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इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

डॉ. विकास दवे

निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश 

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आगामी 30 और 31 मार्च को इंदौर में आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ देशभर की साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े संपादकों, लेखकों, शोधार्थियों और प्रकाशन विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के समक्ष बदलते समय में उत्पन्न हो रही चुनौतियों, उनके स्वरूप, सामग्री और भविष्य की दिशा पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से आयोजित यह समागम साहित्यिक जगत में विशेष उत्सुकता का केंद्र बना हुआ है। अकादमी के अनुसार, इस आयोजन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित आर्थिक, तकनीकी और पाठकीय संकटों पर न केवल चर्चा होगी, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी खोजने का प्रयास किया जाएगा।

 

समागम का उद्घाटन 30 मार्च को प्रातः 11 बजे से होगा, जिसमें ‘देश और समाज के प्रति साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का दायित्व बोध : वीणा का शताब्दी संदर्भ’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित किया जाएगा। इस सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े विद्वान तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ के संपादक अपने विचार व्यक्त करेंगे। उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण में उनका योगदान तथा बदलते मीडिया परिवेश में उनकी जिम्मेदारियों पर विशेष चर्चा अपेक्षित है। इसके बाद आयोजित प्रथम सत्र में पत्रिकाओं के स्वरूप और प्रस्तुति को केंद्र में रखते हुए ‘जो दिखता है वही बिकता है’ विषय पर विमर्श किया जाएगा, जिसमें यह विचार किया जाएगा कि साहित्यिक पत्रिकाओं के कलेवर और लेआउट में आकर्षण की कमी किस प्रकार पाठकों को उनसे दूर कर रही है और उन्हें अधिक पठनीय के साथ-साथ दर्शनीय बनाने की आवश्यकता क्यों है।

 

दोपहर बाद के सत्रों में समागम का स्वर और अधिक व्यावहारिक तथा बहुआयामी हो जाएगा। ‘थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी’ विषयक सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग्य चित्रों के प्रयोग पर चर्चा होगी, जबकि अगले सत्र में पत्रिका प्रकाशन से जुड़ी प्रशासनिक और आर्थिक प्रक्रियाओं पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया जाएगा। इसमें आर.एन.आई. पंजीयन, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क, डाक पंजीयन और वितरण व्यवस्था से संबंधित जटिलताओं को सरल भाषा में समझाया जाएगा। इसी क्रम में सरकारी अनुदान और विज्ञापन प्राप्त करने की प्रक्रियाओं पर भी विशेषज्ञ जानकारी साझा की जाएगी, जो विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर की पत्रिकाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दिन के अंतिम चरण में साहित्यिक पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और वैश्विक स्तर पर उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट पर चर्चा करते हुए संभावित समाधान तलाशे जाएंगे, जिसके बाद सायंकालीन विशेष सत्र में देशभर से आए संपादक अपनी-अपनी पत्रिकाओं के अब तक के योगदान और अनुभव साझा करेंगे।

 

समागम के दूसरे दिन, 31 मार्च को, विमर्श का केंद्र साहित्यिक सामग्री की गुणवत्ता, कलात्मक प्रस्तुति और आधुनिक मुद्रण तकनीक पर रहेगा। ‘छपास की भूख के बीच संपादक धर्म का चीरहरण’ विषय पर आयोजित सत्र में पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही रचनाओं के स्तर में गिरावट और संपादकीय मानकों पर पड़ रहे प्रभावों पर गंभीर चर्चा की जाएगी। इसके पश्चात आयोजित सत्र में साहित्य और चित्रांकन के संबंधों पर विचार करते हुए यह देखा जाएगा कि चित्र और कलात्मक प्रस्तुति किस प्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं की सौंदर्यात्मकता और पठनीयता को बढ़ा सकते हैं। दोपहर बाद का सत्र आधुनिक मुद्रण तकनीकों और प्रकाशन के बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहेगा, जिसमें नई तकनीकों के माध्यम से पत्रिकाओं की गुणवत्ता, प्रसार और लागत प्रबंधन पर प्रकाश डाला जाएगा।

 

दो दिवसीय इस समागम का समापन ‘पाथेय’ विषयक उद्यापन सत्र से होगा, जिसमें समागम के निष्कर्षों और भविष्य की दिशा पर समग्र विचार प्रस्तुत किए जाएंगे। आयोजन समिति के अनुसार, इस समागम से प्राप्त सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर साहित्यिक पत्रिकाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज तैयार करने की भी योजना है। साहित्यिक पत्रकारिता के समकालीन परिदृश्य में यह आयोजन न केवल संवाद का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के भविष्य को लेकर ठोस रणनीति बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

(काव्य समग्र-गीत के विशेष संदर्भ में)

शोधार्थी : बरबी ललबियाकसाङी साइलो

शोध-निर्देशक : प्रो. सुशील कुमार शर्मा

हिंदी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल

 

सारांश

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ (2023) में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय भावना दो ऐसी धाराएँ हैं जो एक-दूसरे से अलग नहीं — बल्कि आपस में गहरे जुड़ी हुई हैं। गौड़ की दृष्टि में भारत की राष्ट्रीय आत्मा उसकी आध्यात्मिक परंपरा में है। इस शोध पत्र में संग्रह के उन गीतों का विश्लेषण किया गया है जिनमें कबीर, राम, कृष्ण, महावीर जैसी आध्यात्मिक परंपराओं की छाप है, और साथ ही किसान की पीड़ा, राजनीतिक खोखलेपन की आलोचना, और देश-प्रेम का भाव भी है। इस दोहरी धारा की पड़ताल करना इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य है।

 

  1. प्रस्तावना

बी. एल. गौड़ का काव्य एक ऐसे व्यक्ति का काव्य है जो जीवन के हर पहलू को गहराई से देखता है। वे एक इंजीनियर, उद्यमी और साहित्यकार हैं। उन्होंने हिंदी अकादेमी दिल्ली (2010-14), संस्कृति मंत्रालय (2018-19) और शिक्षा मंत्रालय (2021-22) की समितियों में भी काम किया।² इस व्यापक अनुभव ने उनकी काव्य-दृष्टि को एक विशेष गहराई और सामाजिक सजगता दी है।

‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका में ओम निश्चल ने गौड़ की इस दोहरी विशेषता को पहचाना है :

“यों तो वे राजनीतिक कवि नहीं पर जहाँ कुछ गलत होते देखा है उसे कविता में उतारने की चेष्टा भी की है। उनके देखते-देखते लाल किले से जाने कितने भाषण हुए, कितने बीस सूत्री कार्यक्रम बने, गरीबों किसानों मजदूरों और उद्यमियों के लिए योजनाएँ चलाई गयीं। किंतु उनका क्या लाभ हुआ।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि गौड़ की आध्यात्मिकता और उनकी राष्ट्र-चिंता दोनों एक ही सामाजिक सजगता से उत्पन्न हैं।

 

  1. गीत की आध्यात्मिक परिभाषा — एक मौलिक दृष्टि

गौड़ ने ‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका स्वयं लिखी है। इस भूमिका में उन्होंने गीत की जो परिभाषा दी है, वह अपने-आप में एक आध्यात्मिक दृष्टि है :

“विद्वान गीतकार/लेखक/साहित्यकार यह मानते हैं कि प्रकृति ईश्वर की ही प्रतिकृति है जिसका विस्तार धरती से आकाश तक है। इस प्रकृति में व्याप्त स्पंदन, लय, सौंदर्य और नाद को समेटकर यदि एक शब्द की बात की जाए तो वह शब्द होगा गीत।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

यह परिभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौड़ के लिए प्रकृति और ईश्वर अभिन्न हैं, और गीत उस दिव्य प्रकृति की भाषा है। यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस धारा से जुड़ा है जो प्रकृति में ईश्वर का दर्शन करती है। आगे वे लिखते हैं :

“अनेक साहित्यकारों ने गीत को अपने-अपने मनोभावों से कई तरह से परिभाषित किया है। मेरे साहित्यकार मित्र रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग ने कहा — गीत भू की गति, पवन की लय, अजस्त्र प्रवाहमय है / पक्षियों का गान, लहर विधान, निर्झर का निलय है / गीत मुरली की मधुर ध्वनि, मंद्र सप्तक है प्रकृति का / नवरसों की आत्मा है / गीत कविता का हृदय है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

इस परिभाषा में गीत को कविता का हृदय कहा गया है। प्रकृति के सभी तत्व — भूमि, पवन, पक्षी, झरना, मुरली — ये सब मिलकर गीत बनाते हैं। यह एक समग्र आध्यात्मिक दृष्टि है।

  1. सरस्वती वंदना — ज्ञान और करुणा की माँग

संग्रह की पहली रचना ‘सरस्वती वंदना’ है। यह वंदना केवल काव्य-परंपरा का निर्वाह नहीं — इसमें गौड़ ने अपनी काव्य-प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है :

“हे माँ तू कुछ ऐसा वर दे / कंठ मेरे तू नवरस भर दे। / जब कागज पर कलम चलाऊँ / तेरा चित्र बना मैं पाऊँ / मुखरित हो ममता मानवता / जब जब मैं तेरे गुण गाऊँ / झाँकृत हो जन जन की पीड़ा / वीणा में ऐसा स्वर भर दे।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 27)

यह वंदना तीन महत्वपूर्ण माँगें करती है — नवरस की शक्ति, ममता-मानवता की मुखरता, और जन-जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति। ये तीनों माँगें मिलकर गौड़ की आध्यात्मिक-सामाजिक काव्य-दृष्टि को परिभाषित करती हैं।

 

  1. कबीर की परंपरा — नैतिक आध्यात्मिकता

4.1 ‘कैसे बनूँ कबीर’

‘कैसे बनूँ कबीर’ गीत गौड़ की आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस गीत में कबीर की परंपरा का प्रत्यक्ष स्वीकार है :

“राम तुम्हारा रूप निहारूँ / या सरयू का तीर / बिना तुम्हारी कृपादृष्टि के / घट न मन की पीर। जब जब मैं दर्शन को आऊँ / अविरल अश्रु बहें / तेरे प्रांगण में आकर सब / केवल राम भजें / जब छोड़ूँ मैं अवधपुरी तो / नयनन बरसे नीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

यह गीत कबीर की राम-भक्ति परंपरा से जुड़ा है। कबीर के राम सगुण-निर्गुण से परे थे — गौड़ के राम भी उसी भाव के हैं। ‘मैं तो मानव साधारण सा / कैसे बनूँ कबीर’ — यह विनम्रता उस आध्यात्मिक यात्री की है जो जानता है कि कबीर जैसा बनना आसान नहीं।

उसी गीत में कबीर की ‘माया’ की अवधारणा भी आती है :

“कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी / कभी न कुछ भी सोचा / अंत समय में सबने देखा / संग न जाय अंगोछा / जीवन की रेखा से पाई / लंबी मौत लकीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

‘संग न जाय अंगोछा’ — यह कबीर की उसी परंपरा का हिस्सा है जिसमें मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाता है। गौड़ ने इस सत्य को बड़ी सरलता से कहा है।

4.2 कबीर की ‘सोचा हम भी कबिरा जैसी’

एक अन्य गीत में गौड़ सीधे कबीर की ‘चदरिया’ वाली परंपरा का संदर्भ लेते हैं :

