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चंपावत : उत्तराखंड का वह अनमोल पर्यटन रत्न, जहाँ प्रकृति बार-बार बुलाती है

चंपावत : उत्तराखंड का वह अनमोल पर्यटन रत्न, जहाँ प्रकृति बार-बार बुलाती है

– डॉ. शैलेश शुक्ला

विश्व भर में पर्यटन उद्योग तेजी से बदल रहा है। आधुनिक यात्री अब केवल भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थलों, चमकदार होटलों और कृत्रिम मनोरंजन सुविधाओं की तलाश में नहीं हैं। वे ऐसे अनुभव चाहते हैं जो उन्हें प्रकृति के निकट ले जाएँ, स्थानीय संस्कृति से परिचित कराएँ, मानसिक शांति प्रदान करें और जीवन की भागदौड़ से कुछ समय के लिए दूर ले जाकर आत्मिक संतुलन स्थापित करने का अवसर दें। इसी बदलती वैश्विक पर्यटन प्रवृत्ति के बीच उत्तराखंड का चंपावत जिला एक ऐसे गंतव्य के रूप में उभरता दिखाई देता है, जो न केवल हिमालयी पर्यटन की मूल आत्मा को संजोए हुए है, बल्कि भविष्य के सतत, सांस्कृतिक और अनुभवात्मक पर्यटन की संभावनाओं को भी अपने भीतर समेटे हुए है। विडंबना यह है कि भारत और विश्व के अधिकांश पर्यटक अभी तक इस अनमोल धरोहर से पूरी तरह परिचित नहीं हो सके हैं, जबकि इसकी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संपदा इसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्वतीय पर्यटन केंद्र की श्रेणी में खड़ा करने की क्षमता रखती है।

जब भारत के पर्वतीय पर्यटन की चर्चा होती है, तो प्रायः नैनीताल, मसूरी, शिमला और मनाली जैसे प्रसिद्ध स्थलों का नाम लिया जाता है। इन स्थानों ने दशकों से पर्यटकों को आकर्षित किया है, किंतु बढ़ती भीड़, अनियंत्रित व्यावसायीकरण, यातायात का दबाव और पर्यावरणीय चुनौतियों ने उनके मूल आकर्षण को कई स्थानों पर प्रभावित भी किया है। इसके विपरीत चंपावत आज भी अपनी प्राकृतिक गरिमा, सांस्कृतिक मौलिकता और शांत वातावरण को बड़ी सीमा तक सुरक्षित रखने में सफल रहा है। यही कारण है कि जो यात्री पर्यटन को केवल एक मनोरंजक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव और आत्मिक पुनर्संपर्क के रूप में देखते हैं, उनके लिए चंपावत एक असाधारण गंतव्य सिद्ध हो सकता है।

हिमालय की गोद में बसा यह क्षेत्र प्रकृति की उन दुर्लभ देनों में से एक है, जहाँ पर्वत, वन, नदियाँ, झीलें और आकाश मिलकर ऐसा दृश्य संसार रचते हैं जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। गर्मियों के दिनों में जब उत्तर भारत के मैदानी शहर भीषण गर्मी और प्रदूषण से जूझ रहे होते हैं, तब चंपावत का मौसम अपेक्षाकृत शीतल, स्वच्छ और स्फूर्तिदायक बना रहता है। यहाँ की पहाड़ियों पर फैले देवदार, ओक, चीड़ और बुरांश के वन न केवल क्षेत्र की जैव विविधता को समृद्ध करते हैं, बल्कि पर्यटकों को एक ऐसे वातावरण में ले जाते हैं जहाँ प्रकृति अभी भी अपनी मूल लय में साँस लेती हुई प्रतीत होती है। सुबह की धुंध, पहाड़ियों के पीछे से उगता सूर्य, दूर-दूर तक फैली हरियाली और हिमालय की बर्फाच्छादित चोटियों पर पड़ती सुनहरी किरणें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं।

चंपावत का आकर्षण केवल उसके प्राकृतिक दृश्यों तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय प्रस्तुत करता है। कभी चंद राजवंश की राजधानी रहा यह जिला अपने भीतर मध्यकालीन इतिहास, स्थापत्य कला और धार्मिक परंपराओं की अनेक स्मृतियाँ समेटे हुए है। यहाँ के प्राचीन मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि इतिहास के जीवंत दस्तावेज हैं। बलेश्वर मंदिर जैसे स्थापत्य स्मारक इस बात के साक्षी हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में कला और संस्कृति का विकास कितनी ऊँचाइयों तक पहुँचा था। स्थानीय लोककथाएँ, लोकगीत, पारंपरिक उत्सव और कुमाऊँनी जीवनशैली आज भी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं। ऐसे समय में जब वैश्वीकरण के दबाव में अनेक स्थानीय संस्कृतियाँ अपनी विशिष्टता खोती जा रही हैं, चंपावत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

चंपावत का एक और महत्वपूर्ण पक्ष इसकी आध्यात्मिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी संभावनाएँ हैं। आज की दुनिया अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति के बावजूद तनाव, अकेलेपन और मानसिक थकान जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में वे स्थान अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं जहाँ व्यक्ति कुछ समय के लिए स्वयं से संवाद कर सके। चंपावत के आश्रम, मंदिर, शांत प्राकृतिक परिवेश और हिमालयी वातावरण इस प्रकार के अनुभव के लिए आदर्श परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। मायावती आश्रम जैसे स्थल केवल धार्मिक महत्व नहीं रखते, बल्कि वे आत्मचिंतन, ध्यान और मानसिक संतुलन की तलाश करने वाले लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं। आने वाले वर्षों में जब वेलनेस टूरिज्म और माइंडफुलनेस आधारित यात्राओं की वैश्विक मांग और बढ़ेगी, तब चंपावत जैसे स्थानों का महत्व और अधिक बढ़ने की संभावना है।

पर्यटन की दृष्टि से चंपावत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह अभी भी अपेक्षाकृत कम खर्चीला गंतव्य है। ऐसे समय में जब लोकप्रिय हिल स्टेशनों में एक सामान्य परिवार के लिए यात्रा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, चंपावत मध्यम और निम्न बजट के यात्रियों को भी गुणवत्तापूर्ण अनुभव उपलब्ध कराता है। यहाँ के होमस्टे, गेस्ट हाउस, स्थानीय भोजनालय और ग्रामीण पर्यटन की संभावनाएँ इसे व्यापक सामाजिक वर्गों के लिए सुलभ बनाती हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र केवल उच्च आय वर्ग के पर्यटकों के लिए नहीं, बल्कि विद्यार्थियों, शोधार्थियों, लेखकों, वरिष्ठ नागरिकों, प्रकृति प्रेमियों और परिवारों के लिए भी समान रूप से आकर्षक बन सकता है।

वैश्विक पर्यटन उद्योग में एक नई अवधारणा तेजी से उभर रही है जिसे “स्लो टूरिज्म” कहा जाता है। इसका उद्देश्य कम समय में अधिक स्थान देखने के बजाय किसी स्थान को गहराई से समझना और अनुभव करना है। यदि इस दृष्टि से देखा जाए तो चंपावत भारत के सबसे उपयुक्त गंतव्यों में से एक बन सकता है। यहाँ आने वाला यात्री केवल दर्शनीय स्थलों की सूची पूरी नहीं करता, बल्कि स्थानीय संस्कृति, भोजन, प्रकृति, इतिहास और जीवन शैली के साथ एक जीवंत संबंध स्थापित करता है। यही वह अनुभव है जो किसी स्थान को बार-बार लौटने योग्य बनाता है।

चंपावत की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि यह पर्यटक को केवल आकर्षित नहीं करता, बल्कि उसके भीतर एक भावनात्मक संबंध भी स्थापित कर देता है। यह उन दुर्लभ स्थानों में से है जहाँ व्यक्ति को यह महसूस होता है कि वह किसी पर्यटन स्थल पर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एक संवाद में सहभागी है। यही कारण है कि यहाँ आने वाले अनेक यात्रियों के मन में पुनः लौटने की इच्छा जन्म लेती है। वे केवल तस्वीरें लेकर नहीं लौटते, बल्कि अपने साथ शांति, स्मृतियाँ और एक ऐसा अनुभव लेकर जाते हैं जो लंबे समय तक उनके जीवन का हिस्सा बना रहता है।

आज जब दुनिया सतत पर्यटन, सांस्कृतिक संरक्षण और मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल यात्रा अनुभवों की ओर बढ़ रही है, तब चंपावत केवल उत्तराखंड का ही नहीं, बल्कि पूरे भारत का एक महत्वपूर्ण पर्यटन मॉडल बन सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इसके विकास की दिशा ऐसी हो जो इसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ पहुँचाए। यदि ऐसा किया गया, तो चंपावत आने वाले वर्षों में हिमालयी पर्यटन का एक ऐसा प्रतीक बन सकता है जहाँ प्रकृति, संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय आत्मीयता एक साथ अनुभव की जा सकती है। और शायद यही वह कारण है कि जो व्यक्ति एक बार चंपावत पहुँचता है, उसके मन में यह भावना अनायास जन्म लेती है कि यह केवल एक यात्रा का गंतव्य नहीं, बल्कि बार-बार लौटकर आने का निमंत्रण है।




साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिद्वन्द्विता की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार बनाने का उपक्रम है यह सम्मेलन-डॉ विकास दवे

डॉ. विकास दवे
निदेशक
साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश
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इंदौर। ​साहित्य की ऐतिहासिक नगरी इंदौर में ‘वीणा की वाणी’ शीर्षक के अंतर्गत देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं पर केंद्रित दो दिवसीय गहन विमर्श का आयोजन मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति परिषद द्वारा आयोजित हुआ। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम ने साहित्य, पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक के अंतर्संबंधों पर नई दृष्टि साझा की।
वाणी अमित जोशी 
पत्रकार 
इंदौर, मध्य प्रदेश 
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कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन सरस्वती वंदना के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में मंच पर श्री उमापति दीक्षित जी, डीएवीवी के कुलगुरू राकेश सिंघई जी, राकेश शर्मा जी (संपादक ‘वीणा’), मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ विकास दवे जी एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्यक्ष सोनाली सिंह नरगुंदे जी उपस्थित रहे।
प्रो. राकेश सिंघई 
कुलगुरु, डीएवीवी, इंदौर 
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स्वागत उद्बोधन में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे जी ने बताया की साहित्य जगत में अगर कार्य करना है तो समरसता की भावना लेकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि कर्नाटक की एक शोधार्थी बहन किसी गांव में अक्षम बच्चों को संस्कृत भाषा में प्रशिक्षित करने का प्रयास कर रही थी और किस प्रकार से उस गांव में उन्होंने जाति भ्रम को दूर कर सभी के बीच समरसता का भाव पैदा किया। ऐसे हमारे देश में अनेकों जीवन्त उदाहरण है, युवा बंधु-भगिनी है, जो इस प्रकार के कार्य को कर रहे हैं।हम इन पत्रिकाओं को एक सूत्र में बांधना चाहते हैं। डाॅ विकास दवे ने बताया कि इन दो दिवस में किस प्रकार से साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं के विषय पर विस्तृत चर्चा होगी और एक से एक धुरंधर पत्रकार एवं साहित्यिक मनीषी विषय पर अपने विचार व्यक्त करेंगे। उन्होंने श्री कृष्ण बेड़ेकर जी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उस समय में आप अंतर्देशीय साहित्य पत्रिका का हस्तलिखित संपादन करते थे। यह बहुत साधारण बात नहीं थी, कितनी मेहनत लगती है यह हम सभी भली भांति जानते है। उन्होंने लघु कलेवर की पत्रिकाओं के संकट पर भी विचार व्यक्त किए।
 
