुशल एवं अकुशल कारीगर सम्मिलित हैं। शोध पद्धतियों में साक्षात्कार, अवलोकन, लक्ष्य समूह चर्चा आदि का उपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त द्वितीयक स्रोतों से भी आवश्यक शोध सामग्री का संकलन एवं उपयोग किया गया।

संशोधकीय विमर्श-

कारीगर समाज की तकनीकी कुशलता व सृजनशीलता को परिलक्षित करती पटोला निर्माण प्रक्रिया के प्रमुख चरण…………..

समग्र पटोला निर्माण प्रक्रिया यह एक गणितीय एवं अकल्पनीय कठिन प्रक्रिया है। पटोला डबल इकत बुनाई है जिसमें उल्टा सीधा नहीं होता इसलिए इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है। इसके रंग 100 वर्षो में भी फीके नहीं पड़ते। पटोला की डिजाइन में इकत केन्द्र स्थान पर होता है। इकत आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना में उत्पादित कपड़े का एक प्रकार है जो यार्न टेकनोलोजी एवं फेब्रिक जगत में एक सामान्य नाम है। इकत एक डाइंग टेकनिक है जिसमें रेजिस्ट डाइंग प्रक्रिया का समावेश किया जाता है। कुदरती रंगों के लिए केचु, कोचीनील, इन्डिगो, हल्दी, लाख  हरडे, मेडर मूल, रत्नजोत, मंडिष्ठा. काथ, केसुडो, अनार का छिलका, महेंदी, गेंदा के फूल आदि का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा फिटकरी, कोपरसल्फेट, फेरस सल्फेट, टीन, क्लोराइड, पोटेशियम, डाइक्रोमेट एवं अन्य मोर्डन पदार्थों का उपयोग किया जाता है।

समान्य रूप से पटोला पर अमूर्त डिजाइन एवं ज्यामितीय पेटर्न बनाए जाते हैं यथा- हाथी, मानव आकृति, कलश, फूल, शिखर, पान, पोपट आदि। अन्य डिजाइन गुजरात के हेरिटेज आर्किट्रेक्चर से प्रेरित हैं जिसमें एतिहासिक स्मारकों के जटिल डिजाइन भी पटोला साड़ियों पर देखे जा सकते हैं। नवरत्न पटोला की बहु प्रचलित एवं मंहगी पेटर्न मानी जाती है  इसी श्रेणी में नारीकुंजर, व्होराजगाजी (माणएक चौक), छाबरी स्नान, चांदभाटी, पाटण भट्ट, लहेरिया, तरलिया, कुलभट्ट, केशर चंदन आदि का समावेश किया जाता है।

मशीनीकरण और पश्चिमीकरण के इस दौर में धारा से विपरीत यह हस्तकला उद्योग प्रदूषण रहित, औद्योगिक जगत के दूषणों से लगभग मुक्त विशाल रोजगार प्रदाता है जिसमें महिलाओं की भागीदारी नोंधनीय है। मात्र रोजगार की बात नहीं अपितु पाटण की पटोला विरासत भारत की समृद्ध जीवंत परंपरा की वाहक बनी हुई है। यदि कारीगरों को पर्याप्त पारश्रमिक मिलता रहा जो यह कला फलती फूलती रहेगी।

इकत इण्डोनेशिया की डाइंग टेकनिक है जिसका उनकी स्थानीय भाषा में शाब्दिक अर्थ है- बाइन्ड। इस टेकनिक का उपयोग टेक्सटाइल पेटर्न के लिए होता है जिसे वेफ्ट यार्न की बुनाई से फेब्रिक की डाइंग के लिए किया जाता है। दक्षिणपूर्व एशिया की अन्य संस्कृतियों में इकत का उपयोग बुनाई की परंपराओं के संदर्भ में किया गया है।एकाधिक कलर एवं सघन डिजाइन वाली इकत प्रक्रिया काफी जटिल व खर्चीली होती है। पटोला निर्माण प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप में निम्म लिखित रूप से समझा जा सकता है-

  1. रेशम धागे के बंच तैयार करना

तारों के डिजाइन के अनुसार गिनती करके बंच तैयार किए जाते हैं जिसमें 150, 250, 300, 350 जैसे तार डिजाइन की आवश्यकता के अनुरूप बांधे जाते हैं। इसके पश्चात पाटी तैयार की जाती है।

  1. ताणी एवं कोटन धागा बांधने का कार्य-

पेपर पर तैयार की गई डिजाइन के अनुसार आड़ी और खड़ी ताणी बनाई जाती है। फिर उस पर कलर करने के लिए अतिरिक्त भाग पर कोटन का धागा इस तरह कसकर बांधने का कार्य किया जाता है कि वह कलर अन्य अवांछित जगह पर प्रवेश न कर पाए। पहले धागे से बनाई गई ताणी पर जगह जगह कोयले से निशान किया जाता है ताकि माप में भूल न हो औरडिजाइन के अनुसार सही जगह पर धागा बांधा जा सके।इसके लिए कोटन के धागे को पहले पानी भिगोया जाता है ताकि वह एक दम फिट कसकर बांधा जा सके। एक ताणी पर एक साथ 9-10 महिला पुरुष कारीगर काम करते हैं। साड़ी का पल्लू बनाने के लिए पाटी तैयार की जाती है।

  1. धागा बांधने की प्रक्रिया को डिजाइन के अनुसार चेक करना-

ताणी अथवा पाटी जिस पर कोटन धागा की गांठ बांधी जाती है वह डिजाइन के अनुसार ठीक है या नहीं इसको चेक करने का कार्य कार्यस्थल पर ही सुपरवाइजर द्वारा बड़ी सावधानी से चेक किया जाता है तथा जरूरत होने पर तत्काल सुधारा जाता है ताकि पटोला के फाइनल प्रोडक्ट में भूल की संभावनाएं न रहें।

  1. कलर (डाई) करना-

प्राकृतिक व रासयनिक कलर उबलते गर्म पानी में 10-15 मिनट तक कलर करने वाले भाग को डाला जाता है फिर साफ पानी से धोकर, कपड़े से पोंछ कर सुखा लिया जाता है। फिर दूसरे कलर के लिए प्रोसेस की जाती है। डिजाइन में जितने कलर होते हैं उतनी ही इस धागे को डाई अर्थात् कलर की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

  1. बुनाई कार्य-

रोजवुड एवं वांस की पट्टियों से बने परंपरागत हार्नेश लूम पर बुनाई कार्य किया जाता है। लूम एक तरफ थोड़ा झुका होता है इसलिए एक लूम पर एक साथ 2 लोगों को काम करना पड़ता है। इसमें वृद्ध, प्रोढ़, युवा महिला – पुरुष सभी कार्य करते हैं। बुनाई और फिनिशिंग का कार्य अंतिम चरण की कामगीरी है जिसमें अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है। कारीगरों ने बताया कि वे यहाँ के फोटो लेने नहीं देते क्योंकि मार्केट में आने से पहले यदि डिजाइन कॉपी हो जाय तो कीमत गिर जाती है। इसलिए यह प्रक्रिया सार्वजनिक होते हुए भी गोपनीय रहती है। इन कारीगरों को बेहतर महेनताना मिल पाता है। ये कारीगर ठेके पर बुनाई और फिनिशिंग का काम करते हैं। ताकि जितना अधिक काम कर सकेंगे उतनी अधिक आय अपने व परिवार के लिए अर्जित कर सकेंगे। अपनी नई पीढ़ी को सिखाने का कार्य भी ये उस्ताद लोग बखूबी करते हैं और अपने शागिर्दों की तरक्की से बेहद खुश भी रहते हैं। बुनाई व फिनिशिंग कार्य से जुड़े एक ही परिवार के महिला व पुरुष सदस्य भी जुड़े हैं। 70 वर्षीय गिरधरभाई-इन्होंने 50 से अधिक शागिर्दों को तैयार किया है। जिन पर इन्हें गर्व हैं। आज भी उतनी ही ऊर्जा के साथ इस कार्य में लगे हुए हैं। इनकी सफाई और दक्षता का आज भी कोई सानी नहीं है।

हस्तकला कारीगर समुदाय के चयनित उत्तरदाताओं की जनसांख्यिक लाक्षणिकताएं एवं प्रतिभाव….