“सोचा हम भी कबिरा जैसी / रखें चदरिया साफ / पर हम ने तो ओढ़ लिया है / दोषों भरा लिहाफ़। कहते दुर्बल को न सताना / इससे बड़ा न पाप / पर दुर्बल से छीन छीन कर / करते हम अर्जन।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 65)

कबीर की ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ की परंपरा में गौड़ ने यहाँ एक सामाजिक आलोचना जोड़ी है। हम कबीर जैसा जीना चाहते हैं, पर दोषों से भरा जीवन जी रहे हैं। यह आत्म-आलोचना गौड़ की ईमानदारी का प्रमाण है।

 

  1. राम-भक्ति और आध्यात्मिक आस्था

5.1 ‘आज कहीं चलने का मन है’

इस गीत में गौड़ ने कृष्ण-भक्ति और राम-भक्ति दोनों का सुंदर संगम किया है :

“आज कहीं चलने का मन है / पर मन की तन से अनबन है / क्यों मैं जाऊँ मंदिर मंदिर / जब अंतस में वृन्दावन है। क्या समझाऊँ पागल को / भूल न पाता विगत दिनों को / बीते गया सो बीते गया रे / रट ले अब तू कृष्ण धुनों को।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 36)

‘जब अंतस में वृन्दावन है’ — यह भक्ति की उस धारा का हिस्सा है जो बाहरी तीर्थ की जगह भीतर के तीर्थ को महत्व देती है। कबीर ने भी यही कहा था कि ईश्वर मंदिर में नहीं, मन में है।

5.2 ‘भीतर से कुछ टूट गया है’ — अध्यात्म और पीड़ा

‘भीतर से कुछ टूट गया है’ गीत में आध्यात्मिक खोज और जीवन की पीड़ा का संगम है :

“मन करता कुछ फूल तोड़कर / इष्टदेव पर उन्हें चढ़ाऊँ / फिर उससे अरदास करूँ मैं / जिसको चाहा उसको पाऊँ / पर इस पागल मन को देखो / हार मिली तो रूठ गया है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 63)

ईश्वर से अरदास करना और फिर न मिलने पर रूठ जाना — यह भक्ति का वह मानवीय रूप है जो सूरदास और मीराबाई की परंपरा में मिलता है।

5.3 ‘हमने जिसे पुकारा अब तक’

‘हमने जिसे पुकारा अब तक’ गीत में ईश्वर के मौन का सामना करने की पीड़ा है :

“हमने जिसे पुकारा अब तक / उसने साधा मौन है / भीड़ भरी दुनिया में कैसे / जानूँ अपना कौन है। सारी उमर देव के सम्मुख / हाथ जोड़ मैं खड़ा रहा / मन की चाहत मनवाने को / कर हठधर्मी अड़ा रहा / आँख खुलीं तो मैंने पाया / देव अभी तक मौन है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 58-59)

ईश्वर का मौन — यह एक गहरी आध्यात्मिक पीड़ा है जो हर भक्त को कभी न कभी महसूस होती है। गौड़ ने इसे बड़ी ईमानदारी से कहा है।

 

  1. ‘जलता दीपक’ — नैतिक धर्म का आह्वान

‘जलता दीपक’ गीत में आध्यात्मिक प्रेरणा और नैतिक संदेश का सुंदर संगम है :

“बड़े बड़े चारागर देखे / मन का मिला न एक / पूछा कुछ उपचार बताओ / बोल — हमको खेद। हमने तो तन चीरा-फाड़ा / मन की हम क्या जानें / मन तो है कवियों का गहना / हम तो तन पहचानें।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 60)

‘मन तो है कवियों का गहना’ — यह पंक्ति आध्यात्मिक और काव्य दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। डॉक्टर शरीर ठीक कर सकते हैं, पर मन की पीड़ा केवल कवि ही समझ सकता है। इसी गीत में आगे आता है :

“हर अँधियारी गुफा बताती / तजो न धीरज, धर्म / कितना भी हो सफर कठिन, तुम / तजो न अपना कर्म / अंधकार के पार मिलेगा / जलता दीपक एक।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 61)

‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक’ — यह आशावाद का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। धर्म और कर्म से कभी विमुख न हों — यह भगवद्गीता की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें फल की चिंता किए बिना कर्म करने का आदेश है।

 

  1. राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति — एक सजग राष्ट्र-प्रेम

7.1 ‘लाल किले से’ — शासन की आलोचना

गौड़ की राष्ट्र-चेतना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वह एक सजग आलोचना के साथ है। ‘लाल किले से’ गीत में वे सरकारी वायदों की खोखलेपन पर करारा व्यंग्य करते हैं। ओम निश्चल ने भूमिका में इस गीत की पंक्तियाँ उद्धृत की हैं :

“लाल किले से अब तक आए / कितने ही फ़रमान / यदि वे सब सच्चे हो जाते / मरता नहीं किसान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14 में उद्धृत, भूमिका)

यह एक क्रांतिकारी कथन है। किसान की आत्महत्या की समस्या पर यह सीधी टिप्पणी है। यदि स्वतंत्रता दिवस के भाषण के वायदे पूरे हो जाते, तो किसान क्यों मरता? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

7.2 ‘परबत ऊपर राजमहल है’ — सामाजिक असमानता पर व्यंग्य

एक अन्य गीत में गौड़ ने सामाजिक असमानता का चित्रण किया है। ओम निश्चल ने भूमिका में लिखा :

“कवि भले उच्च वर्ग का है पर उसे राम मढ़ैया डाल गरीबी की मार सहते लोगों की चिंता होती है। गौड़ के शब्दों में — सूखा में उपले पाथते हैं / ताल तलैया में / रामधनी अब तक रहता है / फूस मढ़ैया में।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

उसी संदर्भ में ‘परबत ऊपर राजमहल है’ गीत का उल्लेख है :

“देखो राजमहल को देखो / हरदम रहता सजा धजा / बस्ती में रहता अंधियारा / निर्धनता भी एक सजा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

राजमहल और झुग्गी का यह विरोधाभास भारत की सबसे बड़ी समस्या — आर्थिक असमानता — की ओर इशारा करता है।

7.3 ‘नई भोर में सूरज लिखता’ — युवाओं से राजनीतिक अपेक्षा

‘नई भोर में सूरज लिखता’ गीत में गौड़ ने राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए युवाओं से आशा व्यक्त की है :

“बूढ़े नेता पाँव कब्र में / राजनीति ना छोड़ें / अपनी भोगपिपासा को वे / जन सेवा से जोड़ें / बड़े काम उनके आती है / जनता की नादानी।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 75)

‘जनता की नादानी’ — यह एक तीखी टिप्पणी है। नेता जनता की भोलेपन का फायदा उठाते हैं — यह सत्य गौड़ ने बड़ी साहसिकता से कहा है।

  1. ‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ — आदर्श भारत का स्वप्न

‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ गीत में गौड़ ने अपने आदर्श भारत का एक सुंदर चित्र खींचा है। यह गीत आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम है :

“चलो मन अब तुम ऐसे देश / जहाँ पर नयनन बरसे नहे / जहाँ पर सीता-सी हों नारि / जहाँ के नर हों सभी विदेह। जहाँ पर हो कोयल की कूक / भ्रमर की गुंजन का हो गान / जहाँ पर तितली हों आजाद / निडर हो पक्षी भरें उड़ान / जहाँ पर हो निर्मल-सा नीर / जहाँ पर हो मुरली की तान / जहाँ पर हो राजा का न्याय / बड़ों का होता हो सम्मान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 41)

यह केवल एक काल्पनिक देश का स्वप्न नहीं — यह उस भारत की कल्पना है जो कभी था, जो होना चाहिए। सीता जैसी नारियाँ, विदेह जैसे नर, कोयल की कूक, मुरली की तान — ये सब भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

उसी गीत में आगे :

“जहाँ हो गंगाजल-सा प्यार / जहाँ हो लक्ष्मण जैसा भ्राता / जहाँ हों सागर एक विशाल / तैरते जिस पर हों जलयान / जहाँ की धरती पर हो धर्म / जहाँ हों भरे हुए खलिहान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 42)

गंगाजल जैसा प्रेम, लक्ष्मण जैसा भ्रातृ-प्रेम, धर्म और भरे खलिहान — यह आदर्श भारत की वह कल्पना है जिसमें आध्यात्मिक मूल्य और सामाजिक समृद्धि दोनों एक साथ हों।

 

  1. ‘सर सर करती हवा सरीखी’ — जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध

‘सर सर करती हवा सरीखी’ गीत में जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध का सुंदर समन्वय है :

“हम सब जीते जग में लेकर / बड़े बड़े मंसूब / बिना कर्म के रह जाते हैं / आधे और अधूरे / जीवन सरल बनाकर जीओ / ज्यों गंगा का पानी। पाना चाहो यदि जीवन में / सत-चित और आनंद / बनो विक्रमादित्य सरीखे / नहीं मगध के नंद।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 79)

‘सत-चित-आनंद’ — यह हिंदू दर्शन की उच्चतम अवस्था का बोध है। इसे पाने के लिए विक्रमादित्य जैसा न्यायी और कर्मशील राजा बनने की प्रेरणा दी गई है। यहाँ आध्यात्मिक लक्ष्य और राष्ट्रीय आदर्श एक ही बात कह रहे हैं।

 

  1. ‘तारा मंडल का यही नियम’ — भवसागर और मृत्यु-दर्शन

‘तारा मंडल का यही नियम’ गीत में गौड़ का आध्यात्मिक दर्शन अपनी गहराई में दिखाई देता है :

“तारा मंडल का यही नियम / जो चला गया सो चला गया / टूटा जो नभ से एक बार / वह सदा सदा को चला गया। मैं तो धरती का हिस्सा हूँ / मेरी भी एक कहानी है / है ज्ञान मुझे यह बचपन से / यह सारी दुनिया फानी है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73)

‘यह सारी दुनिया फानी है’ — यह वेदांत का वह मूल विचार है जो संसार को क्षणिक मानता है। पर गौड़ इससे निराश नहीं होते — वे इसे स्वीकार करके आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

उसी गीत में :

“भवसागर की महिमा न्यारी / लगती है सबको अति प्यारी / जितने भी संत धरा पर हैं / सबकी धारा न्यारी न्यारी / ना मिली डगर कोई ऐसी / जो सत्यलोक तक ले जाती।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73-74)

‘सत्यलोक तक ले जाने वाली डगर’ की खोज — यह आध्यात्मिक यात्रा का वह बिंदु है जहाँ हर संत अपने-अपने रास्ते से जाता है। गौड़ इस विविधता को स्वीकार करते हैं।

 

  1. ‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ — ईश्वर और प्रकृति

‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ गीत में प्रकृति, ईश्वर और जीवन-संघर्ष का त्रिवेणी-संगम है :

“गिरते निर्झर का गीत लिखूँ / या लिखूँ नगर की चहल-पहल / जब पूरब दिशा लालम हुई / मंदिर से आया शंखनाद / कानों से आकर टकराया / वह परम सत्य वह चिर निनाद / जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 77)

मंदिर का शंखनाद — ‘वह परम सत्य वह चिर निनाद’ — यह ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव है। पर साथ ही प्रश्न भी है — ‘जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।’ ईश्वर का मौन रहना और दुखियों का रोना — यह आध्यात्मिक पीड़ा गौड़ की काव्य-चेतना का एक गहरा पहलू है।