मुख्य वक्ता राकेश शर्मा जी संपादक ‘वीणा’ ने अपने उद्बोधन में रेखांकित किया कि हिन्दी पत्रकारिता अपने 200 गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर रही है, जो हम सभी के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने ‘वीणा’ पत्रिका के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘वीणा’ का अर्थ ही ‘वागर्थ’ है। सत्र के दौरान उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ‘साहित्य स्थाई पत्रकारिता है’ और ‘पत्र-पत्रिका स्थाई साहित्य हैं’। उन्होने स्पष्ट किया कि इतिहास की स्याही बहुत सौभाग्य से मिलती है और वही तथ्य दर्ज होते हैं जो सोच-समझकर पदचाप के साथ चलते हैं।
 
तकनीक के बदलते दौर पर चर्चा करते हुए शर्मा जी ने कहा कि एक समय था जब मनुष्य के जीवन में मशीनों के पूर्व और बाद के साहित्य में अंतर आया था, अब AI के प्रवेश से पूर्व और बाद के साहित्य में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यह एक विकट समय है, क्योंकि जब तक कविता हाथ से लिखी जाती थी, उसमें प्राण थे, लेकिन AI और तकनीक की संवेदना उस गहराई तक नहीं पहुँच सकती। पत्रिकाओं का योगदान के संदर्भ में बात करते हुए राकेश शर्मा ने बताया की 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ पत्रिका ने हिन्दी साहित्य की जो प्रतिष्ठा गढ़ी, उस परंपरा को आगे बढ़ाने में देवनागरी और अन्य पत्रिकाओं के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास की स्याही है जो बहुत सौभाग्य से मिलती है। ‘वीणा’ जैसी पत्रिकाएँ सत्य को आगे बढ़ाने और भ्रम को ध्वस्त करने का माध्यम हैं। 
 
​विमर्श के दौरान यह कड़ा संदेश भी दिया कि जो राजनीति के लिए अपना चोला बदलता है, वह कुछ भी हो सकता है, लेकिन वह एक सच्चा व्यक्ति या साहित्यकार कभी नहीं हो सकता। उमापति दीक्षित जी ने उद्बोधन के साथ शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया। 
 
​कार्यक्रम में राकेश सिंघई जी ने अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों के संस्मरण साझा किए, जहाँ साहित्य और समीक्षा की जीवंत परंपरा थी।आपने भाषा की सजगता पर ध्यान इंगित किया। ​कार्यक्रम में साहित्य जगत की कई लब्धप्रतिष्ठ विभूतियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
 
 
उद्घाटन सत्र में ‘समरसता और संघ’ सोनाली सिंह नरगुंदे जी द्वारा संपादित पुस्तक का विमोचन हुआ। आभार सोनाली सिंह नरगुंदे ने माना।
 
प्रथम सत्र के विषय “जो दिखता है वही बिकता है”( कलेवर लेआउट में रोचकता का अभाव: पठनीय को दर्शनीय भी बनाएं)। इस सत्र में इन विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे :-
मनोज राठौर जी ग्राफिक डिजाइनर
हेमंत खुराना जी प्रिंट तकनीकी विशेषज्ञ,
समावर्तन पत्रिका के संपादक – श्रीराम दवे जी से
संजय पटेल जी ने संचालक के रूप में चर्चा की।
संजय पटेल जी का पहला प्रश्न हस्तलिखित पत्रिका का संपादन होता था, फिर प्रकाशन — अब तकनीकी समय में लेखक की ओर से बदलाव आया या अभी भी पहले जैसी समस्या है? 
 
उत्तर (हेमंत जी): हाँ, बदलाव आया है। तकनीक ने आगे बढ़ाया है, इस वजह से गलती अधिक है। समय सीमा में बंधकर त्रुटिपूर्ण विषय वस्तु या चित्र नहीं भेजने चाहिए।
 
लेआउट में रोचकता का अभाव” और उसे “पठनीय बनाने” पर जोर दिया गया है। तकनीक बनाम परंपरा पर चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि कैसे हस्तलिखित पत्रिकाओं के दौर से निकलकर अब तकनीकी युग में संपादन की चुनौतियाँ बदल गई हैं।
 
त्रुटियों के संदर्भ में भी बात की गई और यह उल्लेख किया गया है कि तकनीक के बावजूद, समय की कमी के कारण गलतियाँ अधिक होने की संभावना बनी रहती है।
 
साहित्यिक पत्रिकाओं का स्वरूप: तकनीक, चुनौतियाँ और सृजन का भविष्य, ​साहित्य और पत्रकारिता के बदलते परिवेश में पत्रिकाओं के संपादन, डिजाइन और उनकी पठनीयता को लेकर सत्र था। इस चर्चा में साहित्य जगत के दिग्गजों और तकनीकी विशेषज्ञों ने एक मंच पर आकर पत्रिकाओं के गिरते स्तर, बढ़ती तकनीकी सुगमता और भविष्य की चुनौतियों पर गहन मंथन किया।
 
​”जो दिखता है वही बिकता है”: आवरण की महत्ता
​चर्चा की शुरुआत इस विषय से हुई कि “जो दिखता है वही बिकता है”। जैसे प्रश्न पर ग्राफिक डिजाइनर मनोज राठौर जी ने जोर देते हुए कहा कि पत्रिका का आवरण उसकी पहली पहचान है। उन्होंने तर्क दिया कि आवरण ही वह प्रवेश द्वार है जिसे देखकर पाठक पत्रिका के भीतर प्रवेश करता है। चर्चा में यह बात भी उभरकर आई कि हिंदी भाषा के पास आकर्षण की कोई कमी नहीं है, बस उसे सही प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता है। शुद्धता के मामले में उन्होंने वीणा जैसी पत्रिकाओं के उच्च मानकों का उदाहरण दिया।
 
​जब यह प्रश्न आया तकनीक वरदान या अभिशाप?
​तब हेमंत जी ने संपादन प्रक्रिया में आए तकनीकी बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्वीकार किया कि तकनीक ने काम को गति तो दी है, लेकिन इसके साथ ही गलतियों की संभावना भी बढ़ गई है। ​”तकनीक ने हमें आगे तो बढ़ाया है, लेकिन समय सीमा के दबाव में अक्सर त्रुटिपूर्ण सामग्री या चित्रों का चयन हो जाता है, जिससे बचना अनिवार्य है।” ​इस सत्र में GIGO (Garbage In, Garbage Out) के सिद्धांत पर भी चर्चा हुई, जिसका अर्थ है कि यदि इनपुट या कच्चा माल खराब होगा, तो अंतिम परिणाम भी वैसा ही मिलेगा। संजय जी ने पिक्सल और रिज़ॉल्यूशन की महत्ता समझाते हुए DPI और गुणवत्ता के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया।
 
​ श्री राम दवे ने संपादन को एक 24/7 चलने वाला मस्तिष्क कहा। ​’समावर्तन पत्रिका के संपादक श्रीराम दवे जी ने एक संपादक की चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि देशभर में लगभग 4500 पत्रिकाएं निकलती हैं, जो दो वर्गों में विभाजित हैं:
धनाढ्य पत्रिकाएं-जिनका प्रसार और लेआउट भव्य होता है। स्वयं के खर्च पर निकलने वाली पत्रिकाएं- जो सीमित संसाधनों में भी साहित्य की सेवा कर रही हैं। ​उन्होंने कहा कि एक संपादक का कार्य केवल ऑफिस समय तक सीमित नहीं है, उसका मस्तिष्क 24/7 सक्रिय रहता है। उन्होंने अपनी भूलों से सीखने की सलाह देते हुए कहा कि जल्दबाजी में कभी भी ‘रचना नही भेजना चाहिए।
 
​डिजाइनर की अपेक्षाएं और तकनीकी बारीकियां
​कार्यशाला में डॉ. विकास दवे जी और संजय पटेल जी ने तकनीकी सवाल उठाए। मनोज राठौर जी ने स्पष्ट किया कि एक बेहतर पत्रिका के लिए संपादक और डिजाइनर के बीच तालमेल होना आवश्यक है। डिजाइनर की अपेक्षा होती है कि उसे सामग्री पूरी तरह संपादित और प्रूफ-रीडिंग के बाद मिले ताकि वह लेआउट पर ध्यान केंद्रित कर सके। ​चर्चा में 4 Color Printing के साथ-साथ पांचवें रंग (Special Colors) के प्रयोग पर भी बात हुई, जिसका उपयोग व्यापारिक और पैकेजिंग प्रिंटिंग में अधिक होता है। साहित्यिक पत्रिकाओं में सिलेक्टेड कलर्स और अच्छी गुणवत्ता के कागज़ (GSM) के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
 
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​इस सत्र का सार यह रहा कि डिजिटल युग में मोबाइल आधारित पढ़ाई बढ़ रही है, लेकिन साहित्यिक पत्रिकाओं की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। ‘समावर्तन जैसी पत्रिकाओं ने अपने विशेषांकों के माध्यम से जो मानक स्थापित किए हैं, वे प्रेरणादायी हैं। अंततः, एक सफल पत्रिका वही है जो तकनीक का सहारा तो ले, लेकिन अपनी मौलिकता, भाषा की शुद्धता और वैचारिक गहराई से समझौता न करे।
 
द्वितीय सत्र में विषय ‘थोड़ी हंसी थोड़ी खुशी’ में कार्टून विधा पर रोचक चर्चा हुई। साहित्यिक पत्रिकाएं कंटेंट पर आधारित होती है किंतु कंटेंट भी रोचक होना चाहिए। डॉ विकास दवे ने बताया कि डाॅ देवेंद्र शर्मा जी की कूची के साथ-साथ उनकी कलम भी चलती है।
 
साहित्य और कार्टून विधा पर एक सार्थक संवाद हुआ। सत्र का प्रारूप कुछ ऐसा था, कि डॉ देवेंद्र शर्मा जी को मंच पर अकेले बैठना था और श्रोतागण से आने वाले सवालों के जवाब देना था। लेकिन हुआ कुछ यू कि उन्होंने डाॅ विकास दवे जी को मंच पर आमंत्रित किया इसके बाद तो क्या ही था, दवे जी के साथ-साथ मंच के सामने से आने वाले सवालों की झड़ी लगी थी और डॉ देवेंद्र शर्मा हर एक प्रश्न का बड़ी कुशलता के साथ में, अपने जीवन के रोचक अनुभव सुनाते हुए, एक-एक प्रश्न का उत्तर देते गए।
 
कलम की शक्ति और सामग्री को ध्यान में रखते हुए सत्र की शुरुआत में इस बात पर जोर दिया गया कि यद्यपि साहित्यिक पत्रिकाएं मुख्य रूप से प्रिंट माध्यम पर आधारित होती हैं, लेकिन उनकी सफलता के लिए केवल छपाई पर्याप्त नहीं है। पत्रिकाओं का ‘कंटेंट’ (विषय-वस्तु) उत्कृष्ट होना चाहिए।
 
लघु पत्रिकाएं और कार्टून विधा पर डॉ. देवेन्द्र शर्मा ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया कि लघु पत्रिकाएं कार्टून विधा को और अधिक रोचक बनाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो सकती हैं। उन्होंने ‘जुरासिक पार्क’ जैसे वैश्विक उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि कैसे दृश्यात्मक प्रस्तुति पाठकों को गहराई से जोड़ती है और उसे कुड़ासिक पार्क बनाकर प्रस्तुत करती है।
 
प्रश्न के दौरान इस बात पर भी सहमति बनी कि कार्टून विधा के माध्यम से कालजयी पात्र गढ़े जा सकते हैं। इस संदर्भ में ‘शंकर पिल्लई’ को याद किया गया, जिन्हें ‘भारतीय कार्टून जगत का पितामह’ माना जाता है।
 
