देर शाम चौथे सत्र में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ. आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले सहित मीरा तिवारी आदि ने अपने भाव व्यक्त किए। इस महती आयोजन में अकादमी से सम्बद्ध बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक और प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका डॉ. मीनू पाण्डेय ‘नयन’, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ आदि की उपस्थिति रही।
◾देर शाम हुआ कवि सम्मेलन
“आगि लगै ऐसे फागुन में” – बी. एल. गौड़
आगि लगै ऐसे फागुन में
आगि लगै ऐसे फागुन में
बुढ़ऊ तक बौरावें
बिना बात के खांसी खांसें
बिना बात मठरावें।
देवर की तौ बात कछू ना
जेठन लाज गँवाई
कौनी मार बगल ते निकरें
ऐसी का बेहाई।
अनुज बधु कन्या सम होती
तुलसी बात बताई
पर इन सबके कूढ मगज कू
ना भाई चौपाई
अब तुम्ही बताओ सजन हमारे
कैसे गात बचावें।
मेरौ गोरौ मुखड़ौ है तौ
मेरौ का है दोस
देवर मलें गुलाल गालन पै
भरि भरि पूरौ जोस।
मैं तौ करूँ बहुत बरजोरी
पर वे हट ना छोड़ें
भाभी से देवर कौ रिस्ता
जनम जनम से जोड़ें
आंखि तरेरें सासू माजी
का उनकू बतलावें।
होरी तौ होरी है सासू
या कौ बुरौ न मानों
जे शरीर तौ माटी कौ है
माटी में मिल जानों।
या माटी के पांच तत्व
तौ माटी में मिल जाने
कौन जनम में कौन मिलैगौ
जे ईश्वर ही जाने
प्रेम तत्व ही ईश तत्व है
कबिरा जी समझावें।
“मंज़िल तक कैसे पहुँचें” – बी. एल. गौड़
“मंज़िल तक कैसे पहुँचें”
हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
तुम तो ऐसे बिछुड़े जैसे
मेले में खोया बालक,
अक्सर मिलता कभी नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
गर तुम केवल रूठे होते
तो तुम्हें मना लाते,
हम किंकर्तव्यविमूढ़ हुए
क्योंकि तुम्हारा
कोई पता नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
राहों में धूल बहुत है
पांवों में छाले भी हैं,
फिर भी चलना पड़ता है
क्योंकि ठहरना
अब कोई बात नहीं,
पर यह पीड़ा तब होती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
सपनों की दीपशिखाएँ
अब भी जलती रहती हैं,
मन का मंदिर खाली है
फिर भी आशा
पूरी तरह से राख नहीं,
पर यह विरह तभी गहराता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
याद तुम्हारी आती जैसे
साँझ ढले घर लौटे पंछी,
लेकिन मेरे आँगन में
अब वैसी कोई
मधुर बरसात नहीं,
और यह सूना सा लगता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
फिर भी मन को समझाते हैं
धैर्य धरा का धर लेते हैं,
शायद फिर मिल जाओ तुम
यह आशा भी
पूरी तरह से समाप्त नहीं,
पर मिलन कठिन हो जाता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
इस जीवन की हर डगर पर
एक भरोसा रख लेते हैं,
शायद फिर से साथ चलो
यह सपना भी
पूरी तरह से मिथ्या नहीं,
पर मंज़िल दूर ही रहती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
रवीन्द्रनाथ टैगोर : साहित्य, चेतना और मानवीय संवेदना का विराट स्वर
जब हम रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम लेते हैं, तो एक पूरी सदी की सांस्कृतिक चेतना मानो हमारे सामने सजीव हो उठती है। वे केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि दार्शनिक, चित्रकार, संगीतकार, उपन्यासकार, शिक्षाशास्त्री और महान मानवतावादी भी थे। उनकी रचनाएँ प्रकृति और मनुष्य के गहरे संबंध को जिस संवेदनशीलता से स्पर्श करती हैं, वह किसी मंत्र की तरह आज भी जीवित और प्रासंगिक प्रतीत होती हैं।
टैगोर की कविता में केवल शब्द नहीं होते; वहाँ एक सम्पूर्ण ब्रह्मांड गूँजता है—प्रेम का, मुक्ति का और आत्मबोध का। गीतांजलि के पदों में जो पीड़ा है, वह मानवीय करुणा की गहराइयों से निकलती है, और जो उल्लास है, वह एक सार्वभौमिक आनंद की पुकार बन जाता है।
“Where the mind is without fear and the head is held high…”
यह पंक्ति केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक युग की दिशा है।
आज जब दुनिया तकनीकी उथल-पुथल और बढ़ती संवेदनहीनता की गिरफ्त में है, टैगोर हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कल्पना, उसकी करुणा और उसकी आत्मा की स्वतंत्रता है। वे जिस शिक्षा की कल्पना करते थे, वह केवल ज्ञान का संकलन नहीं, बल्कि जीवन को समझने की प्रक्रिया थी।
शांतिनिकेतन केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं था; वह एक विचार था—खुली हवा में, खुले मन से और रचनात्मकता के साथ सीखने का।
टैगोर : शब्दों से परे एक चित्रकार
टैगोर की चित्रकला उतनी ही मौलिक और मार्मिक है जितनी उनकी कविता। जीवन के उत्तरार्ध में, जब कभी-कभी शब्द मौन हो जाते थे, तब उनके रंग बोलने लगते थे। उनकी पेंटिंग्स में रेखाएँ अक्सर स्पष्ट नहीं होतीं और चेहरों की आकृतियाँ अमूर्त होती हैं, फिर भी उनमें भाव, अनुभूति और रहस्य की उपस्थिति अत्यंत स्पष्ट दिखाई देती है।
टैगोर ने कला को एक नई परिभाषा दी—
“जहाँ शब्द थक जाते हैं, वहाँ रंग बोलने लगते हैं।”
उनकी चित्रशैली आधुनिक भी थी और स्वदेशी भी। उसमें परंपरा और प्रयोग का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।
राष्ट्र, मनुष्य और चेतना : टैगोर का राष्ट्रवाद
टैगोर का राष्ट्रवाद सीमाओं का राष्ट्रवाद नहीं था, बल्कि मानवता का राष्ट्रवाद था।
उन्होंने “जन गण मन” जैसा राष्ट्रगान रचकर देश को एकता का स्वप्न दिया और “एकला चलो रे” के माध्यम से आत्मबल की मशाल थमाई। वे महात्मा गांधी के निकट थे, लेकिन अंधराष्ट्रवाद के आलोचक भी रहे।
उन्होंने “नेशन” और “स्वराज” की अवधारणाओं पर गंभीर चिंतन करते हुए यह स्पष्ट किया कि राष्ट्र की असली पहचान उसकी मानवता में निहित होती है—करुणा, न्याय और विचारशीलता से भरी हुई मानवता में।
आज के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में टैगोर की यह दृष्टि और भी अधिक प्रासंगिक हो उठती है, जहाँ कई बार विचारों की जगह नारों ने ले ली है।
टैगोर : एक व्यक्तिगत अनुभव
टैगोर को पढ़ना मेरे लिए हर बार एक आत्मीय यात्रा जैसा अनुभव होता है।
जब मैं अपने उपन्यासों को रचने बैठती हूँ, तो उनके शब्द जैसे मेरे भीतर किसी बंद द्वार को खोल देते हैं। “स्त्रीर पत्र” की मृणाल आज भी मेरे समय की आवाज़ बनकर उभरती है।
जब गीतांजलि की कोई पंक्ति मन में गूँजती है, तो लगता है कि मैं केवल पढ़ नहीं रही हूँ, बल्कि शब्दों के उस अदृश्य ईश्वर से संवाद कर रही हूँ, जो साहित्य के भीतर जीवित रहता है।
शारदा देवी : एक कवि की माँ
जब संसार ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘गुरुदेव’, ‘कवि’, ‘गीतकार’, ‘द्रष्टा’ और ‘युगपुरुष’ के रूप में देखा, तब बहुत कम लोगों ने उस स्त्री के बारे में सोचा जिसकी गोद ने इस युगनायक को जन्म दिया। वह थीं—माँ शारदा देवी।
माँ : वह स्त्री जो दिखती नहीं थीं, पर थीं
शारदा देवी, देबेन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी थीं। देबेन्द्रनाथ ब्रह्म समाज के प्रमुख विचारकों में से थे। उनके घर की आध्यात्मिकता, सादगी और अनुशासित वातावरण ने रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्व और मानस को गहराई से प्रभावित किया।
शारदा देवी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं थीं, न ही वे किसी रचनात्मक मंच पर दिखाई देती थीं। किंतु उनके शांत, अनुशासित और धर्मनिष्ठ जीवन ने ऐसा संस्कारित वातावरण निर्मित किया, जिसमें रवीन्द्रनाथ जैसे विराट रचनाकार का बचपन पनपा।
घर का मौन वृक्ष
शारदा देवी आडंबर और गहनों से दूर रहने वाली, परिवार-केन्द्रित और सरल स्वभाव की महिला थीं। उनकी गोद वह पहली पाठशाला थी जहाँ टैगोर ने संवेदनाओं का पहला पाठ सीखा।
रवीन्द्रनाथ ने अपनी माँ के बारे में बहुत कम लिखा—शायद इसलिए कि उन्होंने उन्हें बहुत कम देखा, पर उनसे बहुत कुछ पाया।
जब मौन गूँजने लगा
1875 में, जब रवीन्द्रनाथ मात्र चौदह वर्ष के थे, शारदा देवी का निधन हो गया। घर में किसी ने उन्हें स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया, लेकिन बालक-मन सब समझ गया।
अपनी आत्मकथा Chhelebela (My Boyhood Days) में उन्होंने उस क्षण को याद करते हुए लिखा—
“एक दिन वह उठीं नहीं। फिर कभी नहीं उठीं। और मैं, जो उनके पास जाने से डरता था, अब हर समय वहीं बैठा रहा…”
यह वियोग और यह मौन टैगोर की रचनाओं में जीवनभर किसी अदृश्य ध्वनि की तरह गूँजता रहा।
गीतों में माँ की परछाईं
टैगोर के गीतों और कविताओं में कई बार करुणा, कोमलता और मातृवत् आलिंगन की अनुभूति होती है। उनकी रचनाओं में एक ऐसी अनुपस्थित उपस्थिति दिखाई देती है, जो मानो शारदा देवी की छाया हो।
“I seem to have loved you in numberless forms, numberless times…”
(The Gardener)
यह “तुम”—कभी ईश्वर, कभी प्रकृति और शायद कभी माँ भी हो सकती हैं।
अनुपस्थिति में उपस्थिति
शारदा देवी की मृत्यु के बाद टैगोर की रचनाओं में एक गहरा मौन दिखाई देता है। किंतु वही मौन शब्दों में बदलकर एक महान कवि को जन्म देता है।
शारदा देवी प्रसिद्धि नहीं देख सकीं, लेकिन टैगोर की लेखनी में जो करुणा, आत्मीयता और गहराई है, वह उनके संस्कारों से ही उपजी प्रतीत होती है।
वे एक साधारण भारतीय स्त्री थीं, किंतु उनकी मौन उपस्थिति ने एक असाधारण कवि को जन्म दिया। वे उस घर की दीवार थीं, जिन पर विश्व साहित्य के रंग चढ़े। उनकी गोद वह पहली भूमि थी जहाँ गुरुदेव के व्यक्तित्व का बीज पड़ा।
टैगोर की स्त्री पात्राएँ : संवेदना और स्वाधीनता की विविध दिशाएँ
टैगोर की नायिकाएँ केवल कथा-पात्र नहीं हैं; वे स्त्री-चेतना की गहरी अभिव्यक्तियाँ हैं। उनकी स्त्रियाँ चार दिशाओं की तरह हैं—हर दिशा अपने भीतर एक अलग कथा और अलग संघर्ष समेटे हुए।
चारुलता : निस्पृह आँखों का मौन संवाद
“नष्टनीड़” की चारुलता एक अभिजात बंगाली गृहिणी है, जो अपने पति की व्यस्तता और उपेक्षा के बीच गहरे अकेलेपन से गुजरती है। वह किताबों से बातें करती है और मानसिक संगिनी खोजती है।
टैगोर ने उसकी आँखों को निस्पृह कहा है, पर वे निष्क्रिय नहीं हैं। उनमें आत्ममंथन और गहरी समझ की चमक है। चारुलता की चुप्पी दरअसल उस समय की स्त्रियों की विवशता का कलात्मक बयान है।
बिमला : भीतर का आत्म–संघर्ष
“घरे–बाइरे” की बिमला पत्नी, विचारशील स्त्री और देशभक्त—इन तीनों भूमिकाओं के बीच उलझी हुई है।
उसके भीतर दो शक्तियाँ टकराती हैं—पत्नी-धर्म और राष्ट्र-धर्म। वह अपने पति के आधुनिक विचारों और एक क्रांतिकारी के आकर्षण के बीच फँस जाती है। टैगोर यहाँ केवल प्रेम-त्रिकोण नहीं रचते, बल्कि यह दिखाते हैं कि स्त्री का मन भी विचारधाराओं से निर्मित होता है।
मृणाल : विद्रोही आत्मा
“स्त्रीर पत्र” की मृणाल टैगोर की सबसे मुखर और विद्रोही नायिका है। वह परंपरा के साँचे में ढलने से इनकार करती है।
वह लिखती है—
“मैं घर नहीं छोड़ रही, मैं उस जाल को तोड़ रही हूँ जिसमें स्त्रियाँ साँस नहीं ले सकतीं।”
उसका विद्रोह भीतर से उठता है—सम्मान की कमी से, आत्मसम्मान की पीड़ा से और स्वतंत्रता की आकांक्षा से।
ललिता : स्वच्छंद और निर्णयशील
“नौकाडूबी” की ललिता एक ऐसी स्त्री है जो केवल विरोध नहीं करती, बल्कि निर्णय लेती है। सामाजिक बंधनों और परिस्थितियों की उलझनों के बीच वह अपनी बुद्धि और साहस से रास्ता खोजती है।
उसके व्यक्तित्व में आधुनिक स्त्री की छवि दिखाई देती है—संस्कारों को स्वीकार करते हुए भी स्वतंत्रता का चयन करने वाली स्त्री।
अन्य उल्लेखनीय स्त्री पात्र
कमला (नष्टनीड़)
कमला प्रेम और त्याग के द्वंद्व में उलझी स्त्री है। वह घर को बचाने की कोशिश करती है, लेकिन भीतर से टूटती चली जाती है।
हेमनलिनी
वह बुद्धि, संस्कृति और सौंदर्य का प्रतीक है। उसका प्रेम स्थिर है और उसकी गरिमा उसे एक उदात्त नायिका बना देती है।
प्रकृति (प्रकृति और साधु)
प्रकृति अपराधबोध से घिरी एक भीलनी है, जो एक साधु से मिलकर आत्मशुद्धि और प्रेम के मार्ग को चुनती है।
चित्रांगदा
मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा योद्धा भी है और स्त्री भी। अर्जुन से प्रेम करते हुए वह अंततः अपनी असली पहचान के साथ खड़ी होकर कहती है—
“मुझे वैसे ही स्वीकार करो जैसी मैं हूँ।”
अनुराधा (शेषेर कविता)
अनुराधा आधुनिक शिक्षित स्त्री का प्रतीक है। वह भावनाओं में बहती नहीं, बल्कि प्रेम में संतुलन और गरिमा बनाए रखती है।
टैगोर की स्त्रियाँ सचमुच चार दिशाओं की तरह हैं। हर नायिका अपने भीतर एक अलग कहानी, एक अलग संघर्ष और एक अलग प्रकाश लिए हुए है। यही कारण है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य केवल एक युग की धरोहर नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना का अनंत विस्तार है।
हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम
हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम
सूरज के प्रसाद
भाषाविद्
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय
ईमेल पता : [email protected]
सारांश (Abstract):
इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) ने वैश्विक समाज को जिस तीव्र गति से परिवर्तित किया है, उसने जनसंचार माध्यमों (Mass Communication Media) के स्वरूप, भाषा, सामग्री और प्रभाव क्षेत्र को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत शोध पत्र “हिंदी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम” हिंदी भाषा की सूचना-प्रौद्योगिकी में भागीदारी और उसकी संभावनाओं की व्यापक समीक्षा करता है। लेख में दर्शाया गया है कि कैसे सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक—प्रौद्योगिकी (Technology), सूचना (Information) और भाषा (Language)—परस्पर जुड़कर जनसंचार की दिशा और दशा को बदल रहे हैं।
इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि कंप्यूटर, इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब जैसे उपकरणों की सहायता से सूचना का त्वरित संप्रेषण संभव हुआ है, जिसमें भाषा की भूमिका केंद्रीय है। लेख यह भी रेखांकित करता है कि हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी में समाविष्ट करने हेतु विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हुए हैं, जैसे देवनागरी आधारित की-बोर्ड, इंस्टी कोड, यूनिकोड, भाषायी सॉफ्टवेयर और वेब आधारित टूल्स का विकास। हिंदी भाषा को कंप्यूटर और इंटरनेट के साथ जोड़ने की यह प्रक्रिया, न केवल भारत के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी के विस्तार में सहायक सिद्ध हो रही है।
वेबसाइट निर्माण, ई-मेल सेवा, ऑनलाइन भाषा शिक्षण सॉफ्टवेयर, हिंदी आधारित चैट और ब्राउज़र सिस्टम जैसे अनेक उपकरणों के माध्यम से हिंदी को डिजिटल माध्यम में सशक्त बनाया गया है। शोध यह प्रतिपादित करता है कि यदि भाषा की सुबोधता, सरलता और ग्राह्यता को प्राथमिकता दी जाए, तो हिंदी न केवल सूचना संप्रेषण का सशक्त माध्यम बन सकती है, बल्कि वैश्विक संवाद की भाषा भी बन सकती है। लेख का निष्कर्ष यह है कि डिजिटल मीडिया में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है और भविष्य में हिंदी विश्व की प्रमुख सूचना भाषा बनने की क्षमता रखती है।
बीज शब्द (Keywords):
हिंदी, सूचना प्रौद्योगिकी, जनसंचार, कंप्यूटर, इंटरनेट, भाषा शैली, यूनिकोड, देवनागरी, वेबसाइट, वेब सामग्री, डिजिटल मीडिया, तकनीकी भाषा
इक्कीसवीं सदी में मानव समाज में एक ऐसी प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ, जिसने देखते ही देखते हमारे निजी, सामाजिक-सरकारी और व्यावसायिक जीवन में एक आक्रामक की तरह प्रवेश किया और निरंतर परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति के साथ वर्तमान समाज को सूचना समाज में परिवर्तित कर दिया। यूनेस्को की व्याख्या के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी एक शास्त्रीय, तकनीकी, प्रबंधकीय एवं अभियांत्रिकी शाखा है, जो सूचनाओं के तंत्र को विकसित करके उसका प्रयोग कंप्यूटर के माध्यम से करते हुए मानव और मशीन के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को सुदृढ़ और सबल बनाती है। दूसरे शब्दों में सूचना प्रौद्योगिकी कंप्यूटर, संचार और इलैक्ट्रॉनिकी का वह समन्वित रूप है, जिसमें सूचना प्रणाली के विशिष्ट आयामों और उसकी प्रासंगिकता की खोज के द्वारा सूचना उत्पादन, विश्लेषण, भंडारण, संचरण आदि कार्य किए जाते हैं, जिसके महत्त्वपूर्ण अंग हैं- सूक्ष्म संसाधक, डेटा भंडारण तंत्र और डेटा संचरण तत्त्व।
सूचना प्रौद्योगिकी एक सरल तंत्र है, जो तकनीकी उपकरणों के सहारे सूचनाओं का संकलन, प्रक्रिया एवं संप्रेषण करता है। सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक हैं-प्रौद्योगिकी, सूचना और भाषा। इस प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण भूमिका है कंप्यूटर प्रौद्योगिकी की। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी ‘‘सूचना संसाधन और संप्रेषण अभियांत्रिकी’’ की सबसे ज्यादा कारगर प्रौद्योगिकी है। इससे जितनी बड़ी क्रांति हमारे सामाजिक जीवन में आई है उससे कहीं बड़ी क्रांति सूचना प्रौद्योगिकी में आई है। कंप्यूटर हमारे निजी, सामाजिक, सरकारी, व्यावसायिक तथा वाणिज्यिक क्रिया-कलापों में हमें अनंत सुविधाएँ और लाभ प्रदान करता है और हमारा श्रम और समय बचाने के साथ-साथ अद्यतन सूचनाओं के प्रति हमें सजग रखता है।
कंप्यूटर का विकास बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक में सन् 1935 में चार्ल्स बेवेज द्वारा बनाए गए ‘नालिटिकल एंजिन’ से हुआ, जिसकी कार्यप्रणाली बहुत-कुछ आज के आधुनिक कंप्यूटर जैसी ही थी। सन् 1944 में हावर्ड विश्वविद्यालय द्वारा ‘‘आई बी एम’’ और यू एन नेवी’’ के सहयोग से मार्क-1 नामक यंत्र का निर्माण हुआ। इस क्रम में 1946 में कंप्यूटर युग का सूत्रपात हुआ जो सन् 1955 से 1971 तक गति और कार्यक्षमता की दृष्टि से विकसित हुआ और उसमें नए आयाम भी सम्मिलित होते गए। आज कंप्यूटर आकार में छोटा और वजन में हल्का होकर विशाल मेन फ्रेम से छोटा होकर टेबलटॉप, लैपटॉप, पामटॉप, रिस्टटॉप और जेब में सिमट गया है। वहीं कंप्यूटर बहुप्रयोजनी भी हो गया है। इससे अब न केवल टाइपिंग और मुद्रण का काम ले सकते हैं बल्कि फोन, फैक्स कर सकते हैं, फोटो खींच सकते हैं, गाना सुन सकते हैं, रिकॉर्डिंग कर सकते हैं, वीडियो चलचित्र देख सकते हैं, केल्कुलेटर, घड़ी, डायरी का काम ले सकते हैं और इंटरनेट व वेबसाइट्स का उपयोग करके सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, खरीदारी कर सकते हैं, डाक्टरी सलाह ले सकते हैं, शिक्षण प्रशिक्षण दे-ले सकते हैं, पूरी दुनिया में विभिन्न स्थानों पर बैठे लोग कांफ्रेसिंग कर सकते हैं और ज्ञान-विज्ञान की नई-नई जानकारी मिनटों में प्राप्त कर सकते हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के संदर्भ में कंप्यूटर के उपकरण हैं- इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब। सूचना और संचार के क्षेत्र में दूरसंचार, संचार माध्यम, कंप्यूटर, कंप्यूटर-विषयक क्षेत्र आदि प्रमुख क्षेत्रों का विकास 20वीं सदी के अंतिम दशक में अति तीव्र गति से हुआ है। इन सबमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इंटरनेट व वेबसाइट का प्रवेश है। यह एक ऐसी प्रौद्योगिकी है जिसमें विश्वव्यापी नेटवर्क में हजारों कंप्यूटरों को एक कंप्यूटर के साथ जोड़ा गया है।
इस संदर्भ में प्रौद्योगिकी से तात्पर्य उन उपकरणों से है जो दृश्य-श्रव्य रूप में सूचना को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने के माध्यम होते हैं- इनमें कंप्यूटर, इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब, मोडेम, स्केनर, वीडियो कैमरा, साउंड कार्ड, टेलीफोन, प्रिंटर, सर्वर, सैटेलाइट आदि शामिल हैं। आज इस प्रौद्योगिकी में बहुत तेजी से विकास हो रहा है और दो से अधिक प्रौद्योगिकी युक्तियों को जोड़ने से इंटरनेट को सीधे टीवी के पर्दे पर देखना, मोबाइल फोन पर इंटरनेट की सुविधा और वायरलेस प्रौद्योगिकी से केबल के बिना इंटरनेट चलाना संभव हो गया है। इस प्रकार नवीनतम सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के सम्मिश्रण से संसाधनों का नेटवर्क, सामाजिक जानकारी और बुद्धि के सभी प्राप्य रूपों की वृद्धि के असीम अवसर पैदा हुए है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब में विभिन्न स्तरों पर जो परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति हुई है इससे न केवल आम जनमानस को प्रेरणा मिली है बल्कि व्यापारियों उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, अधिकारी वर्ग और यहाँ तक कि राजनीतिज्ञों का भी ध्यान आकर्षित हुआ है। ई-मेल, ई-कॉमर्स, ई-गर्वनेंस, ई-ऐजुकेशन, ई-कम्यूनिटीज़, डाटा-प्रबंधन सूचना पुनः प्राप्ति आदि के माध्यम से इसने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर सूचना प्रौद्योगिकी को एक नवक्रांति के रूप में स्थापित कर दिया है।
सूचना प्रौद्योगिकी का दूसरा घटक है-सूचना। सूचना से तात्पर्य उस कथ्य या सामग्री से है जो इंटरनेट या वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से उपलब्ध होती है। ये सूचनाएं दो प्रकार की होती हैं- सामान्य सूचनाएँ और ज्ञानात्मक सूचनाएँ। सामान्य सूचनाएँ प्रायः तात्कालिक महत्व की होती हैं, जैसे व्यापारिक, व्यावसायिक, राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सूचनाएँ। ज्ञानात्मक सूचनाओं का संबंध ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों या अनुशासनों से होता है। ज्ञानात्मक सूचनाएँ अधिक स्थायी प्रकृति की होती हैं और उनका उपयोग प्रायः संदर्भ गं्रथों की तरह होता है, जैसे ज्ञान-विज्ञान संबंधी जानकारी, शब्दकोश, विश्वकोश, थिसॉरस, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, शिक्षण-प्रशिक्षण संबंधी सामग्री आदि।
स्थायित्व की दृष्टि से भी सूचनाएँ दो प्रकार की होती हैं- स्थिर, और परिवर्तनशील। स्थिर सूचनाएँ काफी समय तक इंटरनेट-वर्ल्ड वाइड वेब पर उसी रूप में बनी रहती हैं। उनमें जल्दी-जल्दी या कम समयांतराल पर बार-बार परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती है या बहुत कम आवश्यकता होती है, जैसे- साहित्य, ज्ञान-विज्ञान की सामग्री, इतिहास, विश्वकोश, शब्दकोश, शिक्षण-प्रशिक्षण सामग्री आदि से संबंधित जानकारी। परिवर्तनशील सूचनाएँ वे हैं, जिन्हें हर कुछ मिनटों, घंटों, दिनों या महीनों में अद्यतन करते रहने की आवश्यकता होती है, जैसे-समाचार, विमान-रेल आगमन-प्रस्थान संबंधी सूचना, खेल कमेंट्री, क्रय-विक्रय संबंधी सूचना, रोजगार-पदों का विज्ञापन, संस्थाओं की गतिविधियों का विवरण आदि।
सूचना प्रौद्योगिकी का तीसरा घटक है- भाषा व भाषा शैली। भाषा सूचना प्रौद्योगिकी का मुखपृष्ठ है, जिसकी सहायता से प्रयोक्ता अंकित सूचना को ग्रहण करता है। जिस भाषा में सूचना अंकित होती है, यदि प्रयोक्ता उस भाषा को न समझ सके तो इस प्रौद्योगिकी से उसे कोई लाभ होने वाला नहीं है। आज इंटरनेट की 83 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। इसलिए अँग्रेजी भाषा-भाषी देशों या अंग्रेजी जानने वाले प्रयोक्ताओं को कोई समस्या नहीं है। यह समस्या उन देशों की है जहाँ का भाषा-समाज अंग्रेजी नहीं जानता और अपनी स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं का ही प्रयोग ज्यादा करता है। चूँकि सूचना प्रौद्यागिकी का उद्देश्य सामाजिक विकास और जन कल्याण है, अतः यह आवश्यक है कि इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री लोगों तक उनकी भाषा के माध्यम से पहुँचे। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि भाषा का स्थानीकरण और विस्तारीकरण करके समस्त कंप्यूटर परिवेश और इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री को प्रयोक्ताओं की स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं में प्रस्तुत किया जाए। इसके अंतर्गत वांछित भाषाओं में कंप्यूटर के पर्दे पर दिखाई देने वाले सभी कमांड, आदेश, संकेत, त्रुटि-संदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया के अंग बनें। इसके अलावा इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर प्रदर्शित समस्त सूचना-सामग्री प्रयोक्ता की अपेक्षित भाषा में उपलब्ध हो और कथ्य सामग्री की भाषा शैली का सरल, सुबोध और ग्राह्य होना भी अत्यंत आवश्यक है इसलिए प्रायः वाक्य अत्यंत छोटे रखे जाते हैं, सरल और बोधगम्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जहाँ अत्यावश्यक हो, कथन स्पष्ट और संक्षिप्त रखे जाते हैं। कथन इतना सुबोध और आकर्षक होना चाहिए कि वह प्रयोक्ता को बाँधकर रख सके अन्यथा प्रयोक्ता कभी भी साइट को छोड़कर जा सकता है।
इस संदर्भ में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सामग्री का निर्माण करते समय भी ये सभी बातें विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य हैं। जहाँ तक हो सके अनुवादपरक और क्लिष्ट भाषा-शैली से बचना आवश्यक है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर सामग्री का विकास करते समय इसके तीन पक्षों पर ध्यान देना आवश्यक होता है-चयन, प्रस्तुतीकरण और भाषा शैली। सामग्री के चयन में प्रयोक्ताओं की जरूरतों, उनकी रूचि के विषयों और समसामयिक महत्त्व के मुद्दों को ध्यान में रखा जाता है। प्रयोक्ता किन-किन प्रयोजनों का उद्देश्यों से किस प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त करना चाहता है, इसका विश्लेषण या पूर्वानुमान करना आवश्यक है।
सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी
भावों, विचारो और मानवीय संबंधों को प्रकटीकरण के लिए भाषा जरूरी है। भाषा के साथ ‘राष्ट्र’, ‘राज’, ‘संपर्क’, जुड़ जाने से भाषा का मूल्य और अधिक बढ़ जाता है। तकनीक और सूचना तकनीक से भाषा को जोड़कर इसे हर भारतीय तक पहुँचाना राजभाषा का ध्येय और लक्ष्य है। दूसरी ओर हिंदी को विश्व फलक पर स्थापित करना भी भारत सरकार के साथ-साथ हर भारतीय का कर्तव्य है। आज सूचना-प्रौद्योगिकी की क्रांति के दौर में सामान्य सूचनाओं के साथ-साथ ज्ञानात्मक सूचनाएँ भी निरंतर हिंदी में उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। इस दिशा में विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ विभिन्न वैज्ञानिक व विद्वान निरंतर प्रयत्नशील हैं।
कंप्यूटर पर हिंदी
हिंदी तथा भारतीय भाषाओं को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने के लिए सन् 1971-72 में सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए कंप्यूटर में देवनागरी व अन्य भारतीय लिपियों के उपयोग के लिए ‘फोटो टाइप टर्मिनल’ का विकास किया। सन् 1980 में शब्द संसाधन की दृष्टि से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में मुद्रण के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति ने जन्म लिया। इसी क्रम में सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों की अनेक संस्थाओं के सक्रिय सहयोग से पहले यांत्रिक टाइप राइटर के मॉडल पर कुंजी पटल का विकास किया गया और बाद में हिंदी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं की लिपियों के लिए वर्णमाला की ध्वनि और वर्णमाला के वर्णों के वितरण, उनके उच्चारण स्थान के आधार पर एक समन्वित कोड विकसित किया गया जिससे एक ही कुंजी से सभी भारतीय भाषाओं (उर्दू को छोड़कर) की लिपियों के समान ध्वनि वाले अक्षर टंकित हो सकें। इसके आधार पर जो कोड विकसित किया गया वह ‘इंस्टी कोड’ (इंडियन स्टैंडर्ड कोड इन्फॉमेंशन इंटरचेंज) कहलाता है और की-बोर्ड का मोड इनस्क्रिप्ट कहलाता है। इसके आधार पर अक्षरों के लिए निर्धारित कुंजी से सभी भारतीय लिपियों में टाइप किया जा सकता है और अन्य भाषा में लिप्यांतरण भी किया जा सकता है। इसी आधार पर अंग्रेजी की वर्णमाला के अक्षरों की ध्वनियों के अनुसार भारतीय भाषाओं के अक्षरों को भी अंग्रेजी के लिए निर्धारित की – बोर्ड पर ही टंकित किया जा सकता है।
इसे ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) या एक्ज़िक्युटिव या एंग्लो-इंडो की-बोर्ड मोड कहते हैं। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए कुंजीपटल में तीन विकल्प हैं- टाइपराइटर, इनस्क्रिप्ट और फोनेटिक। प्रयोक्ता सुविधानुसार इनका उपयोग करके अपना काम हिंदी या अन्य भाषाओं में कर सकते हैं। कुंजीपटल के विकास के बाद कंप्यूटर पर अपेक्षित भाषा में काम करने के लिए आवश्यकतानुसार अनुप्रयोग ‘हिन्दी सॉफ्टवेयरों’ के निर्माण का सिलसिला आरंभ हुआ। भारत सरकारी की सी-डेक संस्था ने 1988 में आई.आई.टी. कानपुर के सहयोग से बहुभाषी कंप्यूटिंग तथा इलेक्ट्रानिकी ‘जिस्ट’ ग्राफिक्स एंड इटेलिजेंस बेस्ड स्क्रिप्ट टेक्नोलॉजी प्रणाली प्रदान की। इसके माध्यम से अंग्रेजी के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डी-बेस, लॉटस, वर्डस्टार, कोबोल आदि में कार्य होने लगा। इसके बाद सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने विंडोज़ प्लेटफार्म व परिवेश में काम करने वाले अनेक फोंट्स व सॉफ्टवेयर जैसे -लीप ऑफिस, इज्म, ट्रांसनेम, जिस्टशैल, लिप्स, मल्टी प्वाइंट अक्षर फॉर विंडोज़ आकृति आफिस सॉफ्टेक का अक्षर, देवेबेस, लेजर कंपोज़र, हिंदी का आलेख वराह, श्रीलिपि एपीएस आदि का निर्माण किया।
इस बीच माइक्रोसॉफ्ट की भारत स्थित कंपनी ने सन् 2000 में एम एस ऑफिस विंडोज में हिन्दी सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं को भी सम्मिलित किया और सन् 2003 में भारत सरकार से किए गए करार के अनुसार विंडोज के समस्त परिवेश, सभी आदेश, संकेत, त्रुटिसंदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि विकसित करके कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया का अंग बना दिया। इसी क्रम में भारत सरकार ने आगे कदम बढ़ाते हुए उक्त सभी फोंट्स व यूनिकोड फोंट्स एवं की-बोर्ड ड्राइवर, टु्रटाइप फोंट्स के हिंदी भाषा मल्टीफोंट्स की-बोर्ड इंजन, हिन्दी भाषा के यूनिकोड आधारित की-बोर्ड ड्राइवर, हिंदी के लिए सभी प्रकार के फोंट्स कोड एवं स्टोरेज कोड का परिवर्तक, भारतीय ओपन ऑफिस का हिंदी भाषा संस्करण, हिन्दी में फायरफॉक्स ब्राउसर, हिन्दी में जीआईएम मल्टी प्रोटोकॉल संदेशवाहक, हिंदी में ई-मेल क्लाइंट, हिंन्दी ओसीआर, हिंदी एवं अंग्रेजी के लिए आसान टाइपिंग अनुशिक्षक, हिंदी के लिए एकीकृत शब्द संसाधक, अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश, हिंदी भाषा के शब्द वर्तनी जाँचकर्ता, हिंदी भाषा का शब्दनुवाद टूल एवं हिंदी के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच प्रणाली आदि का विकास कर इसे आम जनता तक मुफ्त पहुँचाने की व्यवस्था की।
इसके अतिरिक्त आईबीएम द्वारा विकसित साफ्टवेयर में हिंदी के 65000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिंदी और हिंदुस्तानी, अँगं्रेजी के लिए आवाज पहचानने की प्रणाली का विकास भी किया गया है जो शब्दों को पहचानकर कंप्यूटर पर लिपिबद्ध कर देती है। एचपी कंप्यूटर ने एक कदम और आगे बढ़कर ऐसी तकनीक विकसित की है, जो हाथ से लिखी हिंदी लिखावट को पहचानकर कंप्यूटर में लिपिबद्ध कर सकती है। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी के प्रयोग की सुविधा के साथ कंप्यूटर का पूरा परिवेश व प्रक्रिया आदि की हिंदी में उपलब्ध उक्त सुविधाओं से अंग्रेजी न जाने वाले भी अब अपना काम कंप्यूटर पर हिंदी में कर सकते हैं।
इंटरनेट व वेबसाइट पर हिंदी
इंटरनेट ने सूचनाओं के विश्वव्यापी आदान-प्रदान को अपने तंत्रजाल में बाँध लिया है। यह प्रणाली विश्व के विभिन्न देशों में करोड़ों लोगों द्वारा प्रयुक्त की जा रही है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इसका आविष्कार होने से अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं तथा रोमन लिपि का वर्चस्व रहा। अंग्रेजी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रेंच, जापानी, अरबी, स्पेनिश आदि भाषाएँ कंप्यूटर के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गई हैं, वहीं हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए यह एक चुनौती है। लेकिन इंटरनेट के फलक पर वेब दुनिया डॉट कॉम (इंडिया) लि. ने हिंदी पोर्टल का विकास कर इस चुनौती को स्वीकार किया और 23 सितम्बर 1999 को इंटरनेट पर हिन्दी की क्षमता के दर्शन हुए। वेब दुनिया के इस कार्यक्रम में मेल, चैट, खोज आदि भी सम्मिलित हैं। सॉफ्टवेयर कंपनी सुवि इन्फॉमेंशन सिस्टम, इंदौर ने हिंदी में निशुल्क ई-मेल सेवा का श्रीगणेश किया है। इस पैकेज में लिप्यांतरण की सुविधा भी है। रोमन में टाइप पत्र दूसरे छोर पर देवनागरी में प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी भाषा का प्रचलन निरंतर बढ़ रहा है। जहाँ माइक्रोसॉफ्ट, याहू, रेडिफ, आदि विदेशी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट पर हिंदी को स्थान दिया है और बीबीसी ने हिंदी की वेबसाइट विकसित की है, वहीं राजभाषा विभाग ने भी अपनी हिंदी वेबसाइट पर मशीनी अनुवाद और लिप्यांतरण हेतु ‘मंत्र’ पैकेज उपलब्ध कराया है और हिंदी में वेबपेज विकसित करने हेतु ‘प्लग इन’ पैकेज तैयार किया है, जिससे कोई भी व्यक्ति, संस्थान अपना वेबपेज हिंदी में प्रकाशित कर सकता है। भाषा शिक्षण की दिशा में भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने सी-डेक के सहयोग से ‘लीला हिन्दी सैल्फ लर्निंग’ पैकेज सॉफ्टवेयर तैयार किया जा अब इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। इस पैकेज से पाठों में आए वाक्यों, शब्दों और वर्णों का मानक उच्चारण सुन सकते हैं और बार-बार अभ्यास भी कर सकते हैं। लीला पैकेज लर्न इंडियन लेंग्वेज थ्रु आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के द्वारा सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी के माध्यम से सीखने की सुविधा उपलब्ध है। हिंदी शिक्षण की दृष्टि से मल्टीमीडिया सीडी-रोम ‘गुरू’ भी महत्वपूर्ण है।
इंटरनेट पर आसानी से हिंदी में काम कर सकते हैं। वेब साइट्स हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ ग्रहण कर सकते हैं। इंटरनेट व वेबसाइट पर सूचनाएँ अंकित करने के लिए सूचना संप्रेषण की आवश्यक प्रविधि के साथ भाषा और शैली की सुबोधता, सरलता, सहजता को ध्यान में रखकर हिंदी में वेबसाइट्स का निर्माण करके आवश्यक सामान्य सूचनाएँ और ज्ञान विज्ञान संबंधी ज्ञानात्मक सूचनाएँ जन-जन के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी की बढ़ती पैठ को देखते हुए प्रसिद्ध अंग्रेजी भाषाशास्त्री डेविड ग्राडोल ने विश्लेषण करके बताया है कि ‘‘हिन्दी 2050 में दुनिया की नंबर एक भाषा होने जा रही है। दूसरा स्थान चीनी और तीसरा स्पेनिश का होगा।’’ इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी वर्तमान इक्कीसवीं सदी में अन्य भाषाओं के साथ सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेगी।
सन्दर्भ –
1. हिन्दी भाषा का अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भ – भोलानाथ तिवारी, पाण्डुलिपि प्रकाशन दिल्ली।
2. दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी – डी.डी. ओझा, ज्ञान गंगा, प्रकाशन, दिल्ली।
3. जनमाध्यम और पत्रकारिता – प्रवीण दीक्षित, सहयोगी साहित्य संस्थान, महेश्वरी मोहाल, कानपुर।
4. जन संचार माध्यमों में हिन्दी, कुमार चन्द्र क्लासिक पब्लिकेशन्स कम्पनी, नई दिल्ली, 2000।
5. जन संचार और विकास बनर्जी, अंजन कुमार, जनसंचार केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी, 1995।
6. संचार क्रांति और विश्व जन माध्यम – प्रेमचन्द पांतजलि, अनिल अंकित।
7. सूचना प्रौद्योगिकी और जन माध्यम – प्रो. हरि मोहन तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।
8. जनसंचार – राधेश्याम शर्मा, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़।
9. साइबर स्पेस और मीडिया – सुधीश पचौरी, प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली।
10. संचार माध्यमों का प्रभाव – ओम प्रकाश सिंह, क्लासिकल पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली।
11. आधुनिक जन संचार और हिन्दी – प्रो. हरि मोहन, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।
एल सी कुमार की पाँच कविताएँ
1 — मैं कौन हूं
मैं अजनबी हूं लिखना मेरा शौक है
लोग कहते हैं मैं कवि हूं
सुबह उठ कर धोता हूं अंधकार
किरणों से करता हूं प्रकाश
लोग कहते हैं मैं रवि हूं
यूं तो करता हूं मैं मदद अक्सर
लोगो लोगों के बीच फंसकर
करता हूं समस्याओं का समाधान अक्सर
लोग कहते हैं मैं अनुभवी हूं
कौन कहता है आसान है जिंदगी
बड़े संभाल कर करनी होती है बंदगी
सही मायनों में परेशानी से जूझता है इंसान
शायद इसी को कहते हैं असली जिंदगी
जी तो लेता मैं भी अगर आसान होता
जर जमीन कारवां आम होता
लगती है चीजें सवारने को
बन जाता नवाब अगर साजू समान होता
सोच कर उठता हूं रोज कि आज क्या करें
जिए नई जिंदगी या रोजमर्रा की तरह मरे
कर लूंगा काम मेहनत से सभी
फिर भी ऐसो आराम है मुझ से परे
क्यों होना परेशान जब कोई काम नहीं आसान
चलो चलें, करले मेहनत इसी दरमियान
करेंगे काम मेहनत ईमानदारी से
बस यही तो है मेरा अरमान
काट लेंगे बची कुची जिंदगी को
भूलकर द्वंद्व शर्मिंदगी को
छूकर उम्मीदों की बुलंदगी को
कर लो जीवन अपनी मुट्ठी में
अब बचा नहीं कुछ आसान
क्या हुआ, कुछ समझे मेहरबान
2 — सरकारी नौकरी
बढ़ती जा रही है बेकारी
नौकरी चाहिए सरकारी
घट रही है शिक्षा बढ़ रही है भिक्षा
शिक्षा पाना नहीं काम आसान
जाने कितने कोशिश करते
लिखते पढ़ते मेहनत करते
पर सब को नहीं मिलता शिक्षा ज्ञान
जब पड़ जाते हैं बच्चे
ख्वाब देखते अच्छे-अच्छे
कि बस मिल जाए नौकरी सरकारी
कहलायेंगे फिर सरकारी कर्मचारी
लेकिन ख्वाब नहीं थे सच्चे
नहीं आए दिन अच्छे अच्छे
भटक रहे हैं लिख पढ़ बच्चे
लेकर अरमान नौकरी पाने की
जिद है कुछ कर जाने की
जलवा जोश दिखाने की
अपना टैलेंट दिखाने की
यहां बड़ी है मारामारी
बस मिल जाए नौकरी सरकारी
मोल नहीं है ज्ञान का
युग कहते विज्ञान का
घूमने दुनिया सारी
बन बैठे सब व्यापारी
नहीं मिली नौकरी सरकारी
अब चलो निजी क्षेत्र में जाएंगे
वहां अपना लक आजमा आएंगे
और अपने टैलेंट के बल पर यहां तो नौकरी पाएंगे
घरवालों की दो रोटी का शायद इंतजाम कर पाएंगे
यहां पड़े हैं बंद सब काम
नहीं कोई नया निर्माण
मालिक भी अब कर्मचारी
नहीं मिली नौकरी सरकारी
कैसे मिलता हमको काम
Entrepreneur भी बेकार पड़े हैं
नौकरी की इंतजार में खड़े हैं
नहीं मिलेगा अब कोई काम
सब तो निजीकरण के पीछे पड़े
और हम भी बेरोजगार हैं
इसीलिए कंपनी के बाहर खड़े हैं
कर लेते व्यापार अगर पैसे होते
बन जाता साधन एरनिंग का
अपना बहुमूल्य समय हम ना खोते
और चल जाता व्यवसाय हमारा