 

  1. ‘निराला’ पर गीत — साहित्यिक राष्ट्र-चेतना

‘वसंत के शब्दशिल्पी (निराला)’ गीत में गौड़ ने निराला को एक राष्ट्र-कवि के रूप में याद किया है। यह गीत साहित्यिक राष्ट्र-चेतना का एक सुंदर उदाहरण है :

“इक महर्षि ने बरसों पहले / जब वसुधा पर पाँव धरा / देवों ने दुंदुभी बजाई / सूर्यकांत शुभ नाम पड़ा। त्याग तुम्हारा पर्वत जैसा / प्यार घन जंगल-सा था / कर्म तुम्हारा योगी जैसा / जीवन गंगाजल-सा था / सारी वसुधा एक कुटुम्ब है / जन जन मन संदेश भरा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 52)

‘सारी वसुधा एक कुटुम्ब है’ — यह वसुधैव कुटुम्बकम् का वह आध्यात्मिक-राष्ट्रीय भाव है जो भारतीय संस्कृति की पहचान है। निराला का त्याग, प्रेम और कर्म — ये तीनों गुण भारतीय आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

 

  1. आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम

गौड़ के गीतों में आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जब वे कबीर की माया का उल्लेख करते हैं, तो साथ ही समाज की असमानता की आलोचना भी करते हैं। जब वे आदर्श देश का स्वप्न देखते हैं, तो उसमें गंगाजल जैसा प्रेम और भरे खलिहान दोनों हैं।

ओम निश्चल ने भूमिका में इस दोहरेपन को पहचाना है :

“बी.एल.गौड़ एक उद्यमी कवि हैं। यानी अपने उद्यम से उन्होंने कल्पना के भवन ही नहीं, भुवन तैयार किए हैं। किंतु वे जिस भुवन के स्वामी हैं वह उनकी अपनी कविता का भुवन है। उनका मन भवन में नहीं, भुवन में रमता है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

‘भवन में नहीं, भुवन में रमना’ — यह उस आध्यात्मिक दृष्टि का प्रतीक है जो भौतिक संपदा से परे जाकर विश्व-बोध को महत्व देती है।

 

  1. निष्कर्ष

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता एक साथ चलती हैं — जैसे गंगा-यमुना की दो धाराएँ। उनकी आध्यात्मिकता कबीर, राम, कृष्ण, महावीर — सभी परंपराओं को समेटती है, पर किसी एक से बंधती नहीं। उनकी राष्ट्रीयता भावनात्मक जयघोष नहीं, बल्कि एक सजग आलोचनात्मक राष्ट्र-प्रेम है जो किसान की आत्महत्या पर प्रश्न उठाता है और बूढ़े नेताओं की भोगपिपासा की आलोचना करता है।

इन गीतों का केंद्रीय संदेश है : ‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक।’ यह आशावाद आध्यात्मिक है और राष्ट्रीय भी — व्यक्तिगत भी और सामाजिक भी। यह अध्ययन PhD शोध के तृतीय अध्याय के ‘आध्यात्मिक आयाम’ तथा ‘अन्य आयाम’ (राष्ट्रीयता) उप-अध्यायों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

संदर्भ ग्रंथ-सूची

  1. गौड़, बी.एल. (2023). काव्य समग्र-गीत. हंस प्रकाशन, नई दिल्ली. (ISBN: 978-93-89389-78-4)

  2. गौड़, बी.एल. (2012). कब पानी में डूबा सूरज. ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाजियाबाद.

  3. बरबी ललबियाकसाङी साइलो. (2024). बी. एल. गौड़ के साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन (शोध प्रस्ताव/Synopsis). मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल.

  4. शुक्ल, रामचन्द्र. (2010). हिंदी साहित्य का इतिहास. नागरी-प्रचारिणी सभा, वाराणसी.

  5. चतुर्वेदी, रामस्वरूप. (2018). हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.

  6. राधाकृष्णन, एस. (1963). धर्म और समाज. राजपाल एण्ड संस, दिल्ली.

  7. पाण्डेय, शंभुनाथ. (1977). भारतीय जीवन और संस्कृति. केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा.

  8. सिंह, राजकिशोर. (1975). भारतीय संस्कृति. विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा.

  9. नामवर सिंह. (2004). आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ. लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली.

  10. हरदयाल. (1985). साहित्य और सामाजिक मूल्य. विभूति प्रकाशन, दिल्ली




मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—हक़ या केवल सपना? – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब तक बराबरी ज़मीन पर नहीं उतरती, अधूरा है लोकतंत्र

— डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत का लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान रखता है। यह केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और सपनों का प्रतिबिंब है। संविधान ने हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा किया है, लेकिन यह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या यह वादा वास्तव में हर नागरिक तक समान रूप से पहुँच पाया है? क्या आज भी एक गरीब और एक अमीर व्यक्ति के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की सुविधाएँ बराबर हैं? यदि नहीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि हमारा लोकतंत्र अभी भी अधूरा है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। दवाइयों को ब्रांड के बजाय “साल्ट” के आधार पर उपलब्ध कराने की पहल ने यह साबित किया है कि सही नीति और नीयत के साथ आम जनता को बड़ी राहत दी जा सकती है। सस्ती दवाइयाँ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का माध्यम बनती हैं। यह एक उदाहरण है कि जब सरकार समानता को केंद्र में रखकर काम करती है, तो बदलाव संभव है। यही सोच यदि शिक्षा और न्याय जैसे क्षेत्रों में भी लागू की जाए, तो देश की तस्वीर बदल सकती है।

शिक्षा आज के समय में केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा की व्यवस्था दो भागों में बंटी हुई है—एक ओर महंगे निजी स्कूल और संस्थान हैं, जहाँ विश्वस्तरीय सुविधाएँ और संसाधन उपलब्ध हैं, और दूसरी ओर सरकारी स्कूल हैं, जहाँ कई जगह बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। यह विभाजन केवल संस्थानों का नहीं, बल्कि अवसरों का विभाजन है। एक अमीर परिवार का बच्चा जिस स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है, वह एक गरीब परिवार के बच्चे के लिए अक्सर एक सपना बनकर रह जाता है।

ऐसी स्थिति में यह विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि क्यों न पूरे देश में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए। एक ऐसा ढांचा, जहाँ हर कक्षा के लिए एक जैसी किताबें हों, एक जैसा पाठ्यक्रम हो और हर बच्चे को समान अवसर मिले। इससे शिक्षा के स्तर में संतुलन आ सकता है और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी एक समान आधार तैयार हो सकता है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक समानता को बढ़ावा देगी, बल्कि देश की प्रतिभाओं को भी एक समान मंच प्रदान करेगी।

हालाँकि, यह भी समझना आवश्यक है कि भारत की विविधता इतनी व्यापक है कि पूरी तरह एकरूप शिक्षा प्रणाली लागू करना सरल नहीं है। अलग-अलग राज्यों की भाषाएँ, संस्कृतियाँ और स्थानीय आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए एक “कॉमन कोर” के साथ-साथ क्षेत्रीय लचीलापन भी जरूरी है, ताकि समानता और विविधता के बीच संतुलन बना रहे।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। निजी अस्पतालों की ऊँची फीस आम आदमी के लिए एक बड़ी बाधा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा जैसी समस्याएँ हैं। कई बार एक साधारण बीमारी भी आर्थिक संकट का कारण बन जाती है। ऐसे में यह विचार सामने आता है कि यदि सभी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें एक समान व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए, तो हर व्यक्ति को समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकती हैं। डॉक्टरों और कर्मचारियों को सरकार द्वारा वेतन दिए जाने से सेवा का भाव बढ़ सकता है और मुनाफाखोरी पर अंकुश लग सकता है।

न्याय व्यवस्था भी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन आम नागरिक के लिए न्याय तक पहुँचना आज भी एक कठिन प्रक्रिया है। न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या, कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और वकीलों की ऊँची फीस—ये सभी मिलकर न्याय को महंगा और दूर बना देते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना कई बार असंभव जैसा हो जाता है। यदि न्याय व्यवस्था को सरल, सुलभ और निशुल्क बनाया जाए, तो यह लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

इन सभी क्षेत्रों—शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—का पूर्ण राष्ट्रीयकरण एक आदर्श समाधान प्रतीत होता है। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सरकार सभी संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेकर सभी कर्मचारियों को वेतन दे और सेवाओं को निशुल्क एवं समान रूप से उपलब्ध कराए। यह विचार सुनने में आकर्षक है और एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना को मजबूत करता है। लेकिन इसके साथ कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती है आर्थिक संसाधनों की। पूरे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय को पूरी तरह निशुल्क और उच्च गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराना एक बहुत बड़ा वित्तीय दायित्व है। इसके लिए सरकार को अपने बजट में बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे, कर व्यवस्था को मजबूत करना होगा और संसाधनों का कुशल प्रबंधन करना होगा।

दूसरी चुनौती है गुणवत्ता और जवाबदेही की। पूरी व्यवस्था सरकारी होने पर कई बार कार्यकुशलता में कमी आ जाती है। निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा कई बार सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। यदि पूरी व्यवस्था केवल सरकार के हाथ में होगी, तो नवाचार और सुधार की गति धीमी पड़ सकती है।

इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर भी इतनी बड़ी व्यवस्था को संचालित करना आसान नहीं है। भ्रष्टाचार, लापरवाही और संसाधनों के दुरुपयोग जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि किसी भी नीति को लागू करते समय इन संभावित चुनौतियों का समाधान पहले से ही तैयार किया जाए।

इस परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय के क्षेत्र में मजबूत सार्वजनिक ढांचा तैयार करे, जहाँ हर नागरिक को न्यूनतम स्तर की उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएँ सुनिश्चित हों। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे सख्त नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रखा जाए।

शिक्षा में एक समान “कॉमन कोर करिकुलम” लागू किया जा सकता है, जिससे पूरे देश में बुनियादी स्तर पर समानता सुनिश्चित हो, जबकि क्षेत्रीय विषयों और भाषाओं के लिए लचीलापन रखा जाए। स्वास्थ्य सेवाओं में “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज” की दिशा में काम किया जा सकता है, जिससे हर नागरिक को बुनियादी इलाज मुफ्त या अत्यंत सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक और सरल प्रक्रियाओं के माध्यम से पारदर्शिता और गति लाई जा सकती है।

अंततः, लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में निहित होती है। जब तक एक गरीब व्यक्ति अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकता, जब तक वह बीमारी के समय उचित इलाज नहीं पा सकता, और जब तक उसे समय पर न्याय नहीं मिल सकता—तब तक लोकतंत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह समय केवल विचार करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। समान शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और निष्पक्ष न्याय केवल आदर्श नहीं, बल्कि एक सशक्त और समावेशी लोकतंत्र की आधारशिला हैं। यदि हम इन क्षेत्रों में वास्तविक समानता स्थापित कर पाते हैं, तो न केवल लोकतंत्र पूर्ण होगा, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी मजबूत होगी।