संपादन और व्यंग्य चर्चा में स्वदेश (फूलबगिया) और वाजपेयी जी के संपादन कौशल का उल्लेख करते हुए बताया गया कि एक संपादक के लिए यह तय करना कितना चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण होता है कि कब और कैसे व्यंग्य चित्रों का प्रयोग किया जाए।यह कह सकते हैं कि ​यह सत्र केवल हास्य-परिहास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने साहित्य के गंभीर धरातल पर कार्टून और व्यंग्य की प्रासंगिकता को नए सिरे से स्थापित किया। डॉ. विकास दवे के कुशल संयोजन और डॉ. देवेन्द्र शर्मा के प्रखर विचारों ने उपस्थित साहित्य प्रेमियों को एक नई दृष्टि प्रदान की।
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तृतीय सत्र
संपादकों द्वारा अपने पत्र पत्रिकाओं का संक्षिप्त उल्लेख: साथ ही प्रसार संख्या विषय पर एक ऐसा सत्र संपन्न हुआ जहां इंदौर शहर एवं शहर से बाहर से पधारे पत्रकारों एवं संपादकों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिला। जिनमें उपस्थित रहे, गोपाल माहेश्वरी जी- संपादक देवपुत्र, नरेंद्र दीपक जी- पहला अंतरा, मनोज जी – समागम, संदीप ‘सृजन’ जी- अभिनव शब्द प्रवाह एवं राजेश रावल ‘सुशील’ लोकभाषा की राष्ट्रीय पत्रिका “संस्कृति संवाद” से।
 
चतुर्थ सत्र सारंग क्षीरसागर, चित्रांकन विधा से एवं सोनाली सिंह नरगुंदे जी पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, विभागाध्यक्ष की उपस्थिति में प्रारंभ हुआ विषय था ‘कला और साहित्य का संगम’ साहित्य पत्र पत्रिकाओं में चित्रांकन का सौंदर्य। सत्र में सोनाली जी ने जहाँ कला के सौंदर्यात्मक पक्ष को सामने रखा, वहीं सारंग जी ने तकनीक और अभ्यास के महत्व पर प्रकाश डाला। सारंग जी ने कहा चित्रकला केवल रंगों का मेल नहीं है, बल्कि यह मौन शब्दों की एक सशक्त भाषा है।
 
चित्रांकन विधा पर चर्चा के दौरान इस सत्र में रेखाचित्र, छायांकन और विभिन्न माध्यमों (जैसे पेंसिल और वॉटरकलर) के प्रयोग पर विस्तृत चर्चा की गई। मंच पर चित्रांकन विधा के विभिन्न आयामों को प्रदर्शित किया गया, जिसमें कृतियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति के दृश्यों को जीवंत किया।
 
सोनाली जी के सवाल और सारंग जी के सटीक जवाब का सिलसिला निरंतर चल रहा था कि श्रोतागण में से डॉ दवे जी ने एक सवाल किया संपादक से चित्रकार की अपेक्षा क्या है?
 
सारंग जी ने जवाब में कहा सबसे महत्वपूर्ण है समय। ‘समय सीमा’ साथ ही उचित पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए।
पंचम सत्र में
विषय: ‘अस्तित्व का संकट’ घटती प्रसार संख्या एक वैश्विक चिंता: समाधान क्या?
ईश्वर शर्मा जी एवं लोकेंद्र सिंह राजपूत जी ने विषय पर अपने विचार रखते हुए ईश्वर शर्मा जी ने अपने चुटीले अंदाज में गंभीर से गंभीर बात को बड़ी ही सहजता से सभी के समक्ष रखा। उन्होंने बताया एआई पर कॉपीराइट्स जैसी कोई समस्या नहीं होती है। साथ ही तकनीक से डरने और घबराने की भी जरूरत नहीं है। बस उसको उपयोग करने का तरीका जो है उसे सीखने की आवश्यकता है। जिससे हमारा काम आसान हो ना कि हम खुद उसके जाल में फस जाए।
 
साथ ही लोकेंद्र सिंह राजपूत जी ने भी बताया कि मैं खुद हार्ड कॉपी के साथ पढ़ने में रुचि रखने वाला व्यक्ति हूं किंतु समय के बदलाव के साथ हममें भी बदलाव होना चाहिए। बस मशीन या तकनीक हमारा उपयोग न करें हमें उनके उपयोग के साथ में आगे बढ़ना है।
अतिथियां के करकमलों से जागृत मालवा पत्रिका का विमोचन हुआ।
 
इस सत्र के बाद में दो सत्र और संपन्न हुए जहां पर पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का संक्षिप्त विवरण मंच पर प्रस्तुत किया।
 
द्वितीय दिवस, प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता: शोभा जैन के साथ मंच पर सूर्यकांत नागर, शुभदा पांडे, प्रेम जनमेजय, राहुल अवस्थी, संजीव सिन्हा रहे।
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द्वितीय दिवस का शुभारंभ भी दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ
सत्र का मुख्य विषय ‘छपास की भूख’ (प्रसिद्धि की लालसा) के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म (नैतिकता और चयन की शुचिता) से विमुख होने पर तीखा प्रहार था।
शोभा जैन ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। ‘छपास की भूख’ को एक ‘मानवीय उत्कंठा’ के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार: निराला और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान रचनाकारों के लिए ‘छपास’ एक सृजनात्मक संतोष का विषय था, जो आज के लेखकों में केवल संख्यात्मक वृद्धि तक सीमित रह गया है।
 
‘सरस्वती’ (1904) जैसी पत्रिकाओं और महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन आदर्शों को आज के संपादकों के लिए मार्गदर्शक बताया, जिन्होंने निराला की ‘जूही की कली’ जैसी कालजयी रचना को भी परिष्कृत करने का साहस दिखाया था। ‘धर्मयुग’ और धर्मवीर भारती का उदाहरण दिया गया, जिन्होंने 1980 में 5,07,000 प्रतियों का कीर्तिमान रचा था, जो गुणवत्ता और लोकप्रियता के समन्वय का प्रतीक है। संपादकीय कटाक्ष करते हुए शोभा जैन ने उन संपादकों पर कड़ा प्रहार किया जो साहित्य के स्तर को गिराकर महिलाओं के अंतरंग विषयों या सतही सामग्री को स्थान देते हैं। उन्होंने संपादकों को ‘आत्म-अवलोकन’ की सलाह दी। उन्होंने रचनाकारों से अपनी रचना भेजने से पहले पत्रिका की प्रकृति को समझने और एक साथ दर्जनों संपादकों को रचना भेजने की प्रवृत्ति से बचने का आग्रह किया गया।
​संपादकों से तीन मुख्य आग्रह भी किये। ​एक सफल और धर्मनिष्ठ संपादक के लिए तीन गुणों को अनिवार्य बताया : –
• ​बहुश्रुत होना: व्यापक जानकारी और सुनने की क्षमता।
• ​बहुपठित होना: गहन अध्ययन और साहित्य की समझ।
• ​सृजकों से अधिक समृद्ध होना: बौद्धिक और भाषाई स्तर पर रचनाकार से श्रेष्ठ होना ताकि वे रचना का सही मूल्यांकन और परिष्कार कर सकें।
 
अंत में यही कहकर अपनी बात समाप्त की ​कि यदि ‘संपादकीय पन्ना’ साहित्य का दर्पण है, तो उसे ‘संप्रेषणीय’ और ‘शुद्ध’ होना चाहिए। संपादकों को आपसी वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर साहित्य की गुणवत्ता और नियमितता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
 
प्रेम जनमेजय जी ने शोभा जैन जी के विचारों पर बात करते हुए संपादन कला पर अपनी बेबाक राय रखी।
उन्होंने कहा कि सभी संपादकों को एक ही कतार में खड़ा करना उचित नहीं है। हर संपादक की अपनी दृष्टि और कार्यशैली होती है। उन्होंने ‘छपास की भूख’ (छपने की तीव्र इच्छा) पर प्रहार करते हुए कहा कि इसे भूख नहीं, बल्कि ‘अभिव्यक्ति का अतिरेक’ कहना चाहिए।
 
संपादक उत्तरदायित्व पर कहा: एक अच्छे संपादक का कार्य केवल रचना छापना नहीं, बल्कि अच्छे लेखक और जागरूक पाठक तैयार करना है। उन्होंने जोर दिया कि संपादक को तटस्थ होना चाहिए, स्वार्थी नहीं। व्यंग्य की परंपरा पर उन्होंने कबीर से व्यंग्य की धारा के प्रारंभ होने की बात कही और तुलसीदास के ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ व ‘अंगद-रावण संवाद’ को व्यंग्यात्मक संवाद के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देखने की सलाह भी दी।उन्होंने लेखकों में बढ़ती ‘आत्ममुग्धता’ और ‘सम्मान-लिप्सा’ पर चिंता व्यक्त की।
​सूर्यकांत नागर जी- मनस्वी पत्रिका ने कहा कि बड़े से बड़े साहित्यकार भी आज ‘येन-केन-प्रकारेण’ छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस ‘छपास की भूख’ से बचना चाहिए। उन्होंने एक संस्मरण साझा किया कि कैसे एक बार शरद जोशी जी और कमलेश्वर जी ने नागर जी से रचना मांगी थी, लेकिन रचना पसंद न आने पर उसे वापस लौटा दिया था। यह एक संपादक की ईमानदारी का परिचायक है। उन्होंने कहा कि मैंने भी उसे सहजता से स्वीकार किया, जरूर मेरी ही रचना कमजोर होगी और प्रारंभिक चरण में यह सभी के साथ होता है।
उन्होंने लेखकों के लिए सुझाव दिया कि लेखक के लिए ‘धैर्य’ सबसे बड़ी पूंजी है और ‘जल्दबाजी’ सबसे बड़ी कमजोरी। पहले बाहर की दुनिया को समझो, पढ़ो, फिर मूल्यांकन करो। समझ से पहले समझाना गलत है।
संपादक की गरिमा: संपादक को अपने अहंकार से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि से कार्य करना चाहिए। यदि किसी की रचना अस्वीकार करनी हो, तो उसे सीधे मना करने के बजाय सुझाव देना चाहिए कि ‘कुछ और लिखकर भेजें, इस विषय पर गहराई की कमी है।’ हर बात कहने का एक सलीका होता है।
प्रथम सत्र की संपन्नता के बाद आने वाले सत्रो में देशभर से पधारे पत्र पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे उन्हीं में से कुछ संपादकों ने अपनी पत्रिका के बारे में बात की।
राहुल अवस्थी जी ने स्पष्ट किया कि एक संपादक को संबंधित विधा और विषय से पूरी तरह परिचित होना चाहिए।
​ शुभदा पांडे, संजीव सिंहा, राहुल जी , किशोर जी आप सभी ने अपनी पत्रिकाओं के बारे में संक्षेप में बताया।
आर एन आई पंजीयन दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क डाक पंजीयन और परेशान से जुड़ी जिज्ञासाएं और समाधान एवं अर्थ के बिना सब व्यर्थ विषय पर मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने प्रेस सेवा पोर्टल पर अपनी प्रोफाइल बनाने से लेकर आगे की कार्यवाही तक छोटी से छोटी जानकारी बिंदुवार साझा की।
इसके बाद फिर से एक सत्र पत्रकार एवं संपादक बंधुओं के लिए आयोजित हुआ क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में पत्र -पत्रिकाओं के संपादक उपस्थित थे और देश के कोने-कोने से पधारे सभी पत्रकार, संपादक बंधु-भगिनी मंच से अपने पत्र पत्रिकाओं के बारे में संक्षिप्त में अपनी बात लोगों तक पहुंचा सके इस हेतु हर व्यक्ति को समान अवसर मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति परिषद, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित ‘वीणा की वाणी’ के मंच से प्राप्त हुआ।
उद्यापन सत्र में
निरोगधाम पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे, डॉ स्वाति तिवारी, संचालक अमन व्यास एवं मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे उपस्थित रहे।
सुश्री सोनी सुगंधा ने संपादक धर्म पर ‘नमन मेरा शत-शत नमन है’ गीत प्रस्तुत किया।
तत्पश्चात कांता राय एवं सुनीता प्रकाश की लघुकथा वृत्त का विमोचन हुआ। साहित्य अकादमी जब भी किसी साहित्यिक अनुष्ठान को आयोजित करती है तो इस आयोजन में उपस्थित सबसे वरिष्ठ साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है। आज भी ‘वीणा की वाणी’ के मंच से सभी के आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी का सम्मान इस मंच पर हुआ।
डॉ स्वाति तिवारी ने सिहावलोकन प्रस्तुत किया। निरोग धाम के संपादक अशोक पांडे जी ने पाथेय प्रदान किया।
और अंत यानी की नए शुभारंभ में विदाई पाथेय मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने दिया।



मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा

साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिस्पर्धा से निकालकर एक परिवार में रूपांतरित करने का प्रयास है यह सम्मेलन — डॉ. विकास दवे

डॉ. विकास दवे

निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश 

इंदौर, जो सदैव से साहित्यिक चेतना का जीवंत केंद्र रहा है, वहाँ ‘वीणा की वाणी’ शीर्षक अंतर्गत देशभर से आए साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन एक सार्थक विमर्श का साक्षी बना। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी एवं संस्कृति परिषद द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित इस आयोजन ने साहित्य, पत्रकारिता और तकनीक के त्रिकोणीय संबंधों पर एक गंभीर और बहुआयामी दृष्टि प्रस्तुत की।

रूचि बाजपेयी शर्मा
संपादक -कलम हस्ताक्षर

दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ प्रारंभ हुए उद्घाटन सत्र में अनेक विशिष्ट साहित्यकारों और शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति रही। अपने स्वागत उद्बोधन में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने स्पष्ट किया कि साहित्य जगत में सार्थक कार्य के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समरसता की भावना आवश्यक है। उन्होंने इस सम्मेलन को पत्र-पत्रिकाओं को एक सूत्र में पिरोने और उन्हें ‘परिवार’ के रूप में देखने का प्रयास बताया। उनके वक्तव्य में परंपरा और प्रतिबद्धता का सुंदर संतुलन दिखाई दिया।

 

‘वीणा’ पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा ने अपने उद्बोधन में हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि “साहित्य स्थायी पत्रकारिता है और पत्र-पत्रिकाएँ स्थायी साहित्य।” उन्होंने बदलते समय, विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए यह भी रेखांकित किया कि तकनीक सुविधाजनक अवश्य है, परंतु संवेदना का विकल्प नहीं बन सकती।

 

सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में साहित्यिक पत्रिकाओं के स्वरूप, उनकी चुनौतियों, तकनीकी परिवर्तनों और भविष्य की दिशा पर गहन विचार-विमर्श हुआ। “जो दिखता है वही बिकता है” विषयक सत्र में पत्रिकाओं के लेआउट, आवरण और दृश्यात्मक प्रस्तुति की महत्ता पर बल दिया गया। यह स्पष्ट हुआ कि पठनीयता के साथ-साथ दर्शनीयता भी आज के समय की आवश्यकता है, किंतु इसके साथ सामग्री की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।

 

तकनीक और परंपरा के अंतर्संबंधों पर चर्चा करते हुए यह निष्कर्ष सामने आया कि तकनीकी प्रगति ने कार्य को सरल और तीव्र बनाया है, किंतु समय-सीमा के दबाव में त्रुटियों की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। इस संदर्भ में ‘Garbage In, Garbage Out’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए गुणवत्तापूर्ण इनपुट की अनिवार्यता पर जोर दिया गया।

कार्टून एवं व्यंग्य विधा पर केंद्रित सत्र ने यह स्थापित किया कि साहित्य केवल गंभीरता का पर्याय नहीं, बल्कि उसमें हास्य और दृश्यात्मकता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। डॉ. देवेंद्र शर्मा और डॉ. विकास दवे के बीच संवाद ने इस विधा की संभावनाओं और प्रभाव को नई दृष्टि दी।

 

“कला और साहित्य का संगम” विषयक सत्र में चित्रांकन की भूमिका को रेखांकित करते हुए यह कहा गया कि चित्र केवल रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि मौन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। वहीं “अस्तित्व का संकट” विषय पर आयोजित चर्चा में पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और उसके समाधान पर गंभीर चिंतन हुआ। वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि तकनीक से भयभीत होने के बजाय उसका सजग उपयोग आवश्यक है।

 

द्वितीय दिवस का प्रमुख आकर्षण “छपास की भूख” विषय पर केंद्रित सत्र रहा, जिसमें साहित्य के गिरते स्तर और संपादकीय नैतिकता पर तीखा और ईमानदार विमर्श हुआ। शोभा जैन ने मौलिकता के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए संपादकों और लेखकों दोनों को आत्मावलोकन की आवश्यकता बताई। वहीं प्रेम जनमेजय और सूर्यकांत नागर जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों ने संपादन की गरिमा, धैर्य और वस्तुनिष्ठता पर महत्वपूर्ण विचार रखे।

 

समापन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान, पुस्तकों का विमोचन तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आयोजन को भावपूर्ण पूर्णता प्रदान की। डॉ. विकास दवे ने अपने उद्बोधन में इस पूरे आयोजन को साहित्यिक एकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए सभी सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

 

निस्संदेह, ‘वीणा की वाणी’ केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि साहित्यिक संवाद, आत्ममंथन और सामूहिकता की एक सशक्त पहल बनकर उभरा जहाँ पत्रिकाएँ प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक विस्तृत साहित्यिक परिवार की सदस्य के रूप में देखी गईं।

 

बहुत समृद्ध है सम्पादकीय परिवार
समाज का श्रेष्ठ आचार विचार
भाषा बोलियो संग होगा सत्कार
देवी माँ पहनाये स्वयं कंठहार ||

 

दहलीज लाँघ जो आये है
तो आँगन साहित्य कुटीर बनाएंगे
जो दुस्साहस किया नारी शक्ति के लिए
भर भर शब्दों की मिट्टी
तुम्हारी दीवारों मे भर आएंगे ||

 

चलो बंधु एक नया पथ हमने पाया
पाथेय के लिए एक कौर हिन्दी का पाया
न रुकेंगे न झुकेंगे दोस्तों
आसमान भी देखे ये कहा से आकाश है आया ||




जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

जरूरी और उपयोगी है संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर प्रशिक्षण और संपादकों के बीच आपसी विमर्श – डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला 

समूह संपादक 

सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह 

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समकालीन समय में जब सूचना, संचार और विचारों का प्रवाह अभूतपूर्व गति से हो रहा है, तब संपादकीय कर्म की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण, जटिल और जिम्मेदार बन गई है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ केवल रचनाओं के प्रकाशन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि वे समाज की बौद्धिक चेतना, वैचारिक दिशा और सांस्कृतिक संवाद की आधारशिला के रूप में कार्य कर रही हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि संपादकों के सामने अनेक नई चुनौतियाँ उपस्थित हों—चाहे वे सामग्री की गुणवत्ता से जुड़ी हों, तकनीकी बदलावों से, आर्थिक संसाधनों की कमी से, या बदलती पाठकीय रुचियों से। इन चुनौतियों का सामना केवल व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए संगठित प्रशिक्षण, सामूहिक विमर्श और अनुभवों के आदान-प्रदान की अत्यंत आवश्यकता है। यही कारण है कि संपादकीय कर्म की चुनौतियों पर केंद्रित प्रशिक्षण और संपादकों के बीच संवाद आज के समय की एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।

 

इसी संदर्भ में 30 और 31 मार्च 2026 को इंदौर में आयोजित दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया, जिसमें देशभर से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों, लेखकों, शोधार्थियों और प्रकाशन से जुड़े विशेषज्ञों ने सहभागिता की। यह आयोजन केवल एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि एक ऐसा मंच था जहाँ संपादकीय कर्म के विविध आयामों पर गंभीर और व्यावहारिक चर्चा की गई। उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के सामाजिक दायित्व, उनके ऐतिहासिक योगदान और वर्तमान समय में उनकी भूमिका पर गहन विचार हुआ। विशेष रूप से ‘वीणा’ पत्रिका के शताब्दी संदर्भ के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि साहित्यिक पत्रकारिता ने समाज में विचार, संवेदना और जागरूकता के निर्माण में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस प्रकार का ऐतिहासिक बोध संपादकों को यह समझने में सहायता करता है कि उनका कार्य केवल संपादन तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है।

 

इस समागम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि इसमें केवल सैद्धांतिक चर्चा ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक समस्याओं और उनके समाधान पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। उदाहरण के लिए, पत्रिकाओं के कलेवर और प्रस्तुति को लेकर ‘जो दिखता है वही बिकता है’ जैसे विषय पर विचार करते हुए यह स्वीकार किया गया कि आज के डिजिटल युग में केवल अच्छी सामग्री पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे आकर्षक और प्रभावी रूप में प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। यह दृष्टिकोण संपादकीय कर्म को एक नई दिशा देता है, जहाँ साहित्य और प्रस्तुति दोनों का संतुलन आवश्यक हो जाता है। इसी प्रकार, कार्टून, व्यंग्य और चित्रांकन के उपयोग पर हुए विमर्श ने यह स्पष्ट किया कि दृश्य माध्यमों का समुचित प्रयोग पत्रिकाओं को अधिक पठनीय और रोचक बना सकता है।

 

संपादकीय कर्म की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आर्थिक और प्रशासनिक जटिलताएँ भी हैं, जिन पर इस समागम में विशेष ध्यान दिया गया। आर.एन.आई. पंजीयन, डाक वितरण, सरकारी विज्ञापन और अनुदान जैसी प्रक्रियाएँ अक्सर छोटे और मध्यम स्तर की पत्रिकाओं के लिए कठिन साबित होती हैं। इन विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा दी गई जानकारी और मार्गदर्शन ने संपादकों को न केवल इन प्रक्रियाओं को समझने में मदद की, बल्कि उन्हें अपने प्रकाशनों को अधिक संगठित और टिकाऊ बनाने की दिशा भी दिखाई। यह स्पष्ट हुआ कि संपादकीय कौशल के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता भी आज के समय में उतनी ही आवश्यक है।

 

समागम के दूसरे दिन की चर्चाएँ और भी गहन और आत्ममंथनात्मक रहीं। ‘छपास की भूख के बीच संपादक धर्म का चीरहरण’ जैसे विषय ने इस बात को रेखांकित किया कि आज के समय में सामग्री की गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जब प्रकाशन की होड़ बढ़ती है, तो कई बार संपादकीय मानकों से समझौता होने लगता है। इस संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि संपादक अपनी भूमिका को केवल सामग्री चयन तक सीमित न रखें, बल्कि गुणवत्ता, प्रामाणिकता और नैतिकता के मानकों को बनाए रखने के लिए सजग रहें। यह विमर्श संपादकीय कर्म के मूल्यों को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

 

इसके साथ ही, आधुनिक मुद्रण तकनीकों और डिजिटल माध्यमों पर हुई चर्चा ने यह स्पष्ट किया कि समय के साथ बदलाव को अपनाना अनिवार्य है। आज सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल प्रकाशन ने पाठकों तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं। यदि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ इन माध्यमों का प्रभावी उपयोग करें, तो वे न केवल अपने पाठक वर्ग का विस्तार कर सकती हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी साहित्य से जोड़ सकती हैं। इस संदर्भ में यह भी सामने आया कि तकनीकी ज्ञान और डिजिटल दक्षता अब संपादकों के लिए एक अतिरिक्त योग्यता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।

 

इस पूरे आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसमें संपादकों के बीच संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान हुआ। देश के विभिन्न हिस्सों से आए संपादकों ने अपनी-अपनी पत्रिकाओं के अनुभव साझा किए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि चुनौतियाँ भले ही अलग-अलग रूपों में हों, लेकिन उनका समाधान सामूहिक प्रयास से ही संभव है। यह आपसी विमर्श न केवल ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि इससे एक प्रकार की सामूहिक चेतना और सहयोग की भावना भी विकसित हुई। यही वह तत्व है, जो किसी भी क्षेत्र को मजबूत बनाता है—चाहे वह साहित्य हो, पत्रकारिता हो या कोई अन्य क्षेत्र।

 