हम ने किसी से कम होते
देखे थे हमने सपने कभी
हम भी उन में से चुन लेते
करके तिरस्कार नौकरी का
अपने सपनों को बुन लेते
यह जीवन है चलते जाने का
पथ पर आगे बढ़ने का
आएंगी मुसीबतें रुक रुक कर
ठहर नहीं जाना पर पथ पर
पा लेना विजय इन सब पर
क्योंकि नया समय अब आने का
छोड़ ना तू कुछ अब कल पर
3 — जनप्रतिनिधि
चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो
डर की कमी हो और बाजुओं में दम हो
लड़ सके सभी के लिए ना किसी से कम हो
समझ सके सभी को और समझाने का दम हो
सुलझा सके उलझनों को ना कोई भ्रम हो
चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो
और बाजुओं में दम है
कह सके अपनी बात उतना बंदे में दम हो
उलझाएगी दुनिया तुम्हें समझाएगी दुनिया हमें
बात पर टिक जाए जो बंदे में ऐसा फन हो
वजूद ना हो पाए अपना दिखा पाए सबको सपना
निकालें काम अपना राम नाम जपना
ऐसा बंदे का मन हो
चाहिए ऐसा बंदा जिसमें शराफत कम हो
डर की कमी हो और हुनर में दम हो
4 — जिंदगी
हंसना ना कम कीजिएगा
गमों को कम पीजिएगा
हंसना अगर सीख लिए
जिंदगी मजे से जी लीजिएगा
आ जाए गमों का सैलाब कितना
हंसते हंसते सभी सह लीजिएगा
मुकद्दर में सभी के लिखा है हंसना
जिंदगी के पेचों वह झांसे में नहीं फसना
यह उलझाइगा गमों के दरिया में
किनारों को अपना घर बनाए रखना
मुश्किलें आती,जाती रहती हैं
हंसते हंसते इन्हें अपनी बनाए रखना
छूट जाए गर किनारा हंसने का
दोस्तों से संपर्क बनाए रखना।
5 — मां की ममता
तेरा आंचल मां अलबेला है
मेरा जीवन इसमें खेला है
तू ममता की मूरत है श्याम सलोनी सूरत है
मैं जागूं तू जागे है मेरे पीछे पीछे भागे
तू ऐसी देवी मूरत है
मां तू ममता की सूरत है
मैं रोउ रो तो तू हंसती है
मेरे कन कन में तू बसती है
तू है तो मैं जिंदा हूं
तेरे रहते मैं एक परिंदा हूं
तू मेरा शुभ मुहूर्त है
मां तू ममता की मूरत है
जी चाहे तो उड़ जाऊं
मनचाहे मैं जो खाऊं
तेरा आंगन का मैं नन्ना हूं
कोरे जीवन का एक पन्ना हूं
मुझे तेरी बहुत जरूरत है
मां तू ममता की मूरत है
मेरे दिल में तू मेरे मन में तू
मेरा मान भी तू अभिमान भी
तू देवी मां की मूरत है
मां तू ममता की सूरत है
सब कुछ तो तुमसे सीख लिया
गिर गिर कर चलना सीख लिया
अब घर कोई नया बनाना है
मां तुझको वही बसाना है
तेरे साथ रहूं मैं जीवन भर तक
नहीं लगती ऐसी कोई सूरत है
मां तू ममता की मूरत है,
मां तू ममता की मूरत है
मानवीय एवं सामाजिक संवेदनाओं के आइने में पाटण की सांस्कृतिक विरासत पटोला हस्तकला एवं हस्तकला कारीगरः एक अध्ययन
मानवीय एवं सामाजिक संवेदनाओं के आइने में पाटण की सांस्कृतिक विरासत पटोला हस्तकला एवं हस्तकला कारीगरः एक अध्ययन
डॉ. लोकेश जैन एवं डॉ. देबेन्द्र दास
सार संक्षिप्त
हिन्दी साहित्य जगत के मूर्धन्य उपन्यासकार मुंशी प्रेंमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के दर्द को छुआ, अन्दर तक उसकी सिरहन को महसूस किया तथा अदम्य साहस के साथ अपनी लेखनी से उस संवेदना को उकेर कर जनमानस को झकझोरने का जो भगीरथ कार्य किया। उसी तरह की मानवीय संवेदना से प्रेरित होकर ग्रामीण प्रबंधन से जुड़े शोधार्थी ने कबीर की तरह सुनहरे सपनों का ताना-बाना बुनने बाले अत्यंत मंहगी भौगोलिक संकेत वाली (जो क्षेत्र विशेष तक ही मर्यादित होने के कारण वैधानिक रूप से विशिष्टता लिए हुए है) पटोला-साड़ी हस्तकला एवं उसके कारीगरों की कथा-व्याथा तथा उनकी प्रवर्तमान व्यावसायिक, सामाजिक- आर्थिक स्थिति को समझने एवं प्रबुद्ध समाज के समक्ष रखने का प्रयास किया है ताकि इन हुन्नरधारकों के भविष्य को बेहतर व सम्मानजनक बनाने हेतु समाज के विभिन्न पक्षकारों व हितधारकों के हृदय में, नीतिनियामकों में इनके प्रति गहरी व स्पष्ट समझ विकसित की जा सके।
कुंजी शब्द- भारतीय कला संस्कृति, पाटण की प्रभुता, पाटण का पर्यायवाची पटोला, पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाएं, पटोला कारीगरों का कार्य वातावरण, कारीगर समाज की मनो-सामाजिक दशा तथा जीवन यापन का परिदृश्य
भारतीय कला संस्कृति जगत पाटण का पटोला हस्तकला कारीगरी के आलोक मे…….
“कला एक हस्तकला नहीं है अपितु कौशल्य से भरे समाज के रूप में हमारी गर्वीली पहचान है, हमारी समृद्ध गौरवशाली संस्कृति का आइना है, यह कलाकार द्वारा महसूस की गई अनुभूति का प्रसारण है।”
भारत देश सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा है। 64 कलाओं से परिपूर्ण समाज परस्पर पूरकता का पर्याय बना। इस व्यवस्था में विकन्द्रित रूप से समाज के सभी वर्गों का चहुँमुखी विकास हुआ। सभी हाथों को काम मिला, सभी की रचनात्मकता को निखरने का भरपूर अवसर मिला। यह ज्ञान व कौशल्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित तो हुआ ही साथ ही साथ देश काल परिस्थिति की वर्तमान व भावी आवश्यकता के अनुरूप इन कलाओं में नूतन अभिनव प्रयोग जुड़ते रहे लेकिन मानवीयता और मानवीय सुख सदैव इनके केन्द्र में रहे जिनका प्रकृति के अस्तित्व अथवा हितों के साथ शायद ही किंचित विरोधाभास रहा हो। हस्तकलाओं के दायरे में ऐसे समाज ने आकार लिया जो प्रकृति के साथ साथ जरूरतमंद तथा हासिए पर आ चुके लोगों के साथ चलने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रतिबद्धता व्यक्त करता था। इन हस्तकलाओं में सृजनशीलता के साथ सौन्दर्य बोध था, मानवीय संवेदनशीलता थी तथा जीवन के विविध प्रसंगों को जीवंत बनाने वाले रंग प्रसरे हुए थे जो कतिपय सामाजिक भेदभाव को गौण करते थे। समाज परस्पर इन हस्तकला धारकों का सम्मान करता था, उनमें सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करते हुए……। हर हुनर “एक सबके लिए, सब एक के लिए” की मूल सहकारी भावना पर संचालित होता था जिसमें सही मायनों में “सबका साथ और सबका विकास” नियत होता था।
गुजरात राज्य में पाटण की भौगोलिक रूप से चिन्हित हस्तकला एवं हस्तशिल्पियों की सामाजिक – आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति के इस अध्ययन में इन कारीगरों की मनो-सामाजिक, व्यावसायिक स्थति को सांस्कृतिक एवं जीवन यापन के प्रतिमानों के परिप्रेक्ष्य में समझने की मूल विभावना समाहित रही है जिसमें इस कला संस्कृति को नई पीढ़ी तक ले जाने की संभावनाएं गर्भित हैं। मानवीय सामाजिक संवेदना के पटल पर किया गया यह विश्लेषण भारतीय कला संस्कृति एवं कारीगर समुदाय के उत्थान की भावी तस्वीर विविध कोणों से खींच सकेगा।
इस शोध परक आलेख का एक ध्येय विरासत में मिली इस जी.आई. (भौगोलिक विस्तार तक परिसीमित) हस्तकला संबंधी ज्ञान को आगे ले जाने के उद्देश्य से समाज के सामने रखना है, इन कुशलताओं की बारीकी से आने वाली पीढ़ी को ससज्ज करना है ताकि समाज में हुन्नरधारकों के प्रति सम्मान व संवेदना के साथ इस हुनर व प्रतिभा को लुप्त होने से बचाया जा सके।
कोई भी ज्ञान अथवा कला तब विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती है जब उसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता को किन्हीं सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तथा व्यवस्थाकीय कारणों से क्षति पहुँचने लगे, वह आधुनिक प्रवाह के साथ गति न कर सके अथवा बाजार स्पर्धा के सामने टिके रहने का सामर्थ्य स्थापित न रख सके। सामाजिक परिवेश का भी प्रभाव इन हुनर (कला) के अस्तित्व की स्थिति को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। आज का समाज इस कला से एवं कला की विविध प्रक्रिया से जुड़े हुनरधारकों को किस नजरिए से देखता है, कितना सम्मान देता है, इसे समझना भी जरूरी हो जाता है क्योंकि यदि वह स्थिति सम्मानजनक होती है तो इस कला के साथ नई पीढ़ी को सहजता से जोड़ा जा सकता है अथवा जुड़ने की उत्कंठा को अच्क्षुण बनाए रखा जा सकता है अन्यथा इसमें वही लोग जुड़ते हैं जो बाहर कहीं सेट होने की योग्यता खो देते हैं जिसका अपेक्षाकृत विपरीत असर इन हुनरों की निर्माण प्रक्रिया एवं व्यावसायिक परिवेश पर पड़ता है जिसके चलते कला का अपेक्षित उत्थान सुनिश्चित नहीं हो पाता। यदि इन कलाओं के क्षेत्र में रुचि के साथ योग्य मानवशक्ति के जुड़ने की निरंतरता का सामाजिक-सांस्कृतिक अनुकूल एवं प्रोत्साहक वातावरण बना रहे तो ये कलाएं दीर्घकाल तक चिरंजीवी बनी रहती है तथा समृद्ध परंपरागत ज्ञान के द्वारा सफलता के सोपान चढ़ती रहती हैं।
अध्ययन के परिक्षेत्र में जीवनयापन अर्थात् आजीविका प्रतिमानों से जुड़ा आर्थिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि इस समुदाय को इससे बेहतर अर्थोपार्जन के अवसर मिलते हैं तो वह इस कला को अपने जीवनयापन का कार्यक्षेत्र नहीं बनाता और वर्षों से अर्जित प्रयोगजनित ज्ञान तथा प्रतिभा को छोड़ देने में जरा भी नहीं हिचकिचाता। समाजिक पक्ष तो इतना हावी है कि अन्यत्र स्रोत से कम आय मिलने के बावजूद भी कारीगर अपने परंपरागत हुनर में अपनी संतान को जोड़ना नहीं चाहते। इससे उनके रोटी-बेटी के संबंध प्रभावित होते हैं और “घर” की व्यवस्थाएं अस्तव्यस्त होने लगती हैं। यह भी देखने में आता है कि स्थानीय स्तर पर आजीविका के पर्याप्त साधन न होने से, अन्यान्य आय के साधन न होने से वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी काम करने को मजबूर होता है, शोषित होते हुए भी शोषित होने का आभास नहीं कर पाता। उसे भय रहता है कि जितना उसे आज मिल रहा है, जिससे उसका जीवन येनकेन प्रकारेण चल रहा है उस पर संकट आ सकता है।
इसी कार्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य का भी सामने निकल कर आया है जिसकी कल्पना संशोधकों को शोध परियोजना निर्माण करते समय नहीं थी। इस कला की विविध प्रक्रियाओं में श्रमिक कारीगर की तरह काम करते हुए सतत एक ही स्थिति में रहने से और रासायनिकों का उपयोग बढ़ने से, प्रक्रियाजनित प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल रूप से निरंतर प्रभावित हो रहे हैं, जिसकी ये लोग सामान्यतया प्राथमिक स्टेज तक परवाह नहीं करते किन्तु कालान्तर में यह समस्या गंभीर बन जाती है और उनके कार्य की स्थिति को प्रभावित करने लगती है तथा कई बार जीवन को समय से पहले ही पूर्ण कर डालती है। इससे उसकी कार्यक्षमता और आय दोनों ही कम होने लगते हैं तथा जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता चला जाता है।
भारत के प्रमुख जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तशिल्प………
आयरन वुडन क्राफ्ट छत्तीसगढ़, चन्नापटना (कर्नाटक) के खिलौने गुड्डे गुड़ियां, मैसूर रेजवुड इनले, तमिलनाडु की परंपरागत क्राफ्ट, बोबलहेंड डांसिग डॉल तंजावुर, खुर्जा – बुलंदशहर पोटरी, राजस्थान की कठपुतली (स्ट्रिंग पपेट), आसाम की बांस से बनी क्राफ्ट, संखेड़ा फर्नीचर(गुजरात), रोगान प्रिन्ट कच्छ (गुजरात), रावण हस्त वीणा (राजस्थान), पेम्पार्थी शीट मेटल क्राफ्ट (तेलंगाना), करीमनगर सिल्वर फिलिग्री(तेलंगाना), विलियनुर टेराकोटा काम, पुडुचेरी तंजावुर आर्ट प्लेट सी शैल क्राफ्ट, अंडमान, गोवा, उड़ीसा की एतिहासिक पिपली(पुरी) एप्लिक वर्क उड़ीसा, एतिहासिक कोर्णाक स्टोन कटिंग वर्क उड़ीसा, जयपुर ब्ल्युपोटरी(राजस्थान), आदिवासी कारीगर-बांस का कार्य- छत्तीसगढ़, कोकोनट शैल क्राफ्ट-केरल (ब्रास एम्ब्रोइडरी), आंध्रप्रदेश काकुलम जिले की फूल (ब्रास) आगरा की मार्बल की वस्तुएं , टेराकोटा-आसाम (क्राफ्ट) के बर्तन दीपक, घंटी आदि वस्तुएं, सहारनपुर-उ. प्र. वुडन हस्तकला, अमृतसर की भरतकाम वाली मोजड़ी, नागरा तथा पंजाबी जूती, लेदर टॉयज म.प्र., कोल्हापुरी (महाराष्ट्र) चप्पल, सोलापुर (महाराष्ट्र) की चादर, फुलकारी साड़ी-पंजाब, कुल्लु शॉल- हिमाचल, किनल क्राफ्ट-कर्नाटक, मदुरकाठी- पश्चिमी बंगाल, मधुबनी पेंटिंग (परंपरागत चित्र), तथा गुजरात में पाटण की पटोला साड़ी, संखेड़ा फर्नीचर,खंभात के अगेट्स तथा तंगलिया शॉल, जामनगरी बंधनी, माता नी पछेड़ी उत्पाद आदि जी.आई. क्राफ्ट के प्रमुख उदाहरण हैं।
इसके अलावा लोंग पी कोल्ड पोटरी हाथ से बनाई जाती है जिसमें रसोई के बर्तन एवं शो पीस बनाए जाते हैं। तथा तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के निर्मल शहर के कुशल कारीगरों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले खिलौने, पेंटिग और फर्नीचर जी.आई. श्रेणी में रखे गए हैं। अरनमुला कन्नडी, केरल (अरनमुला नामक छोटे से शहर में हाथ से बनाया जाने वाला शीशा है जिस पर धातु का कार्य किया जाता है। इसका उपयोग अरनमुला पार्थसारथी मंदिर में रखने हेतु किया जाता है), धोकरा छत्तीसगढ़ (धोकरा वेक्स मेटल पर बनाए जाने वाला एक प्रसिद्ध क्राफ्ट है जिसमें घोड़ा और हाथी का समावेश किया जाता है) कोंडापल्ली टॉयज आंध्र प्रदेश- विजयवाड़ा के पास कोंडापल्ली गांव में बने ये खिलौने अपनी विशिष्ट थीम व शैली के कारण जी. आई. में पंजीकृत होने जा रहे हैं। तथा कर्नाटक मेटल पीस (कर्नाटक के बिद्रीवेर कस्बे में मेटल से बनने वाली यह वस्तु विश्व विख्यात है जिसका भी निर्यात किया जाता है।)
पाटण की पटोला हस्तशिल्पः एतिहासिक परिवेश…….