अब प्रश्न यह नहीं है कि यह लक्ष्य कठिन है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे प्राप्त करने के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति दिखाने को तैयार हैं। यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत का लोकतंत्र केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में समान रूप से दिखाई देगा।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)




हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत

🔹‘गली बचपन की’ विषय पर राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में जुटे देशभर के बाल रचनाकार
🔹साहित्य अकादमी मप्र के महती आयोजन में साहित्यकार व
शोधार्थियों ने बताए समस्याओं के समाधान
🔹समापन सत्र में निदेशक डॉ. दवे की भावना पर भावुक हुए रचनाकार

भोपाल (मप्र)। हमें वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बच्चों तक पहुंचाने के तरीकों पर विचार करना होगा।रचनात्मकता के साथ शालाओं में स्मारिका प्रकाशन की तरफ भी और ध्यान देना चाहिए। वैश्वीकरण के दौर में भारतीय बाल साहित्य की वैश्विक पहचान और अनुवाद की संभावनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। अनुवाद पुल है। बाजारीकरण और मानवीय मूल्यों की सुरक्षा पर जोर देना पड़ेगा। अपने मन में, अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा। हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत है।
यह विचार विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन का वह सार है, जो उन्होंने भोपाल में बाल साहित्यकार स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना (सम्पादक- देवपुत्र) की स्मृति में ‘गली बचपन की’ विषय पर साहित्य अकादमी मप्र द्वारा आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में दूसरे दिन के विभिन्न सत्र में व्यक्त किए। अकादमी ने यह बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम स्मार्ट रोड स्थित एनआईटीटीटीआर परिसर (श्यामला हिल्स) में आयोजित किया, जिसमें विभिन्न राज्यों से बाल साहित्यकार, शोधार्थी तथा साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए और नन्हे-मुन्नों के बदलते परिवेश में बाल साहित्य की भूमिका पर गंभीर विचार-विमर्श करते हुए विभिन्न समस्याओं के समाधान भी प्रस्तुत किए। अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे की उपस्थिति में दूसरे दिन इस संगोष्ठी का समग्र संयोजन ‘देवपुत्र’ के संपादक गोपाल माहेश्वरी ने किया।
शाम को साढ़े 5.30 बजे समापन सत्र में विदाई भाव निदेशक डॉ. दवे ने व्यक्त किया। इनकी मन की बात सुनकर अनेक रचनाकार विदाई के पल में बड़े भावुक हो गए। आपने डॉ. जीवन रजक (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मंत्री संस्कृति) के सम्बोधन एवं उपस्थिति के लिए विशेष आभार व्यक्त किया। समग्र वृत्त की जिम्मेदारी बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने निभाई।

◾विभिन्न बिन्दुओं पर किया चिंतन
इस संगोष्ठी में दूसरे दिन ‘बाल-साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’ विषय पर डॉ.रेखा लोढ़ा ‘स्मित’, नीलम राकेश, डॉ. उमेशचंद्र सिरसवारी, दिनेश पाठक ‘शशि’ आदि ने अपनी बात रखी, तो वरिष्ठ लघुकथाकार मीरा जैन (उज्जैन) ने भी अपना वक्तव्यीय योगदान दिया। इसी कड़ी में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ.आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले, शिवचरण चौहान, शरद शबल और रेनू सैनी आदि रचनाकारों ने अपने भाव व्यक्त किए। ‘बाल-साहित्य में पठन की चुनौती : तकनीक की बदलती प्रवृत्तियां, आडियो-वीडियो और बाल फिल्में-धारावाहिक’ विषय पर सुषमा व्यास, रजनीकांत शुक्ल, इन्दु पाराशर और प्रगति मिमरोट ने विभिन्न बिंदुओं कों चिंतन के रूप में सामने रखा, जबकि बीज वक्तव्य भाषाविद और साहित्यकार डॉ. पूजा अलापुरिया ‘हेमाक्ष'(मुम्बई) ने देते हुए कहा, कि आज बच्चों की बहुत सारी चीजें बदल गई है। आज वह हमारी तरह से नहीं सोचते हैं। हम अपडेटेड नहीं हैं। हमें अपडेटेड होने के लिए बच्चों से बात करनी पड़ेगी। अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए अगर कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा।
ऐसे ही ‘बाल-साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजीटल युग में बाल-साहित्य की चुनौतियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव’ विषय पर डॉ. पूनम अग्रवाल, सुषमा सिंह, वंदना यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं मुकेश तिवारी (इंदौर) आदि ने भी अपने विचारों की बानगी दिखाई।

🔹71 वक्ताओं ने दी मंचीय अभिव्यक्ति
14 मार्च को दूसरे दिन अलग-अलग सत्र में ‘बाल साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजिटल युग में बाल साहित्य की चुनौतियाँ और एआई का प्रभाव’, ‘बाल अवस्था के रचनाकारों की बाल साहित्य सृजन में भूमिका’ आदि विषयों पर कुल 5 सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों की पूर्णतः सक्रिय सहभागिता रही। संगोष्ठी में कुल 11 सत्र हुए, जिनमें 10 मुख्य विषयों पर गहन विमर्श करते हुए 51 वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, साथ ही 21 अध्यक्षों और बीज वक्ताओं सहित कुल 71 वक्ताओं ने मंच से अपनी अभिव्यक्ति दी। आयोजन में लेखक अजय जैन ‘विकल्प’ का विशेष सहयोग रहा।

🔹 शोधार्थियों का विशेष सत्र-
आयोजन की एक विशेषता के रूप में एक सत्र बाल साहित्य के पीएचडी शोधार्थियों के लिए विशेष विमर्श का भी रहा। निदेशक डॉ. दवे ने इसमें बाल साहित्य पर पीएचडी करने वाले शोधार्थियों और उनके गाइड डॉ. पूजा अलापुरिया आदि से चर्चा की। इसमें शोधपरक आयामों पर चर्चा से समझा गया कि बाल साहित्य पर और कैसे विषयों पर शोध की आवश्यकता है एवं इसे बढ़ाया जाए।

🔹मंच से 20 पुस्तक विमोचित-
इस महती आयोजन में विभिन्न राज्य के साहित्यकारों की बाल साहित्य की 20 पुस्तक एवं 1 मासिक पत्रिका का लोकार्पण होना भी अपने-आपमें कीर्तिमान है। रचनाकार डॉ. मीनाक्षी दुबे की पुस्तक ‘नाम नौनिहालों के:पाती वीर सपूतों की’, किशोर श्रीवास्तव पुस्तक ‘विश्वास की रक्षा’, ‘मेहनत का फल’ और ‘खुशियों की वापसी’ का विमोचन अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने मंच पर किया, वहीं डॉ.भैरूँलाल गर्ग की पुस्तक ‘चलो चलें नानी के गाँव‘, समीक्षा तैलंग की पुस्तक ‘बेड़ा गर्क है’, शिवम सिंह की पुस्तक ‘नन्हे मुन्ने गीत’, डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’ की 2 पुस्तक ‘बुंदेली संस्कृति के रंग’-छई छपाक छपर छपर’, सुषमा सिंह की 2 पुस्तक ‘नन्हा पाखी’-‘कच्चा पापड़’ एवं माधुरी व्यास ‘नवपमा’ की पुस्तक ‘अनुभूति’ का लोकार्पण यहाँ किया गया। डॉ. मंजरी शुक्ला की पुस्तक ‘उड़ चले जादुई बर्तन’, नीलम राकेश की पुस्तक ‘सतरंगी दुनिया’ व द ‘रैनबो वर्ल्ड’, प्रो. प्रभा पंत की पुस्तक ‘मुझको सूरज बनना है’, ‘डिबिया में बंद चींटी व ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’, डॉ. अशोक व्यास की पुस्तक ‘स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला’ आदि सहित मासिक पत्र ‘राष्ट्र समर्पण’ के अंक का लोकार्पण निदेशक ने किया।




तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

‘तथ्य अनंत हो सकते हैं किंतु वास्तविक तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध का अभीष्ट है।’ ये विचार ‘वाङ्मय विमर्श’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहे। उन्होंने इस विषय पर अपने व्याख्यान में शोध के दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए कहा कि ‘ज्ञान के पीछे की प्रत्येक दिशा की ओर पुनः लौटकर ज्ञान के विस्तार की संभावनाओं को निरंतर बनाए रखना ही शोध का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तथ्यों का संकलन कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें निहित नवाचार को खोजना और उसे समाज के लिए उपयोगी बनाना शोधार्थी का प्राथमिक उत्तरदायित्व है।

‘वाङ्मय विमर्श’ के तत्वावधान में आयोजित व्याख्यानमाला शृंखला की पाँचवीं कड़ी में देश के प्रख्यात विद्वान कवि और लेखक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने शोधार्थियों को संबोधित किया। ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर केंद्रित इस आभासी सत्र में शोध की वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ शुभम शास्त्री द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात वाङ्मय विमर्श’ के संरक्षक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने अपने स्वागत वक्तव्य में इस अकादमिक प्रकल्प के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह प्रकल्प शोधार्थियों के बौद्धिक संवर्धन हेतु निरंतर क्रियाशील है। डॉ. ‘मणि’ ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर अरोड़ा का अभिनंदन करते हुए इस महत्वपूर्ण विषय पर मार्गदर्शन हेतु उन्हें धन्यवाद एवं बधाई दी।

प्रो. अरोड़ा ने अपने व्याख्यान में शोध के विभिन्न प्रतिमानों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने समकालीन शोध के नवीन आयामों जैसे पारिस्थितिकीय साहित्य एवं पाठालोचन की महत्ता को भी रेखांकित किया। उन्होंने शोध के विभिन्न चरणों की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए एक आदर्श रूपरेखा निर्मित करने के व्यावहारिक सूत्र साझा किए व्याख्यान के उपरांत एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें शोधार्थियों द्वारा पूर्व में ‘गूगल फॉर्म’ के माध्यम से प्रेषित जिज्ञासाओं का प्रो. अरोड़ा ने अत्यंत विद्वतापूर्ण ढंग से समाधान किया। अंत में उन्होंने इस शृंखला के अनवरत संचालन हेतु अपनी शुभकामनाएँ भी प्रदान कीं।

कार्यक्रम का अत्यंत गरिमापूर्ण एवं सुस्पष्ट संचालन साक्षी सिंह द्वारा किया गया। सत्र के समापन पर हंसिका ने मुख्य वक्ता, आयोजक मंडल एवं सहभागी शोधार्थियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अकादमिक अनुष्ठान को सफल बनाने में संयोजक अविरल अभिलाष, समन्वयक प्रवीण त्रिपाठी, सह-समन्वयक सोमेश पाण्डेय एवं समस्त शोधार्थियों का सक्रिय सहयोग रहा। प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन हेतु आयोजकों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।




बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा – गर्ग

बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा – गर्ग

आयोजन में हुआ अनेक पुस्तकों का विमोचन

भोपाल। यह बाल साहित्य को संवर्द्धित करने का अवसर है। बालकों को हम जैसा वातावरण देंगे, सांस्कृतिक, पारिवारिक, सामाजिक, जो हमारा है, वो उनको श्रेष्ठ बनाता है। प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं। उपदेश से परहेज क्यों ? बच्चे को दिशा-निर्देश दें। रोकना-टोकना करें, पर प्रकारेंतर से। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार एवं बाल पत्रिका ‘बालवाटिका’ के संपादक भेरूँलाल गर्ग ने बतौर अतिथि कही। अवसर रहा साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना स्मृति बाल साहित्य राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन का, जो भोपाल स्थित एनआईटीटीटीआर (श्यामला हिल्स) में शुक्रवार को हुआ। इसका समग्र संयोजन बाल पत्रिका ‘देवपुत्र’ के सम्पादक गोपाल माहेश्वरी ने किया। प्रातः 11 बजे सैकड़ों बाल साहित्यकारों की उपस्थिति में इस संगोष्ठी का उद्घाटन मंच पर उपस्थित अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, डॉ. भेरूलाल गर्ग, दिनेश पाठक और राजा चौरसिया ने दीप प्रज्ज्वलन से किया।

इस कार्यक्रम का संचालन गोपाल माहेश्वरी ने किया। इस 2 दिनी संगोष्ठी में पहले दिन 12 से 1.30 बजे तक प्रथम सत्र में ‘बाल मनोविज्ञान और बाल साहित्य सृजन’ विषय पर समीक्षा तैलंग, डॉ. रश्मि अग्रवाल, डॉ. वर्षा महेश, शीला पाण्डेय, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, शशि पुरवार, राजकुमारी चौकसे, देवी प्रसाद गौड़, और देवेन्द्रसिंह सिसौदिया ने वक्ता के नाते अपनी अभिव्यक्ति दी। 

ऐसे ही द्वितीय सत्र में ‘बाल-साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’ विषय पर डॉ. रेखा लोढा, नीलम राकेश, उमेशचंद्र सिरसवारी, मीरा जैन और निरुपमा त्रिवेदी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। तीसरे सत्र में ‘बाल-साहित्य में देशप्रेम, राष्ट्रीयता, पर्यावरण तथा भारतीय संस्कृति का भाव विषय पर सपना साहू ‘स्वप्निल’, आशा पांडेय, सत्यनारायण सत्य, विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ और हरीराम पथिक आदि ने बाल साहित्य के बिंदु प्रस्तुत किए।

देर शाम चौथे सत्र में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ. आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले सहित मीरा तिवारी आदि ने अपने भाव व्यक्त किए। इस महती आयोजन में अकादमी से सम्बद्ध बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक और प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका डॉ. मीनू पाण्डेय ‘नयन’, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ आदि की उपस्थिति रही।
‘गली बचपन की’ शीर्षक से आयोजित उक्त संगोष्ठी में देशभर के बाल रचनाकार जुटे हैं, जो बदलते परिवेश में बाल साहित्य की भूमिका पर 14 मार्च को दूसरे दिन भी गंभीर चिंतन करेंगे।

◾देर शाम हुआ कवि सम्मेलन
अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे और सैकड़ों बाल साहित्यकार की मौजूदगी में अनुरंजन कार्यक्रम 8.30 बजे से कवि सम्मेलन के रूप में हुआ। विभिन्न बाल रचनाकारों ने इस में अपनी रचनाओं से सबको प्रभावित किया।




“आगि लगै ऐसे फागुन में” – बी. एल. गौड़

 

आगि लगै ऐसे फागुन में

आगि लगै ऐसे फागुन में

बुढ़ऊ तक बौरावें

बिना बात के खांसी खांसें

बिना बात मठरावें।

देवर की तौ बात कछू ना

जेठन लाज गँवाई

कौनी मार बगल ते निकरें

ऐसी का बेहाई। 

अनुज बधु कन्या सम होती

तुलसी बात बताई

पर इन सबके कूढ मगज कू

ना भाई चौपाई

अब तुम्ही बताओ सजन हमारे

कैसे गात बचावें।

मेरौ गोरौ मुखड़ौ है तौ

मेरौ का है दोस

देवर मलें गुलाल गालन पै

भरि भरि पूरौ जोस। 

मैं तौ करूँ बहुत बरजोरी

पर वे हट ना छोड़ें

भाभी से देवर कौ रिस्ता

जनम जनम से जोड़ें

आंखि तरेरें सासू माजी

का उनकू बतलावें।

होरी तौ होरी है सासू

या कौ बुरौ न मानों

जे शरीर तौ माटी कौ है

माटी में मिल जानों। 

या माटी के पांच तत्व

तौ माटी में मिल जाने

कौन जनम में कौन मिलैगौ

जे ईश्वर ही जाने

प्रेम तत्व ही ईश तत्व है

कबिरा जी समझावें।




“मंज़िल तक कैसे पहुँचें” – बी. एल. गौड़

“मंज़िल तक कैसे पहुँचें”

 

 

हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

तुम तो ऐसे बिछुड़े जैसे
मेले में खोया बालक,
अक्सर मिलता कभी नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

गर तुम केवल रूठे होते
तो तुम्हें मना लाते,
हम किंकर्तव्यविमूढ़ हुए
क्योंकि तुम्हारा
कोई पता नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

राहों में धूल बहुत है
पांवों में छाले भी हैं,
फिर भी चलना पड़ता है
क्योंकि ठहरना
अब कोई बात नहीं,
पर यह पीड़ा तब होती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

सपनों की दीपशिखाएँ
अब भी जलती रहती हैं,
मन का मंदिर खाली है
फिर भी आशा
पूरी तरह से राख नहीं,
पर यह विरह तभी गहराता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

याद तुम्हारी आती जैसे
साँझ ढले घर लौटे पंछी,
लेकिन मेरे आँगन में
अब वैसी कोई
मधुर बरसात नहीं,
और यह सूना सा लगता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

फिर भी मन को समझाते हैं
धैर्य धरा का धर लेते हैं,
शायद फिर मिल जाओ तुम
यह आशा भी
पूरी तरह से समाप्त नहीं,
पर मिलन कठिन हो जाता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

इस जीवन की हर डगर पर
एक भरोसा रख लेते हैं,
शायद फिर से साथ चलो
यह सपना भी
पूरी तरह से मिथ्या नहीं,
पर मंज़िल दूर ही रहती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।




रवीन्द्रनाथ टैगोर : साहित्य, चेतना और मानवीय संवेदना का विराट स्वर

जब हम रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम लेते हैं, तो एक पूरी सदी की सांस्कृतिक चेतना मानो हमारे सामने सजीव हो उठती है। वे केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि दार्शनिक, चित्रकार, संगीतकार, उपन्यासकार, शिक्षाशास्त्री और महान मानवतावादी भी थे। उनकी रचनाएँ प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को जिस संवेदनशीलता से स्पर्श करती हैं, वह किसी मंत्र की तरह आज भी जीवित और प्रासंगिक प्रतीत होती हैं।

टैगोर की कविता में केवल शब्द नहीं होते; वहाँ एक सम्पूर्ण ब्रह्मांड गूँजता है—प्रेम का, मुक्ति का और आत्मबोध का। गीतांजलि के पदों में जो पीड़ा है, वह मानवीय करुणा की गहराइयों से निकलती है, और जो उल्लास है, वह एक सार्वभौमिक आनंद की पुकार बन जाता है।

“Where the mind is without fear and the head is held high…”

यह पंक्ति केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक युग की दिशा है।

आज जब दुनिया तकनीकी उथल-पुथल और बढ़ती संवेदनहीनता की गिरफ्त में है, टैगोर हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कल्पना, उसकी करुणा और उसकी आत्मा की स्वतंत्रता है। वे जिस शिक्षा की कल्पना करते थे, वह केवल ज्ञान का संकलन नहीं, बल्कि जीवन को समझने की प्रक्रिया थी।

शांतिनिकेतन केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं था; वह एक विचार था—खुली हवा में, खुले मन से और रचनात्मकता के साथ सीखने का।

रुचि शर्मा बाजपेयी

टैगोर : शब्दों से परे एक चित्रकार

टैगोर की चित्रकला उतनी ही मौलिक और मार्मिक है जितनी उनकी कविता। जीवन के उत्तरार्ध में, जब कभी-कभी शब्द मौन हो जाते थे, तब उनके रंग बोलने लगते थे। उनकी पेंटिंग्स में रेखाएँ अक्सर स्पष्ट नहीं होतीं और चेहरों की आकृतियाँ अमूर्त होती हैं, फिर भी उनमें भाव, अनुभूति और रहस्य की उपस्थिति अत्यंत स्पष्ट दिखाई देती है।

टैगोर ने कला को एक नई परिभाषा दी—
जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहाँ रंग बोलने लगते हैं।

उनकी चित्रशैली आधुनिक भी थी और स्वदेशी भी। उसमें परंपरा और प्रयोग का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

राष्ट्र, मनुष्य और चेतना : टैगोर का राष्ट्रवाद

टैगोर का राष्ट्रवाद सीमाओं का राष्ट्रवाद नहीं था, बल्कि मानवता का राष्ट्रवाद था।

उन्होंने जन गण मन जैसा राष्ट्रगान रचकर देश को एकता का स्वप्न दिया और एकला चलो रे के माध्यम से आत्मबल की मशाल थमाई। वे महात्मा गांधी के निकट थे, लेकिन अंधराष्ट्रवाद के आलोचक भी रहे।

उन्होंने “नेशन” और “स्वराज” की अवधारणाओं पर गंभीर चिंतन करते हुए यह स्पष्ट किया कि राष्ट्र की असली पहचान उसकी मानवता में निहित होती है—करुणा, न्याय और विचारशीलता से भरी हुई मानवता में।

आज के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में टैगोर की यह दृष्टि और भी अधिक प्रासंगिक हो उठती है, जहाँ कई बार विचारों की जगह नारों ने ले ली है।

टैगोर : एक व्यक्तिगत अनुभव

टैगोर को पढ़ना मेरे लिए हर बार एक आत्मीय यात्रा जैसा अनुभव होता है।

जब मैं अपने उपन्यासों को रचने बैठती हूँ, तो उनके शब्द जैसे मेरे भीतर किसी बंद द्वार को खोल देते हैं। स्त्रीर पत्र की मृणाल आज भी मेरे समय की आवाज़ बनकर उभरती है।

जब गीतांजलि की कोई पंक्ति मन में गूँजती है, तो लगता है कि मैं केवल पढ़ नहीं रही हूँ, बल्कि शब्दों के उस अदृश्य ईश्वर से संवाद कर रही हूँ, जो साहित्य के भीतर जीवित रहता है।

शारदा देवी : एक कवि की माँ

जब संसार ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘गुरुदेव’, ‘कवि’, ‘गीतकार’, ‘द्रष्टा’ और ‘युगपुरुष’ के रूप में देखा, तब बहुत कम लोगों ने उस स्त्री के बारे में सोचा जिसकी गोद ने इस युगनायक को जन्म दिया। वह थीं—माँ शारदा देवी।

माँ : वह स्त्री जो दिखती नहीं थीं, पर थीं

शारदा देवी, देबेन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी थीं। देबेन्द्रनाथ ब्रह्म समाज के प्रमुख विचारकों में से थे। उनके घर की आध्यात्मिकता, सादगी और अनुशासित वातावरण ने रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्व और मानस को गहराई से प्रभावित किया।

शारदा देवी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं थीं, न ही वे किसी रचनात्मक मंच पर दिखाई देती थीं। किंतु उनके शांत, अनुशासित और धर्मनिष्ठ जीवन ने ऐसा संस्कारित वातावरण निर्मित किया, जिसमें रवीन्द्रनाथ जैसे विराट रचनाकार का बचपन पनपा।