  1. पटोला निर्माण कार्य में आधे से ज्यादा उत्तरदाता युवा हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यह हस्त कला युवा आबादी को रोजगार देने की क्षमता रखती है। वहीं 13 प्रतिशत उत्तरदाता किशोर अर्थात् 15 वर्ष एवं उससे अधिकआयु के हैं यदि इसे बालश्रम के कानूनी दायरे से परे रखकर देखा जाय तो यह कहा जा सकता है कि इस कला के क्षेत्र में छोटी उम्र से सीखने सिखाने की प्रक्रिया वर्तमान में अनवरत चल रही है। इनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी का हिस्सा भी हैं। 31-50 वर्ष के लगभग 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं जो संभवतः परिवार की सकल आय में वृद्धि की इच्छाशक्ति के साथ इस कला में संलग्न हैं।
  2. शोध में लिंगानुसार महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत एक तिहाई है जो कोटन धागा बांघने व पाटी तैयार करने आदि उप प्रक्रिया से जुड़ी हैं।
  3. पटोला हस्तकला में सामान्य वर्ग के उत्तरदाता 69 एवं अन्य पिछड़ावर्ग के 21 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जन जाति का कोई उत्तरदाता नहीं है। सामान्य जाति वर्ग में ठाकोर, चौधरी, रावल गुप्ता आदि उप जातियों का समावेश किया जा सकता है। इन आंकड़ों को कला और सामाजिक स्तर अथवा कला का समाज में स्थान की दृष्टि से जोड़कर देखें तो कह सकते हैं कि समान्य वर्ग का अधिक प्रतिशत इस बात का गवाह है कि इसमें कार्य करने वालों को सामाजिक तौर पर निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाता।
  4. शिक्षण की दृष्टि से देखें तो अधिकांश उत्तरदाता पढ़े-लिखे ही हैं लगभग दो तिहाई का समावेश प्राथमिक व माध्यमिक स्तर तक के शिक्षण में हो जाता है। फिर भी उच्च माध्यमिक एवं स्नातक स्तर तक शिक्षण प्राप्त करने सुंक्त प्रतिशत 23 है। इनको शिक्षण ठूटने का ज्यादा गम नहीं हैं क्योंकि काम सीख लेने एवं काम मिल जाने की खुशी जो है।
  5. विवाहित एवं अविवाहित दोनों ही इस कला से जुड़े हुए हैं।
  6. कुछ एक उत्तरदाताओं को छोड़कर ज्यादातर कारीगर स्थानीय हैं और पाटण के आसपास से 10-15 कि.मी, के दायरे से आते हैं। इन उत्तरदाताओं की वर्तमान आय का मुख्य स्रोत पटोला की कामगीरी ही है किन्तु कुछ उत्तरदाता का सहायक आय का स्रोत मजदूरी भी है। जाति के अनुसार देखें तो सर्वाधिक ठाकोर समुदाय के उत्तरदाता ही मजदूरी कार्य में द्वितीयक स्रोत के रुप में संलग्न हैं।
  7. संयुक्त कुटुंब वाले उत्तरदाता 87 प्रतिशत हैं जहाँ 5-8 सदस्य वाले परिवारों की संख्या सर्वाधिक है। ज्यादातर कमाने वाले सदस्य अंशकालिक रोजगारी में संलग्न हैं। अधिकांश उत्तरदाताओं के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अधिक अच्छी नहीं हैं।
  8. 3500-5000 रूपये मासिक आय में 25 प्रतिशत उत्तरदाता हैं तथा इतने ही 5000-7000 रुपये मासिक में हैं। अर्थात् आधे उत्तरदाता बहुत ही कम मजदूरी लेकर जीवन यापन को विवश हैं। मात्र 25 प्रतिशत उत्तरदाता ही 15000-25000 मासिक आयोपार्जन कर रहे हैं ये वे कारीगर हैं जो पटोला डिजाइन एवं बुनाई जैसे कुशल कार्य में रत हैं। कुटुंब की मासिक आय देखें तो 4000-8000 रुपये मासिक आय वर्ग में सर्वाधिक उत्तरदाता आ जाते हैं।
  9. मकान उत्तरदाता के सामाजिक आर्थिक स्तर को स्प्ष्ट रूप से प्रकट कर देता है। लगभग 46 प्रतिशत उत्तरदाताओं के मकान कच्चे हैं जिनका स्तर निम्न कहा जा सकता है 10 प्रतिशत अर्ध पक्के मकान वाले उत्तरदाताओं की स्थिति इस पैमाने पर सामान्य के थोड़ा नीचे एवं आसपास कही जा सकती है। मात्र 8 प्रतिशत के मकान पक्के एवं सुविधायुक्त (फ्रिज, टी.वी. बाइक आदि) हैं। मात्र एक तिहाई उत्तरदाताओं के पास ही जमीन है।
  10. लिंगानुसार इस कला में भगीदारी देखें तो सर्वाधिक 35 प्रतिशत उत्तरदाता ताणी और पाटी बनाने एवं उस पर कोटन की गांठ बांधने वाले काम से जुड़े हुए हैं जिसमें कुल महिला उत्तरदताओं के 69 प्रतिशत उत्तरदाता संलग्न हैं। इसके बाद सबसे अधिक पारश्रमिक वाली बुनाई उप प्रक्रिया में एक चौथाई उत्तरदाता है किन्तु उसमें महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत मात्र 17 है। डाई अर्थात् कलर काम में 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं किन्तु इस प्रक्रिया में कोई भी महिला उत्तरदाता नहीं है। गांठ बांधने के कार्य में संलग्न 10 प्रतिशत उत्तरदाताओं में महिला पुरुष दोनों काम रहे हैं पुरुष – महिला 40 – 60 के अनुपात में हैं।
  11. सभी जातियों की महिलाएं पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाओं से जुड़ी हैं जिससे सिद्ध होता है कि लिंग के आधार पर इस कार्य एवं इसकी किसी भी प्रक्रिया में कार्य करना सामाजिक रूप से निम्न नहीं माना जाता। दूसरे हम यह भी कह सकते हैं कि कार्यस्थलीय व्यवस्थाओं के प्रति कारीगर समाज का विश्वास बना हुआ है जिससे उन्हें अपने घर की महिलाओं के यहाँ भेजने किसी भई तरह की आपत्ति नहीं है।
  12. पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि विभन्न स्तरों पर की जाने वाली प्रक्रियात्मक कामगीरी में तकनीकी कुशलता एवं अर्थोपार्जन की दृष्टि से स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
  13. शिक्षण व कामगीरी के संबंध के संदर्भ को लेकर सामान्यीकरण तो नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी तरह की कामगीरी में सभी शैक्षणिक स्तरों का समावेश है किन्तु अध्ययन में यह पाया गया है कि शुरुआती कम कुशलता वाले कार्यों में उत्तरदाताओं का शैक्षणिक स्तर अपेक्षाकृत कम है।
  14. उम्र एवं कामगारी के संबंध को देखें तो हम पाते हैं कि 20 वर्ष से कम आयु के अधिकांश कारीगर ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने तथा कलर करने के काम में लगे हैं। 21 से 30 वर्ष की वय जिसमें सर्वाधिक उत्तरदाता हैं उसमें से 50 प्रतिशत ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने के कार्य में रत हैं तथा इसी उम्रवय के 28-28 प्रतिशत उत्तरदाता कलर व बुनाई काम में लगे हुए हैं।
  15. उत्तरदाताओं के काम सीखने के स्रोत अलग अलग हैं यथा काम करते करते सीख लेना जिसमें आरंभिक प्रक्रिया को सम्मिलित किया जा सकता है। किन्तु जो कारीगर बुनाई के कार्य में लगे हैं उनमें से अधिकांश वंशानुगत एवं गुरु-शिष्य परंपरा की तरह प्रशिक्षित हुए हैं। वंशानुगत रूप से पटोला कार्य में जुड़े कारीगरों का प्रतिशत छठवां भाग ही है। इसलिए संशोधन में सर्वाधिक कारीगर (71प्रतिशत) 3-5 वर्ष के अनुभव वाले पाये गए हैं जो कतिपय कम कुशल प्रक्रियाओं से सरोकार रखते हैं।
  16. पटोला निर्माण कार्य में अधिकांश कारीगर मजदूर के रूप में काम करते हैं, कुछ प्रक्रियाओं का ठेके पर लेकर पूर्ण किया जाता है। इस उद्योग में मांग पर्याप्त है। सतत उत्पादन तो होता ही है किन्तु ऑर्डर के अनुसार भी उत्पादन कार्य किया जाता है।
  17. उत्तरदाताओं के कार्य में सर्वाधिक सहयोगी उनके माता पिता हैं, स्कूल तथा घरकाम के चलते बच्चे और पत्नी भी समय मिलने पर मदद कर पाते हैं। कारीगरों के विकास में अवरोधक घटकों में वे पटोला निर्माण कार्य में लगने वाला अधिक समय तथा सामाजिक प्रसंगों की अनिवार्यता वश काम में रुकावट का आना आदि है। इस समस्या के समाधान हेतु वे सीखने की प्रक्रिया में तेजी लाना, एकाग्रता के साथ काम करना, सहयोग के साथ काम करना तथा तनाव को कम करने का प्रयास करना आदि को आवश्यक मानते हैं। इस तनाव के लिए शारीरिक, मानसिक एवं कार्यवातावरणीय संकीर्णता को जिम्मेदार मानते हैं। ये समस्याएं आरंभिक प्रक्रिया स्तर पर उत्तरदाताओं द्वारा अधिक की जाती हैं क्योंकि अपेक्षाकृत प्रतिफल कम और शारीरिक मानसिक थकान एवं अनइजीनेस ज्यादा है। इसके चलते व्यक्तिगत एवं संगठनात्मक स्तर की उत्पादकता तथा परिवारीजनों के शिक्षण स्वास्थ्य आदि जीवन स्तरीय घटकों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पटोला उद्योग मे कार्यरत उत्तरदाताओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को स्पष्ट करती है। एक साथ एक ही तरह का कार्य करने से हाथ-पैर व जोड़ों के दुखने समस्याएं उत्तरदाताओं में देखने को मिलती हैं। उत्तरदातओं के मतानुसार सावधानी रखकर, संवेदना विकसित कर तथा मानवीय मूल्य प्रेरित जवाबदारी महसूस करके यथोचित निदान किया जा सकता है।
  18. व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए अधिकांश उत्तरदाता डिजिटल ट्रांजेक्सन, एडवांस मार्केटिंग टेक्नोलोजी के ज्ञान कौशल्यों के विकास की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
  19. अधिकांश उत्तरदाता (83 प्रतिशत) पटोला निर्माण कार्य की विविध प्रक्रियाओं में उन्हें पूर्ण रोजगार मिल जाता है। हालांकि उनका वेतन कम है लेकिन काम की निरंतरता से वे खुश हैं।
  20. मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।

हस्तकला कामगीरी….कारीगर समुदाय तथा उनकी पारश्रमिक व्यवस्था

वर्तमान में इस कला की विविध प्रक्रियाओं में सालवी परिवार के अलावा विभिन्न जाति के स्थानीय महिला, पुरुष किशोर व युवाओं ने अपना स्थान बनाया है। पटोला काम में गुप्ता, ठाकोर, रावल, चौधरी, सालवी, दरबार, पटेल, गोहिल, लींबाचिया, पारीख आदि उप जातियों के लोग जुड़े हैं। महिला और पुरुष दोनों ही इस निर्माण प्रक्रिया में सहभागी हैं। महिलाएं मुख्यतः पाटी में धागा बांधने, कलर वाले धागे बांधने, ताणी बांधने काम कर रही हैं जबकि पुरुष  पाटी बनाने, ताणी बांधने, कलर काम तथा बुनकर काम करते देखे गए हैं।

डिजाइन की प्राथमिक संकल्पना इकाई मालिक सालवी परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है जिसमें ग्राहकों की पसंद व मांग को प्राधान्य दिया जाता है वे डिजाइन की प्रकृति के अनुसार उसमें लगने वाले समय व संसाधन का मूल्यांकन करने का कौशल्य रखते हैं तथा निर्णय लेने का सामर्थ्य भी। उनके पास रेशम खरीदने से लेकर विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए कारीगरों की व्यवस्था करने की सत्ता होती है। पटोला मार्केटिंग की व्यूहरचना के केन्द्रीय निर्णयों में भी यही मालिक लोग होते हैं। इसे तकनीकी प्रबंधकीय की शीर्ष स्थिति भी कहा जा सकता है इसलिए लाभ का एक बड़ा भाग इसके हिस्से में रहता है। ये उद्योग साहसिक एवं जोखिम वहनकर्ता होते हैं जो पूँजी व एकम की कामगीरी का बेहतर प्रबंधन करते हैं।

पटोला साड़ी तैयार करने की प्राथमिक प्रक्रियाओं यथा-पाटी या ताणी तैयार करना, बंच बनाना, कोटन का धागा बांधना, हर स्तर पर डिजाइन की चौक्कसाई की जांच करना, कलर काम करने वाले जो काफी कम वेतन पर कार्य करते है। अनुभव के आधार इसमें थोड़ा बहुत इजाफा होता है। कलर से पूर्व कोटन धागा बांधने वाले कारीगर यद्यपि तकनीकी कार्य करते हैं किन्तु रूटीन कार्य होने से उनका 3500 से 5000 प्रतिमाह के मध्य ही रहता है। इनका रिप्लेसमेंट आसानी से कभी भी किया जा सकता है। अर्थात् इस कार्य को थोड़ी मेहनत व लगन से करके गति दक्षता प्राप्त की जा सकती है। यह असंगठित श्रम समुदाय है इसको मजदूरी के अलावा अन्य कोई लाभ नहीं मिलता।