समकालीन समय में जब सूचना की अधिकता और त्वरित प्रसार के कारण गुणवत्ता और प्रामाणिकता पर संकट मंडरा रहा है, तब संपादकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे केवल सामग्री के चयनकर्ता नहीं, बल्कि विचारों के संरक्षक और समाज के मार्गदर्शक भी होते हैं। ऐसे में यदि उन्हें उचित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और संवाद का अवसर मिलता है, तो वे अपने कार्य को अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। इंदौर में आयोजित यह समागम इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास था, जिसने यह सिद्ध किया कि यदि संपादक संगठित होकर अपनी चुनौतियों पर विचार करें, तो वे न केवल अपने कार्य को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि साहित्यिक पत्रकारिता के भविष्य को भी सुदृढ़ कर सकते हैं।

 

अंततः यह कहा जा सकता है कि संपादकीय कर्म की चुनौतियों का समाधान केवल व्यक्तिगत प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए सामूहिक सोच, निरंतर प्रशिक्षण और खुले संवाद की आवश्यकता है। ‘वीणा की वाणी’ जैसे आयोजन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं, जो न केवल वर्तमान समस्याओं को समझने का अवसर प्रदान करते हैं, बल्कि भविष्य की दिशा भी निर्धारित करते हैं। यदि इस प्रकार के प्रयास निरंतर होते रहें, तो निश्चित रूप से साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ अपनी प्रासंगिकता बनाए रखते हुए समाज में एक सशक्त और सकारात्मक भूमिका निभाती रहेंगी।




महेंद्र तिवारी की कहानी ‘अटूट बंधन’

अटूट बंधन

 महेन्द्र तिवारी

 

सुबह के साढ़े चार बजे थे। रात का अंधियारा अभी पूरी तरह से हटा नहीं था और आसमान में तारे भी अपनी चमक खो चुके थे, मानो वे भी थककर सो गए हों। झेजियांग प्रांत के झोउशान गाँव की सुबहें आमतौर पर बहुत शांत होती हैं। समुद्र की ठंडी हवा गाँव के खाली रास्तों पर बेमतलब घूमती रहती है, लेकिन आज उस हवा में भी एक बेचैनी थी। गाँव की नींद तब भी गहरी थी, लेकिन 82 वर्षीय चेन अचोंग के घर में नींद का नामो-निशान नहीं था।

 

चेन की आँखें अपने आप खुल गई थीं, मानो उनके अंदर कोई अलार्म बज रहा हो। वे धीरे-धीरे अपने बिस्तर से उठे और अपनी पत्नी जू की ओर देखा। वह वहाँ नहीं थी। बेशक, वह अब घर पर नहीं थी, वह करीब 100 किलोमीटर दूर निंगबो के अस्पताल में आईसीयू की उस ठंडी चारदीवारी में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थी। चेन ने अपना एप्रन उठाया और भारी कदमों से रसोई की ओर चल पड़े। शरीर में थकान का बोझ ज़रूर था, पर चेहरे पर एक ऐसी अनकही दृढ़ता थी जिसे समय की मार भी धुंधला नहीं कर पाई थी।

 

रसोई छोटी थी और सालों के धुएं से दीवारें काली पड़ गई थीं, लेकिन आज उसमें जो महक फैल रही थी, वह दशकों पुराने प्यार की थी। चेन ने चूल्हा सुलगाया। लकड़ी की चटखने की आवाज और आग की सुनहरी लपटें उन्हें स्मृतियों के गलियारे में ले गईं। वे अपनी पत्नी जू के लिए भोजन बना रहे थे। जू के लिए बनाया गया वह भोजन दरअसल एक संदेश था कि वह अकेली नहीं है, और चेन का साथ आज भी उतना ही अटूट है।

 

रसोई तंग थी और उसकी दीवारें दशकों के धुएं की स्याही से काली पड़ चुकी थीं, लेकिन आज वहाँ जो महक तैर रही थी, वह रसोइयों की नहीं बल्कि बरसों पुराने अटूट प्रेम की थी। चेन ने जैसे ही चूल्हा सुलगाया, लकड़ियों की चटकन और आग की सुनहरी लपटें उन्हें स्मृतियों के गलियारे में ले गईं। वे अपनी पत्नी जू के लिए भोजन बना रहे थे। जू के लिए बनाया गया वह भोजन एक संदेश था कि वह अकेली नहीं है।

 

उनके हाथों में झुर्रियाँ साफ दिखाई दे रही थीं, नसें फूली हुई थीं, लेकिन उन हाथों में एक अजीब सी फुर्ती थी। शायद यह फुर्ती प्यार की वो शक्ति थी जो उम्र के थकावट को भी हरा कर देती है। उन्होंने मछली को धीरे-धीरे साफ किया। जू को मछली बहुत पसंद थी। चेन को याद था कि कैसे जू हमेशा मछली का सबसे अच्छा हिस्सा उनकी थाली में रखती थी और खुद बचे-खुचे हिस्सों से संतोष करती थी। आज चेन उसी मछली को उस तरह पका रहे थे जैसे उन्हें पसंद था। कम मिर्च, ज्यादा रसा, और बस उंगलियों से मसले हुए स्वाद के साथ।

 

भोजन तैयार होने में एक घंटा लग गया। तब तक आसमान का रंग गहरे नीले से नीले में बदलने लगा था। चेन ने भोजन को ध्यान से एक स्टील के डब्बे में भरा और फिर उसे एक कपड़े में कई बार लपेटा ताकि ठंडा न हो। उन्होंने एक झोला उठाया जिसमें कुछ फल और जू के लिए घर का बना खाना था। वे घर से बाहर निकले।

 

सामने सड़क खाली थी। चेन के सामने कोई साधारण रास्ता नहीं था; यह एक ऐसा अभियान था जो एक 82 वर्षीय व्यक्ति के लिए लगभग असंभव था। 12 घंटे का सफर जिसमें छह घंटे जाने में और छह घंटे वापस आने में लगते थे। दो अलग-अलग बसों को पकड़ना, भीड़ में खुद को समेटना और बूढ़े पैरों से उस थकान को झेलना। और यह सब किसलिए? केवल उन 30 मिनटों के लिए जो उन्हें अस्पताल में मिलते थे।

 

पहली बस मिलने में उन्हें आधे घंटे का इंतजार करना पड़ा। सुबह की ठंडी हवा उनके सूती कपड़ों को भेदकर हड़्डियों तक पहुँच रही थी, लेकिन चेन को ठंड का अहसास भी नहीं था। उनका मन अस्पताल में पहुँचने की उड़ान भर रहा था। जब बस आई, तो वे धीरे-धीरे कदमों से सवार हुए। कंडक्टर ने उन्हें देखा और पहचान लिया। यह रोज का नजारा था।

 

“चेन अंकल, अस्पताल जा रहे हो?” कंडक्टर ने प्यार से पूछा।

 

“हाँ बेटा, जू को खाना देना है,” चेन ने मुस्कुराकर जवाब दिया।

 

बस की सीटें कठोर थीं और सड़कें उतार-चढ़ाव भरी थीं। हर झटके के साथ चेन के जोड़ों में दर्द उठता, लेकिन उनकी नज़र खिड़की के बाहर थी। पेड़, पहाड़ और छोटे-छोटे घर पीछे छूट रहे थे। वे अपने जीवन की फिल्म देख रहे थे। उन्हें याद आया वो दिन जब उन्होंने जू से शादी की थी। उन दिनों उनके पास बहुत कुछ नहीं था। न कोई बड़ा घर, न बहुत सारा पैसा। लेकिन उनके पास जू का साथ था।

 

जू एक आम गृहिणी नहीं थी; वह चेन के जीवन की धुरी थी। जब चेन खेतों में काम करके थककर लौटते, तो जू का हाथ उनके माथे से पसीना पोंछता था। वह घर को इतना सुंदर बनाती कि मिट्टी के फर्श भी किसी कालीन जैसे लगते। वह जानती थी कि चेन को क्या पसंद है, क्या परेशानी है। वे पचास साल से साथ थे। इतने सालों में दो लोग एक दूसरे के अंग बन जाते हैं। उनकी खुशियाँ और गम एक दूसरे से जुड़े होते हैं। अब जब जू बीमार थी, तो मानो चेन का आधा शरीर ही कट गया हो।

 

दूसरी बस पकड़ने के बाद सफ़र और कठिन हो गया। भीड़ बढ़ गई थी। चेन को सीट नहीं मिली। वे खड़े रहकर सफ़र तय कर रहे थे। उनके पैर काँपने लगे थे, लेकिन उन्होंने अपने हाथ में थमा झोला नहीं छोड़ा। वह झोला उनके लिए कोई सामान नहीं, बल्कि जू की जिंदगी की आशा था।

 

करीब छह घंटे बाद, दोपहर बारह बजे के करीब, चेन निंगबो अस्पताल के गेट पर थे। वे थके हुए थे, उनके कपड़े धूल से लथपथ थे और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक चमक थी। वे अस्पताल के गलियारे से गुज़रे। अस्पताल की वह महक, दवाइयों की गंध और मरीजों के रोने की आवाजें यह सब चेन के लिए अजीब था, लेकिन वे डरे नहीं। उनका डर तब खत्म होता है जब वे जू को देखते हैं।

 

आईसीयू के बाहर उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ा। वह नर्स का इंतजार कर रहे थे जिससे उन्हें अंदर जाने की इजाजत लेनी थी। उन तीस मिनटों के लिए वे पूरा दिन और अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दिए थे। जब नर्स ने दरवाजा खोला और साइन करने को कहा, तो चेन का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

आईसीयू का कमरा ठंडा था। मशीनों की बीप-बीप की आवाजें चारों ओर गूँज रही थीं। बीच में एक बिस्तर पर जू पड़ी थी। उसके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था और उसके शरीर से कई तरह की नलियाँ जुड़ी थीं। वह पहले जैसी नहीं थी। वह अब वह जू नहीं थी जो घर को सजाती थी, जो जोर से हँसती थी। लेकिन चेन के लिए वह वही थी।

 

चेन धीरे-धीरे उसके पास गए। उन्होंने अपना झोला एक कुर्सी पर रखा और जू का हाथ थाम लिया। वह हाथ ठंडा और पतला था। चेन ने उसे अपने दोनों हाथों में लेकर गर्म करने की कोशिश की।

 

“जू,” चेन ने धीमे से कहा, “मैं आ गया। तुम्हारा खाना ले आया हूँ। तुम्हारी पसंद की मछली बनाई है।”

 

जू बोल नहीं सकती थी। वह एक वेंटिलेटर पर थी। लेकिन जब उसने चेन को देखा, तो उसकी आँखों में एक चमक आई। उसकी आँखें नम थीं। वह बोल नहीं पा रही थी, लेकिन उसकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। वह कह रही थीं, “तुम थक गए होगे। तुम क्यों आते हो रोज?”

 

चेन ने उसके बालों को हाथ से सहलाया। उन्हें लगा मानो समय ठहर गया हो। इन तीस मिनटों में वे दोनों अपनी दुनिया में होते थे। चेन ने कहा, “जू, मुझे याद है जब हमारे बच्चे छोटे थे। हमारे पास पैसे कम थे, लेकिन तुमने कभी शिकायत नहीं की। तुमने मुझे हमेशा सहारा दिया। अब जब तुम थोड़े बीमार हो, तो मैं कैसे न आऊँ?”