घर का मौन वृक्ष

शारदा देवी आडंबर और गहनों से दूर रहने वाली, परिवार-केन्द्रित और सरल स्वभाव की महिला थीं। उनकी गोद वह पहली पाठशाला थी जहाँ टैगोर ने संवेदनाओं का पहला पाठ सीखा।

रवीन्द्रनाथ ने अपनी माँ के बारे में बहुत कम लिखा—शायद इसलिए कि उन्होंने उन्हें बहुत कम देखा, पर उनसे बहुत कुछ पाया।

जब मौन गूँजने लगा

1875 में, जब रवीन्द्रनाथ मात्र चौदह वर्ष के थे, शारदा देवी का निधन हो गया। घर में किसी ने उन्हें स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया, लेकिन बालक-मन सब समझ गया।

अपनी आत्मकथा Chhelebela (My Boyhood Days) में उन्होंने उस क्षण को याद करते हुए लिखा—

“एक दिन वह उठीं नहीं। फिर कभी नहीं उठीं। और मैं, जो उनके पास जाने से डरता था, अब हर समय वहीं बैठा रहा…”

यह वियोग और यह मौन टैगोर की रचनाओं में जीवनभर किसी अदृश्य ध्वनि की तरह गूँजता रहा।

गीतों में माँ की परछाईं

टैगोर के गीतों और कविताओं में कई बार करुणा, कोमलता और मातृवत् आलिंगन की अनुभूति होती है। उनकी रचनाओं में एक ऐसी अनुपस्थित उपस्थिति दिखाई देती है, जो मानो शारदा देवी की छाया हो।

“I seem to have loved you in numberless forms, numberless times…”
(The Gardener)

यह “तुम”—कभी ईश्वर, कभी प्रकृति और शायद कभी माँ भी हो सकती हैं।

अनुपस्थिति में उपस्थिति

शारदा देवी की मृत्यु के बाद टैगोर की रचनाओं में एक गहरा मौन दिखाई देता है। किंतु वही मौन शब्दों में बदलकर एक महान कवि को जन्म देता है।

शारदा देवी प्रसिद्धि नहीं देख सकीं, लेकिन टैगोर की लेखनी में जो करुणा, आत्मीयता और गहराई है, वह उनके संस्कारों से ही उपजी प्रतीत होती है।

वे एक साधारण भारतीय स्त्री थीं, किंतु उनकी मौन उपस्थिति ने एक असाधारण कवि को जन्म दिया। वे उस घर की दीवार थीं, जिन पर विश्व साहित्य के रंग चढ़े। उनकी गोद वह पहली भूमि थी जहाँ गुरुदेव के व्यक्तित्व का बीज पड़ा।

टैगोर की स्त्री पात्राएँ : संवेदना और स्वाधीनता की विविध दिशाएँ

टैगोर की नायिकाएँ केवल कथा-पात्र नहीं हैं; वे स्त्री-चेतना की गहरी अभिव्यक्तियाँ हैं। उनकी स्त्रियाँ चार दिशाओं की तरह हैं—हर दिशा अपने भीतर एक अलग कथा और अलग संघर्ष समेटे हुए।

चारुलता : निस्पृह आँखों का मौन संवाद

नष्टनीड़ की चारुलता एक अभिजात बंगाली गृहिणी है, जो अपने पति की व्यस्तता और उपेक्षा के बीच गहरे अकेलेपन से गुजरती है। वह किताबों से बातें करती है और मानसिक संगिनी खोजती है।

टैगोर ने उसकी आँखों को निस्पृह कहा है, पर वे निष्क्रिय नहीं हैं। उनमें आत्ममंथन और गहरी समझ की चमक है। चारुलता की चुप्पी दरअसल उस समय की स्त्रियों की विवशता का कलात्मक बयान है।

बिमला : भीतर का आत्मसंघर्ष

घरेबाइरे की बिमला पत्नी, विचारशील स्त्री और देशभक्त—इन तीनों भूमिकाओं के बीच उलझी हुई है।

उसके भीतर दो शक्तियाँ टकराती हैं—पत्नी-धर्म और राष्ट्र-धर्म। वह अपने पति के आधुनिक विचारों और एक क्रांतिकारी के आकर्षण के बीच फँस जाती है। टैगोर यहाँ केवल प्रेम-त्रिकोण नहीं रचते, बल्कि यह दिखाते हैं कि स्त्री का मन भी विचारधाराओं से निर्मित होता है।

मृणाल : विद्रोही आत्मा

स्त्रीर पत्र की मृणाल टैगोर की सबसे मुखर और विद्रोही नायिका है। वह परंपरा के साँचे में ढलने से इनकार करती है।

वह लिखती है—
“मैं घर नहीं छोड़ रही, मैं उस जाल को तोड़ रही हूँ जिसमें स्त्रियाँ साँस नहीं ले सकतीं।”

उसका विद्रोह भीतर से उठता है—सम्मान की कमी से, आत्मसम्मान की पीड़ा से और स्वतंत्रता की आकांक्षा से।

ललिता : स्वच्छंद और निर्णयशील

नौकाडूबी की ललिता एक ऐसी स्त्री है जो केवल विरोध नहीं करती, बल्कि निर्णय लेती है। सामाजिक बंधनों और परिस्थितियों की उलझनों के बीच वह अपनी बुद्धि और साहस से रास्ता खोजती है।

उसके व्यक्तित्व में आधुनिक स्त्री की छवि दिखाई देती है—संस्कारों को स्वीकार करते हुए भी स्वतंत्रता का चयन करने वाली स्त्री।

अन्य उल्लेखनीय स्त्री पात्र

कमला (नष्टनीड़)
कमला प्रेम और त्याग के द्वंद्व में उलझी स्त्री है। वह घर को बचाने की कोशिश करती है, लेकिन भीतर से टूटती चली जाती है।

हेमनलिनी
वह बुद्धि, संस्कृति और सौंदर्य का प्रतीक है। उसका प्रेम स्थिर है और उसकी गरिमा उसे एक उदात्त नायिका बना देती है।

प्रकृति (प्रकृति और साधु)
प्रकृति अपराधबोध से घिरी एक भीलनी है, जो एक साधु से मिलकर आत्मशुद्धि और प्रेम के मार्ग को चुनती है।

चित्रांगदा
मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा योद्धा भी है और स्त्री भी। अर्जुन से प्रेम करते हुए वह अंततः अपनी असली पहचान के साथ खड़ी होकर कहती है—

“मुझे वैसे ही स्वीकार करो जैसी मैं हूँ।”

अनुराधा (शेषेर कविता)
अनुराधा आधुनिक शिक्षित स्त्री का प्रतीक है। वह भावनाओं में बहती नहीं, बल्कि प्रेम में संतुलन और गरिमा बनाए रखती है।

टैगोर की स्त्रियाँ सचमुच चार दिशाओं की तरह हैं। हर नायिका अपने भीतर एक अलग कहानी, एक अलग संघर्ष और एक अलग प्रकाश लिए हुए है। यही कारण है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य केवल एक युग की धरोहर नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना का अनंत विस्तार है।




हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम

हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम

सूरज के प्रसाद

भाषाविद्

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय

ईमेल पता : [email protected]

 

सारांश (Abstract):

इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) ने वैश्विक समाज को जिस तीव्र गति से परिवर्तित किया है, उसने जनसंचार माध्यमों (Mass Communication Media) के स्वरूप, भाषा, सामग्री और प्रभाव क्षेत्र को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत शोध पत्र “हिंदी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम” हिंदी भाषा की सूचना-प्रौद्योगिकी में भागीदारी और उसकी संभावनाओं की व्यापक समीक्षा करता है। लेख में दर्शाया गया है कि कैसे सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक—प्रौद्योगिकी (Technology), सूचना (Information) और भाषा (Language)—परस्पर जुड़कर जनसंचार की दिशा और दशा को बदल रहे हैं।

इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि कंप्यूटर, इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब जैसे उपकरणों की सहायता से सूचना का त्वरित संप्रेषण संभव हुआ है, जिसमें भाषा की भूमिका केंद्रीय है। लेख यह भी रेखांकित करता है कि हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी में समाविष्ट करने हेतु विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हुए हैं, जैसे देवनागरी आधारित की-बोर्ड, इंस्टी कोड, यूनिकोड, भाषायी सॉफ्टवेयर और वेब आधारित टूल्स का विकास। हिंदी भाषा को कंप्यूटर और इंटरनेट के साथ जोड़ने की यह प्रक्रिया, न केवल भारत के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी के विस्तार में सहायक सिद्ध हो रही है।

वेबसाइट निर्माण, ई-मेल सेवा, ऑनलाइन भाषा शिक्षण सॉफ्टवेयर, हिंदी आधारित चैट और ब्राउज़र सिस्टम जैसे अनेक उपकरणों के माध्यम से हिंदी को डिजिटल माध्यम में सशक्त बनाया गया है। शोध यह प्रतिपादित करता है कि यदि भाषा की सुबोधता, सरलता और ग्राह्यता को प्राथमिकता दी जाए, तो हिंदी न केवल सूचना संप्रेषण का सशक्त माध्यम बन सकती है, बल्कि वैश्विक संवाद की भाषा भी बन सकती है। लेख का निष्कर्ष यह है कि डिजिटल मीडिया में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है और भविष्य में हिंदी विश्व की प्रमुख सूचना भाषा बनने की क्षमता रखती है।

बीज शब्द (Keywords):
हिंदी, सूचना प्रौद्योगिकी, जनसंचार, कंप्यूटर, इंटरनेट, भाषा शैली, यूनिकोड, देवनागरी, वेबसाइट, वेब सामग्री, डिजिटल मीडिया, तकनीकी भाषा

इक्कीसवीं सदी में मानव समाज में एक ऐसी प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ, जिसने देखते ही देखते हमारे निजी, सामाजिक-सरकारी और व्यावसायिक जीवन में एक आक्रामक की तरह प्रवेश किया और निरंतर परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति के साथ वर्तमान समाज को सूचना समाज में परिवर्तित कर दिया। यूनेस्को की व्याख्या के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी एक शास्त्रीय, तकनीकी, प्रबंधकीय एवं अभियांत्रिकी शाखा है, जो सूचनाओं के तंत्र को विकसित करके उसका प्रयोग कंप्यूटर के माध्यम से करते हुए मानव और मशीन के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को सुदृढ़ और सबल बनाती है। दूसरे शब्दों में सूचना प्रौद्योगिकी कंप्यूटर, संचार और इलैक्ट्रॉनिकी का वह समन्वित रूप है, जिसमें सूचना प्रणाली के विशिष्ट आयामों और उसकी प्रासंगिकता की खोज के द्वारा सूचना उत्पादन, विश्लेषण, भंडारण, संचरण आदि कार्य किए जाते हैं, जिसके महत्त्वपूर्ण अंग हैं- सूक्ष्म संसाधक, डेटा भंडारण तंत्र और डेटा संचरण तत्त्व।
सूचना प्रौद्योगिकी एक सरल तंत्र है, जो तकनीकी उपकरणों के सहारे सूचनाओं का संकलन, प्रक्रिया एवं संप्रेषण करता है। सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक हैं-प्रौद्योगिकी, सूचना और भाषा। इस प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण भूमिका है कंप्यूटर प्रौद्योगिकी की। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी ‘‘सूचना संसाधन और संप्रेषण अभियांत्रिकी’’ की सबसे ज्यादा कारगर प्रौद्योगिकी है। इससे जितनी बड़ी क्रांति हमारे सामाजिक जीवन में आई है उससे कहीं बड़ी क्रांति सूचना प्रौद्योगिकी में आई है। कंप्यूटर हमारे निजी, सामाजिक, सरकारी, व्यावसायिक तथा वाणिज्यिक क्रिया-कलापों में हमें अनंत सुविधाएँ और लाभ प्रदान करता है और हमारा श्रम और समय बचाने के साथ-साथ अद्यतन सूचनाओं के प्रति हमें सजग रखता है।