इनके सुपरवाइजर धागा बांधने के कार्य को दी गई डिजाइन के अनुसार जाँच करते हैं जिनका वेतन इनसे लगभग डबल और अनुभव के आधार पर बढ़ता चला जाता है। हर एक सामूहिक कार्य की डिजाइन मेचिंग अनुरूप जाँच कम मेहतन और कम जिम्मेदारी वाला कार्य नहीं है। इसलिए इनका रिप्लेसमेंट बहुत जल्दी संभव नहीं होता। लेकिन इनका वेतन बहुत संतोषकारक तो नहीं कहा जा सकता।

बुनाई के काम की मेहनत, चौक्कसाई, तथा डिजाइन गुप्तता आदि के साथ यदि इन कारीगरों को मिलने वाले पारश्रमिक को देखते हैं तो इनकी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण तथा बेहतर मानी जा सकती है ये महीने में 18000-25000 या 30000 तक कमा लेते हैं। इन पर सालवी परिवार से जुड़े एवं निकटस्थ परिवारों का वंशानुगत कब्जा है। सीखना सिखाना भी लगभग वंशानुगत है। इस प्रक्रिया में भी बहुत जल्दी किसी को भी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। ये लोग ठेके पर भी बुनाई का काम ले लेते हैं। फिनिशिंग व समयसर कामगीरी इनके गुणवत्ता मानक हैं। इसलिए इस अंतिम प्रक्रिया को कार्य की जटिलता व पारश्रमिक दोनों ही दृष्टि से अति महत्व का माना जा सकता है।

अधिकांश कारीगर मालिक के इकाई में मजदूर या कर्मचारी के रूप में ही काम करते हैं स्वतंत्र रूप से नहीं। वे 8-12 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हुए जीवन निर्वाह करते हैं। कुछ कारीगर ठेके पर (कार्य के अनुसार एक मुश्त प्रतिफल) पर कार्य करते हैं। वे सभी निम्न मध्यम स्तरीय कम महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न रहते हैं। उनकी जगह किसी भी नए व्यक्ति को आसानी से बदला जा सकता है। जबकि सालवी परिवार के सदस्य बतौर मालिक कार्य करते हैं। बुनाई का काम करने वाले कारीगर सालवी परिवार से पुराना निकटतम संबंध रखते हैं। यह कार्य अंतिम तबक्के का है इसे कार्य की जटिलता और प्रतिफल की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इकाई मालिकों का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन विविध स्तरीय प्रक्रियाओं से जुड़े कारीगरों को प्राप्त होने वाले दैनिक औसत पारश्रमिक पर दृष्टिपात करें तो अंतर स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगता है।

इस पटोला उद्योग में अधिकांश कारीगर संयुक्त कुटुंब से आते है जहाँ सदस्य संख्या 6-8 है। मुखिया पर घर का भार होता है कुटुंब में से 2-3 व्यक्ति ही कमाते हैं। काम के अवसर मिलने पर घर की महिलाएं कम मजदूरी में भी इस कार्य से जुड़ जाती है। जो लड़कियां बीच में शिक्षण छोड़ चुकी हैं वे भी इसमें जुड़ी हैं। कम उम्र के बच्चे भी ये कार्य कर रहै हैं। सालवी कुटुंब के बच्चे इस कार्य से जुड़े हैं। ये कारीगर अपने बच्चों का शिक्षण भी पूरा नहीं करा पाते उन्हें बीच में ही छुड़वा देते हैं। कुछ आय होने से परिवार व समाज में उनकी स्थिति बेहतर बनती है और वे घर की बुनियादी जरूरतों के पूरा करने में अपनी कुछ योगदान कर पाती हैं। कई कारीगरों के घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है उनके मकान कच्चे, अर्ध पक्के हैं जिसमें प्रमुख बुनियादी सुविधाओं की कमी दिखाई देती है। इस मजदूरी से उनका भरणपोषण चलता है।

रेशम का धागा मुलायम अवश्य है किन्तु धारदार है। इसलिए यदि उंगली पर कपड़ा ठीक से न बंधा हो तो कलर करने वाले व धागा बांधने वाले कारीगरों की उंगली को घायल कर देता है। इस कार्य में एक 4 घंटे एक ही पोजीशन बैठे रहने से कारीगरों को कमर का दर्द एवं शारीरिक थकान अधिक महसूस होती है। बुनाई का कार्य सघन व गहन होने से आंख के नंबंर तथा सिर दर्द की समस्याएं बनी रहती है।

इस हस्तकला की संचालन व्यवस्था में सामान्य तकनीकी का प्रवेश तो हुआ है जिसके साथ काम करने के लिए नये पुराने कारीगरों को इसका अभ्यस्त होना पड़ता है किन्तु इस हस्तकला में प्रयुक्त होने वाले संसाधनों पर कारीगरों का समान अधिकार नहीं है और न ही उन पर अधिकार करने की आर्थिक क्षमता। इसलिए इनके उपयोग के लिए हस्तकला इकाइयों के मालिकों की मर्जी पर निर्भर रहना पडता है एवं तदनरूप कार्य निर्णयों को आकार देना पड़ता है। हस्तकला के क्षेत्र में मार्केटिंग की समस्या बनी हुई है। जी.आई. टेग के बावजूद अन्य का हस्तक्षेप यहाँ दिखाई देता है। जैसा कि पाटण का पटोला हस्तकला इकाई के मालिक एवं एशोसिएशन के सदस्य पदाधिकारी ने बताया कि हम मांग के अनुरूप ही उत्पादन कर पाते हैं जिन लोगों को आर्जिनल माल खरीदना होता है वे हमसे सीधे संपर्क करते हैं इसिलए हमें नकल करने वालों से ज्यादा परेशानी नहीं होती।

उपसंहार-

अंत में यह कहा जा सकता है कि हस्तकला कारीगरों में मालिकी का प्रमाण घटने लगा और वे कुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक के रूप में चिन्हित होने लगे। इसके परिणाम स्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति डंवाडोल होने लगी और वे रोजगारी के अन्य विकल्पों की ओर भी पूरक व स्वतंत्र रूप से उन्मुख होने लगे। कारीगर समुदाय कतिपय कारणों से अपनी योग्य संतानो एवं परिजनों को इसमें लाना नहीं चाहते क्योंकि इसमें उन्हें समुन्नत जीवन यापन हेतु आर्थिक सुनिश्चितता दिखाई नहीं देती।

कला का अस्तित्व कारीगरों की हस्ती पर टिका होता है। छोटे कारीगर जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है वे किस प्रकार स्वयं को टिकाए रख सकते हैं इस तरफ गंभीरता से विचार करना होगा। एक अहम् प्रश्न हस्तकला कारीगरों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तनों को लेकर है कि अनुकूल परिवर्तन कैसे लाया जाय, कार्यस्थलीय वातावरण को कैसे सहज और प्रभावी बनाया जाय, संघर्ष व तनाव कैसे घटाया जाय तथा कार्य निष्पान गुणात्मक मात्रात्मक सुधार हो और बिना किसी टकराव के उनका व उनके परिवार का जीवनस्तर कैसे ऊपर उठ सके। पटोला हस्तकला के अधिकांश कारीगरों की मजदूरों जैसी स्थिति का होना,उनका समग्र कला की किसी एक प्रक्रिया विशेष तक ही सीमित होना, सौदेबाजी की कमजोर क्षमता का होना, कार्य संबंधी अपर्याप्त शिक्षण-प्रशिक्षण का होना आदि इस क्षेत्र में विद्यमान हैं। इसलिए वे जिस कार्य को कर रहे हैं उसी तक ही मर्यादित रह जाते हैं। कदाचित हस्तकला कार्य में आंशिक या बहुतायत से मशीनों का प्रवेश हो जाय तथा नफा-नुकसान के गणित पर हस्तकला व्यवसाय पर मालिकाना हक रखने वाले मूल कारीगरों को ही सुनियोजित रूप से उनके स्थान से अलग थलग न कर दें, इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

यदि हस्तकला व्यावसायिक इकाइयों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश कारीगरों की समाजिक –आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती।  क्योंकि उनकी दैनिक मजदूरी भी मनरेगा के अन्तर्गत मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। स्वास्थ्य के इश्यु बने ही हुए हैं। 

कामगीरी का स्वरूप और उससे होने वाली आय में कामगीरी का स्तर प्रतिबिम्बित होता है। पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि उनके मध्य आर्थिक स्तर पर एक अंतर अवश्य दिखाई देता है जिसे इस सारणी में दर्शाया गया है। लगभग आधे उत्तरदाता निम्न स्तर पर आपनी कामगीरी का सम्पादन करते हुए सीमान्त आय का सृजन कर रहे हैं, जिनके बीच में छोड़कर चले जाने से मालिकों को विशेष फर्क नहीं पड़ता। कोई भी दूसरा उनकी जगह आसानी से ले सकता है अथवा थोड़ी सी प्रेक्टिस करके सीख सकता है, कार्य सम्पादित कर सकता है।

निम्न मध्यम स्तर में वे उत्तरदाता हैं जो इस स्तर पर कार्य करते हुए कुछ अनुभवी हो गए हैं जिनकी कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है और वे अपेक्षाकृत अधिक पारश्रमिक ले पा रहे हैं। मध्यम स्तर पर सुपरवाइजरी तथा बुनाई के क्षेत्र में आरंभिक स्थिति में हैं। मध्य एवं उच्च स्तर उन कारीगरों का है जो बुनाई आदि प्रक्रिया से जुड़कर आपनी श्रेष्ठ कार्यकुशलता के आधार पर एक अच्छा पारश्रमिक लेने की स्थिति में हैं।

इस कला के अस्तित्व के संदर्भ में मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।

मानव संसाधन के संदर्भ में मांग से अधिक पूर्ति की स्थिति होने के कारण उन्हें आसानी अर्ध कुशल मानव शक्ति आसपास के विस्तार से आसानी से मिल जाती है। क्योंकि इस कार्य को सहजता थोड़ा सा ध्यान से काम करने पर आसानी से सीखा सिखाया जा सकता है इसलिए कारीगरों के बीच में छोड़कर जाने पर समस्या सामान्य रूप से नहीं होती। हाँ, उत्पादन पर अवश्य फर्क पड़ता है यदि सीखने के बाद कारीगर छोड़कर चला जाय। सामान्य रूप से चेकिंग, बुनाई और बंच बनाने वाले कारीगर काम छोड़कर कम ही जाते हैं। यदि काम ऑर्डर के कारण जल्दी पूर्ण कराना हो तो कारीगरों ओवर टाइम के लिए राजी करना पड़ता है।  मालिकों का अच्छा व्यवहार ही उनके लिए प्रेरणास्पद साबित होता है।

