प्रथम सत्र के विषय “जो दिखता है वही बिकता है”( कलेवर लेआउट में रोचकता का अभाव: पठनीय को दर्शनीय भी बनाएं)। इस सत्र में इन विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे :-
मनोज राठौर जी ग्राफिक डिजाइनर
हेमंत खुराना जी प्रिंट तकनीकी विशेषज्ञ,
समावर्तन पत्रिका के संपादक – श्रीराम दवे जी से
संजय पटेल जी ने संचालक के रूप में चर्चा की।
संजय पटेल जी का पहला प्रश्न हस्तलिखित पत्रिका का संपादन होता था, फिर प्रकाशन — अब तकनीकी समय में लेखक की ओर से बदलाव आया या अभी भी पहले जैसी समस्या है?
उत्तर (हेमंत जी): हाँ, बदलाव आया है। तकनीक ने आगे बढ़ाया है, इस वजह से गलती अधिक है। समय सीमा में बंधकर त्रुटिपूर्ण विषय वस्तु या चित्र नहीं भेजने चाहिए।
लेआउट में रोचकता का अभाव” और उसे “पठनीय बनाने” पर जोर दिया गया है। तकनीक बनाम परंपरा पर चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि कैसे हस्तलिखित पत्रिकाओं के दौर से निकलकर अब तकनीकी युग में संपादन की चुनौतियाँ बदल गई हैं।
त्रुटियों के संदर्भ में भी बात की गई और यह उल्लेख किया गया है कि तकनीक के बावजूद, समय की कमी के कारण गलतियाँ अधिक होने की संभावना बनी रहती है।
साहित्यिक पत्रिकाओं का स्वरूप: तकनीक, चुनौतियाँ और सृजन का भविष्य, साहित्य और पत्रकारिता के बदलते परिवेश में पत्रिकाओं के संपादन, डिजाइन और उनकी पठनीयता को लेकर सत्र था। इस चर्चा में साहित्य जगत के दिग्गजों और तकनीकी विशेषज्ञों ने एक मंच पर आकर पत्रिकाओं के गिरते स्तर, बढ़ती तकनीकी सुगमता और भविष्य की चुनौतियों पर गहन मंथन किया।
”जो दिखता है वही बिकता है”: आवरण की महत्ता
चर्चा की शुरुआत इस विषय से हुई कि “जो दिखता है वही बिकता है”। जैसे प्रश्न पर ग्राफिक डिजाइनर मनोज राठौर जी ने जोर देते हुए कहा कि पत्रिका का आवरण उसकी पहली पहचान है। उन्होंने तर्क दिया कि आवरण ही वह प्रवेश द्वार है जिसे देखकर पाठक पत्रिका के भीतर प्रवेश करता है। चर्चा में यह बात भी उभरकर आई कि हिंदी भाषा के पास आकर्षण की कोई कमी नहीं है, बस उसे सही प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता है। शुद्धता के मामले में उन्होंने वीणा जैसी पत्रिकाओं के उच्च मानकों का उदाहरण दिया।
जब यह प्रश्न आया तकनीक वरदान या अभिशाप?