कंप्यूटर का विकास बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक में सन् 1935 में चार्ल्स बेवेज द्वारा बनाए गए ‘नालिटिकल एंजिन’ से हुआ, जिसकी कार्यप्रणाली बहुत-कुछ आज के आधुनिक कंप्यूटर जैसी ही थी। सन् 1944 में हावर्ड विश्वविद्यालय द्वारा ‘‘आई बी एम’’ और यू एन नेवी’’ के सहयोग से मार्क-1 नामक यंत्र का निर्माण हुआ। इस क्रम में 1946 में कंप्यूटर युग का सूत्रपात हुआ जो सन् 1955 से 1971 तक गति और कार्यक्षमता की दृष्टि से विकसित हुआ और उसमें नए आयाम भी सम्मिलित होते गए। आज कंप्यूटर आकार में छोटा और वजन में हल्का होकर विशाल मेन फ्रेम से छोटा होकर टेबलटॉप, लैपटॉप, पामटॉप, रिस्टटॉप और जेब में सिमट गया है। वहीं कंप्यूटर बहुप्रयोजनी भी हो गया है। इससे अब न केवल टाइपिंग और मुद्रण का काम ले सकते हैं बल्कि फोन, फैक्स कर सकते हैं, फोटो खींच सकते हैं, गाना सुन सकते हैं, रिकॉर्डिंग कर सकते हैं, वीडियो चलचित्र देख सकते हैं, केल्कुलेटर, घड़ी, डायरी का काम ले सकते हैं और इंटरनेट व वेबसाइट्स का उपयोग करके सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, खरीदारी कर सकते हैं, डाक्टरी सलाह ले सकते हैं, शिक्षण प्रशिक्षण दे-ले सकते हैं, पूरी दुनिया में विभिन्न स्थानों पर बैठे लोग कांफ्रेसिंग कर सकते हैं और ज्ञान-विज्ञान की नई-नई जानकारी मिनटों में प्राप्त कर सकते हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के संदर्भ में कंप्यूटर के उपकरण हैं- इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब। सूचना और संचार के क्षेत्र में दूरसंचार, संचार माध्यम, कंप्यूटर, कंप्यूटर-विषयक क्षेत्र आदि प्रमुख क्षेत्रों का विकास 20वीं सदी के अंतिम दशक में अति तीव्र गति से हुआ है। इन सबमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इंटरनेट व वेबसाइट का प्रवेश है। यह एक ऐसी प्रौद्योगिकी है जिसमें विश्वव्यापी नेटवर्क में हजारों कंप्यूटरों को एक कंप्यूटर के साथ जोड़ा गया है।

इस संदर्भ में प्रौद्योगिकी से तात्पर्य उन उपकरणों से है जो दृश्य-श्रव्य रूप में सूचना को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने के माध्यम होते हैं- इनमें कंप्यूटर, इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब, मोडेम, स्केनर, वीडियो कैमरा, साउंड कार्ड, टेलीफोन, प्रिंटर, सर्वर, सैटेलाइट आदि शामिल हैं। आज इस प्रौद्योगिकी में बहुत तेजी से विकास हो रहा है और दो से अधिक प्रौद्योगिकी युक्तियों को जोड़ने से इंटरनेट को सीधे टीवी के पर्दे पर देखना, मोबाइल फोन पर इंटरनेट की सुविधा और वायरलेस प्रौद्योगिकी से केबल के बिना इंटरनेट चलाना संभव हो गया है। इस प्रकार नवीनतम सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के सम्मिश्रण से संसाधनों का नेटवर्क, सामाजिक जानकारी और बुद्धि के सभी प्राप्य रूपों की वृद्धि के असीम अवसर पैदा हुए है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब में विभिन्न स्तरों पर जो परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति हुई है इससे न केवल आम जनमानस को प्रेरणा मिली है बल्कि व्यापारियों उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, अधिकारी वर्ग और यहाँ तक कि राजनीतिज्ञों का भी ध्यान आकर्षित हुआ है। ई-मेल, ई-कॉमर्स, ई-गर्वनेंस, ई-ऐजुकेशन, ई-कम्यूनिटीज़, डाटा-प्रबंधन सूचना पुनः प्राप्ति आदि के माध्यम से इसने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर सूचना प्रौद्योगिकी को एक नवक्रांति के रूप में स्थापित कर दिया है।

सूचना प्रौद्योगिकी का दूसरा घटक है-सूचना। सूचना से तात्पर्य उस कथ्य या सामग्री से है जो इंटरनेट या वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से उपलब्ध होती है। ये सूचनाएं दो प्रकार की होती हैं- सामान्य सूचनाएँ और ज्ञानात्मक सूचनाएँ। सामान्य सूचनाएँ प्रायः तात्कालिक महत्व की होती हैं, जैसे व्यापारिक, व्यावसायिक, राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सूचनाएँ। ज्ञानात्मक सूचनाओं का संबंध ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों या अनुशासनों से होता है। ज्ञानात्मक सूचनाएँ अधिक स्थायी प्रकृति की होती हैं और उनका उपयोग प्रायः संदर्भ गं्रथों की तरह होता है, जैसे ज्ञान-विज्ञान संबंधी जानकारी, शब्दकोश, विश्वकोश, थिसॉरस, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, शिक्षण-प्रशिक्षण संबंधी सामग्री आदि।

स्थायित्व की दृष्टि से भी सूचनाएँ दो प्रकार की होती हैं- स्थिर, और परिवर्तनशील। स्थिर सूचनाएँ काफी समय तक इंटरनेट-वर्ल्ड वाइड वेब पर उसी रूप में बनी रहती हैं। उनमें जल्दी-जल्दी या कम समयांतराल पर बार-बार परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती है या बहुत कम आवश्यकता होती है, जैसे- साहित्य, ज्ञान-विज्ञान की सामग्री, इतिहास, विश्वकोश, शब्दकोश, शिक्षण-प्रशिक्षण सामग्री आदि से संबंधित जानकारी। परिवर्तनशील सूचनाएँ वे हैं, जिन्हें हर कुछ मिनटों, घंटों, दिनों या महीनों में अद्यतन करते रहने की आवश्यकता होती है, जैसे-समाचार, विमान-रेल आगमन-प्रस्थान संबंधी सूचना, खेल कमेंट्री, क्रय-विक्रय संबंधी सूचना, रोजगार-पदों का विज्ञापन, संस्थाओं की गतिविधियों का विवरण आदि।

सूचना प्रौद्योगिकी का तीसरा घटक है- भाषा व भाषा शैली। भाषा सूचना प्रौद्योगिकी का मुखपृष्ठ है, जिसकी सहायता से प्रयोक्ता अंकित सूचना को ग्रहण करता है। जिस भाषा में सूचना अंकित होती है, यदि प्रयोक्ता उस भाषा को न समझ सके तो इस प्रौद्योगिकी से उसे कोई लाभ होने वाला नहीं है। आज इंटरनेट की 83 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। इसलिए अँग्रेजी भाषा-भाषी देशों या अंग्रेजी जानने वाले प्रयोक्ताओं को कोई समस्या नहीं है। यह समस्या उन देशों की है जहाँ का भाषा-समाज अंग्रेजी नहीं जानता और अपनी स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं का ही प्रयोग ज्यादा करता है। चूँकि सूचना प्रौद्यागिकी का उद्देश्य सामाजिक विकास और जन कल्याण है, अतः यह आवश्यक है कि इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री लोगों तक उनकी भाषा के माध्यम से पहुँचे। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि भाषा का स्थानीकरण और विस्तारीकरण करके समस्त कंप्यूटर परिवेश और इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री को प्रयोक्ताओं की स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं में प्रस्तुत किया जाए। इसके अंतर्गत वांछित भाषाओं में कंप्यूटर के पर्दे पर दिखाई देने वाले सभी कमांड, आदेश, संकेत, त्रुटि-संदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया के अंग बनें। इसके अलावा इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर प्रदर्शित समस्त सूचना-सामग्री प्रयोक्ता की अपेक्षित भाषा में उपलब्ध हो और कथ्य सामग्री की भाषा शैली का सरल, सुबोध और ग्राह्य होना भी अत्यंत आवश्यक है इसलिए प्रायः वाक्य अत्यंत छोटे रखे जाते हैं, सरल और बोधगम्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जहाँ अत्यावश्यक हो, कथन स्पष्ट और संक्षिप्त रखे जाते हैं। कथन इतना सुबोध और आकर्षक होना चाहिए कि वह प्रयोक्ता को बाँधकर रख सके अन्यथा प्रयोक्ता कभी भी साइट को छोड़कर जा सकता है।

इस संदर्भ में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सामग्री का निर्माण करते समय भी ये सभी बातें विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य हैं। जहाँ तक हो सके अनुवादपरक और क्लिष्ट भाषा-शैली से बचना आवश्यक है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर सामग्री का विकास करते समय इसके तीन पक्षों पर ध्यान देना आवश्यक होता है-चयन, प्रस्तुतीकरण और भाषा शैली। सामग्री के चयन में प्रयोक्ताओं की जरूरतों, उनकी रूचि के विषयों और समसामयिक महत्त्व के मुद्दों को ध्यान में रखा जाता है। प्रयोक्ता किन-किन प्रयोजनों का उद्देश्यों से किस प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त करना चाहता है, इसका विश्लेषण या पूर्वानुमान करना आवश्यक है।

सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी
भावों, विचारो और मानवीय संबंधों को प्रकटीकरण के लिए भाषा जरूरी है। भाषा के साथ ‘राष्ट्र’, ‘राज’, ‘संपर्क’, जुड़ जाने से भाषा का मूल्य और अधिक बढ़ जाता है। तकनीक और सूचना तकनीक से भाषा को जोड़कर इसे हर भारतीय तक पहुँचाना राजभाषा का ध्येय और लक्ष्य है। दूसरी ओर हिंदी को विश्व फलक पर स्थापित करना भी भारत सरकार के साथ-साथ हर भारतीय का कर्तव्य है। आज सूचना-प्रौद्योगिकी की क्रांति के दौर में सामान्य सूचनाओं के साथ-साथ ज्ञानात्मक सूचनाएँ भी निरंतर हिंदी में उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। इस दिशा में विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ विभिन्न वैज्ञानिक व विद्वान निरंतर प्रयत्नशील हैं।