 

संदर्भ

आमर्त्य सेन(1976) पोवर्टीः एन ऑर्डीनल एप्रोच टू मेजरमेंट इकोनोमेट्रिका, वोल्युम-44(2)

आमर्त्य सेन(1999) डवलपमेंट एज फ्रीडम, न्युयोर्क नोफ

चेम्बर्स, आर एवं कोनवे जी.आर. (1992) स्सटेनेबल रूरल लाइवलीहुडः प्रेक्टीकल कन्सेप्ट फॉर 21 सेन्चुरी, डिस्कसन पेपर-96 ब्रिघटॉन,

जैन (डॉ.) लोकेश (2020) आदिवासियों की सम्पोषित आजीविका (आदिवासी कारीगरों के पारंपरिक प्रबंधकीय-तकनीकी ज्ञान व कुशलताओं का अध्ययन), एग्री बायोवेट प्रेस, नई दिल्लीISBN 978-93-84502-92-8

जैन (डॉ.) लोकेश (2019) भारतीय संस्कृति एवं प्रबंध शिक्षण (गांधी विचार के समावेषीय आयामों के संदर्भ में), हर्ष बुक एजेन्सी, अहमदाबादISBN 978-81-933755-6-3

विनोबा भावे(1942) स्वराज शास्त्र, गूजरात विद्यापीठ प्रकाशन, अहमदाबाद

विनोबा भावे(1997) सर्वोदयनुं अर्थकारण (गुजराती), गूजरात विद्यापीठ प्रकाशन,अहमदाबाद

मोहनदास करमचंद गांधी- ग्राम स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद

मोहनदास करमचंद गांधी- हिन्द स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद

मोहनदास करमचंद गांधी- मंगल प्रभात, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद

 

द्वारा-

डॉ. लोकेश जैन

प्रोफेसर, ग्रामीण प्रबंधन विभाग, प्रबंधन संकाय

गूजरात विद्यापीठ-आश्रम मार्ग, अहमदाबाद(गुजरात) 380009

E-Mail: [email protected] mob. 9427026647

एवं

डॉ. देबेन्द्र दास

सदस्य सचिव (कार्यकारी) एवं सहायक निदेशक (R&N)

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण शिक्षा परिषद(MGNCRE), हैदराबाद

E-Mail: [email protected]  mob.7416417852

 

 

 

 

 




‘प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता : प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रतिभागिता प्रमाणपत्र

प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता पर  दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन संपन्न

प्रयागराज, 24 जून 2025। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित करते हुए जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में 22 एवं 23 जून 2025 को प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता : प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ विषय पर एक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन अत्यंत गरिमा एवं सफलता के साथ संपन्न हुआ। यह संगोष्ठी न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से संपन्न हुई, जिसमें देश-विदेश की लगभग 30 प्रमुख शैक्षणिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं मीडिया संस्थाओं ने सक्रिय सहभागिता की।

अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष-2025-26 की आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं संरक्षक डॉ. शैलेश शुक्ला की गणमान्य उपस्थिति एवं उनके मार्गदर्शन  में यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। 

दिनांक 22 जून को संगोष्ठी का विधिवत उद्घाटन हुआ। कॉलेज की प्राचार्या प्रो. आशिमा घोष ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आत्मीय स्वागत किया। प्रो. असीम मुखर्जी (अध्यक्ष, शासी निकाय) ने पहलगाम आतंकी घटना एवं ईरानइजराइल संघर्ष की पत्रकारिता का विश्लेषण करते हुए मीडिया की जिम्मेदारियों और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। उद्घाटन सत्र में प्रो. धनंजय चोपड़ा, पाठ्यक्रम समन्वयक, मीडिया अध्ययन केंद्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, डॉ.  रविनंदन सिंह, संपादक – सरस्वती पत्रिका आदि ने हिंदी पत्रकारिता से संबंधित अपने सारगर्भित वक्तव्य दिए।

 

23 जून को ऑनलाइन आयोजित किए गए समापन सत्र में विद्वानों ने समकालीन पत्रकारिता पर सारगर्भित विमर्श प्रस्तुत किए।

अमेरिका, मॉरीशस, कतर और बेल्जियम से आए अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य, डिजिटल मीडिया की दिशा, और सामाजिक भूमिका पर गंभीर संवाद किए।

 

मारीशस से हिंदी रेडियो ब्रॉडकास्टर डॉ. शशि दूकन, अमेरिका से सृजन अमेरिका  पत्रिका के संपादक अरुण नामदेव, बेल्जियम से सृजन यूरोप के संपादक कपिल कुमार, डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (संपादक, सृजन मॉरीशस पत्रिका), तथा डॉ. शैलेश शुक्ला (वैश्विक प्रधान संपादक, सृजन समूह एवं कार्यक्रम के मुख्य आयोजक) ने न्यू मीडिया, मीडिया की विसंगतियाँ, पेड मीडिया, सोशल मीडिया का हस्तक्षेप, और मीडिया के लोकतांत्रिक स्वरूप जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशद चर्चा की।

यह संगोष्ठी न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन और अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में, त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा), बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड जर्नलिज्म (बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी), आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह), अमरावती ग्रुप ऑफ इन्स्टिच्यूशन (वाराणसी), थाईलैंड हिंदी परिषद, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय, और सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन अमेरिका, सृजन मलेशिया, सृजन कतर, सृजन यूरोप, सृजन थाईलैंड, तथा मधुराक्षर पत्रिका आदि के सहयोग से आयोजित की गई।

कार्यक्रम की विशेष उपलब्धियों में हाइब्रिड मोड में अंतरराष्ट्रीय सहभागिता, प्रयागराज की पत्रकारिता पर गहन विमर्श, शोधार्थियों के लिए समृद्ध शोध मंच और पत्रकारिता के लोकतांत्रिक भविष्य पर मार्गदर्शी सुझाव प्रमुख रहे।

 

इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने न केवल प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान स्वरूप को रेखांकित किया, बल्कि इसके वैश्विक आयामों पर केंद्रित चिंतन को भी गति दी। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता की नई सदी के लिए प्रेरणा और दिशा-दर्शक बनकर उभरा है।

संगोष्ठी में 60 से अधिक प्रतिभागियों ने शोधपत्र वाचन प्रस्तुत कर प्रयागराज की पत्रकारिता पर केंद्रित ज्ञानवर्धक विमर्श को समृद्ध किया।  संगोष्ठी का सफल संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन आयोजन प्रभारी प्रो. रतन कुमारी वर्मा ने किया। इस अवसर पर प्रो. नीलिमा मिश्र, प्रो. अर्चना पाल, प्रो. मीनाश्री यादव, तथा सुश्री संगीता सहगल सहित कॉलेज की अन्य शिक्षिकाओं ने सहभागिता की।

 

 

 

 

 

 




कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण विषयक विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून को

फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि के अवसर  पर
कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण विषयक विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून को

हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025’ के अंतर्गत ‘कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण’ विषय पर एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून 2025 को शाम 7:30 बजे किया जाएगा।

यह आयोजन ‘न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं ‘अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें हिंदी पत्रकारिता के साथ-साथ सैन्य इतिहास और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीक रहे फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि को भी श्रद्धांजलि दी जाएगी।


इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन त्रिपुरा केन्द्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय (बठिंडा), आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह, मध्य प्रदेश), अमरावती ग्रुप ऑफ इन्स्टिच्यूशन, थाईलैंड हिंदी परिषद, जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय तथा सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर, सृजन मलेशिया, सृजन अमेरिका, सृजन थाईलैंड, सृजन यूरोप, मधुराक्षर आदि अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के सहयोग से किया जा रहा है। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता में कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) के बढ़ते उपयोग और उसके प्रभावों पर गहन संवाद को समर्पित होगा, जिसमें विषय-विशेषज्ञ प्रो. संजीव भानावत (प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ, पूर्व अध्यक्ष, जनसंचार केन्द्र, राजस्थान विश्वविद्यालय और संपादक, कम्युनिकेशन टुडे) अपने विचार साझा करेंगे।

फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उनके अदम्य साहस, नेतृत्व और भारतीय सैन्य इतिहास में उनके अतुलनीय योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जिन्हें प्यार से ‘सैम बहादुर’ कहा जाता है, 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व करते हुए देश को ऐतिहासिक विजय दिलाने वाले भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल थे। 27 जून 2008 को उनका निधन हुआ था, और इस आयोजन में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा।
कार्यक्रम में वार्ताकार एवं मंच संचालक की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और ‘सृजन संसार’ अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला निभाएंगे। डॉ. शुक्ला के अनुभव और संवाद शैली इस कार्यक्रम को और भी ज्ञानवर्धक और संवादपरक बनाएगी। इस कार्यक्रम में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के सफर को याद करते हुए डिजिटल युग में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभाव पर चर्चा होगी। इसके साथ ही न्यू मीडिया के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता के प्रशिक्षण में आने वाली संभावनाओं, चुनौतियों और नई तकनीकी दिशा पर भी विचार-विमर्श होगा।
इस कार्यक्रम के आयोजन में डॉ. कल्पना लालजी (राष्ट्रीय संयोजक, सृजन मॉरीशस), डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री (संस्थापक-संपादक, मधुराक्षर), प्रो. रतन कुमारी वर्मा (जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज), डॉ. हृदय नारायण तिवारी (एकलव्य विश्वविद्यालय), श्री कपिल कुमार (वरिष्ठ पत्रकार, सृजन यूरोप), डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (राष्ट्रीय संपादक, सृजन मॉरीशस), श्री अरुण नामदेव (राष्ट्रीय संपादक, सृजन अमेरिका), शालिनी गर्ग (राष्ट्रीय संपादक, सृजन कतर), प्रो. आशा शुक्ला (संरक्षक) और प्रो. विनोद कुमार मिश्रा (मार्गदर्शक) सहित अनेक विद्वानों का योगदान सुनिश्चित किया गया है।


कार्यक्रम की सफलता के लिए श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला (मुख्य संयोजक एवं संस्थापक-निदेशक, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन, लखनऊ) और श्री प्रशांत चौबे (संयोजक, अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन, लखनऊ) का विशेष सहयोग उल्लेखनीय है। यह आयोजन न केवल हिंदी पत्रकारिता में तकनीकी बदलाव और प्रशिक्षण के नए दृष्टिकोण पर विमर्श करेगा, बल्कि भारत के गौरवशाली सैन्य इतिहास के प्रति भी नई पीढ़ी को जागरूक करेगा।