तब हेमंत जी ने संपादन प्रक्रिया में आए तकनीकी बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्वीकार किया कि तकनीक ने काम को गति तो दी है, लेकिन इसके साथ ही गलतियों की संभावना भी बढ़ गई है। ”तकनीक ने हमें आगे तो बढ़ाया है, लेकिन समय सीमा के दबाव में अक्सर त्रुटिपूर्ण सामग्री या चित्रों का चयन हो जाता है, जिससे बचना अनिवार्य है।” इस सत्र में GIGO (Garbage In, Garbage Out) के सिद्धांत पर भी चर्चा हुई, जिसका अर्थ है कि यदि इनपुट या कच्चा माल खराब होगा, तो अंतिम परिणाम भी वैसा ही मिलेगा। संजय जी ने पिक्सल और रिज़ॉल्यूशन की महत्ता समझाते हुए DPI और गुणवत्ता के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया।
श्री राम दवे ने संपादन को एक 24/7 चलने वाला मस्तिष्क कहा। ’समावर्तन पत्रिका के संपादक श्रीराम दवे जी ने एक संपादक की चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि देशभर में लगभग 4500 पत्रिकाएं निकलती हैं, जो दो वर्गों में विभाजित हैं:
धनाढ्य पत्रिकाएं-जिनका प्रसार और लेआउट भव्य होता है। स्वयं के खर्च पर निकलने वाली पत्रिकाएं- जो सीमित संसाधनों में भी साहित्य की सेवा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि एक संपादक का कार्य केवल ऑफिस समय तक सीमित नहीं है, उसका मस्तिष्क 24/7 सक्रिय रहता है। उन्होंने अपनी भूलों से सीखने की सलाह देते हुए कहा कि जल्दबाजी में कभी भी ‘रचना नही भेजना चाहिए।
डिजाइनर की अपेक्षाएं और तकनीकी बारीकियां
कार्यशाला में डॉ. विकास दवे जी और संजय पटेल जी ने तकनीकी सवाल उठाए। मनोज राठौर जी ने स्पष्ट किया कि एक बेहतर पत्रिका के लिए संपादक और डिजाइनर के बीच तालमेल होना आवश्यक है। डिजाइनर की अपेक्षा होती है कि उसे सामग्री पूरी तरह संपादित और प्रूफ-रीडिंग के बाद मिले ताकि वह लेआउट पर ध्यान केंद्रित कर सके। चर्चा में 4 Color Printing के साथ-साथ पांचवें रंग (Special Colors) के प्रयोग पर भी बात हुई, जिसका उपयोग व्यापारिक और पैकेजिंग प्रिंटिंग में अधिक होता है। साहित्यिक पत्रिकाओं में सिलेक्टेड कलर्स और अच्छी गुणवत्ता के कागज़ (GSM) के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
इस सत्र का सार यह रहा कि डिजिटल युग में मोबाइल आधारित पढ़ाई बढ़ रही है, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। ‘समावर्तन जैसी पत्रिकाओं ने अपने विशेषांकों के माध्यम से जो मानक स्थापित किए हैं, वे प्रेरणादायी हैं। अंततः, एक सफल पत्रिका वही है जो तकनीक का सहारा तो ले, लेकिन अपनी मौलिकता, भाषा की शुद्धता और वैचारिक गहराई से समझौता न करे।
द्वितीय सत्र में विषय ‘थोड़ी हंसी थोड़ी खुशी’ में कार्टून विधा पर रोचक चर्चा हुई। साहित्यिक पत्रिकाएं कंटेंट पर आधारित होती है किंतु कंटेंट भी रोचक होना चाहिए। डॉ विकास दवे ने बताया कि डाॅ देवेंद्र शर्मा जी की कूची के साथ-साथ उनकी कलम भी चलती है।
साहित्य और कार्टून विधा पर एक सार्थक संवाद हुआ। सत्र का प्रारूप कुछ ऐसा था, कि डॉ देवेंद्र शर्मा जी को मंच पर अकेले बैठना था और श्रोतागण से आने वाले सवालों के जवाब देना था। लेकिन हुआ कुछ यू कि उन्होंने डाॅ विकास दवे जी को मंच पर आमंत्रित किया इसके बाद तो क्या ही था, दवे जी के साथ-साथ मंच के सामने से आने वाले सवालों की झड़ी लगी थी और डॉ देवेंद्र शर्मा हर एक प्रश्न का बड़ी कुशलता के साथ में, अपने जीवन के रोचक अनुभव सुनाते हुए, एक-एक प्रश्न का उत्तर देते गए।