पटोला गुजरात की संस्कृति में पूरी तरह रच बस कर सिने गीतों तक पहुँच गया है- छेलाजी रे मारु हाटु पाटणथी पटोला मोंघा लावजो। जनमानस में पाटण का पटोला पाटण की पहचान का पर्याय बन चुका है। रेशम के कीड़े से तैयार अत्यन्त नरम और पतले रेशम से तैयार पटोला वस्त्र दुनिया में अति विशिष्ट है। कहा जाता है कि इसकी शोध चीन में हुई थी। वर्षों तक चीन ने रेशम से कपड़े बनाने की पद्धति को गुप्त रखा और बहुत नफा कमाया। प्राचीन समय में भारत का रेशम से बना यह पटोला कपड़ा इस गुणवत्ता के लिए विख्यात था कि उसे अंगूठी में आर पार किया जा सकता था। अहिंसा में मानने वाले लोग रेशम के कीड़े को मारकर तैयार किए गए इस कपड़े का उपयोग नहीं करते थे।
पटोला बनाने की कला लगभग 900 साल पुरानी है। प्राचीन काल में डिजाइन वाला कपड़ा बनाने की कोई पद्धति नहीं थी तब बांधणी पर कलर करने की कला पाटण के सालवी परिवारों ने अपनी सूझबूझ व हुनर के द्वारा विकसित की थी। इन परिवारों का मूल निवास तो वर्तमान महाराष्ट्र था जहाँ जालना शहर में यह कला विकसित हुई थी। वहाँ के 700 सालवी परिवारों ने 11वी सदी में पाटण के शासक कुमारपाल देसाई के यहाँ राजाश्रय प्राप्त कर इस कला का चहुँमुखी विकास किया जिसके कारण पाटण विश्व के मानचित्र पर एक अलग प्रतिष्ठा के रूप में उभर कर सामने आया। कालक्रम में इन सालवी परिवारों की संख्या घटती चली गई जिससे इस विशिष्ट कला का अस्तित्व खतरे में लगने लगा। वर्तमान में पटोला बनाने वाले मात्र तीन सालवी परिवार हैं जो मालिक और कारीगर दोनों की भूमिका में हैं। अन्य जाति के कारीगर इसकी ताणी और पाटी बांधना, धागा बांधना आदि प्रक्रिया से जुड़े हैं। बुनाई में सालवी परिवार के पुरुष हैं। सालवी परिवारों ने दूसरों को काम सिखाया भी है।
पाटण का पटोला पूर्ण रूप से हस्तशिल्प होने के कारण कुटीर उद्योग के रूप में आकार ले चुका है। मँहगा होने के बावजूद अपनी लोकप्रियता के कारण कोरोना महामारी काल में भी यह हस्तशिल्प उद्योग अपने अस्तित्व को संरक्षित बनाए रख सका है।अति विशिष्ट कामगीरी के स्वरूप के कारण इसकी मांग में बहुत अधिक विचलन उत्पन्न नहीं हुए हैं। पटोला काम में इस समय साड़ी के अलावा दुपट्टा, रूमाल, स्कॉर्फ, टाई, छोटे-बड़े पर्स जिनका उपयोग जैन समुदाय द्वारा मंदिर में पूजा के उपक्रम से किया जाता है, आदि का उत्पादन भी शुरु किया गया है। पटोला की डिजाइन रेशम के तार से तैयार की जाती है जो कर्नाटक से मंगाया जाता है। पटोला की साड़ी को दोनों तरफ से पहना जा सकता है। एक साड़ी की कीमत सवा लाख से लेकर 5 लाख तक होती है। कीमत का यह अंतर डिजाइन की विशिष्टता और डिजाइन के अनुरूप कार्य में लगने वाले समय की अधिकता के कारण होता है। हर श्रीमंत नारी का यह सपना होता है कि वह अपने जीवन में ऑरीजनल पटोला अवश्य पहने क्योंकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है।
पटोला हस्तशिल्पः एक विशिष्ट महत्वपर्ण कला
सरल नहीं पटोला तैयार करना। एक के बाद एक लगभग 20 छोटी बड़ी प्रक्रियाओं- ताणी बांधना, डिजाइन बनाना, धागा बांधना, कलर काम, बुनाई. फनिशिंग आदि से गुजर कर पटोला तैयार होता है। यदि 4 व्यक्ति एक साथ काम करें तो एक पटोला साड़ी तैयार करने में 4-6 महीने का समय लग जाता है क्योंकि इसकी उप प्रक्रियाओं की संख्या अधिक हैं एवं हर एक प्रक्रिया सावधानी की दरकार रखती है किसी भी स्तर हुई जरा सी चूक मेहनत, पूँजी व समय को व्यर्थ कर देती है।
इसमें किसी मशीन या टेक्नोलोजी का उपयोग नहीं होता। इसके लिए बाहर के राज्य से बढ़िया क्वालिटी का नरम मुलायम रेशम मंगाया जाता है।पटोला बनाने हेतु डिजाइन तय कर लेने के पश्चात पहले रेशम के तारों को सीधा करके गिनकर रखा जाता है और उससे ताणी तैयार की जाती है फिर डिजाइन के अनुसार तार बांधने का कार्य हाथ से किया जाता है। इस पट्टी पर एक निश्चित माप के आधार पर डिजाइन के अनुसार धागा बांधा जाता है ताकि बिना बंधे हुए हिस्से पर कलर किया जा सके। साड़ी में जितने कलर होते हैं उतनी ही बार उसे धागा बांधने और कलर करने की प्रक्रिया से गुजरना होता हैं। इस पूरी प्रक्रिया में डिजाइन व माप बहुत ध्यान रखा जाता है कि एक भी धागा कम ज्यादा न हो जाय। नहीं तो वह आगे बुनाई के लिए नहीं जा सकेगा।
एक साड़ी(5मीटर) में आड़े तार 25000-26000 तथा खड़े तार 5000-6000 के करीब होते हैं। इसके पश्चात डिजाइन के हिसाब के अलग अलग कलर एक-एक करके किए जाते हैं जिसके लिए बड़ी सावधानी से शेष भाग को बांधा जाता है। एक से अधिक कलर होने की दशा में इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है क्योंकि डिजाइन हर बार अलग कलर हिसाब से धागे से गिनकर गांठ बांधनी होती हैं। एक डिजाइन 6 तार से बनी होती है। प्राकृतिक रंग के लिए विभिन्न वनस्तपतियों- हरडे. बोडी की लाख, आवंला, हल्दी, हरी तथा नील जैसी वनस्पति के रंगों का उपयोग किया जाता है। इसका खर्च प्रायः अधिक आता है इसलिए वैकल्पिक रूप से रासायनिक रंगों का भी उपयोग होने लगा है।
संशोधन प्रवधि-
पटोला जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तकला और उससे जुड़े कारीगरों की सामाजिक, आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति को समझने के लिए पाटण के छोटे-बड़े व्यावसायिक उपक्रमों में कार्यरत कारीगरों में से 48 उत्तरदाताओं का यदच्छ पद्धति से चयन किया गया जिसमें इस उत्पाद की विविध प्रक्रियाओं से जुड़े कुशल, अर्द्ध–कुशल एवं अकुशल कारीगर सम्मिलित हैं। शोध पद्धतियों में साक्षात्कार, अवलोकन, लक्ष्य समूह चर्चा आदि का उपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त द्वितीयक स्रोतों से भी आवश्यक शोध सामग्री का संकलन एवं उपयोग किया गया।
संशोधकीय विमर्श-
कारीगर समाज की तकनीकी कुशलता व सृजनशीलता को परिलक्षित करती पटोला निर्माण प्रक्रिया के प्रमुख चरण…………..
समग्र पटोला निर्माण प्रक्रिया यह एक गणितीय एवं अकल्पनीय कठिन प्रक्रिया है। पटोला डबल इकत बुनाई है जिसमें उल्टा सीधा नहीं होता इसलिए इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है। इसके रंग 100 वर्षो में भी फीके नहीं पड़ते। पटोला की डिजाइन में इकत केन्द्र स्थान पर होता है। इकत आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना में उत्पादित कपड़े का एक प्रकार है जो यार्न टेकनोलोजी एवं फेब्रिक जगत में एक सामान्य नाम है। इकत एक डाइंग टेकनिक है जिसमें रेजिस्ट डाइंग प्रक्रिया का समावेश किया जाता है। कुदरती रंगों के लिए केचु, कोचीनील, इन्डिगो, हल्दी, लाख हरडे, मेडर मूल, रत्नजोत, मंडिष्ठा. काथ, केसुडो, अनार का छिलका, महेंदी, गेंदा के फूल आदि का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा फिटकरी, कोपरसल्फेट, फेरस सल्फेट, टीन, क्लोराइड, पोटेशियम, डाइक्रोमेट एवं अन्य मोर्डन पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
समान्य रूप से पटोला पर अमूर्त डिजाइन एवं ज्यामितीय पेटर्न बनाए जाते हैं यथा- हाथी, मानव आकृति, कलश, फूल, शिखर, पान, पोपट आदि। अन्य डिजाइन गुजरात के हेरिटेज आर्किट्रेक्चर से प्रेरित हैं जिसमें एतिहासिक स्मारकों के जटिल डिजाइन भी पटोला साड़ियों पर देखे जा सकते हैं। नवरत्न पटोला की बहु प्रचलित एवं मंहगी पेटर्न मानी जाती है इसी श्रेणी में नारीकुंजर, व्होराजगाजी (माणएक चौक), छाबरी स्नान, चांदभाटी, पाटण भट्ट, लहेरिया, तरलिया, कुलभट्ट, केशर चंदन आदि का समावेश किया जाता है।
मशीनीकरण और पश्चिमीकरण के इस दौर में धारा से विपरीत यह हस्तकला उद्योग प्रदूषण रहित, औद्योगिक जगत के दूषणों से लगभग मुक्त विशाल रोजगार प्रदाता है जिसमें महिलाओं की भागीदारी नोंधनीय है। मात्र रोजगार की बात नहीं अपितु पाटण की पटोला विरासत भारत की समृद्ध जीवंत परंपरा की वाहक बनी हुई है। यदि कारीगरों को पर्याप्त पारश्रमिक मिलता रहा जो यह कला फलती फूलती रहेगी।
इकत इण्डोनेशिया की डाइंग टेकनिक है जिसका उनकी स्थानीय भाषा में शाब्दिक अर्थ है- बाइन्ड। इस टेकनिक का उपयोग टेक्सटाइल पेटर्न के लिए होता है जिसे वेफ्ट यार्न की बुनाई से फेब्रिक की डाइंग के लिए किया जाता है। दक्षिणपूर्व एशिया की अन्य संस्कृतियों में इकत का उपयोग बुनाई की परंपराओं के संदर्भ में किया गया है।एकाधिक कलर एवं सघन डिजाइन वाली इकत प्रक्रिया काफी जटिल व खर्चीली होती है। पटोला निर्माण प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप में निम्म लिखित रूप से समझा जा सकता है-
- रेशम धागे के बंच तैयार करना–
तारों के डिजाइन के अनुसार गिनती करके बंच तैयार किए जाते हैं जिसमें 150, 250, 300, 350 जैसे तार डिजाइन की आवश्यकता के अनुरूप बांधे जाते हैं। इसके पश्चात पाटी तैयार की जाती है।
- ताणी एवं कोटन धागा बांधने का कार्य-
पेपर पर तैयार की गई डिजाइन के अनुसार आड़ी और खड़ी ताणी बनाई जाती है। फिर उस पर कलर करने के लिए अतिरिक्त भाग पर कोटन का धागा इस तरह कसकर बांधने का कार्य किया जाता है कि वह कलर अन्य अवांछित जगह पर प्रवेश न कर पाए। पहले धागे से बनाई गई ताणी पर जगह जगह कोयले से निशान किया जाता है ताकि माप में भूल न हो औरडिजाइन के अनुसार सही जगह पर धागा बांधा जा सके।इसके लिए कोटन के धागे को पहले पानी भिगोया जाता है ताकि वह एक दम फिट कसकर बांधा जा सके। एक ताणी पर एक साथ 9-10 महिला पुरुष कारीगर काम करते हैं। साड़ी का पल्लू बनाने के लिए पाटी तैयार की जाती है।
- धागा बांधने की प्रक्रिया को डिजाइन के अनुसार चेक करना-
ताणी अथवा पाटी जिस पर कोटन धागा की गांठ बांधी जाती है वह डिजाइन के अनुसार ठीक है या नहीं इसको चेक करने का कार्य कार्यस्थल पर ही सुपरवाइजर द्वारा बड़ी सावधानी से चेक किया जाता है तथा जरूरत होने पर तत्काल सुधारा जाता है ताकि पटोला के फाइनल प्रोडक्ट में भूल की संभावनाएं न रहें।
- कलर (डाई) करना-
प्राकृतिक व रासयनिक कलर उबलते गर्म पानी में 10-15 मिनट तक कलर करने वाले भाग को डाला जाता है फिर साफ पानी से धोकर, कपड़े से पोंछ कर सुखा लिया जाता है। फिर दूसरे कलर के लिए प्रोसेस की जाती है। डिजाइन में जितने कलर होते हैं उतनी ही इस धागे को डाई अर्थात् कलर की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
- बुनाई कार्य-
रोजवुड एवं वांस की पट्टियों से बने परंपरागत हार्नेश लूम पर बुनाई कार्य किया जाता है। लूम एक तरफ थोड़ा झुका होता है इसलिए एक लूम पर एक साथ 2 लोगों को काम करना पड़ता है। इसमें वृद्ध, प्रोढ़, युवा महिला – पुरुष सभी कार्य करते हैं। बुनाई और फिनिशिंग का कार्य अंतिम चरण की कामगीरी है जिसमें अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है। कारीगरों ने बताया कि वे यहाँ के फोटो लेने नहीं देते क्योंकि मार्केट में आने से पहले यदि डिजाइन कॉपी हो जाय तो कीमत गिर जाती है। इसलिए यह प्रक्रिया सार्वजनिक होते हुए भी गोपनीय रहती है। इन कारीगरों को बेहतर महेनताना मिल पाता है। ये कारीगर ठेके पर बुनाई और फिनिशिंग का काम करते हैं। ताकि जितना अधिक काम कर सकेंगे उतनी अधिक आय अपने व परिवार के लिए अर्जित कर सकेंगे। अपनी नई पीढ़ी को सिखाने का कार्य भी ये उस्ताद लोग बखूबी करते हैं और अपने शागिर्दों की तरक्की से बेहद खुश भी रहते हैं। बुनाई व फिनिशिंग कार्य से जुड़े एक ही परिवार के महिला व पुरुष सदस्य भी जुड़े हैं। 70 वर्षीय गिरधरभाई-इन्होंने 50 से अधिक शागिर्दों को तैयार किया है। जिन पर इन्हें गर्व हैं। आज भी उतनी ही ऊर्जा के साथ इस कार्य में लगे हुए हैं। इनकी सफाई और दक्षता का आज भी कोई सानी नहीं है।
हस्तकला कारीगर समुदाय के चयनित उत्तरदाताओं की जनसांख्यिक लाक्षणिकताएं एवं प्रतिभाव….