आयोजकों ने हिंदी पत्रकारिता, मीडिया शिक्षण, तकनीकी शिक्षा, रक्षा अध्ययन, अभिलेख विज्ञान और सामाजिक विज्ञान से जुड़े सभी विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों, पत्रकारों और भाषा प्रेमियों से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में सहभागी बनने का आग्रह किया है। आयोजन की समस्त जानकारी, पंजीकरण और कार्यक्रम लिंक ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025’ के आधिकारिक लिंक https://tinyurl.com/IHJM2025DetailsLinksQRCodes पर उपलब्ध हैं। आयोजकों का विश्वास है कि यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयाँ देने के साथ-साथ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के बलिदान और उनकी नेतृत्वगुणों की गौरवगाथा को भी नई पीढ़ी तक पहुँचाएगा।




मध्य प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन

अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष 2025-26 के अंतर्गत

मध्य प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन 

न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से सृजन अमेरिका, सृजन मलेशिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर एवं हिंदी विभाग, कला एवं मानविकी संकाय, एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर मनाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह- 2025 के अंतर्गत 25 जून 2025 को सुबह 11 बजे से ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से मध्यप्रदेश में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता : विविध आयाम विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी।

इसमें हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, जनपदीय लेखन, पत्र-पत्रिकाएँ, स्वतंत्रता आंदोलन, आधुनिक तकनीक, डिजिटल मीडिया, और नई प्रवृत्तियों से जुड़े विविध पहलुओं पर देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के विद्वानों के साथ ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, मॉरीशस, कतर के विद्वानों ने मंथन किया।

यह आयोजन एकलव्य विश्वविद्यालय की कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया, प्रति कुलाधिपति श्रीमती पूजा मलैया एवं श्रीमती रति मलैया के कुशल नेतृत्व, कुलगुरू प्रोफेसर पवन कुमार जैन, कुलसचिव डॉ. प्रफुल्ल शर्मा के निर्देशन एवं हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हृदय नारायण तिवारी के संयोजन में किया गया।

इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं संरक्षक  विश्व प्रसिद्ध कवि, लेखक, पत्रकार एवं वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला, पूर्व महासचिव विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस एवं अधिष्ठाता, साहित्य संकाय, त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय डॉ.विनोद कुमार मिश्र, विशिष्ट अतिथि के रूप में विभागाध्यक्ष हिंदी अध्ययनशाला, कुलानुशासक, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा, सीनियर प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी, विषय विशेषज्ञ के रूप में  भूतपूर्व संयुक्त निदेशक, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी से प्रोफेसर सेवाराम त्रिपाठी, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल, राष्ट्रीय संपादक सृजन अमेरिका से श्री अरुण नामदेव, सृजन मॉरीशस से डॉ. सोमदत्त काशीनाथ, सृजन मलेशिया से डॉ. रश्मि चौबे, सृजन कतर से श्रीमती शालिनी गर्ग के साथ ही अनेक ख्यातिप्राप्त विद्वानों ने इस संगोष्ठी में विचार मंथन किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती एवं प्रथम पूज्य भगवान गणेश के चरणों में दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।

कुलगुरू प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार जैन द्वारा अभी अतिथियों का स्वागत किया गया साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया गया।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहीं एकलव्य विश्वविद्यालय की कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया ने वर्तमान हिंदी पत्रकारिता खासकर प्रिंट मीडिया में हो रहे भाषायी क्षरण को पटल पर रखते हुए हिंग्लिश आधारित हिंदी के चलन पर चिंता व्यक्त करते हुए इससे बाहर निकलने की बात कही।

बीज वक्तव्य में प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही चुनौतियों को ही वर्तमान की भी चुनौती माना साथ ही मध्यप्रदेश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों का उल्लेख करते हुए इंदौर को पत्रकारिता की उर्वरा भूमि कहा।

 

 

प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश के हिंदी साहित्य को रेखांकित करते हुए बुंदेलखंड के साहित्यकारों की लंबी श्रृंखला एवं उनके योगदान को पटल पर रखा।

कतर की धरती से जुड़ी श्रीमती शालिनी गर्ग ने हिंदी की संवेदना को चिन्हित किया।

अमेरिका से जुड़े सृजन अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के राष्ट्रीय संपादक श्री अरुण नामदेव ने भारत के टीवी चैनलों पर हो रही भड़काऊ बहस पर चिंता व्यक्त करते हुए समाधान दिया।

प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल ने पत्रकारिता और लोकतंत्र को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियों से निपटने हेतु समाधान प्रस्तुत किया।

प्रोफेसर सेवाराम त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता पर विचार रखते हुए वर्तमान हवा-हवाई पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त किया साथ ही पत्रकारिता में नैतिकता के क्षरण पर भी ध्यानाकर्षण कराया।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे एकलव्य विश्वविद्यालय के कला एवं मानविकी संकाय, अधिष्ठाता प्रोफेसर आर सी जैन ने हिंदी पत्रकारिता की संवेदना पर सहमति व्यक्त की।

द्वितीय सत्र में डॉ. आशीष जैन द्वारा जैन पत्रकारिता के इतिहास को रेखांकित किया गया।

प्रोफेसर सूर्य नारायण गौतम ने कहानी के माध्यम से वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा को चिन्हित किया गया।इस संगोष्ठी में अलग-अलग प्रदेशों से जुड़े दस से अधिक प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने शोधपत्र का वाचन किया।

इस अवसर पर डॉ. शैलेश शुक्ला ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर सृजन समूह द्वारा अनवरत पूरे वर्ष भर में 200 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना है।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र के अंत में कुलसचिव डॉ. प्रफुल्ल शर्मा एवं द्वितीय सत्र के अंत में डॉ. सुधीर गौतम द्वारा आभार व्यक्त किया गया।

इस अवसर पर देश के अलग-अलग राज्यों के प्राध्यापकों, संपादकों, संवाददाताओं, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के साथ ही दुनिया के अनेक देशों अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, मलेशिया, कतर आदि के हिंदी प्रेमी जुड़कर   इस ज्ञानयज्ञ को सफल बनाया। कार्यक्रम के अंत में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. हृदय नारायण तिवारी ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया कि यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी अपने उद्देश्य में सफल रही साथ ही भविष्य में इस विषय पर सभी के सहयोग से विस्तृत कार्ययोजना प्रकाश में लायी जाएगी। इस वृहद आयोजन को सफल बनाने में छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ. शैलेन्द्र जैन, डॉ. शमा खानम, डॉ. सुधीर गौतम, डॉ. वैभव कैथवास, डॉ. स्वाति गौर, डॉ. रमाकांत त्रिपाठी, श्री रणजीत सिंह, डॉ. दुर्गा महोबिया, डॉ. प्रमीला कुशवाहा,आईटी प्रमुख श्री राम नरेश लोधी, श्री मुकेश तिवारी, श्री साहिल कुर्मी एवं सतेंद्र यादव का विशेष सहयोग रहा।




अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी सम्मान योजना

“अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी सम्मान योजना”

उद्देश्य
हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर, सृजन मलेशिया, सृजन अमेरिका आदि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं एवं विश्व की विभिन्न संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में 30 मई 2025 से 30 मई 2026 तक मनाए जा रहे ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष – 2025-26’ के अंतर्गत आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी सम्मान योजना का उद्देश्य शोधकर्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं भाषा-प्रेमियों को ‘हिंदी भाषा में शोध’ एवं “हिंदी भाषा और तकनीक” विषय पर समकालीन विमर्श हेतु प्रोत्साहित करना है, साथ ही डॉ. शैलेश शुक्ला की विचारधारा, तकनीकी दृष्टि एवं अनुभवजन्य विश्लेषण पर आधारित शोध-सामग्री पर विमर्श का सृजन कराना है।

शोध सम्मान विवरण 
शोध रत्न सम्मान : 1 (एक)
शोध विभूषण सम्मान : 2 (दो)
शोध भूषण सम्मान : 5 (पाँच)
शोध श्री सम्मान : 11 (ग्यारह)

विशेष : इस योजना में प्राप्त सभी उच्च गुणवत्ता वाले आलेखों को ISBN युक्त पुस्तक / शोध-पत्रिका / डिजिटल जर्नल में प्रकाशित किया जाएगा।

आधार-पुस्तक

पुस्तक का नाम : हिंदी भाषा और तकनीक
लेखक : डॉ. शैलेश शुक्ला

प्रकाशक : न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन, लखनऊ
प्रकाशन वर्ष : 2024, आईएसबीएन : 978-81-949867-3-7
पुस्तक (निशुल्क) नीचे दिए गए लिंक
और सामने दिए गए क्यू आर कोड पर उपलब्ध है :- https ://tinyurl.com/BookByDrShaileshShukla