 

उन्होंने उसे खाना खिलाने की कोशिश की, लेकिन जू बहुत कम खा सकती थी। बस कुछ चम्मच ही। चेन ने धीरे-धीरे उसे खिलाया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को खिलाती है। हर चम्मच के साथ उनकी उम्मीद जागती और डर भी बढ़ता। वे जानते थे कि जू का समय कम है, लेकिन वे उसे मानने को तैयार नहीं थे।

 

“जल्दी ठीक हो जाओ, जू,” चेन ने कहा, “घर में तुम्हारे बिना सन्नाटा है। बगीचे में जो फूल लगाए थे, वे मुरझा रहे हैं। तुम्हें वापस आना होगा।”

 

तीस मिनट बाद नर्स ने संकेत दिया कि समय हो गया है। चेन का दिल भारी हो गया। हर दिन यह विदा उनके लिए किसी सजा से कम नहीं थी। उन्होंने जू का हाथ छोड़ा और उसे विदा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

 

“मैं कल आऊँगा, जू,” चेन ने कहा, “मत डरना।”

 

यह सिलसिला 105 दिनों तक चला। 105 दिन आम आदमी के लिए यह अंक है, लेकिन चेन के लिए यह एक तपस्या थी। इन 105 दिनों में उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी खत्म कर दी। इलाज का खर्च आसमान छू रहा था। उन्होंने अपना घर बेच दिया, लेकिन चेन का हौसला नहीं डगमगाया। लोगों ने कहा, “अंकल, अब छोड़ दो। उम्र ढल चुकी है।” लेकिन चेन ने कहा, “जब तक साँस है, मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

 

इस अथक प्रयास ने समाज को भी रुला दिया। जब बसों के कंडक्टरों और ड्राइवरों को पता चला कि यह बूढ़ा आदमी रोज अपनी बीमार पत्नी से मिलने जा रहा है, तो उन्होंने उनसे किराया लेना बंद कर दिया। “अंकल, तुम्हारा किराया माफ,” वे कहते। अनजान लोगों ने अस्पताल के बाहर उन्हें देखकर पानी पिलाया और कुछ लोगों ने मदद के लिए पैसे भी दिए। यह प्यार का ही असर था।

 

13 मार्च का वह दिन भी आ गया। चेन आम दिन की तरह ही अस्पताल पहुँचे। उन्होंने जू को खाना खिलाया। उस दिन जू ने आँखों से कुछ इशारे किए। उसने धीमे से सिर हिलाया। उसकी नजरें चेन पर टिकी थीं। मानो वह कह रही हो, “चेन, मैं थक गई हूँ। तुमने बहुत किया मेरे लिए। अब मुझे तसल्ली है।” उसकी नजरों में एक गहरी संतुष्टि और विदा का भाव था।

 

चेन ने उसकी उंगलियों को छुआ और बोले, “तुम ठीक हो जाओगी, जू। मैं कल आऊँगा।” यह कहकर वे बाहर निकले। वे नहीं जानते थे कि यह उनकी आखिरी बातचीत थी।

 

जैसे ही चेन अस्पताल के मुख्य द्वार से बाहर निकले और वापस जाने के लिए बस की तरफ बढ़े, उनके मोबाइल की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर ‘अस्पताल’ लिखा  हुआ था। चेन का दिल धड़कने लगा। उन्होंने फोन उठाया।

 

“हेलो?”

 

“मिस्टर चेन? आप तुरंत अस्पताल वापस आइए। मिसेज जू की हालत गंभीर है।”

 

चेन के हाथ से फोन छूट गया। उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उन्होंने दौड़कर अंदर जाना शुरू किया, लेकिन थके हुए पैर साथ नहीं दे रहे थे। वे गिरे, फिर उठे। उनकी साँसे फूल रही थीं। जब वे आईसीयू पहुँचे, तो डॉक्टरों और नर्सों का एक समूह जू के बिस्तरे के आसपास था। मशीनों की आवाज बंद हो चुकी थी। सीधी रेखा चल रही थी।

 

चेन ने चीख नहीं मारी, न ही जोर से रोया। वे बस उस बिस्तरे के पास गए जहाँ उनकी जू शांत पड़ी थी। अब वह मशीनों से मुक्त थी। उसका चेहरा शांत था, मानो वह सो रही हो। चेन ने कांपते हाथों में उसका हाथ थामा। वह हाथ अब और ठंडा हो चुका था।

 

उन्होंने अपने आँसू रोके और धीरे-धीरे अपने होठों से उसके माथे को छुआ। उन्होंने उसके कान में आखिरी बार कुछ फुसफुसाया। उनके शब्द भारी थे, लेकिन उनमें एक अद्भुत संतुष्टि थी।

 

“जू,” चेन बोले, आवाज टूटते हुए, “इस जीवन में हमारा बंधन अब पूरा हुआ। तुमने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। पचास साल तुमने मुझे खुश रखा। आखिरी 105 दिनों में मैंने कोशिश की कि तुम्हें थोड़ी राहत मिले। शायद अब तुम्हें आराम करना है। मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा। जब तक मेरी साँसे हैं, तुम मेरे साथ रहोगी।”

 

अस्पताल का वह कमरा उस दिन एक अलग ही शांति में डूब गया था। वहाँ मौत का शोक नहीं, बल्कि एक अमर प्रेम की विजय थी। डॉक्टर और नर्सें, जो रोज मौत देखते हैं, वे भी आँखें पोंछने लगे। एक बूढ़े आदमी का उसकी पत्नी के प्रति यह अंतिम समर्पण सबके दिलों को छू गया था।

 

चेन के लिए वह 105 दिन का सफर केवल एक रास्ता नहीं था; यह दो आत्माओं को जोड़ने वाला एक ‘प्रेम का सेतु’ था। उन्होंने अपनी इस यात्रा से यह साबित कर दिया कि मृत्यु शरीर को अलग कर सकती है, लोगों को भी अलग कर सकती है, लेकिन उस पवित्र समर्पण को और उस प्यार को कभी नहीं तोड़ सकती, जिसे आधी सदी तक साथ जिया गया हो।

 

उस शाम जब चेन अपने सूने घर में लौटे, तो दीवारों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। मगर जू की खुशबू अब भी हवाओं में घुली हुई थी। खिड़की के पास खड़े होकर उन्होंने उस पुरानी राह को निहारा, जहाँ से वे रोज निकलते थे। वह रास्ता अब महज़ धूल और मिट्टी की पगडंडी नहीं थी, बल्कि उनके प्यार का गवाह बन चुका था। उन्होंने महसूस किया कि जू कहीं नहीं गई। वह फिजाओं में है, घर के हर कोने में है, और उनकी हर साँस में है।




संतोष कुमार झा की कविता ‘पिताजी का कोट’

पिताजी का कोट

सन्तोष कुमार झा
अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक
कोंकण रेलवे

पिता का कोट पहनते ही
जाने क्या हो जाता है।
सर तना, कदम तेज़
होंठों पर मुस्कान ,
आँखों में चमक
और कंधे सीधे ,
लेकिन हो जाते हैं,
बेहद बोझिल।

पहनते ही कोट बाबूजी का
भर जाता हूँ चिन्ताओं से,
दुनियाभर के।
बोझ अनुभवों के उतर
आते हैं मस्तिष्क से कन्धों पर।
एहसास ज़िम्मेदारियों का
तारी होता जाता है,
होता जाता हूँ
कुछ ही अन्तराल में
बेटे से पिता
खोता जाता हूँ
अल्हड़पन, लड़कपन
होता जाता हूँ
एक बच्चे से आदमी।

गौण होते जाते हैं
अपने सपने, अपनी खुशियाँ,
अपनी आज़ादी, अपने अनमोल पल
अपना एकान्त, अपना अस्तित्व।

होते जाते हैं महत्वपूर्ण
परिवार और दुनियादारी
पत्नी के सुख दुख की परवाह ,
माँ की बीमारी की चिन्ता
घर का लोन,
बच्चों की पढ़ाई
रिश्तों को सहेजने की चिन्ता,
और न जाने क्या कुछ।

अचरज की बात है
फिर भी तैरती रहती है
चेहरे पर दिव्य मुस्कान
और संतोष की ख़ुशी
पिता का कोट पहनते ही।

पहनते ही बाबूजी का कोट
भर जाता हूँ
अनकहे प्रेम से
वात्सल्य से और
आश्चर्यजनक खुशी से।
बच्चों की खुशी में खुशी,
पत्नि की मुस्कान में खुशी,
माँ के आशीर्वाद में खुशी,
ज़िम्मेदारियाँ निभाने में खुशी,
तंगहाली में खुशी
खुशहाली में खुशी।

पहनते ही पिता का कोट
भर जाता हूँ अदम्य साहस से
कर जाता हूँ सामना
किसी भी आपदा से
ढूँढ लेता हूँ हल
हर समस्या का,
जूझ लेता हूँ
किसी भी त्रासदी से।

निकाल फ़ेकना चाहता हूँ
कई बार
पिता का कोट
और हो जाना चाहता हूँ
स्वतंत्र और उन्मुक्त
भाग जाना चाहता हूँ अतीत में
यार दोस्तों के संग
काॅलेज के मौलसरी के पेड़
के नीचे चबूतरे पर
या फिर खुले आसमान के तले
नहर की पुलिया के मुंडेर पर।

पर न जाने क्या हो जाता है
नहीं फ़ेक पाता हूँ
बाबूजी का कोट ।

बावज़ूद तमाम ज़िम्मेदारियों के
अनायास ही,
बस मुस्कुराता रहता हूँ
पहनकर पिताजी का कोट।




इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

डॉ. विकास दवे

निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश 

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आगामी 30 और 31 मार्च को इंदौर में आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ देशभर की साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े संपादकों, लेखकों, शोधार्थियों और प्रकाशन विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के समक्ष बदलते समय में उत्पन्न हो रही चुनौतियों, उनके स्वरूप, सामग्री और भविष्य की दिशा पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से आयोजित यह समागम साहित्यिक जगत में विशेष उत्सुकता का केंद्र बना हुआ है। अकादमी के अनुसार, इस आयोजन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित आर्थिक, तकनीकी और पाठकीय संकटों पर न केवल चर्चा होगी, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी खोजने का प्रयास किया जाएगा।

 

समागम का उद्घाटन 30 मार्च को प्रातः 11 बजे से होगा, जिसमें ‘देश और समाज के प्रति साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का दायित्व बोध : वीणा का शताब्दी संदर्भ’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित किया जाएगा। इस सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े विद्वान तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ के संपादक अपने विचार व्यक्त करेंगे। उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण में उनका योगदान तथा बदलते मीडिया परिवेश में उनकी जिम्मेदारियों पर विशेष चर्चा अपेक्षित है। इसके बाद आयोजित प्रथम सत्र में पत्रिकाओं के स्वरूप और प्रस्तुति को केंद्र में रखते हुए ‘जो दिखता है वही बिकता है’ विषय पर विमर्श किया जाएगा, जिसमें यह विचार किया जाएगा कि साहित्यिक पत्रिकाओं के कलेवर और लेआउट में आकर्षण की कमी किस प्रकार पाठकों को उनसे दूर कर रही है और उन्हें अधिक पठनीय के साथ-साथ दर्शनीय बनाने की आवश्यकता क्यों है।

 

दोपहर बाद के सत्रों में समागम का स्वर और अधिक व्यावहारिक तथा बहुआयामी हो जाएगा। ‘थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी’ विषयक सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग्य चित्रों के प्रयोग पर चर्चा होगी, जबकि अगले सत्र में पत्रिका प्रकाशन से जुड़ी प्रशासनिक और आर्थिक प्रक्रियाओं पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया जाएगा। इसमें आर.एन.आई. पंजीयन, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क, डाक पंजीयन और वितरण व्यवस्था से संबंधित जटिलताओं को सरल भाषा में समझाया जाएगा। इसी क्रम में सरकारी अनुदान और विज्ञापन प्राप्त करने की प्रक्रियाओं पर भी विशेषज्ञ जानकारी साझा की जाएगी, जो विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर की पत्रिकाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दिन के अंतिम चरण में साहित्यिक पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और वैश्विक स्तर पर उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट पर चर्चा करते हुए संभावित समाधान तलाशे जाएंगे, जिसके बाद सायंकालीन विशेष सत्र में देशभर से आए संपादक अपनी-अपनी पत्रिकाओं के अब तक के योगदान और अनुभव साझा करेंगे।

 