- पटोला निर्माण कार्य में आधे से ज्यादा उत्तरदाता युवा हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यह हस्त कला युवा आबादी को रोजगार देने की क्षमता रखती है। वहीं 13 प्रतिशत उत्तरदाता किशोर अर्थात् 15 वर्ष एवं उससे अधिकआयु के हैं यदि इसे बालश्रम के कानूनी दायरे से परे रखकर देखा जाय तो यह कहा जा सकता है कि इस कला के क्षेत्र में छोटी उम्र से सीखने सिखाने की प्रक्रिया वर्तमान में अनवरत चल रही है। इनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी का हिस्सा भी हैं। 31-50 वर्ष के लगभग 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं जो संभवतः परिवार की सकल आय में वृद्धि की इच्छाशक्ति के साथ इस कला में संलग्न हैं।
- शोध में लिंगानुसार महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत एक तिहाई है जो कोटन धागा बांघने व पाटी तैयार करने आदि उप प्रक्रिया से जुड़ी हैं।
- पटोला हस्तकला में सामान्य वर्ग के उत्तरदाता 69 एवं अन्य पिछड़ावर्ग के 21 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जन जाति का कोई उत्तरदाता नहीं है। सामान्य जाति वर्ग में ठाकोर, चौधरी, रावल गुप्ता आदि उप जातियों का समावेश किया जा सकता है। इन आंकड़ों को कला और सामाजिक स्तर अथवा कला का समाज में स्थान की दृष्टि से जोड़कर देखें तो कह सकते हैं कि समान्य वर्ग का अधिक प्रतिशत इस बात का गवाह है कि इसमें कार्य करने वालों को सामाजिक तौर पर निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाता।
- शिक्षण की दृष्टि से देखें तो अधिकांश उत्तरदाता पढ़े-लिखे ही हैं लगभग दो तिहाई का समावेश प्राथमिक व माध्यमिक स्तर तक के शिक्षण में हो जाता है। फिर भी उच्च माध्यमिक एवं स्नातक स्तर तक शिक्षण प्राप्त करने सुंक्त प्रतिशत 23 है। इनको शिक्षण ठूटने का ज्यादा गम नहीं हैं क्योंकि काम सीख लेने एवं काम मिल जाने की खुशी जो है।
- विवाहित एवं अविवाहित दोनों ही इस कला से जुड़े हुए हैं।
- कुछ एक उत्तरदाताओं को छोड़कर ज्यादातर कारीगर स्थानीय हैं और पाटण के आसपास से 10-15 कि.मी, के दायरे से आते हैं। इन उत्तरदाताओं की वर्तमान आय का मुख्य स्रोत पटोला की कामगीरी ही है किन्तु कुछ उत्तरदाता का सहायक आय का स्रोत मजदूरी भी है। जाति के अनुसार देखें तो सर्वाधिक ठाकोर समुदाय के उत्तरदाता ही मजदूरी कार्य में द्वितीयक स्रोत के रुप में संलग्न हैं।
- संयुक्त कुटुंब वाले उत्तरदाता 87 प्रतिशत हैं जहाँ 5-8 सदस्य वाले परिवारों की संख्या सर्वाधिक है। ज्यादातर कमाने वाले सदस्य अंशकालिक रोजगारी में संलग्न हैं। अधिकांश उत्तरदाताओं के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अधिक अच्छी नहीं हैं।
- 3500-5000 रूपये मासिक आय में 25 प्रतिशत उत्तरदाता हैं तथा इतने ही 5000-7000 रुपये मासिक में हैं। अर्थात् आधे उत्तरदाता बहुत ही कम मजदूरी लेकर जीवन यापन को विवश हैं। मात्र 25 प्रतिशत उत्तरदाता ही 15000-25000 मासिक आयोपार्जन कर रहे हैं ये वे कारीगर हैं जो पटोला डिजाइन एवं बुनाई जैसे कुशल कार्य में रत हैं। कुटुंब की मासिक आय देखें तो 4000-8000 रुपये मासिक आय वर्ग में सर्वाधिक उत्तरदाता आ जाते हैं।
- मकान उत्तरदाता के सामाजिक आर्थिक स्तर को स्प्ष्ट रूप से प्रकट कर देता है। लगभग 46 प्रतिशत उत्तरदाताओं के मकान कच्चे हैं जिनका स्तर निम्न कहा जा सकता है 10 प्रतिशत अर्ध पक्के मकान वाले उत्तरदाताओं की स्थिति इस पैमाने पर सामान्य के थोड़ा नीचे एवं आसपास कही जा सकती है। मात्र 8 प्रतिशत के मकान पक्के एवं सुविधायुक्त (फ्रिज, टी.वी. बाइक आदि) हैं। मात्र एक तिहाई उत्तरदाताओं के पास ही जमीन है।
- लिंगानुसार इस कला में भगीदारी देखें तो सर्वाधिक 35 प्रतिशत उत्तरदाता ताणी और पाटी बनाने एवं उस पर कोटन की गांठ बांधने वाले काम से जुड़े हुए हैं जिसमें कुल महिला उत्तरदताओं के 69 प्रतिशत उत्तरदाता संलग्न हैं। इसके बाद सबसे अधिक पारश्रमिक वाली बुनाई उप प्रक्रिया में एक चौथाई उत्तरदाता है किन्तु उसमें महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत मात्र 17 है। डाई अर्थात् कलर काम में 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं किन्तु इस प्रक्रिया में कोई भी महिला उत्तरदाता नहीं है। गांठ बांधने के कार्य में संलग्न 10 प्रतिशत उत्तरदाताओं में महिला पुरुष दोनों काम रहे हैं पुरुष – महिला 40 – 60 के अनुपात में हैं।
- सभी जातियों की महिलाएं पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाओं से जुड़ी हैं जिससे सिद्ध होता है कि लिंग के आधार पर इस कार्य एवं इसकी किसी भी प्रक्रिया में कार्य करना सामाजिक रूप से निम्न नहीं माना जाता। दूसरे हम यह भी कह सकते हैं कि कार्यस्थलीय व्यवस्थाओं के प्रति कारीगर समाज का विश्वास बना हुआ है जिससे उन्हें अपने घर की महिलाओं के यहाँ भेजने किसी भई तरह की आपत्ति नहीं है।
- पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि विभन्न स्तरों पर की जाने वाली प्रक्रियात्मक कामगीरी में तकनीकी कुशलता एवं अर्थोपार्जन की दृष्टि से स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
- शिक्षण व कामगीरी के संबंध के संदर्भ को लेकर सामान्यीकरण तो नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी तरह की कामगीरी में सभी शैक्षणिक स्तरों का समावेश है किन्तु अध्ययन में यह पाया गया है कि शुरुआती कम कुशलता वाले कार्यों में उत्तरदाताओं का शैक्षणिक स्तर अपेक्षाकृत कम है।
- उम्र एवं कामगारी के संबंध को देखें तो हम पाते हैं कि 20 वर्ष से कम आयु के अधिकांश कारीगर ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने तथा कलर करने के काम में लगे हैं। 21 से 30 वर्ष की वय जिसमें सर्वाधिक उत्तरदाता हैं उसमें से 50 प्रतिशत ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने के कार्य में रत हैं तथा इसी उम्रवय के 28-28 प्रतिशत उत्तरदाता कलर व बुनाई काम में लगे हुए हैं।
- उत्तरदाताओं के काम सीखने के स्रोत अलग अलग हैं यथा काम करते करते सीख लेना जिसमें आरंभिक प्रक्रिया को सम्मिलित किया जा सकता है। किन्तु जो कारीगर बुनाई के कार्य में लगे हैं उनमें से अधिकांश वंशानुगत एवं गुरु-शिष्य परंपरा की तरह प्रशिक्षित हुए हैं। वंशानुगत रूप से पटोला कार्य में जुड़े कारीगरों का प्रतिशत छठवां भाग ही है। इसलिए संशोधन में सर्वाधिक कारीगर (71प्रतिशत) 3-5 वर्ष के अनुभव वाले पाये गए हैं जो कतिपय कम कुशल प्रक्रियाओं से सरोकार रखते हैं।
- पटोला निर्माण कार्य में अधिकांश कारीगर मजदूर के रूप में काम करते हैं, कुछ प्रक्रियाओं का ठेके पर लेकर पूर्ण किया जाता है। इस उद्योग में मांग पर्याप्त है। सतत उत्पादन तो होता ही है किन्तु ऑर्डर के अनुसार भी उत्पादन कार्य किया जाता है।
- उत्तरदाताओं के कार्य में सर्वाधिक सहयोगी उनके माता पिता हैं, स्कूल तथा घरकाम के चलते बच्चे और पत्नी भी समय मिलने पर मदद कर पाते हैं। कारीगरों के विकास में अवरोधक घटकों में वे पटोला निर्माण कार्य में लगने वाला अधिक समय तथा सामाजिक प्रसंगों की अनिवार्यता वश काम में रुकावट का आना आदि है। इस समस्या के समाधान हेतु वे सीखने की प्रक्रिया में तेजी लाना, एकाग्रता के साथ काम करना, सहयोग के साथ काम करना तथा तनाव को कम करने का प्रयास करना आदि को आवश्यक मानते हैं। इस तनाव के लिए शारीरिक, मानसिक एवं कार्यवातावरणीय संकीर्णता को जिम्मेदार मानते हैं। ये समस्याएं आरंभिक प्रक्रिया स्तर पर उत्तरदाताओं द्वारा अधिक की जाती हैं क्योंकि अपेक्षाकृत प्रतिफल कम और शारीरिक मानसिक थकान एवं अनइजीनेस ज्यादा है। इसके चलते व्यक्तिगत एवं संगठनात्मक स्तर की उत्पादकता तथा परिवारीजनों के शिक्षण स्वास्थ्य आदि जीवन स्तरीय घटकों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पटोला उद्योग मे कार्यरत उत्तरदाताओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को स्पष्ट करती है। एक साथ एक ही तरह का कार्य करने से हाथ-पैर व जोड़ों के दुखने समस्याएं उत्तरदाताओं में देखने को मिलती हैं। उत्तरदातओं के मतानुसार सावधानी रखकर, संवेदना विकसित कर तथा मानवीय मूल्य प्रेरित जवाबदारी महसूस करके यथोचित निदान किया जा सकता है।
- व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए अधिकांश उत्तरदाता डिजिटल ट्रांजेक्सन, एडवांस मार्केटिंग टेक्नोलोजी के ज्ञान कौशल्यों के विकास की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
- अधिकांश उत्तरदाता (83 प्रतिशत) पटोला निर्माण कार्य की विविध प्रक्रियाओं में उन्हें पूर्ण रोजगार मिल जाता है। हालांकि उनका वेतन कम है लेकिन काम की निरंतरता से वे खुश हैं।
- मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
हस्तकला कामगीरी….कारीगर समुदाय तथा उनकी पारश्रमिक व्यवस्था
वर्तमान में इस कला की विविध प्रक्रियाओं में सालवी परिवार के अलावा विभिन्न जाति के स्थानीय महिला, पुरुष किशोर व युवाओं ने अपना स्थान बनाया है। पटोला काम में गुप्ता, ठाकोर, रावल, चौधरी, सालवी, दरबार, पटेल, गोहिल, लींबाचिया, पारीख आदि उप जातियों के लोग जुड़े हैं। महिला और पुरुष दोनों ही इस निर्माण प्रक्रिया में सहभागी हैं। महिलाएं मुख्यतः पाटी में धागा बांधने, कलर वाले धागे बांधने, ताणी बांधने काम कर रही हैं जबकि पुरुष पाटी बनाने, ताणी बांधने, कलर काम तथा बुनकर काम करते देखे गए हैं।
डिजाइन की प्राथमिक संकल्पना इकाई मालिक सालवी परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है जिसमें ग्राहकों की पसंद व मांग को प्राधान्य दिया जाता है वे डिजाइन की प्रकृति के अनुसार उसमें लगने वाले समय व संसाधन का मूल्यांकन करने का कौशल्य रखते हैं तथा निर्णय लेने का सामर्थ्य भी। उनके पास रेशम खरीदने से लेकर विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए कारीगरों की व्यवस्था करने की सत्ता होती है। पटोला मार्केटिंग की व्यूहरचना के केन्द्रीय निर्णयों में भी यही मालिक लोग होते हैं। इसे तकनीकी प्रबंधकीय की शीर्ष स्थिति भी कहा जा सकता है इसलिए लाभ का एक बड़ा भाग इसके हिस्से में रहता है। ये उद्योग साहसिक एवं जोखिम वहनकर्ता होते हैं जो पूँजी व एकम की कामगीरी का बेहतर प्रबंधन करते हैं।
पटोला साड़ी तैयार करने की प्राथमिक प्रक्रियाओं यथा-पाटी या ताणी तैयार करना, बंच बनाना, कोटन का धागा बांधना, हर स्तर पर डिजाइन की चौक्कसाई की जांच करना, कलर काम करने वाले जो काफी कम वेतन पर कार्य करते है। अनुभव के आधार इसमें थोड़ा बहुत इजाफा होता है। कलर से पूर्व कोटन धागा बांधने वाले कारीगर यद्यपि तकनीकी कार्य करते हैं किन्तु रूटीन कार्य होने से उनका 3500 से 5000 प्रतिमाह के मध्य ही रहता है। इनका रिप्लेसमेंट आसानी से कभी भी किया जा सकता है। अर्थात् इस कार्य को थोड़ी मेहनत व लगन से करके गति दक्षता प्राप्त की जा सकती है। यह असंगठित श्रम समुदाय है इसको मजदूरी के अलावा अन्य कोई लाभ नहीं मिलता।
इनके सुपरवाइजर धागा बांधने के कार्य को दी गई डिजाइन के अनुसार जाँच करते हैं जिनका वेतन इनसे लगभग डबल और अनुभव के आधार पर बढ़ता चला जाता है। हर एक सामूहिक कार्य की डिजाइन मेचिंग अनुरूप जाँच कम मेहतन और कम जिम्मेदारी वाला कार्य नहीं है। इसलिए इनका रिप्लेसमेंट बहुत जल्दी संभव नहीं होता। लेकिन इनका वेतन बहुत संतोषकारक तो नहीं कहा जा सकता।
बुनाई के काम की मेहनत, चौक्कसाई, तथा डिजाइन गुप्तता आदि के साथ यदि इन कारीगरों को मिलने वाले पारश्रमिक को देखते हैं तो इनकी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण तथा बेहतर मानी जा सकती है ये महीने में 18000-25000 या 30000 तक कमा लेते हैं। इन पर सालवी परिवार से जुड़े एवं निकटस्थ परिवारों का वंशानुगत कब्जा है। सीखना सिखाना भी लगभग वंशानुगत है। इस प्रक्रिया में भी बहुत जल्दी किसी को भी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। ये लोग ठेके पर भी बुनाई का काम ले लेते हैं। फिनिशिंग व समयसर कामगीरी इनके गुणवत्ता मानक हैं। इसलिए इस अंतिम प्रक्रिया को कार्य की जटिलता व पारश्रमिक दोनों ही दृष्टि से अति महत्व का माना जा सकता है।
अधिकांश कारीगर मालिक के इकाई में मजदूर या कर्मचारी के रूप में ही काम करते हैं स्वतंत्र रूप से नहीं। वे 8-12 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हुए जीवन निर्वाह करते हैं। कुछ कारीगर ठेके पर (कार्य के अनुसार एक मुश्त प्रतिफल) पर कार्य करते हैं। वे सभी निम्न मध्यम स्तरीय कम महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न रहते हैं। उनकी जगह किसी भी नए व्यक्ति को आसानी से बदला जा सकता है। जबकि सालवी परिवार के सदस्य बतौर मालिक कार्य करते हैं। बुनाई का काम करने वाले कारीगर सालवी परिवार से पुराना निकटतम संबंध रखते हैं। यह कार्य अंतिम तबक्के का है इसे कार्य की जटिलता और प्रतिफल की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इकाई मालिकों का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन विविध स्तरीय प्रक्रियाओं से जुड़े कारीगरों को प्राप्त होने वाले दैनिक औसत पारश्रमिक पर दृष्टिपात करें तो अंतर स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगता है।