कंप्यूटर पर हिंदी
हिंदी तथा भारतीय भाषाओं को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने के लिए सन् 1971-72 में सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए कंप्यूटर में देवनागरी व अन्य भारतीय लिपियों के उपयोग के लिए ‘फोटो टाइप टर्मिनल’ का विकास किया। सन् 1980 में शब्द संसाधन की दृष्टि से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में मुद्रण के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति ने जन्म लिया। इसी क्रम में सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों की अनेक संस्थाओं के सक्रिय सहयोग से पहले यांत्रिक टाइप राइटर के मॉडल पर कुंजी पटल का विकास किया गया और बाद में हिंदी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं की लिपियों के लिए वर्णमाला की ध्वनि और वर्णमाला के वर्णों के वितरण, उनके उच्चारण स्थान के आधार पर एक समन्वित कोड विकसित किया गया जिससे एक ही कुंजी से सभी भारतीय भाषाओं (उर्दू को छोड़कर) की लिपियों के समान ध्वनि वाले अक्षर टंकित हो सकें। इसके आधार पर जो कोड विकसित किया गया वह ‘इंस्टी कोड’ (इंडियन स्टैंडर्ड कोड इन्फॉमेंशन इंटरचेंज) कहलाता है और की-बोर्ड का मोड इनस्क्रिप्ट कहलाता है। इसके आधार पर अक्षरों के लिए निर्धारित कुंजी से सभी भारतीय लिपियों में टाइप किया जा सकता है और अन्य भाषा में लिप्यांतरण भी किया जा सकता है। इसी आधार पर अंग्रेजी की वर्णमाला के अक्षरों की ध्वनियों के अनुसार भारतीय भाषाओं के अक्षरों को भी अंग्रेजी के लिए निर्धारित की – बोर्ड पर ही टंकित किया जा सकता है।

इसे ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) या एक्ज़िक्युटिव या एंग्लो-इंडो की-बोर्ड मोड कहते हैं। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए कुंजीपटल में तीन विकल्प हैं- टाइपराइटर, इनस्क्रिप्ट और फोनेटिक। प्रयोक्ता सुविधानुसार इनका उपयोग करके अपना काम हिंदी या अन्य भाषाओं में कर सकते हैं। कुंजीपटल के विकास के बाद कंप्यूटर पर अपेक्षित भाषा में काम करने के लिए आवश्यकतानुसार अनुप्रयोग ‘हिन्दी सॉफ्टवेयरों’ के निर्माण का सिलसिला आरंभ हुआ। भारत सरकारी की सी-डेक संस्था ने 1988 में आई.आई.टी. कानपुर के सहयोग से बहुभाषी कंप्यूटिंग तथा इलेक्ट्रानिकी ‘जिस्ट’ ग्राफिक्स एंड इटेलिजेंस बेस्ड स्क्रिप्ट टेक्नोलॉजी प्रणाली प्रदान की। इसके माध्यम से अंग्रेजी के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डी-बेस, लॉटस, वर्डस्टार, कोबोल आदि में कार्य होने लगा। इसके बाद सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने विंडोज़ प्लेटफार्म व परिवेश में काम करने वाले अनेक फोंट्स व सॉफ्टवेयर जैसे -लीप ऑफिस, इज्म, ट्रांसनेम, जिस्टशैल, लिप्स, मल्टी प्वाइंट अक्षर फॉर विंडोज़ आकृति आफिस सॉफ्टेक का अक्षर, देवेबेस, लेजर कंपोज़र, हिंदी का आलेख वराह, श्रीलिपि एपीएस आदि का निर्माण किया।

इस बीच माइक्रोसॉफ्ट की भारत स्थित कंपनी ने सन् 2000 में एम एस ऑफिस विंडोज में हिन्दी सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं को भी सम्मिलित किया और सन् 2003 में भारत सरकार से किए गए करार के अनुसार विंडोज के समस्त परिवेश, सभी आदेश, संकेत, त्रुटिसंदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि विकसित करके कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया का अंग बना दिया। इसी क्रम में भारत सरकार ने आगे कदम बढ़ाते हुए उक्त सभी फोंट्स व यूनिकोड फोंट्स एवं की-बोर्ड ड्राइवर, टु्रटाइप फोंट्स के हिंदी भाषा मल्टीफोंट्स की-बोर्ड इंजन, हिन्दी भाषा के यूनिकोड आधारित की-बोर्ड ड्राइवर, हिंदी के लिए सभी प्रकार के फोंट्स कोड एवं स्टोरेज कोड का परिवर्तक, भारतीय ओपन ऑफिस का हिंदी भाषा संस्करण, हिन्दी में फायरफॉक्स ब्राउसर, हिन्दी में जीआईएम मल्टी प्रोटोकॉल संदेशवाहक, हिंदी में ई-मेल क्लाइंट, हिंन्दी ओसीआर, हिंदी एवं अंग्रेजी के लिए आसान टाइपिंग अनुशिक्षक, हिंदी के लिए एकीकृत शब्द संसाधक, अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश, हिंदी भाषा के शब्द वर्तनी जाँचकर्ता, हिंदी भाषा का शब्दनुवाद टूल एवं हिंदी के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच प्रणाली आदि का विकास कर इसे आम जनता तक मुफ्त पहुँचाने की व्यवस्था की।

इसके अतिरिक्त आईबीएम द्वारा विकसित साफ्टवेयर में हिंदी के 65000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिंदी और हिंदुस्तानी, अँगं्रेजी के लिए आवाज पहचानने की प्रणाली का विकास भी किया गया है जो शब्दों को पहचानकर कंप्यूटर पर लिपिबद्ध कर देती है। एचपी कंप्यूटर ने एक कदम और आगे बढ़कर ऐसी तकनीक विकसित की है, जो हाथ से लिखी हिंदी लिखावट को पहचानकर कंप्यूटर में लिपिबद्ध कर सकती है। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी के प्रयोग की सुविधा के साथ कंप्यूटर का पूरा परिवेश व प्रक्रिया आदि की हिंदी में उपलब्ध उक्त सुविधाओं से अंग्रेजी न जाने वाले भी अब अपना काम कंप्यूटर पर हिंदी में कर सकते हैं।

इंटरनेट व वेबसाइट पर हिंदी
इंटरनेट ने सूचनाओं के विश्वव्यापी आदान-प्रदान को अपने तंत्रजाल में बाँध लिया है। यह प्रणाली विश्व के विभिन्न देशों में करोड़ों लोगों द्वारा प्रयुक्त की जा रही है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इसका आविष्कार होने से अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं तथा रोमन लिपि का वर्चस्व रहा। अंग्रेजी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रेंच, जापानी, अरबी, स्पेनिश आदि भाषाएँ कंप्यूटर के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गई हैं, वहीं हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए यह एक चुनौती है। लेकिन इंटरनेट के फलक पर वेब दुनिया डॉट कॉम (इंडिया) लि. ने हिंदी पोर्टल का विकास कर इस चुनौती को स्वीकार किया और 23 सितम्बर 1999 को इंटरनेट पर हिन्दी की क्षमता के दर्शन हुए। वेब दुनिया के इस कार्यक्रम में मेल, चैट, खोज आदि भी सम्मिलित हैं। सॉफ्टवेयर कंपनी सुवि इन्फॉमेंशन सिस्टम, इंदौर ने हिंदी में निशुल्क ई-मेल सेवा का श्रीगणेश किया है। इस पैकेज में लिप्यांतरण की सुविधा भी है। रोमन में टाइप पत्र दूसरे छोर पर देवनागरी में प्राप्त हो सकता है।

इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी भाषा का प्रचलन निरंतर बढ़ रहा है। जहाँ माइक्रोसॉफ्ट, याहू, रेडिफ, आदि विदेशी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट पर हिंदी को स्थान दिया है और बीबीसी ने हिंदी की वेबसाइट विकसित की है, वहीं राजभाषा विभाग ने भी अपनी हिंदी वेबसाइट पर मशीनी अनुवाद और लिप्यांतरण हेतु ‘मंत्र’ पैकेज उपलब्ध कराया है और हिंदी में वेबपेज विकसित करने हेतु ‘प्लग इन’ पैकेज तैयार किया है, जिससे कोई भी व्यक्ति, संस्थान अपना वेबपेज हिंदी में प्रकाशित कर सकता है। भाषा शिक्षण की दिशा में भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने सी-डेक के सहयोग से ‘लीला हिन्दी सैल्फ लर्निंग’ पैकेज सॉफ्टवेयर तैयार किया जा अब इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। इस पैकेज से पाठों में आए वाक्यों, शब्दों और वर्णों का मानक उच्चारण सुन सकते हैं और बार-बार अभ्यास भी कर सकते हैं। लीला पैकेज लर्न इंडियन लेंग्वेज थ्रु आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के द्वारा सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी के माध्यम से सीखने की सुविधा उपलब्ध है। हिंदी शिक्षण की दृष्टि से मल्टीमीडिया सीडी-रोम ‘गुरू’ भी महत्वपूर्ण है।

इंटरनेट पर आसानी से हिंदी में काम कर सकते हैं। वेब साइट्स हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ ग्रहण कर सकते हैं। इंटरनेट व वेबसाइट पर सूचनाएँ अंकित करने के लिए सूचना संप्रेषण की आवश्यक प्रविधि के साथ भाषा और शैली की सुबोधता, सरलता, सहजता को ध्यान में रखकर हिंदी में वेबसाइट्स का निर्माण करके आवश्यक सामान्य सूचनाएँ और ज्ञान विज्ञान संबंधी ज्ञानात्मक सूचनाएँ जन-जन के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी की बढ़ती पैठ को देखते हुए प्रसिद्ध अंग्रेजी भाषाशास्त्री डेविड ग्राडोल ने विश्लेषण करके बताया है कि ‘‘हिन्दी 2050 में दुनिया की नंबर एक भाषा होने जा रही है। दूसरा स्थान चीनी और तीसरा स्पेनिश का होगा।’’ इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी वर्तमान इक्कीसवीं सदी में अन्य भाषाओं के साथ सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेगी।

सन्दर्भ –
1. हिन्दी भाषा का अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भ – भोलानाथ तिवारी, पाण्डुलिपि प्रकाशन दिल्ली।
2. दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी – डी.डी. ओझा, ज्ञान गंगा, प्रकाशन, दिल्ली।
3. जनमाध्यम और पत्रकारिता – प्रवीण दीक्षित, सहयोगी साहित्य संस्थान, महेश्वरी मोहाल, कानपुर।
4. जन संचार माध्यमों में हिन्दी, कुमार चन्द्र क्लासिक पब्लिकेशन्स कम्पनी, नई दिल्ली, 2000।
5. जन संचार और विकास बनर्जी, अंजन कुमार, जनसंचार केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी, 1995।
6. संचार क्रांति और विश्व जन माध्यम – प्रेमचन्द पांतजलि, अनिल अंकित।
7. सूचना प्रौद्योगिकी और जन माध्यम – प्रो. हरि मोहन तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।
8. जनसंचार – राधेश्याम शर्मा, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़।
9. साइबर स्पेस और मीडिया – सुधीश पचौरी, प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली।
10. संचार माध्यमों का प्रभाव – ओम प्रकाश सिंह, क्लासिकल पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली।
11. आधुनिक जन संचार और हिन्दी – प्रो. हरि मोहन, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।