कलम की शक्ति और सामग्री को ध्यान में रखते हुए सत्र की शुरुआत में इस बात पर जोर दिया गया कि यद्यपि साहित्यिक पत्रिकाएं मुख्य रूप से प्रिंट माध्यम पर आधारित होती हैं, लेकिन उनकी सफलता के लिए केवल छपाई पर्याप्त नहीं है। पत्रिकाओं का ‘कंटेंट’ (विषय-वस्तु) उत्कृष्ट होना चाहिए।
लघु पत्रिकाएं और कार्टून विधा पर डॉ. देवेन्द्र शर्मा ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया कि लघु पत्रिकाएं कार्टून विधा को और अधिक रोचक बनाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो सकती हैं। उन्होंने ‘जुरासिक पार्क’ जैसे वैश्विक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कैसे दृश्यात्मक प्रस्तुति पाठकों को गहराई से जोड़ती है और उसे कुड़ासिक पार्क बनाकर प्रस्तुत करती है।
प्रश्न के दौरान इस बात पर भी सहमति बनी कि कार्टून विधा के माध्यम से कालजयी पात्र गढ़े जा सकते हैं। इस संदर्भ में ‘शंकर पिल्लई’ को याद किया गया, जिन्हें ‘भारतीय कार्टून जगत का पितामह’ माना जाता है।
संपादन और व्यंग्य चर्चा में स्वदेश (फूलबगिया) और वाजपेयी जी के संपादन कौशल का उल्लेख करते हुए बताया गया कि एक संपादक के लिए यह तय करना कितना चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण होता है कि कब और कैसे व्यंग्य चित्रों का प्रयोग किया जाए।यह कह सकते हैं कि यह सत्र केवल हास्य-परिहास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने साहित्य के गंभीर धरातल पर कार्टून और व्यंग्य की प्रासंगिकता को नए सिरे से स्थापित किया। डॉ. विकास दवे के कुशल संयोजन और डॉ. देवेन्द्र शर्मा के प्रखर विचारों ने उपस्थित साहित्य प्रेमियों को एक नई दृष्टि प्रदान की।
तृतीय सत्र
संपादकों द्वारा अपने पत्र पत्रिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख: साथ ही प्रसार संख्या विषय पर एक ऐसा सत्र संपन्न हुआ जहां इंदौर शहर एवं शहर से बाहर से पधारे पत्रकारों एवं संपादकों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिला। जिनमें उपस्थित रहे, गोपाल माहेश्वरी जी- संपादक देवपुत्र, नरेंद्र दीपक जी- पहला अंतरा, मनोज जी – समागम, संदीप ‘सृजन’ जी- अभिनव शब्द प्रवाह एवं राजेश रावल ‘सुशील’ लोकभाषा की राष्ट्रीय पत्रिका “संस्कृति संवाद” से।
चतुर्थ सत्र सारंग क्षीरसागर, चित्रांकन विधा से एवं सोनाली सिंह नरगुंदे जी पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, विभागाध्यक्ष की उपस्थिति में प्रारंभ हुआ विषय था ‘कला और साहित्य का संगम’ साहित्य पत्र पत्रिकाओं में चित्रांकन का सौंदर्य। सत्र में सोनाली जी ने जहाँ कला के सौंदर्यात्मक पक्ष को सामने रखा, वहीं सारंग जी ने तकनीक और अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डाला। सारंग जी ने कहा चित्रकला केवल रंगों का मेल नहीं है, बल्कि यह मौन शब्दों की एक सशक्त भाषा है।
चित्रांकन विधा पर चर्चा के दौरान इस सत्र में रेखाचित्र, छायांकन और विभिन्न माध्यमों (जैसे पेंसिल और वॉटरकलर) के प्रयोग पर विस्तृत चर्चा की गई। मंच पर चित्रांकन विधा के विभिन्न आयामों को प्रदर्शित किया गया, जिसमें कृतियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के दृश्यों को जीवंत किया।
सोनाली जी के सवाल और सारंग जी के सटीक जवाब का सिलसिला निरंतर चल रहा था कि श्रोतागण में से डॉ दवे जी ने एक सवाल किया संपादक से चित्रकार की अपेक्षा क्या है?
सारंग जी ने जवाब में कहा सबसे महत्वपूर्ण है समय। ‘समय सीमा’ साथ ही उचित पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए।
पंचम सत्र में
विषय: ‘अस्तित्व का संकट’ घटती प्रसार संख्या एक वैश्विक चिंता: समाधान क्या?