इस पटोला उद्योग में अधिकांश कारीगर संयुक्त कुटुंब से आते है जहाँ सदस्य संख्या 6-8 है। मुखिया पर घर का भार होता है कुटुंब में से 2-3 व्यक्ति ही कमाते हैं। काम के अवसर मिलने पर घर की महिलाएं कम मजदूरी में भी इस कार्य से जुड़ जाती है। जो लड़कियां बीच में शिक्षण छोड़ चुकी हैं वे भी इसमें जुड़ी हैं। कम उम्र के बच्चे भी ये कार्य कर रहै हैं। सालवी कुटुंब के बच्चे इस कार्य से जुड़े हैं। ये कारीगर अपने बच्चों का शिक्षण भी पूरा नहीं करा पाते उन्हें बीच में ही छुड़वा देते हैं। कुछ आय होने से परिवार व समाज में उनकी स्थिति बेहतर बनती है और वे घर की बुनियादी जरूरतों के पूरा करने में अपनी कुछ योगदान कर पाती हैं। कई कारीगरों के घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है उनके मकान कच्चे, अर्ध पक्के हैं जिसमें प्रमुख बुनियादी सुविधाओं की कमी दिखाई देती है। इस मजदूरी से उनका भरणपोषण चलता है।
रेशम का धागा मुलायम अवश्य है किन्तु धारदार है। इसलिए यदि उंगली पर कपड़ा ठीक से न बंधा हो तो कलर करने वाले व धागा बांधने वाले कारीगरों की उंगली को घायल कर देता है। इस कार्य में एक 4 घंटे एक ही पोजीशन बैठे रहने से कारीगरों को कमर का दर्द एवं शारीरिक थकान अधिक महसूस होती है। बुनाई का कार्य सघन व गहन होने से आंख के नंबंर तथा सिर दर्द की समस्याएं बनी रहती है।
इस हस्तकला की संचालन व्यवस्था में सामान्य तकनीकी का प्रवेश तो हुआ है जिसके साथ काम करने के लिए नये पुराने कारीगरों को इसका अभ्यस्त होना पड़ता है किन्तु इस हस्तकला में प्रयुक्त होने वाले संसाधनों पर कारीगरों का समान अधिकार नहीं है और न ही उन पर अधिकार करने की आर्थिक क्षमता। इसलिए इनके उपयोग के लिए हस्तकला इकाइयों के मालिकों की मर्जी पर निर्भर रहना पडता है एवं तदनरूप कार्य निर्णयों को आकार देना पड़ता है। हस्तकला के क्षेत्र में मार्केटिंग की समस्या बनी हुई है। जी.आई. टेग के बावजूद अन्य का हस्तक्षेप यहाँ दिखाई देता है। जैसा कि पाटण का पटोला हस्तकला इकाई के मालिक एवं एशोसिएशन के सदस्य पदाधिकारी ने बताया कि हम मांग के अनुरूप ही उत्पादन कर पाते हैं जिन लोगों को आर्जिनल माल खरीदना होता है वे हमसे सीधे संपर्क करते हैं इसिलए हमें नकल करने वालों से ज्यादा परेशानी नहीं होती।
उपसंहार-
अंत में यह कहा जा सकता है कि हस्तकला कारीगरों में मालिकी का प्रमाण घटने लगा और वे कुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक के रूप में चिन्हित होने लगे। इसके परिणाम स्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति डंवाडोल होने लगी और वे रोजगारी के अन्य विकल्पों की ओर भी पूरक व स्वतंत्र रूप से उन्मुख होने लगे। कारीगर समुदाय कतिपय कारणों से अपनी योग्य संतानो एवं परिजनों को इसमें लाना नहीं चाहते क्योंकि इसमें उन्हें समुन्नत जीवन यापन हेतु आर्थिक सुनिश्चितता दिखाई नहीं देती।
कला का अस्तित्व कारीगरों की हस्ती पर टिका होता है। छोटे कारीगर जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है वे किस प्रकार स्वयं को टिकाए रख सकते हैं इस तरफ गंभीरता से विचार करना होगा। एक अहम् प्रश्न हस्तकला कारीगरों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तनों को लेकर है कि अनुकूल परिवर्तन कैसे लाया जाय, कार्यस्थलीय वातावरण को कैसे सहज और प्रभावी बनाया जाय, संघर्ष व तनाव कैसे घटाया जाय तथा कार्य निष्पान गुणात्मक मात्रात्मक सुधार हो और बिना किसी टकराव के उनका व उनके परिवार का जीवनस्तर कैसे ऊपर उठ सके। पटोला हस्तकला के अधिकांश कारीगरों की मजदूरों जैसी स्थिति का होना,उनका समग्र कला की किसी एक प्रक्रिया विशेष तक ही सीमित होना, सौदेबाजी की कमजोर क्षमता का होना, कार्य संबंधी अपर्याप्त शिक्षण-प्रशिक्षण का होना आदि इस क्षेत्र में विद्यमान हैं। इसलिए वे जिस कार्य को कर रहे हैं उसी तक ही मर्यादित रह जाते हैं। कदाचित हस्तकला कार्य में आंशिक या बहुतायत से मशीनों का प्रवेश हो जाय तथा नफा-नुकसान के गणित पर हस्तकला व्यवसाय पर मालिकाना हक रखने वाले मूल कारीगरों को ही सुनियोजित रूप से उनके स्थान से अलग थलग न कर दें, इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
यदि हस्तकला व्यावसायिक इकाइयों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश कारीगरों की समाजिक –आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। क्योंकि उनकी दैनिक मजदूरी भी मनरेगा के अन्तर्गत मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। स्वास्थ्य के इश्यु बने ही हुए हैं।
कामगीरी का स्वरूप और उससे होने वाली आय में कामगीरी का स्तर प्रतिबिम्बित होता है। पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि उनके मध्य आर्थिक स्तर पर एक अंतर अवश्य दिखाई देता है जिसे इस सारणी में दर्शाया गया है। लगभग आधे उत्तरदाता निम्न स्तर पर आपनी कामगीरी का सम्पादन करते हुए सीमान्त आय का सृजन कर रहे हैं, जिनके बीच में छोड़कर चले जाने से मालिकों को विशेष फर्क नहीं पड़ता। कोई भी दूसरा उनकी जगह आसानी से ले सकता है अथवा थोड़ी सी प्रेक्टिस करके सीख सकता है, कार्य सम्पादित कर सकता है।
निम्न मध्यम स्तर में वे उत्तरदाता हैं जो इस स्तर पर कार्य करते हुए कुछ अनुभवी हो गए हैं जिनकी कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है और वे अपेक्षाकृत अधिक पारश्रमिक ले पा रहे हैं। मध्यम स्तर पर सुपरवाइजरी तथा बुनाई के क्षेत्र में आरंभिक स्थिति में हैं। मध्य एवं उच्च स्तर उन कारीगरों का है जो बुनाई आदि प्रक्रिया से जुड़कर आपनी श्रेष्ठ कार्यकुशलता के आधार पर एक अच्छा पारश्रमिक लेने की स्थिति में हैं।
इस कला के अस्तित्व के संदर्भ में मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
मानव संसाधन के संदर्भ में मांग से अधिक पूर्ति की स्थिति होने के कारण उन्हें आसानी अर्ध कुशल मानव शक्ति आसपास के विस्तार से आसानी से मिल जाती है। क्योंकि इस कार्य को सहजता थोड़ा सा ध्यान से काम करने पर आसानी से सीखा सिखाया जा सकता है इसलिए कारीगरों के बीच में छोड़कर जाने पर समस्या सामान्य रूप से नहीं होती। हाँ, उत्पादन पर अवश्य फर्क पड़ता है यदि सीखने के बाद कारीगर छोड़कर चला जाय। सामान्य रूप से चेकिंग, बुनाई और बंच बनाने वाले कारीगर काम छोड़कर कम ही जाते हैं। यदि काम ऑर्डर के कारण जल्दी पूर्ण कराना हो तो कारीगरों ओवर टाइम के लिए राजी करना पड़ता है। मालिकों का अच्छा व्यवहार ही उनके लिए प्रेरणास्पद साबित होता है।
संदर्भ
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जैन (डॉ.) लोकेश (2020) आदिवासियों की सम्पोषित आजीविका (आदिवासी कारीगरों के पारंपरिक प्रबंधकीय-तकनीकी ज्ञान व कुशलताओं का अध्ययन), एग्री बायोवेट प्रेस, नई दिल्लीISBN 978-93-84502-92-8
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विनोबा भावे(1942) स्वराज शास्त्र, गूजरात विद्यापीठ प्रकाशन, अहमदाबाद
विनोबा भावे(1997) सर्वोदयनुं अर्थकारण (गुजराती), गूजरात विद्यापीठ प्रकाशन,अहमदाबाद
मोहनदास करमचंद गांधी- ग्राम स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
मोहनदास करमचंद गांधी- हिन्द स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
मोहनदास करमचंद गांधी- मंगल प्रभात, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
द्वारा-
डॉ. लोकेश जैन
प्रोफेसर, ग्रामीण प्रबंधन विभाग, प्रबंधन संकाय
गूजरात विद्यापीठ-आश्रम मार्ग, अहमदाबाद(गुजरात) 380009
E-Mail: [email protected] mob. 9427026647
एवं
डॉ. देबेन्द्र दास
सदस्य सचिव (कार्यकारी) एवं सहायक निदेशक (R&N)
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण शिक्षा परिषद(MGNCRE), हैदराबाद
E-Mail: [email protected] mob.7416417852
‘प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता : प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रतिभागिता प्रमाणपत्र
प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता पर दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन संपन्न
प्रयागराज, 24 जून 2025। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित करते हुए जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में 22 एवं 23 जून 2025 को ‘प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता : प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ विषय पर एक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन अत्यंत गरिमा एवं सफलता के साथ संपन्न हुआ। यह संगोष्ठी ‘न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं ‘अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन’ के सहयोग से संपन्न हुई, जिसमें देश-विदेश की लगभग 30 प्रमुख शैक्षणिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं मीडिया संस्थाओं ने सक्रिय सहभागिता की।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष-2025-26 की आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं संरक्षक डॉ. शैलेश शुक्ला की गणमान्य उपस्थिति एवं उनके मार्गदर्शन में यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
दिनांक 22 जून को संगोष्ठी का विधिवत उद्घाटन हुआ। कॉलेज की प्राचार्या प्रो. आशिमा घोष ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आत्मीय स्वागत किया। प्रो. असीम मुखर्जी (अध्यक्ष, शासी निकाय) ने पहलगाम आतंकी घटना एवं ईरान–इजराइल संघर्ष की पत्रकारिता का विश्लेषण करते हुए मीडिया की जिम्मेदारियों और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। उद्घाटन सत्र में प्रो. धनंजय चोपड़ा, पाठ्यक्रम समन्वयक, मीडिया अध्ययन केंद्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, डॉ. रविनंदन सिंह, संपादक – सरस्वती पत्रिका आदि ने हिंदी पत्रकारिता से संबंधित अपने सारगर्भित वक्तव्य दिए।
23 जून को ऑनलाइन आयोजित किए गए समापन सत्र में विद्वानों ने समकालीन पत्रकारिता पर सारगर्भित विमर्श प्रस्तुत किए।
अमेरिका, मॉरीशस, कतर और बेल्जियम से आए अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी पत्रकारिता के भविष्य, डिजिटल मीडिया की दिशा, और सामाजिक भूमिका पर गंभीर संवाद किए।
मारीशस से हिंदी रेडियो ब्रॉडकास्टर डॉ. शशि दूकन, अमेरिका से सृजन अमेरिका पत्रिका के संपादक अरुण नामदेव, बेल्जियम से सृजन यूरोप के संपादक कपिल कुमार, डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (संपादक, सृजन मॉरीशस पत्रिका), तथा डॉ. शैलेश शुक्ला (वैश्विक प्रधान संपादक, सृजन समूह एवं कार्यक्रम के मुख्य आयोजक) ने न्यू मीडिया, मीडिया की विसंगतियाँ, पेड मीडिया, सोशल मीडिया का हस्तक्षेप, और मीडिया के लोकतांत्रिक स्वरूप जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशद चर्चा की।
यह संगोष्ठी ‘न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ और ‘अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में, त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा), बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड जर्नलिज्म (बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी), आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह), अमरावती ग्रुप ऑफ इन्स्टिच्यूशन (वाराणसी), थाईलैंड हिंदी परिषद, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय, और सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन अमेरिका, सृजन मलेशिया, सृजन कतर, सृजन यूरोप, सृजन थाईलैंड, तथा मधुराक्षर पत्रिका आदि के सहयोग से आयोजित की गई।
कार्यक्रम की विशेष उपलब्धियों में हाइब्रिड मोड में अंतरराष्ट्रीय सहभागिता, प्रयागराज की पत्रकारिता पर गहन विमर्श, शोधार्थियों के लिए समृद्ध शोध मंच और पत्रकारिता के लोकतांत्रिक भविष्य पर मार्गदर्शी सुझाव प्रमुख रहे।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने न केवल प्रयागराज की हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान स्वरूप को रेखांकित किया, बल्कि इसके वैश्विक आयामों पर केंद्रित चिंतन को भी गति दी। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता की नई सदी के लिए प्रेरणा और दिशा-दर्शक बनकर उभरा है।
संगोष्ठी में 60 से अधिक प्रतिभागियों ने शोधपत्र वाचन प्रस्तुत कर प्रयागराज की पत्रकारिता पर केंद्रित ज्ञानवर्धक विमर्श को समृद्ध किया। संगोष्ठी का सफल संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन आयोजन प्रभारी प्रो. रतन कुमारी वर्मा ने किया। इस अवसर पर प्रो. नीलिमा मिश्र, प्रो. अर्चना पाल, प्रो. मीनाश्री यादव, तथा सुश्री संगीता सहगल सहित कॉलेज की अन्य शिक्षिकाओं ने सहभागिता की।
कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण विषयक विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून को
फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि के अवसर पर
कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण विषयक विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून को
हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025’ के अंतर्गत ‘कृत्रिम मेधा के दौर में हिंदी पत्रकारिता प्रशिक्षण’ विषय पर एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञ वार्ता का आयोजन 27 जून 2025 को शाम 7:30 बजे किया जाएगा।
यह आयोजन ‘न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं ‘अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें हिंदी पत्रकारिता के साथ-साथ सैन्य इतिहास और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीक रहे फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि को भी श्रद्धांजलि दी जाएगी।

इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन त्रिपुरा केन्द्रीय विश्वविद्यालय, डॉ. आंबेडकर चेयर, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय (बठिंडा), आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, एकलव्य विश्वविद्यालय (दमोह, मध्य प्रदेश), अमरावती ग्रुप ऑफ इन्स्टिच्यूशन, थाईलैंड हिंदी परिषद, जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय तथा सृजन ऑस्ट्रेलिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर, सृजन मलेशिया, सृजन अमेरिका, सृजन थाईलैंड, सृजन यूरोप, मधुराक्षर आदि अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के सहयोग से किया जा रहा है। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता में कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) के बढ़ते उपयोग और उसके प्रभावों पर गहन संवाद को समर्पित होगा, जिसमें विषय-विशेषज्ञ प्रो. संजीव भानावत (प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ, पूर्व अध्यक्ष, जनसंचार केन्द्र, राजस्थान विश्वविद्यालय और संपादक, कम्युनिकेशन टुडे) अपने विचार साझा करेंगे।
फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की 18वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उनके अदम्य साहस, नेतृत्व और भारतीय सैन्य इतिहास में उनके अतुलनीय योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जिन्हें प्यार से ‘सैम बहादुर’ कहा जाता है, 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व करते हुए देश को ऐतिहासिक विजय दिलाने वाले भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल थे। 27 जून 2008 को उनका निधन हुआ था, और इस आयोजन में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा।
कार्यक्रम में वार्ताकार एवं मंच संचालक की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और ‘सृजन संसार’ अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला निभाएंगे। डॉ. शुक्ला के अनुभव और संवाद शैली इस कार्यक्रम को और भी ज्ञानवर्धक और संवादपरक बनाएगी। इस कार्यक्रम में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के सफर को याद करते हुए डिजिटल युग में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभाव पर चर्चा होगी। इसके साथ ही न्यू मीडिया के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता के प्रशिक्षण में आने वाली संभावनाओं, चुनौतियों और नई तकनीकी दिशा पर भी विचार-विमर्श होगा।
इस कार्यक्रम के आयोजन में डॉ. कल्पना लालजी (राष्ट्रीय संयोजक, सृजन मॉरीशस), डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री (संस्थापक-संपादक, मधुराक्षर), प्रो. रतन कुमारी वर्मा (जगत तारन गर्ल्स डिग्री कॉलेज), डॉ. हृदय नारायण तिवारी (एकलव्य विश्वविद्यालय), श्री कपिल कुमार (वरिष्ठ पत्रकार, सृजन यूरोप), डॉ. सोमदत्त काशीनाथ (राष्ट्रीय संपादक, सृजन मॉरीशस), श्री अरुण नामदेव (राष्ट्रीय संपादक, सृजन अमेरिका), शालिनी गर्ग (राष्ट्रीय संपादक, सृजन कतर), प्रो. आशा शुक्ला (संरक्षक) और प्रो. विनोद कुमार मिश्रा (मार्गदर्शक) सहित अनेक विद्वानों का योगदान सुनिश्चित किया गया है।

कार्यक्रम की सफलता के लिए श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला (मुख्य संयोजक एवं संस्थापक-निदेशक, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन, लखनऊ) और श्री प्रशांत चौबे (संयोजक, अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन, लखनऊ) का विशेष सहयोग उल्लेखनीय है। यह आयोजन न केवल हिंदी पत्रकारिता में तकनीकी बदलाव और प्रशिक्षण के नए दृष्टिकोण पर विमर्श करेगा, बल्कि भारत के गौरवशाली सैन्य इतिहास के प्रति भी नई पीढ़ी को जागरूक करेगा।
आयोजकों ने हिंदी पत्रकारिता, मीडिया शिक्षण, तकनीकी शिक्षा, रक्षा अध्ययन, अभिलेख विज्ञान और सामाजिक विज्ञान से जुड़े सभी विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों, पत्रकारों और भाषा प्रेमियों से इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में सहभागी बनने का आग्रह किया है। आयोजन की समस्त जानकारी, पंजीकरण और कार्यक्रम लिंक ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह – 2025’ के आधिकारिक लिंक https://tinyurl.com/IHJM2025DetailsLinksQRCodes पर उपलब्ध हैं। आयोजकों का विश्वास है कि यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयाँ देने के साथ-साथ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के बलिदान और उनकी नेतृत्वगुणों की गौरवगाथा को भी नई पीढ़ी तक पहुँचाएगा।
मध्य प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन
अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता वर्ष 2025-26 के अंतर्गत
मध्य प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन
न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से सृजन अमेरिका, सृजन मलेशिया, सृजन मॉरीशस, सृजन कतर एवं हिंदी विभाग, कला एवं मानविकी संकाय, एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर मनाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता माह- 2025 के अंतर्गत 25 जून 2025 को सुबह 11 बजे से ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों माध्यमों से मध्यप्रदेश में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता : विविध आयाम विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी।
इसमें हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, जनपदीय लेखन, पत्र-पत्रिकाएँ, स्वतंत्रता आंदोलन, आधुनिक तकनीक, डिजिटल मीडिया, और नई प्रवृत्तियों से जुड़े विविध पहलुओं पर देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के विद्वानों के साथ ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, मॉरीशस, कतर के विद्वानों ने मंथन किया।
यह आयोजन एकलव्य विश्वविद्यालय की कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया, प्रति कुलाधिपति श्रीमती पूजा मलैया एवं श्रीमती रति मलैया के कुशल नेतृत्व, कुलगुरू प्रोफेसर पवन कुमार जैन, कुलसचिव डॉ. प्रफुल्ल शर्मा के निर्देशन एवं हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हृदय नारायण तिवारी के संयोजन में किया गया।
इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं संरक्षक विश्व प्रसिद्ध कवि, लेखक, पत्रकार एवं वैश्विक प्रधान संपादक डॉ. शैलेश शुक्ला, पूर्व महासचिव विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस एवं अधिष्ठाता, साहित्य संकाय, त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय डॉ.विनोद कुमार मिश्र, विशिष्ट अतिथि के रूप में विभागाध्यक्ष हिंदी अध्ययनशाला, कुलानुशासक, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा, सीनियर प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी, विषय विशेषज्ञ के रूप में भूतपूर्व संयुक्त निदेशक, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी से प्रोफेसर सेवाराम त्रिपाठी, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल, राष्ट्रीय संपादक सृजन अमेरिका से श्री अरुण नामदेव, सृजन मॉरीशस से डॉ. सोमदत्त काशीनाथ, सृजन मलेशिया से डॉ. रश्मि चौबे, सृजन कतर से श्रीमती शालिनी गर्ग के साथ ही अनेक ख्यातिप्राप्त विद्वानों ने इस संगोष्ठी में विचार मंथन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती एवं प्रथम पूज्य भगवान गणेश के चरणों में दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
कुलगुरू प्रोफेसर डॉ. पवन कुमार जैन द्वारा अभी अतिथियों का स्वागत किया गया साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया गया।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहीं एकलव्य विश्वविद्यालय की कुलाधिपति डॉ. सुधा मलैया ने वर्तमान हिंदी पत्रकारिता खासकर प्रिंट मीडिया में हो रहे भाषायी क्षरण को पटल पर रखते हुए हिंग्लिश आधारित हिंदी के चलन पर चिंता व्यक्त करते हुए इससे बाहर निकलने की बात कही।
बीज वक्तव्य में प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही चुनौतियों को ही वर्तमान की भी चुनौती माना साथ ही मध्यप्रदेश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों का उल्लेख करते हुए इंदौर को पत्रकारिता की उर्वरा भूमि कहा।
प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश के हिंदी साहित्य को रेखांकित करते हुए बुंदेलखंड के साहित्यकारों की लंबी श्रृंखला एवं उनके योगदान को पटल पर रखा।
कतर की धरती से जुड़ी श्रीमती शालिनी गर्ग ने हिंदी की संवेदना को चिन्हित किया।
अमेरिका से जुड़े सृजन अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के राष्ट्रीय संपादक श्री अरुण नामदेव ने भारत के टीवी चैनलों पर हो रही भड़काऊ बहस पर चिंता व्यक्त करते हुए समाधान दिया।
प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल ने पत्रकारिता और लोकतंत्र को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियों से निपटने हेतु समाधान प्रस्तुत किया।
प्रोफेसर सेवाराम त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश की हिंदी पत्रकारिता पर विचार रखते हुए वर्तमान हवा-हवाई पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त किया साथ ही पत्रकारिता में नैतिकता के क्षरण पर भी ध्यानाकर्षण कराया।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे एकलव्य विश्वविद्यालय के कला एवं मानविकी संकाय, अधिष्ठाता प्रोफेसर आर सी जैन ने हिंदी पत्रकारिता की संवेदना पर सहमति व्यक्त की।
द्वितीय सत्र में डॉ. आशीष जैन द्वारा जैन पत्रकारिता के इतिहास को रेखांकित किया गया।
प्रोफेसर सूर्य नारायण गौतम ने कहानी के माध्यम से वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा को चिन्हित किया गया।इस संगोष्ठी में अलग-अलग प्रदेशों से जुड़े दस से अधिक प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने शोधपत्र का वाचन किया।
इस अवसर पर डॉ. शैलेश शुक्ला ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष के सुअवसर पर सृजन समूह द्वारा अनवरत पूरे वर्ष भर में 200 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना है।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र के अंत में कुलसचिव डॉ. प्रफुल्ल शर्मा एवं द्वितीय सत्र के अंत में डॉ. सुधीर गौतम द्वारा आभार व्यक्त किया गया।
इस अवसर पर देश के अलग-अलग राज्यों के प्राध्यापकों, संपादकों, संवाददाताओं, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के साथ ही दुनिया के अनेक देशों अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, मलेशिया, कतर आदि के हिंदी प्रेमी जुड़कर इस ज्ञानयज्ञ को सफल बनाया। कार्यक्रम के अंत में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. हृदय नारायण तिवारी ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया कि यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी अपने उद्देश्य में सफल रही साथ ही भविष्य में इस विषय पर सभी के सहयोग से विस्तृत कार्ययोजना प्रकाश में लायी जाएगी। इस वृहद आयोजन को सफल बनाने में छात्र कल्याण अधिष्ठाता डॉ. शैलेन्द्र जैन, डॉ. शमा खानम, डॉ. सुधीर गौतम, डॉ. वैभव कैथवास, डॉ. स्वाति गौर, डॉ. रमाकांत त्रिपाठी, श्री रणजीत सिंह, डॉ. दुर्गा महोबिया, डॉ. प्रमीला कुशवाहा,आईटी प्रमुख श्री राम नरेश लोधी, श्री मुकेश तिवारी, श्री साहिल कुर्मी एवं सतेंद्र यादव का विशेष सहयोग रहा।














































































