शोध सम्मान योजना  की शर्तें और दिशानिर्देश
1. शोधपरक समीक्षात्मक आलेख हेतु शब्द सीमा : 3000 से 5000 शब्द
* संरचना : आलेख में निम्न अनुभाग अनिवार्य रूप से सम्मिलित हों :-
* सारांश (Abstract) : 250–300 शब्द
* भूमिका / प्रस्तावना
* लेखन का उद्देश्य
* समकालीन संदर्भ में पुस्तक की प्रासंगिकता
2. लेखक परिचय : डॉ. शैलेश शुक्ला
* शैक्षणिक एवं व्यावसायिक पृष्ठभूमि
* पत्रकारिता, शिक्षण, राजभाषा व डिजिटल लेखन में योगदान
* पूर्व लेखन कार्यों की झलक
3. पुस्तक की संरचना और सामग्री का अवलोकन
* अध्याय संरचना (12 अध्यायों की सूची और उद्देश्य)
* तकनीकी शब्दावली, उपशीर्षक, और विशेषताएँ
* भाषा और शैली की विशेषता
4. पुस्तक की प्रमुख विषयवस्तु का विश्लेषण
यह खंड 4.1 से 4.8 तक विभाजित हो सकता है :
4.1 हिंदी भाषा का डिजिटल प्रवेश
4.2 सोशल मीडिया में हिंदी
4.3 हिंदी टाइपिंग व फॉन्ट्स
4.4 सॉफ्टवेयर, ऐप्स और AI में हिंदी
4.5 डिजिटल शिक्षा, प्रकाशन और अनुवाद में हिंदी
4.6 ब्लॉगिंग, यूट्यूब व डिजिटल साहित्य
4.7 SEO और सोशल मीडिया मार्केटिंग में हिंदी
4.8 भविष्य की दिशा और चुनौतियाँ
5. लेखन शैली एवं प्रस्तुति का विश्लेषण
* भाषा की सहजता, शैली की वैज्ञानिकता
* शब्दों का चयन, संप्रेषणीयता
* तकनीकी विषयों की सरलीकरण क्षमता
6. विषय की गहराई और प्रामाणिकता
* तकनीकी स्रोतों की प्रस्तुति
* अनुभवजन्य उदाहरणों का समावेश
* लेखक की व्यावहारिक दृष्टि
7. समसामयिक प्रासंगिकता और शोधयोग्यता
* पुस्तक का शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए महत्त्व
* डिजिटल युग में हिंदी के लिए इसका उपयोग
* नीतिगत निर्माण में संभावित योगदान
8. तुलनात्मक विवेचन (वैकल्पिक)
* अन्य हिंदी तकनीकी पुस्तकों या डिजिटल हिंदी लेखन से तुलना
* नवीनता और विशिष्टता का निर्धारण
9. पुस्तक की विशेषताएँ और सीमाएँ
* पुस्तक की सकारात्मक विशेषताएँ
* संभावित कमियाँ (यदि हों तो संतुलित ढंग से)
10. निष्कर्ष
* संपूर्ण मूल्यांकन का सार
* हिंदी भाषा और तकनीक के यथार्थ और संभावनाओं पर लेखक की पकड़
* भविष्य के शोध के लिए प्रेरणा
11. संदर्भ / ग्रंथ सूची
* प्रयुक्त स्रोत
* उद्धरण और टिप्पणियों के संदर्भ
* प्रत्येक शीर्षक के अंतर्गत 300–800 शब्दों का विश्लेषण करें।
* पुस्तक से प्रासंगिक उद्धरणों का प्रयोग करें।
* तटस्थ, शोधपरक और विद्वत्तापूर्ण भाषा का उपयोग करें।
* संदर्भ सूची (References) – APA शैली में या अन्य मानक अनुसंधान शैली में
12. तकनीकी प्रारूप :
* Font : यूनिकोड फॉन्ट (मंगल / निर्मला / कोकिला / कोई और युनिकोड फॉन्ट)
* स्पेस : 1.5
* प्रविष्टि हेतु फॉर्मैट : MS Word (Doc)
* भाषा : केवल हिंदी
13. प्रविष्टि जमा करने की अंतिम तिथि : 25 जुलाई 2025 तक
* प्रविष्टियाँ भेजने का माध्यम : ईमेल : [email protected]
* ईमेल विषय (Subject Line) :-
“अंतरराष्ट्रीय शोधार्थी सम्मान योजना हेतु शोधपरक समीक्षात्मक आलेख प्रतियोगिता हेतु प्रविष्टि”

मौलिकता (Originality)
1. आलेख स्वयं लिखा गया होना चाहिए।
2. 100% मौलिक (Plagiarism-free) हो। पुस्तक से कुछ भी उद्धृत करने पर संदर्भ अवश्य दिया जाए।
3. AI जनरेटेड कंटेंट, कॉपी-पेस्ट लेख को अस्वीकार कर दिया जाएगा।
4. आयोजक मंडल द्वारा प्लैगरिज्म सॉफ्टवेयर से जांच की जाएगी।

शोध सम्मान योजना  हेतु शोधपरक समीक्षात्मक आलेखों के संभावित  विषयों की सूची
प्रतियोगिता हेतु लेखक / शोधार्थीगण / प्राध्यापकगण निम्नलिखित दिए गए विषयों में से किसी एक या पुस्तक ‘हिंदी भाषा और तकनीक’ की शोधपरक समीक्षा पर आधारित अन्य संबंधित विषय का चयन कर सकते हैं :-
1. डॉ. शैलेश शुक्ला के लेखन में इंटरनेट युग और हिंदी भाषा की पहचान
2. डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक के आलोक में डिजिटल सामग्री निर्माण और उपभोग का विश्लेषण
3. सोशल मीडिया में हिंदी की शक्ति : डॉ. शैलेश शुक्ला की आलोचनात्मक दृष्टि
4. ई-कॉमर्स और हिंदी का संबंध : डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक के संदर्भ में
5. हिंदी टाइपिंग तकनीक : डॉ. शैलेश शुक्ला के अनुभवों की समीक्षा
6. यूनिकोड और तकनीकी मानकीकरण पर डॉ. शैलेश शुक्ला का योगदान
7. डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक में फोनेटिक बनाम इनस्क्रिप्ट की तुलना
8. हिंदी फॉन्ट्स का विकास : डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टि से
9. डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा प्रस्तुत हिंदी टाइपिंग साक्षरता की चुनौतियाँ और समाधान
10. डॉ. शैलेश शुक्ला के विश्लेषण में सोशल मीडिया ब्रांडिंग में हिंदी की भूमिका
11. सोशल मीडिया मार्केटिंग टूल्स की समीक्षा : डॉ. शैलेश शुक्ला की कृति के आधार पर
12. डॉ. शैलेश शुक्ला के विचारों में सामाजिक अभियानों में हिंदी की शक्ति
13. ग्रामीण भारत में डिजिटल हिंदी का प्रसार : डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टिकोण से
14. डॉ. शैलेश शुक्ला के विश्लेषण में युवाओं की डिजिटल संस्कृति और हिंदी
15. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी : डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक का विश्लेषण
16. हिंदी अनुवाद तकनीकों पर डॉ. शैलेश शुक्ला का शोधपरक मूल्यांकन
17. नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग में हिंदी की संभावनाएँ : डॉ. शैलेश शुक्ला के अनुसार
18. डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक में रोबोटिक्स और हिंदी भाषा का संगम
19. डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा रचित हिंदी-अनुवाद में सांस्कृतिक अंतर्वस्तु की भूमिका
20. डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टि में डिजिटल प्रकाशन : लेखक, पाठक और प्लेटफॉर्म
21. हिंदी डिजिटल पाठकों की प्रवृत्तियाँ : डॉ. शैलेश शुक्ला की अंतर्दृष्टि
22. ई-शिक्षा में हिंदी भाषा का स्थान : डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक के आलोक में
23. हिंदी और SEO के तकनीकी पक्ष : डॉ. शैलेश शुक्ला की समीक्षा
24. भविष्य की ओर हिंदी और तकनीक : डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक का विमर्शात्मक विश्लेषण
25. डॉ. शैलेश शुक्ला के अनुभवों में डिजिटल पत्रकारिता और हिंदी भाषा का परिदृश्य
26. डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टि में पॉडकास्ट, यूट्यूब और डिजिटल साहित्य में हिंदी की भूमिका
27. डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक के आलोक में मोबाइल ऐप्स और हिंदी भाषा का प्रयोग
28. डॉ. शैलेश शुक्ला की कृति में डिजिटल हिंदी कविता और छवि प्रस्तुति की प्रवृत्तियाँ
29. ब्लॉगिंग संस्कृति और हिंदी अभिव्यक्ति : डॉ. शैलेश शुक्ला की वैचारिक पृष्ठभूमि
30. डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा प्रतिपादित हिंदी की डिजिटल लेखन शैली और भाषा प्रवाह
31. राजभाषा नीति और तकनीकी साधनों का समन्वय : डॉ. शैलेश शुक्ला का विश्लेषण
32. डॉ. शैलेश शुक्ला के अनुसार सरकारी संस्थानों में तकनीकी हिंदी का व्यवहारिक पक्ष
33. डॉ. शैलेश शुक्ला के विचारों में हिंदी के तकनीकी टूल्स का प्रशिक्षण पक्ष
34. डॉ. शैलेश शुक्ला की कृति में डिजिटल हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता
35. डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टि में डिजिटल साहित्य की गुणवत्ता और प्रामाणिकता
36. डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा प्रतिपादित टेक्स्ट, इमेज और वीडियो रूप में हिंदी की बहुविधता
37. डॉ. शैलेश शुक्ला के आलेखों में तकनीकी नवाचार और हिंदी साहित्य का समन्वय
38. डॉ. शैलेश शुक्ला की पुस्तक में हिंदी तकनीक की चुनौतियाँ और सुधार के सुझाव
39. हिंदी भाषा में नवाचार और स्टार्टअप की भूमिका : डॉ. शैलेश शुक्ला की अंतर्दृष्टि
40. डॉ. शैलेश शुक्ला की दृष्टि में हिंदी का डिजिटलीकरण : एक समीक्षात्मक अध्ययन
एवं पुस्तक की शोधपरक समीक्षा पर आधारित अन्य कोई भी संबंधित विषय

सम्मान समारोह 
सभी विजेताओं की घोषणा हमारे ऑनलाइन मंचों पर की जाएगी और एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा। सभी सम्मानित किए गए प्रतिभागियों को प्रबंधन द्वारा निर्धारित सम्मानित राशि के बराबर या अधिक मूल्य की पुस्तकें उनके दिए गए डाक पते पर प्रेषित की जाएंगी। भारत से बाहर के विजेताओं के मामले में डाक खर्च देय होगा।
प्राप्त हुए गुणवत्तापूर्ण आलेखों का प्रकाशन एवं लोकार्पण
* प्रतियोगिता के सभी उच्च गुणवत्ता वाले आलेखों को ISBN युक्त पुस्तक / शोध-पत्रिका / डिजिटल जर्नल में प्रकाशित किया जाएगा।
* चयनित लेखों के संकलन का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकार्पण किया जाएगा।
प्रतियोगिता पंजीकरण शुल्क
कोई शुल्क देय नहीं है। यह सम्मान योजना पूर्णतः निःशुल्क है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
निर्णायकों का निर्णय अंतिम एवं सर्वमान्य होगा।
इस शोधपरक आलेख लेखन प्रतियोगिता से संबंधित समस्त जानकारी आयोजक मंडल द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार की गई है, तथापि इसमें दी गई सूचनाएँ बिना किसी पूर्व सूचना के संशोधित की जा सकती हैं। आयोजक मंडल द्वारा प्रस्तुत नियम, पुरस्कार विवरण एवं अन्य जानकारी पूरी सावधानी से प्रदान की गई है, परंतु किसी भी प्रकार की त्रुटि, विसंगति या परिवर्तन की स्थिति में आयोजक संस्था की उत्तरदायित्व सीमित रहेगा।
प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत किए गए आलेख उनके स्वयं के विचार, विश्लेषण एवं निष्कर्ष हैं, जिनकी संपूर्ण वैचारिक जिम्मेदारी लेखक की होगी। आयोजक संस्था इन विचारों से आवश्यक नहीं कि सहमत हो। किसी भी प्रकार की सामग्री में यदि कॉपीराइट या बौद्धिक संपदा अधिकार का उल्लंघन पाया जाता है, तो उसकी पूर्ण जिम्मेदारी संबंधित लेखक की होगी, न कि आयोजक संस्था की।
यह अंतरराष्ट्रीय शोध सम्मान योजना शोध एवं रचनात्मकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है, इसका कोई वाणिज्यिक लाभ आयोजक संस्था द्वारा नहीं लिया जा रहा है। प्रतिभागियों से कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा है और पुरस्कार/प्रकाशन केवल योग्यता के आधार पर निर्णयित किए जाएंगे। पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण आलेख न प्राप्त होने की स्थिति में आयोजक संस्थाओं के प्रबंधन द्वारा प्रतियोगिता रद्द की जा सकती है।