ईश्वर शर्मा जी एवं लोकेंद्र सिंह राजपूत जी ने विषय पर अपने विचार रखते हुए ईश्वर शर्मा जी ने अपने चुटीले अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को बड़ी ही सहजता से सभी के समक्ष रखा। उन्होंने बताया एआई पर कॉपीराइट्स जैसी कोई समस्या नहीं होती है। साथ ही तकनीक से डरने और घबराने की भी जरूरत नहीं है। बस उसको उपयोग करने का तरीका जो है उसे सीखने की आवश्यकता है। जिससे हमारा काम आसान हो ना कि हम खुद उसके जाल में फस जाए।
साथ ही लोकेंद्र सिंह राजपूत जी ने भी बताया कि मैं खुद हार्ड कॉपी के साथ पढ़ने में रुचि रखने वाला व्यक्ति हूं किंतु समय के बदलाव के साथ हममें भी बदलाव होना चाहिए। बस मशीन या तकनीक हमारा उपयोग न करें हमें उनके उपयोग के साथ में आगे बढ़ना है।
अतिथियां के करकमलों से जागृत मालवा पत्रिका का विमोचन हुआ।
इस सत्र के बाद में दो सत्र और संपन्न हुए जहां पर पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का संक्षिप्त विवरण मंच पर प्रस्तुत किया।
द्वितीय दिवस, प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता: शोभा जैन के साथ मंच पर सूर्यकांत नागर, शुभदा पांडे, प्रेम जनमेजय, राहुल अवस्थी, संजीव सिन्हा रहे।
द्वितीय दिवस का शुभारंभ भी दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ
सत्र का मुख्य विषय ‘छपास की भूख’ (प्रसिद्धि की लालसा) के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म (नैतिकता और चयन की शुचिता) से विमुख होने पर तीखा प्रहार था।
शोभा जैन ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। ‘छपास की भूख’ को एक ‘मानवीय उत्कंठा’ के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार: निराला और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान रचनाकारों के लिए ‘छपास’ एक सृजनात्मक संतोष का विषय था, जो आज के लेखकों में केवल संख्यात्मक वृद्धि तक सीमित रह गया है।
‘सरस्वती’ (1904) जैसी पत्रिकाओं और महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन आदर्शों को आज के संपादकों के लिए मार्गदर्शक बताया, जिन्होंने निराला की ‘जूही की कली’ जैसी कालजयी रचना को भी परिष्कृत करने का साहस दिखाया था। ‘धर्मयुग’ और धर्मवीर भारती का उदाहरण दिया गया, जिन्होंने 1980 में 5,07,000 प्रतियों का कीर्तिमान रचा था, जो गुणवत्ता और लोकप्रियता के समन्वय का प्रतीक है। संपादकीय कटाक्ष करते हुए शोभा जैन ने उन संपादकों पर कड़ा प्रहार किया जो साहित्य के स्तर को गिराकर महिलाओं के अंतरंग विषयों या सतही सामग्री को स्थान देते हैं। उन्होंने संपादकों को ‘आत्म-अवलोकन’ की सलाह दी। उन्होंने रचनाकारों से अपनी रचना भेजने से पहले पत्रिका की प्रकृति को समझने और एक साथ दर्जनों संपादकों को रचना भेजने की प्रवृत्ति से बचने का आग्रह किया गया।
संपादकों से तीन मुख्य आग्रह भी किये। एक सफल और धर्मनिष्ठ संपादक के लिए तीन गुणों को अनिवार्य बताया : –
• बहुश्रुत होना: व्यापक जानकारी और सुनने की क्षमता।
• बहुपठित होना: गहन अध्ययन और साहित्य की समझ।
• सृजकों से अधिक समृद्ध होना: बौद्धिक और भाषाई स्तर पर रचनाकार से श्रेष्ठ होना ताकि वे रचना का सही मूल्यांकन और परिष्कार कर सकें।
अंत में यही कहकर अपनी बात समाप्त की कि यदि ‘संपादकीय पन्ना’ साहित्य का दर्पण है, तो उसे ‘संप्रेषणीय’ और ‘शुद्ध’ होना चाहिए। संपादकों को आपसी वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर साहित्य की गुणवत्ता और नियमितता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
प्रेम जनमेजय जी ने शोभा जैन जी के विचारों पर बात करते हुए संपादन कला पर अपनी बेबाक राय रखी।
उन्होंने कहा कि सभी संपादकों को एक ही कतार में खड़ा करना उचित नहीं है। हर संपादक की अपनी दृष्टि और कार्यशैली होती है। उन्होंने ‘छपास की भूख’ (छपने की तीव्र इच्छा) पर प्रहार करते हुए कहा कि इसे भूख नहीं, बल्कि ‘अभिव्यक्ति का अतिरेक’ कहना चाहिए।