न्यायक्षेत्र
यदि इस प्रतियोगिता से संबंधित किसी सूचना, निर्णय या निष्कर्ष से कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उसका निवारण केवल लखनऊ (उत्तर प्रदेश) न्यायक्षेत्र में ही किया जाएगा।
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पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
संस्थापक-निदेशक
अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन एवं
न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन
प्रशांत चौबे
संस्थापक-निदेशक
अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन




प्रयागराज में हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के अवसर पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 22-23 जून को

प्रयागराज में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी : हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों को समर्पित भव्य आयोजन

प्रयागराज, जून 2025। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा के सुअवसर 30 मई 2025 से 30 मई 2026 तक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशनद्वारा मनाए जा रहे ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष – 2025-26’ के विभिन्न कार्यक्रमों की शृंखला के अंतर्गत एक ऐतिहासिक और बहुआयामी अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 22-23 जून 2025 को प्रयागराज स्थित जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) में किया जा रहा है।

यह आयोजन न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के संयुक्त सहयोग से, देश-विदेश की अनेक शैक्षणिक, सांस्कृतिक और पत्रकारिता संस्थाओं के सहभाग से संपन्न हो रहा है। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय है— प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता : प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ, जो कि हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रयागराज की ऐतिहासिक भूमिका और भविष्य की दिशा को रेखांकित करेगा।

यह दो दिवसीय संगोष्ठी हाइब्रिड मोड में आयोजित की जा रही है, जिसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, पत्र-पत्रिकाओं, शोध संस्थानों और मीडिया संगठनों की सहभागिता सुनिश्चित की गई है।

इसमें त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा), बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड जर्नलिज्म, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह), अमरावती ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन (वाराणसी), थाईलैंड हिंदी परिषद, आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय, और सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर, सृजन मलेशिया, सृजन अमेरिका, सृजन थाईलैंड, सृजन यूरोप  जैसी अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भागीदारी कर रही हैं।

इस संगोष्ठी की अंतरराष्ट्रीय आयोजन समिति की संरक्षक प्रो. आशा शुक्ला (पूर्व कुलगुरु, ब्राउस, इंदौर) हैं, जबकि मार्गदर्शक की भूमिका में प्रो. विनोद कुमार मिश्रा (पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस एवं अधिष्ठाता, साहित्य संकाय, त्रिपुरा केन्द्रीय विश्वविद्यालय) हैं।

इस संगोष्ठी की अंतरराष्ट्रीय आयोजन समिति के के अध्यक्ष एवं संरक्षक डॉ. शैलेश शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक प्रधान संपादक हैं।

मुख्य संयोजक की भूमिका में श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला (संस्थापक-निदेशक, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन) हैं, जबकि संयोजक  हैं श्री प्रशांत चौबे, वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक।

संगोष्ठी में देश-विदेश के अनेक विशिष्ट वक्ता और विद्वान सहभाग करेंगे, जिनमें प्रो. असीम कुमार मुखर्जी (अध्यक्ष, शासी निकाय, जगत तारन कॉलेज), प्रो. आशिमा घोष (प्राचार्या), प्रो. कुमार वीरेन्द्र सिंह (अध्यक्ष, राजभाषा कार्यान्वयन समिति), डा. रविनंदन सिंह (वरिष्ठ साहित्यकार), डा. धनंजय चोपड़ा (मीडिया अध्ययन केंद्र), डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री, संपादक, मधुराक्षर एवं सह आचार्य, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, डॉ. शशि दूकन (वरिष्ठ ब्रोडकास्टर, मॉरीशस), कपिल कुमार (संपादक, सृजन यूरोप अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, बेल्जियम), अरुण नामदेव (राष्ट्रीय संपादक, सृजन अमेरिका अंतरराष्ट्रीय पत्रिका, डलास, अमेरिका), डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (राष्ट्रीय संपादक, सृजन मॉरीशस अंतरराष्ट्रीय पत्रिका) आदि प्रमुख हैं।

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यह संगोष्ठी न केवल प्रयागराज की पत्रकारिता पर केंद्रित होगी, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के वैश्विक विस्तार, डिजिटल मीडिया के प्रभाव, भाषा-संवर्द्धन और नई पीढ़ी की भूमिका जैसे ज्वलंत विषयों पर भी विमर्श प्रस्तुत करेगी। कार्यक्रम से संबंधित समस्त जानकारी, पंजीकरण लिंक, और ऑनलाइन सहभाग हेतु विवरण https://tinyurl.com/IHJM2025DetailsLinksQRCodes पर उपलब्ध हैं। फ़ेसबुक, व्हाट्सएप और टेलीग्राम समूहों से भी इस वैश्विक कार्यक्रम से जुड़ा जा सकता है।

इस महोत्सव में भाग लेने हेतु सभी प्रतिभागियों को पूर्व पंजीकरण आवश्यक है। पंजीकरण लिंक :-  https://tinyurl.com/IHJM2025ForAllPrograms और क्यू आर कोड :- 

कार्यक्रम से जुड़ने के लिए गूगल मीट लिंक – https://tinyurl.com/IHJM2025 और क्यू आर कोड उपलब्ध कराया गया है :-

आयोजन से जुड़ी ताज़ा जानकारी के लिए टेलीग्राम चैनल लिंक : https://t.me/SrijanAustraliaIEJournaL  और क्यू आर कोड :- 

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 न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन तथा अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन की संस्थापक-निदेशक श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला ने बताया कि यह आयोजन विश्वस्तरीय स्तर पर हिंदी पत्रकारिता की स्थिति, चुनौतियों और संभावनाओं को एक साथ मंच पर लाकर संवाद, विमर्श और नवाचार की दिशा में एक निर्णायक पहल करेगा। यह आयोजन न केवल हिंदी पत्रकारिता के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करता है, बल्कि डिजिटल युग में उसके बदलते स्वरूप को भी वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाता है। यह महीना निश्चित रूप से हिंदी के लिए एक नई जागरूकता, आत्मगौरव और अंतरराष्ट्रीय संवाद का उत्सव सिद्ध होगा। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के पुल की भांति कार्य करेगा तथा प्रयागराज को एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता विमर्श के केंद्र में स्थापित करेगा। यह कार्यक्रम हिंदी के गौरव को अंतरराष्ट्रीय पटल पर नए शिखर तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रयास है।




हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता : विविध आयाम” विषयक अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन 17 जून को

राजमाता जीजाबाई की 352वीं पुण्यतिथि पर

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता : विविध आयाम” विषयक अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन

17 जून 2025 को शाम 8:40 बजे (भारतीय समय) भारतवर्ष की महान प्रेरणास्त्रोत, मराठा स्वराज्य की शिल्पकार और छत्रपति शिवाजी महाराज की मातृशक्ति राजमाता जीजाबाई की 352वीं पुण्यतिथि के अवसर पर हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता को समर्पित एक अत्यंत विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ‘न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं ‘अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025’ की विविध कार्यक्रम श्रृंखला का हिस्सा है, जो 30 मई 2025 से 30 जून 2025 तक हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर संचालित हो रहा है।

यह संवाद “हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता : विविध आयाम” विषय पर केंद्रित होगा, जिसमें हिंदी पत्रकारिता के साहित्यिक सरोकार, विमर्श की परंपरा, भाषा का सौंदर्यशास्त्र और साहित्यिक अभिव्यक्ति के नवीन माध्यमों पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा। इस अवसर पर आमंत्रित विषय-विशेषज्ञ होंगे वरिष्ठ आलोचक, संपादक एवं शिक्षाविद डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री, जो मधुराक्षर पत्रिका के संस्थापक-संपादक हैं तथा लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा में सह-आचार्य (हिंदी) के रूप में कार्यरत हैं।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा किया जाएगा।

यह संवाद विशेष रूप से हिंदी पत्रकारिता में साहित्यिक दृष्टि के योगदान, विचारधारा और संवेदना को रेखांकित करेगा, जो समकालीन डिजिटल युग में भी अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए है। कार्यक्रम में यह विचार भी प्रमुखता से सामने लाया जाएगा कि किस प्रकार राजमाता जीजाबाई जैसी प्रेरणादायी ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से प्राप्त नारी चेतना आज के साहित्यिक लेखन और पत्रकारिता में दृष्टिगोचर होती है।

कार्यक्रम का आयोजन भारत के साथ-साथ विश्वभर की प्रमुख संस्थाओं और पत्रिकाओं के सहयोग से हो रहा है, जिनमें त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड जर्नलिज्म, एकलव्य विश्वविद्यालय, अमरावती ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन, जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, थाईलैंड हिंदी परिषद, और आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन प्रमुख हैं।

साथ ही, सृजन समूह की अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाएं — सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन अमेरिका, सृजन थाईलैंड, सृजन यूरोप, सृजन मलेशिया, सृजन कतर और मधुराक्षर — इस वैश्विक आयोजन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

कार्यक्रम के प्रमुख आयोजकों में मुख्य संयोजक श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला, अध्यक्ष एवं संरक्षक डॉ. शैलेश शुक्ला, राष्ट्रीय संयोजक डॉ. कल्पना लालजी (संपादक – सृजन मॉरीशस), संयोजक श्री प्रशांत चौबे (संस्थापक – अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन), और सह संयोजकों में डॉ. सोमदत्त काशीनाथ, डॉ. हृदय नारायण तिवारी, प्रो. रतन कुमारी वर्मा, श्री कपिल कुमार, श्री अरुण नामदेव, शालिनी गर्ग आदि जैसे विविध अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि शामिल हैं।

मार्गदर्शक के रूप में प्रो. विनोद कुमार मिश्रा और संरक्षक के रूप में प्रो. आशा शुक्ला की भूमिका उल्लेखनीय रहेगी।

इस महोत्सव में भाग लेने हेतु सभी प्रतिभागियों को पूर्व पंजीकरण आवश्यक है। पंजीकरण लिंक :-  https://tinyurl.com/IHJM2025ForAllPrograms और क्यू आर कोड :- 

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 न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन तथा अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन की संस्थापक-निदेशक श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला ने बताया कि यह आयोजन विश्वस्तरीय स्तर पर हिंदी पत्रकारिता की स्थिति, चुनौतियों और संभावनाओं को एक साथ मंच पर लाकर संवाद, विमर्श और नवाचार की दिशा में एक निर्णायक पहल करेगा। यह आयोजन न केवल हिंदी पत्रकारिता के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करता है, बल्कि डिजिटल युग में उसके बदलते स्वरूप को भी वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाता है। यह महीना निश्चित रूप से हिंदी के लिए एक नई जागरूकता, आत्मगौरव और अंतरराष्ट्रीय संवाद का उत्सव सिद्ध होगा।




विविध आयामों में विस्तार लेती वैश्विक हिंदी पत्रकारिता : विशेषज्ञ वार्ता की ऐतिहासिक प्रस्तुति

विविध आयामों में विस्तार लेती वैश्विक हिंदी पत्रकारिता : विशेषज्ञ वार्ता की ऐतिहासिक प्रस्तुति

16 जून 2025, शाम 6 :00 बजे (भारत समय) — अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 के अंतर्गत आयोजित एक महत्वपूर्ण संवादमूलक कार्यक्रम “हिंदी की वैश्विक पत्रकारिता : विविध आयाम” ने वैश्विक मंच पर हिंदी पत्रकारिता के प्रभाव, समस्याएं, अवसरों और सांस्कृतिक दायित्वों पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया। यह कार्यक्रम पत्रकारिता की 200 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा का एक विचारोत्तेजक और दूरगामी पड़ाव सिद्ध हुआ।

यह सारगर्भित संवाद न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। इसके आयोजन में त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर – पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमेनिटीज़ एंड जर्नलिज्म (बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी), आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह), थाईलैंड हिंदी परिषद, सृजन समूह की अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाएं (मॉरीशस, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, थाईलैंड, कतर), जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय आदि संस्थानों की सक्रिय सहभागिता रही।

 

हिंदी पत्रकारिता के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में नए विमर्श  : मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित रहे डॉ. जवाहर कर्नावट (निदेशक, अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र, रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल), जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता के वैश्विक स्वरूप की बहुआयामी पड़ताल की। उन्होंने डिजिटल माध्यमों, प्रवासी पत्रकारिता, भाषिक विविधता, राजनीतिक-सांस्कृतिक संवाद, नई पीढ़ी की सहभागिता और वैश्विक पाठक-समुदाय की बदलती मानसिकता पर ठोस आंकड़ों और दृष्टांतों के साथ विचार प्रस्तुत किए।

उन्होंने 27 देशों की हिंदी पत्रकारिता से जुड़े पत्र-पत्रिकाओं की प्रतियाँ एकत्रित करने के लिए की गईं विभिन्न देशों की यात्राओं, उन देशों के राष्ट्रीय पुस्तकालयों और अभिलेखागारों में किए गए अपने शोध को विस्तार से बताया।

डॉ. जवाहर कर्नावट ने यह भी बताया कि विदेश में 1883 से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है और विभिन्न देशों में प्रकाशित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं में भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के पक्ष में सामग्री प्रकाशित की। उन्होंने बताया कि बहुत सी पत्रिकाएं वर्षों तक हाथ से लिखकर प्रकाशित की गईं।

कार्यक्रम के संचालक एवं सह-वक्ता डॉ. शैलेश शुक्ला (वरिष्ठ पत्रकार, वैश्विक प्रधान संपादक – सृजन संसार) ने वैश्विक पत्रकारिता के तकनीकी, व्यावसायिक और सांस्कृतिक पक्षों की विवेचना करते हुए हिंदी को विश्व मंच पर प्रतिस्थापित करने की रणनीतियों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने प्रवासी भारतीय समाज में हिंदी पत्रकारिता के योगदान और संभावनाओं की व्याख्या की।

गंभीर संवाद, बहस और नवदृष्टि  : संवाद के दौरान अनेक प्रश्नों और मुद्दों पर प्रकाश डाला गया — जैसे हिंदी पत्रकारिता की सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी, क्षेत्रीय बनाम वैश्विक एजेंडा, न्यू मीडिया (New Media) का प्रभाव, हिंदी बनाम अन्य भारतीय भाषाएं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence – AI) से पत्रकारिता की दिशा और प्रवासी भारतीयों की पहचान की रक्षा में हिंदी मीडिया की भूमिका।

सक्रिय संयोजन और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता

इस भव्य आयोजन की मुख्य संयोजक रहीं श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला (संस्थापक-निदेशक, न्यू मीडिया सृजन संसार एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन), जबकि आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं संरक्षक की भूमिका में रहे डॉ. शैलेश शुक्ला, जिन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा और लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता को ‘वाणी के स्तर से नीति के स्तर तक’ पहुँचाने की आवश्यकता बताई।

संयोजक श्री प्रशांत चौबे (अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन), राष्ट्रीय संयोजक डॉ. कल्पना लालजी (सृजन मॉरीशस), मार्गदर्शक प्रो. विनोद कुमार मिश्रा (पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय), संरक्षक प्रो. आशा शुक्ला (आशा पारस फाउंडेशन), तथा सह संयोजकों की अंतरराष्ट्रीय टीम — डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री, प्रो. रतन कुमारी वर्मा, डॉ. हृदय नारायण तिवारी, श्री कपिल कुमार, डॉ. सोमदत्त काशीनाथ, श्री अरुण नामदेव, श्रीमती शालिनी गर्ग — ने अपनी प्रभावी भूमिका निभाई।

दुनिया भर से सहभागिता और सकारात्मक प्रतिक्रियाएं  : कार्यक्रम में भारत के साथ-साथ मॉरीशस, थाईलैंड, मलेशिया, अमेरिका, यूरोप, कतर, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों से जुड़े हिंदीप्रेमी, पत्रकार, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी ऑनलाइन शामिल हुए। सोशल मीडिया चैनलों, टेलीग्राम एवं व्हाट्सऐप ग्रुप्स के माध्यम से इस आयोजन की जानकारी सैकड़ों लोगों तक पहुँची।

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं और आयोजकों ने इस बात पर सहमति जताई कि हिंदी पत्रकारिता अब केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक वैश्विक संवाद का साधन बन चुकी है। यह संवाद, आलोचना, जनचेतना, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता का माध्यम है। इसके विविध आयामों की समझ और विकास हेतु इस प्रकार के संवाद निरंतर आवश्यक हैं।

यह कार्यक्रम न केवल “अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025” का एक महत्त्वपूर्ण आयाम था, बल्कि यह आगामी “अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष – 2025-26” की दिशा निर्धारित करने वाला प्रेरक संवाद भी सिद्ध हुआ।




“हिंदी की वेब पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार : एसईओ एवं अन्य तकनीकी आयाम” विषय पर संवाद आज शाम 9 बजे से

हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष – 2025–26 के अंतर्गत 30 मई से 30 जून 2025 तक आयोजित किए जा रहे अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025 की विविध शृंखला में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम 11 जून 2025, रात 9:00 बजे आयोजित किया जा रहा है। इस विशेष संवाद का विषय है: “हिंदी की वेब पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार : एसईओ (Search Engine Optimization) एवं अन्य तकनीकी आयाम”

 

यह कार्यक्रम विशेष रूप से उन युवा मीडिया कर्मियों, वेब-पत्रिका संपादकों, डिजिटल पत्रकारिता से जुड़े शोधकर्ताओं, कंटेंट क्रिएटर्स एवं प्रकाशकों के लिए उपयोगी है जो हिंदी को वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में प्रभावी और प्रतिस्पर्धी बनाना चाहते हैं।

इस संवाद कार्यक्रम के मुख्य वक्ता होंगे – वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञ एवं Search MarkUp (नोएडा) के निदेशक श्री सोनू पाण्डेय, जो वेब पत्रिकाओं के SEO (Search Engine Optimization), keyword optimization, backlink building, structured metadata, mobile optimization, content strategy एवं search ranking बढ़ाने की तकनीकों पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देंगे।

यह संवाद न केवल डिजिटल मार्केटिंग की समग्र समझ देगा, बल्कि हिंदी वेब सामग्री को Google जैसे प्रमुख सर्च इंजनों में उच्च स्थान दिलाने की रणनीतियाँ भी सुझाएगा।

संवाद एवं मंच संचालन करेंगे – वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, संपादक एवं सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला

वे हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर डिजिटल मीडिया के वर्तमान परिदृश्य तक की चर्चा करते हुए इस बात पर ज़ोर देंगे कि आज SEO कोई तकनीकी विकल्प नहीं, बल्कि वेब प्रकाशन के लिए एक अनिवार्यता बन चुका है।

इस कार्यक्रम का आयोजन न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित  किया जा रहा है।

इस बहुस्तरीय आयोजन में सहभागी संस्थाएँ हैं – त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय (डॉ. आंबेडकर चेयर), पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय (बठिंडा), बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड जर्नलिज्म (बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी), एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह), जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज (प्रयागराज), थाईलैंड हिंदी परिषद, आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एवं अंतरराष्ट्रीय सृजन पत्रिकाएँ – सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन अमेरिका, सृजन मलेशिया, सृजन थाईलैंड, सृजन यूरोप, सृजन कतर एवं मधुराक्षर आदि प्रसिद्ध हिंदी पत्रिकाएँ

कार्यक्रम के मुख्य संयोजक हैं – श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला (संस्थापक-निदेशक, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन)। अध्यक्ष एवं संरक्षक हैं – डॉ. शैलेश शुक्ला

 

 संयोजक – श्री प्रशांत चौबे (संस्थापक-निदेशक, अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन)। अन्य सह-संयोजकों में शामिल हैं – डॉ. कल्पना लालजी (संपादक, सृजन मॉरीशस), डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री (मधुराक्षर), प्रो. रतन कुमारी वर्मा (जगत तारन कॉलेज), डॉ. हृदय नारायण तिवारी (एकलव्य विश्वविद्यालय), श्री कपिल कुमार (सृजन यूरोप), डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (सृजन मॉरीशस), श्री अरुण नामदेव (सृजन अमेरिका), शालिनी गर्ग (सृजन कतर) आदि।

संरक्षक – प्रो. आशा शुक्ला (पूर्व कुलगुरु, ब्राउस, म.प्र.)
मार्गदर्शक – प्रो. विनोद कुमार मिश्रा (पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस एवं अधिष्ठाता, त्रिपुरा विश्वविद्यालय)

कार्यक्रम से जुड़ी सभी जानकारी, पंजीकरण एवं लिंक निम्न माध्यमों से प्राप्त की जा सकती है:
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इस महोत्सव में भाग लेने हेतु सभी प्रतिभागियों को पूर्व पंजीकरण आवश्यक है। पंजीकरण लिंक :-  https://tinyurl.com/IHJM2025ForAllPrograms और क्यू आर कोड :- 

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