संपादक उत्तरदायित्व पर कहा: एक अच्छे संपादक का कार्य केवल रचना छापना नहीं, बल्कि अच्छे लेखक और जागरूक पाठक तैयार करना है। उन्होंने जोर दिया कि संपादक को तटस्थ होना चाहिए, स्वार्थी नहीं। व्यंग्य की परंपरा पर उन्होंने कबीर से व्यंग्य की धारा के प्रारंभ होने की बात कही और तुलसीदास के ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ व ‘अंगद-रावण संवाद’ को व्यंग्यात्मक संवाद के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखने की सलाह भी दी।उन्होंने लेखकों में बढ़ती ‘आत्ममुग्धता’ और ‘सम्मान-लिप्सा’ पर चिंता व्यक्त की।
सूर्यकांत नागर जी- मनस्वी पत्रिका ने कहा कि बड़े से बड़े साहित्यकार भी आज ‘येन-केन-प्रकारेण’ छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस ‘छपास की भूख’ से बचना चाहिए। उन्होंने एक संस्मरण साझा किया कि कैसे एक बार शरद जोशी जी और कमलेश्वर जी ने नागर जी से रचना मांगी थी, लेकिन रचना पसंद न आने पर उसे वापस लौटा दिया था। यह एक संपादक की ईमानदारी का परिचायक है। उन्होंने कहा कि मैंने भी उसे सहजता से स्वीकार किया, जरूर मेरी ही रचना कमजोर होगी और प्रारंभिक चरण में यह सभी के साथ होता है।
उन्होंने लेखकों के लिए सुझाव दिया कि लेखक के लिए ‘धैर्य’ सबसे बड़ी पूंजी है और ‘जल्दबाजी’ सबसे बड़ी कमजोरी। पहले बाहर की दुनिया को समझो, पढ़ो, फिर मूल्यांकन करो। समझ से पहले समझाना गलत है।
संपादक की गरिमा: संपादक को अपने अहंकार से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि से कार्य करना चाहिए। यदि किसी की रचना अस्वीकार करनी हो, तो उसे सीधे मना करने के बजाय सुझाव देना चाहिए कि ‘कुछ और लिखकर भेजें, इस विषय पर गहराई की कमी है।’ हर बात कहने का एक सलीका होता है।
प्रथम सत्र की संपन्नता के बाद आने वाले सत्रो में देशभर से पधारे पत्र पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे उन्हीं में से कुछ संपादकों ने अपनी पत्रिका के बारे में बात की।
राहुल अवस्थी जी ने स्पष्ट किया कि एक संपादक को संबंधित विधा और विषय से पूरी तरह परिचित होना चाहिए।
शुभदा पांडे, संजीव सिंहा, राहुल जी , किशोर जी आप सभी ने अपनी पत्रिकाओं के बारे में संक्षेप में बताया।
आर एन आई पंजीयन दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क डाक पंजीयन और परेशान से जुड़ी जिज्ञासाएं और समाधान एवं अर्थ के बिना सब व्यर्थ विषय पर मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने प्रेस सेवा पोर्टल पर अपनी प्रोफाइल बनाने से लेकर आगे की कार्यवाही तक छोटी से छोटी जानकारी बिंदुवार साझा की।
इसके बाद फिर से एक सत्र पत्रकार एवं संपादक बंधुओं के लिए आयोजित हुआ क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में पत्र -पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे और देश के कोने-कोने से पधारे सभी पत्रकार, संपादक बंधु-भगिनी मंच से अपने पत्र पत्रिकाओं के बारे में संक्षिप्त में अपनी बात लोगों तक पहुंचा सके इस हेतु हर व्यक्ति को समान अवसर मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति परिषद, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित ‘वीणा की वाणी’ के मंच से प्राप्त हुआ।
उद्यापन सत्र में
निरोगधाम पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे, डॉ स्वाति तिवारी, संचालक अमन व्यास एवं मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे उपस्थित रहे।
सुश्री सोनी सुगंधा ने संपादक धर्म पर ‘नमन मेरा शत-शत नमन है’ गीत प्रस्तुत किया।
तत्पश्चात कांता राय एवं सुनीता प्रकाश की लघुकथा वृत्त का विमोचन हुआ। साहित्य अकादमी जब भी किसी साहित्यिक अनुष्ठान को आयोजित करती है तो इस आयोजन में उपस्थित सबसे वरिष्ठ साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है। आज भी ‘वीणा की वाणी’ के मंच से सभी के आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी का सम्मान इस मंच पर हुआ।
डॉ स्वाति तिवारी ने सिहावलोकन प्रस्तुत किया। निरोग धाम के संपादक अशोक पांडे जी ने पाथेय प्रदान किया।
और अंत यानी की नए शुभारंभ में विदाई पाथेय मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक
डॉ विकास दवे ने दिया।