समागम के दूसरे दिन, 31 मार्च को, विमर्श का केंद्र साहित्यिक सामग्री की गुणवत्ता, कलात्मक प्रस्तुति और आधुनिक मुद्रण तकनीक पर रहेगा। ‘छपास की भूख के बीच संपादक धर्म का चीरहरण’ विषय पर आयोजित सत्र में पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही रचनाओं के स्तर में गिरावट और संपादकीय मानकों पर पड़ रहे प्रभावों पर गंभीर चर्चा की जाएगी। इसके पश्चात आयोजित सत्र में साहित्य और चित्रांकन के संबंधों पर विचार करते हुए यह देखा जाएगा कि चित्र और कलात्मक प्रस्तुति किस प्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं की सौंदर्यात्मकता और पठनीयता को बढ़ा सकते हैं। दोपहर बाद का सत्र आधुनिक मुद्रण तकनीकों और प्रकाशन के बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहेगा, जिसमें नई तकनीकों के माध्यम से पत्रिकाओं की गुणवत्ता, प्रसार और लागत प्रबंधन पर प्रकाश डाला जाएगा।

 

दो दिवसीय इस समागम का समापन ‘पाथेय’ विषयक उद्यापन सत्र से होगा, जिसमें समागम के निष्कर्षों और भविष्य की दिशा पर समग्र विचार प्रस्तुत किए जाएंगे। आयोजन समिति के अनुसार, इस समागम से प्राप्त सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर साहित्यिक पत्रिकाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज तैयार करने की भी योजना है। साहित्यिक पत्रकारिता के समकालीन परिदृश्य में यह आयोजन न केवल संवाद का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के भविष्य को लेकर ठोस रणनीति बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

(काव्य समग्र-गीत के विशेष संदर्भ में)

शोधार्थी : बरबी ललबियाकसाङी साइलो

शोध-निर्देशक : प्रो. सुशील कुमार शर्मा

हिंदी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल

 

सारांश

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ (2023) में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय भावना दो ऐसी धाराएँ हैं जो एक-दूसरे से अलग नहीं — बल्कि आपस में गहरे जुड़ी हुई हैं। गौड़ की दृष्टि में भारत की राष्ट्रीय आत्मा उसकी आध्यात्मिक परंपरा में है। इस शोध पत्र में संग्रह के उन गीतों का विश्लेषण किया गया है जिनमें कबीर, राम, कृष्ण, महावीर जैसी आध्यात्मिक परंपराओं की छाप है, और साथ ही किसान की पीड़ा, राजनीतिक खोखलेपन की आलोचना, और देश-प्रेम का भाव भी है। इस दोहरी धारा की पड़ताल करना इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य है।

 

  1. प्रस्तावना

बी. एल. गौड़ का काव्य एक ऐसे व्यक्ति का काव्य है जो जीवन के हर पहलू को गहराई से देखता है। वे एक इंजीनियर, उद्यमी और साहित्यकार हैं। उन्होंने हिंदी अकादेमी दिल्ली (2010-14), संस्कृति मंत्रालय (2018-19) और शिक्षा मंत्रालय (2021-22) की समितियों में भी काम किया।² इस व्यापक अनुभव ने उनकी काव्य-दृष्टि को एक विशेष गहराई और सामाजिक सजगता दी है।

‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका में ओम निश्चल ने गौड़ की इस दोहरी विशेषता को पहचाना है :

“यों तो वे राजनीतिक कवि नहीं पर जहाँ कुछ गलत होते देखा है उसे कविता में उतारने की चेष्टा भी की है। उनके देखते-देखते लाल किले से जाने कितने भाषण हुए, कितने बीस सूत्री कार्यक्रम बने, गरीबों किसानों मजदूरों और उद्यमियों के लिए योजनाएँ चलाई गयीं। किंतु उनका क्या लाभ हुआ।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि गौड़ की आध्यात्मिकता और उनकी राष्ट्र-चिंता दोनों एक ही सामाजिक सजगता से उत्पन्न हैं।

 

  1. गीत की आध्यात्मिक परिभाषा — एक मौलिक दृष्टि

गौड़ ने ‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका स्वयं लिखी है। इस भूमिका में उन्होंने गीत की जो परिभाषा दी है, वह अपने-आप में एक आध्यात्मिक दृष्टि है :

“विद्वान गीतकार/लेखक/साहित्यकार यह मानते हैं कि प्रकृति ईश्वर की ही प्रतिकृति है जिसका विस्तार धरती से आकाश तक है। इस प्रकृति में व्याप्त स्पंदन, लय, सौंदर्य और नाद को समेटकर यदि एक शब्द की बात की जाए तो वह शब्द होगा गीत।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

यह परिभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौड़ के लिए प्रकृति और ईश्वर अभिन्न हैं, और गीत उस दिव्य प्रकृति की भाषा है। यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस धारा से जुड़ा है जो प्रकृति में ईश्वर का दर्शन करती है। आगे वे लिखते हैं :

“अनेक साहित्यकारों ने गीत को अपने-अपने मनोभावों से कई तरह से परिभाषित किया है। मेरे साहित्यकार मित्र रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग ने कहा — गीत भू की गति, पवन की लय, अजस्त्र प्रवाहमय है / पक्षियों का गान, लहर विधान, निर्झर का निलय है / गीत मुरली की मधुर ध्वनि, मंद्र सप्तक है प्रकृति का / नवरसों की आत्मा है / गीत कविता का हृदय है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

इस परिभाषा में गीत को कविता का हृदय कहा गया है। प्रकृति के सभी तत्व — भूमि, पवन, पक्षी, झरना, मुरली — ये सब मिलकर गीत बनाते हैं। यह एक समग्र आध्यात्मिक दृष्टि है।

  1. सरस्वती वंदना — ज्ञान और करुणा की माँग

संग्रह की पहली रचना ‘सरस्वती वंदना’ है। यह वंदना केवल काव्य-परंपरा का निर्वाह नहीं — इसमें गौड़ ने अपनी काव्य-प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है :

“हे माँ तू कुछ ऐसा वर दे / कंठ मेरे तू नवरस भर दे। / जब कागज पर कलम चलाऊँ / तेरा चित्र बना मैं पाऊँ / मुखरित हो ममता मानवता / जब जब मैं तेरे गुण गाऊँ / झाँकृत हो जन जन की पीड़ा / वीणा में ऐसा स्वर भर दे।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 27)

यह वंदना तीन महत्वपूर्ण माँगें करती है — नवरस की शक्ति, ममता-मानवता की मुखरता, और जन-जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति। ये तीनों माँगें मिलकर गौड़ की आध्यात्मिक-सामाजिक काव्य-दृष्टि को परिभाषित करती हैं।

 

  1. कबीर की परंपरा — नैतिक आध्यात्मिकता

4.1 ‘कैसे बनूँ कबीर’

‘कैसे बनूँ कबीर’ गीत गौड़ की आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस गीत में कबीर की परंपरा का प्रत्यक्ष स्वीकार है :

“राम तुम्हारा रूप निहारूँ / या सरयू का तीर / बिना तुम्हारी कृपादृष्टि के / घट न मन की पीर। जब जब मैं दर्शन को आऊँ / अविरल अश्रु बहें / तेरे प्रांगण में आकर सब / केवल राम भजें / जब छोड़ूँ मैं अवधपुरी तो / नयनन बरसे नीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

यह गीत कबीर की राम-भक्ति परंपरा से जुड़ा है। कबीर के राम सगुण-निर्गुण से परे थे — गौड़ के राम भी उसी भाव के हैं। ‘मैं तो मानव साधारण सा / कैसे बनूँ कबीर’ — यह विनम्रता उस आध्यात्मिक यात्री की है जो जानता है कि कबीर जैसा बनना आसान नहीं।

उसी गीत में कबीर की ‘माया’ की अवधारणा भी आती है :

“कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी / कभी न कुछ भी सोचा / अंत समय में सबने देखा / संग न जाय अंगोछा / जीवन की रेखा से पाई / लंबी मौत लकीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

‘संग न जाय अंगोछा’ — यह कबीर की उसी परंपरा का हिस्सा है जिसमें मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाता है। गौड़ ने इस सत्य को बड़ी सरलता से कहा है।

4.2 कबीर की ‘सोचा हम भी कबिरा जैसी’

एक अन्य गीत में गौड़ सीधे कबीर की ‘चदरिया’ वाली परंपरा का संदर्भ लेते हैं :

“सोचा हम भी कबिरा जैसी / रखें चदरिया साफ / पर हम ने तो ओढ़ लिया है / दोषों भरा लिहाफ़। कहते दुर्बल को न सताना / इससे बड़ा न पाप / पर दुर्बल से छीन छीन कर / करते हम अर्जन।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 65)

कबीर की ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ की परंपरा में गौड़ ने यहाँ एक सामाजिक आलोचना जोड़ी है। हम कबीर जैसा जीना चाहते हैं, पर दोषों से भरा जीवन जी रहे हैं। यह आत्म-आलोचना गौड़ की ईमानदारी का प्रमाण है।

 

  1. राम-भक्ति और आध्यात्मिक आस्था

5.1 ‘आज कहीं चलने का मन है’

इस गीत में गौड़ ने कृष्ण-भक्ति और राम-भक्ति दोनों का सुंदर संगम किया है :

“आज कहीं चलने का मन है / पर मन की तन से अनबन है / क्यों मैं जाऊँ मंदिर मंदिर / जब अंतस में वृन्दावन है। क्या समझाऊँ पागल को / भूल न पाता विगत दिनों को / बीते गया सो बीते गया रे / रट ले अब तू कृष्ण धुनों को।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 36)

‘जब अंतस में वृन्दावन है’ — यह भक्ति की उस धारा का हिस्सा है जो बाहरी तीर्थ की जगह भीतर के तीर्थ को महत्व देती है। कबीर ने भी यही कहा था कि ईश्वर मंदिर में नहीं, मन में है।

5.2 ‘भीतर से कुछ टूट गया है’ — अध्यात्म और पीड़ा

‘भीतर से कुछ टूट गया है’ गीत में आध्यात्मिक खोज और जीवन की पीड़ा का संगम है :

“मन करता कुछ फूल तोड़कर / इष्टदेव पर उन्हें चढ़ाऊँ / फिर उससे अरदास करूँ मैं / जिसको चाहा उसको पाऊँ / पर इस पागल मन को देखो / हार मिली तो रूठ गया है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 63)

ईश्वर से अरदास करना और फिर न मिलने पर रूठ जाना — यह भक्ति का वह मानवीय रूप है जो सूरदास और मीराबाई की परंपरा में मिलता है।

5.3 ‘हमने जिसे पुकारा अब तक’

‘हमने जिसे पुकारा अब तक’ गीत में ईश्वर के मौन का सामना करने की पीड़ा है :

“हमने जिसे पुकारा अब तक / उसने साधा मौन है / भीड़ भरी दुनिया में कैसे / जानूँ अपना कौन है। सारी उमर देव के सम्मुख / हाथ जोड़ मैं खड़ा रहा / मन की चाहत मनवाने को / कर हठधर्मी अड़ा रहा / आँख खुलीं तो मैंने पाया / देव अभी तक मौन है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 58-59)

ईश्वर का मौन — यह एक गहरी आध्यात्मिक पीड़ा है जो हर भक्त को कभी न कभी महसूस होती है। गौड़ ने इसे बड़ी ईमानदारी से कहा है।

 

  1. ‘जलता दीपक’ — नैतिक धर्म का आह्वान

‘जलता दीपक’ गीत में आध्यात्मिक प्रेरणा और नैतिक संदेश का सुंदर संगम है :

“बड़े बड़े चारागर देखे / मन का मिला न एक / पूछा कुछ उपचार बताओ / बोल — हमको खेद। हमने तो तन चीरा-फाड़ा / मन की हम क्या जानें / मन तो है कवियों का गहना / हम तो तन पहचानें।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 60)

‘मन तो है कवियों का गहना’ — यह पंक्ति आध्यात्मिक और काव्य दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। डॉक्टर शरीर ठीक कर सकते हैं, पर मन की पीड़ा केवल कवि ही समझ सकता है। इसी गीत में आगे आता है :

“हर अँधियारी गुफा बताती / तजो न धीरज, धर्म / कितना भी हो सफर कठिन, तुम / तजो न अपना कर्म / अंधकार के पार मिलेगा / जलता दीपक एक।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 61)

‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक’ — यह आशावाद का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। धर्म और कर्म से कभी विमुख न हों — यह भगवद्गीता की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें फल की चिंता किए बिना कर्म करने का आदेश है।

 

  1. राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति — एक सजग राष्ट्र-प्रेम

7.1 ‘लाल किले से’ — शासन की आलोचना

गौड़ की राष्ट्र-चेतना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वह एक सजग आलोचना के साथ है। ‘लाल किले से’ गीत में वे सरकारी वायदों की खोखलेपन पर करारा व्यंग्य करते हैं। ओम निश्चल ने भूमिका में इस गीत की पंक्तियाँ उद्धृत की हैं :

“लाल किले से अब तक आए / कितने ही फ़रमान / यदि वे सब सच्चे हो जाते / मरता नहीं किसान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14 में उद्धृत, भूमिका)

यह एक क्रांतिकारी कथन है। किसान की आत्महत्या की समस्या पर यह सीधी टिप्पणी है। यदि स्वतंत्रता दिवस के भाषण के वायदे पूरे हो जाते, तो किसान क्यों मरता? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

7.2 ‘परबत ऊपर राजमहल है’ — सामाजिक असमानता पर व्यंग्य

एक अन्य गीत में गौड़ ने सामाजिक असमानता का चित्रण किया है। ओम निश्चल ने भूमिका में लिखा :

“कवि भले उच्च वर्ग का है पर उसे राम मढ़ैया डाल गरीबी की मार सहते लोगों की चिंता होती है। गौड़ के शब्दों में — सूखा में उपले पाथते हैं / ताल तलैया में / रामधनी अब तक रहता है / फूस मढ़ैया में।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

उसी संदर्भ में ‘परबत ऊपर राजमहल है’ गीत का उल्लेख है :

“देखो राजमहल को देखो / हरदम रहता सजा धजा / बस्ती में रहता अंधियारा / निर्धनता भी एक सजा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

राजमहल और झुग्गी का यह विरोधाभास भारत की सबसे बड़ी समस्या — आर्थिक असमानता — की ओर इशारा करता है।

7.3 ‘नई भोर में सूरज लिखता’ — युवाओं से राजनीतिक अपेक्षा

‘नई भोर में सूरज लिखता’ गीत में गौड़ ने राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए युवाओं से आशा व्यक्त की है :

“बूढ़े नेता पाँव कब्र में / राजनीति ना छोड़ें / अपनी भोगपिपासा को वे / जन सेवा से जोड़ें / बड़े काम उनके आती है / जनता की नादानी।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 75)

‘जनता की नादानी’ — यह एक तीखी टिप्पणी है। नेता जनता की भोलेपन का फायदा उठाते हैं — यह सत्य गौड़ ने बड़ी साहसिकता से कहा है।

  1. ‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ — आदर्श भारत का स्वप्न

‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ गीत में गौड़ ने अपने आदर्श भारत का एक सुंदर चित्र खींचा है। यह गीत आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम है :

“चलो मन अब तुम ऐसे देश / जहाँ पर नयनन बरसे नहे / जहाँ पर सीता-सी हों नारि / जहाँ के नर हों सभी विदेह। जहाँ पर हो कोयल की कूक / भ्रमर की गुंजन का हो गान / जहाँ पर तितली हों आजाद / निडर हो पक्षी भरें उड़ान / जहाँ पर हो निर्मल-सा नीर / जहाँ पर हो मुरली की तान / जहाँ पर हो राजा का न्याय / बड़ों का होता हो सम्मान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 41)

यह केवल एक काल्पनिक देश का स्वप्न नहीं — यह उस भारत की कल्पना है जो कभी था, जो होना चाहिए। सीता जैसी नारियाँ, विदेह जैसे नर, कोयल की कूक, मुरली की तान — ये सब भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

उसी गीत में आगे :

“जहाँ हो गंगाजल-सा प्यार / जहाँ हो लक्ष्मण जैसा भ्राता / जहाँ हों सागर एक विशाल / तैरते जिस पर हों जलयान / जहाँ की धरती पर हो धर्म / जहाँ हों भरे हुए खलिहान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 42)

गंगाजल जैसा प्रेम, लक्ष्मण जैसा भ्रातृ-प्रेम, धर्म और भरे खलिहान — यह आदर्श भारत की वह कल्पना है जिसमें आध्यात्मिक मूल्य और सामाजिक समृद्धि दोनों एक साथ हों।

 

  1. ‘सर सर करती हवा सरीखी’ — जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध

‘सर सर करती हवा सरीखी’ गीत में जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध का सुंदर समन्वय है :

“हम सब जीते जग में लेकर / बड़े बड़े मंसूब / बिना कर्म के रह जाते हैं / आधे और अधूरे / जीवन सरल बनाकर जीओ / ज्यों गंगा का पानी। पाना चाहो यदि जीवन में / सत-चित और आनंद / बनो विक्रमादित्य सरीखे / नहीं मगध के नंद।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 79)

‘सत-चित-आनंद’ — यह हिंदू दर्शन की उच्चतम अवस्था का बोध है। इसे पाने के लिए विक्रमादित्य जैसा न्यायी और कर्मशील राजा बनने की प्रेरणा दी गई है। यहाँ आध्यात्मिक लक्ष्य और राष्ट्रीय आदर्श एक ही बात कह रहे हैं।

 

  1. ‘तारा मंडल का यही नियम’ — भवसागर और मृत्यु-दर्शन

‘तारा मंडल का यही नियम’ गीत में गौड़ का आध्यात्मिक दर्शन अपनी गहराई में दिखाई देता है :

“तारा मंडल का यही नियम / जो चला गया सो चला गया / टूटा जो नभ से एक बार / वह सदा सदा को चला गया। मैं तो धरती का हिस्सा हूँ / मेरी भी एक कहानी है / है ज्ञान मुझे यह बचपन से / यह सारी दुनिया फानी है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73)

‘यह सारी दुनिया फानी है’ — यह वेदांत का वह मूल विचार है जो संसार को क्षणिक मानता है। पर गौड़ इससे निराश नहीं होते — वे इसे स्वीकार करके आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

उसी गीत में :

“भवसागर की महिमा न्यारी / लगती है सबको अति प्यारी / जितने भी संत धरा पर हैं / सबकी धारा न्यारी न्यारी / ना मिली डगर कोई ऐसी / जो सत्यलोक तक ले जाती।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73-74)

‘सत्यलोक तक ले जाने वाली डगर’ की खोज — यह आध्यात्मिक यात्रा का वह बिंदु है जहाँ हर संत अपने-अपने रास्ते से जाता है। गौड़ इस विविधता को स्वीकार करते हैं।

 

  1. ‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ — ईश्वर और प्रकृति

‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ गीत में प्रकृति, ईश्वर और जीवन-संघर्ष का त्रिवेणी-संगम है :

“गिरते निर्झर का गीत लिखूँ / या लिखूँ नगर की चहल-पहल / जब पूरब दिशा लालम हुई / मंदिर से आया शंखनाद / कानों से आकर टकराया / वह परम सत्य वह चिर निनाद / जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 77)

मंदिर का शंखनाद — ‘वह परम सत्य वह चिर निनाद’ — यह ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव है। पर साथ ही प्रश्न भी है — ‘जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।’ ईश्वर का मौन रहना और दुखियों का रोना — यह आध्यात्मिक पीड़ा गौड़ की काव्य-चेतना का एक गहरा पहलू है।

 

  1. ‘निराला’ पर गीत — साहित्यिक राष्ट्र-चेतना

‘वसंत के शब्दशिल्पी (निराला)’ गीत में गौड़ ने निराला को एक राष्ट्र-कवि के रूप में याद किया है। यह गीत साहित्यिक राष्ट्र-चेतना का एक सुंदर उदाहरण है :

“इक महर्षि ने बरसों पहले / जब वसुधा पर पाँव धरा / देवों ने दुंदुभी बजाई / सूर्यकांत शुभ नाम पड़ा। त्याग तुम्हारा पर्वत जैसा / प्यार घन जंगल-सा था / कर्म तुम्हारा योगी जैसा / जीवन गंगाजल-सा था / सारी वसुधा एक कुटुम्ब है / जन जन मन संदेश भरा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 52)

‘सारी वसुधा एक कुटुम्ब है’ — यह वसुधैव कुटुम्बकम् का वह आध्यात्मिक-राष्ट्रीय भाव है जो भारतीय संस्कृति की पहचान है। निराला का त्याग, प्रेम और कर्म — ये तीनों गुण भारतीय आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

 

  1. आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम

गौड़ के गीतों में आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जब वे कबीर की माया का उल्लेख करते हैं, तो साथ ही समाज की असमानता की आलोचना भी करते हैं। जब वे आदर्श देश का स्वप्न देखते हैं, तो उसमें गंगाजल जैसा प्रेम और भरे खलिहान दोनों हैं।

ओम निश्चल ने भूमिका में इस दोहरेपन को पहचाना है :

“बी.एल.गौड़ एक उद्यमी कवि हैं। यानी अपने उद्यम से उन्होंने कल्पना के भवन ही नहीं, भुवन तैयार किए हैं। किंतु वे जिस भुवन के स्वामी हैं वह उनकी अपनी कविता का भुवन है। उनका मन भवन में नहीं, भुवन में रमता है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

‘भवन में नहीं, भुवन में रमना’ — यह उस आध्यात्मिक दृष्टि का प्रतीक है जो भौतिक संपदा से परे जाकर विश्व-बोध को महत्व देती है।

 

  1. निष्कर्ष

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता एक साथ चलती हैं — जैसे गंगा-यमुना की दो धाराएँ। उनकी आध्यात्मिकता कबीर, राम, कृष्ण, महावीर — सभी परंपराओं को समेटती है, पर किसी एक से बंधती नहीं। उनकी राष्ट्रीयता भावनात्मक जयघोष नहीं, बल्कि एक सजग आलोचनात्मक राष्ट्र-प्रेम है जो किसान की आत्महत्या पर प्रश्न उठाता है और बूढ़े नेताओं की भोगपिपासा की आलोचना करता है।

इन गीतों का केंद्रीय संदेश है : ‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक।’ यह आशावाद आध्यात्मिक है और राष्ट्रीय भी — व्यक्तिगत भी और सामाजिक भी। यह अध्ययन PhD शोध के तृतीय अध्याय के ‘आध्यात्मिक आयाम’ तथा ‘अन्य आयाम’ (राष्ट्रीयता) उप-अध्यायों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

संदर्भ ग्रंथ-सूची

  1. गौड़, बी.एल. (2023). काव्य समग्र-गीत. हंस प्रकाशन, नई दिल्ली. (ISBN: 978-93-89389-78-4)

  2. गौड़, बी.एल. (2012). कब पानी में डूबा सूरज. ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाजियाबाद.

  3. बरबी ललबियाकसाङी साइलो. (2024). बी. एल. गौड़ के साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन (शोध प्रस्ताव/Synopsis). मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल.

  4. शुक्ल, रामचन्द्र. (2010). हिंदी साहित्य का इतिहास. नागरी-प्रचारिणी सभा, वाराणसी.

  5. चतुर्वेदी, रामस्वरूप. (2018). हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.

  6. राधाकृष्णन, एस. (1963). धर्म और समाज. राजपाल एण्ड संस, दिल्ली.

  7. पाण्डेय, शंभुनाथ. (1977). भारतीय जीवन और संस्कृति. केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा.

  8. सिंह, राजकिशोर. (1975). भारतीय संस्कृति. विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा.

  9. नामवर सिंह. (2004). आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ. लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली.

  10. हरदयाल. (1985). साहित्य और सामाजिक मूल्य. विभूति प्रकाशन, दिल्ली




मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—हक़ या केवल सपना? – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब तक बराबरी ज़मीन पर नहीं उतरती, अधूरा है लोकतंत्र

— डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत का लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान रखता है। यह केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और सपनों का प्रतिबिंब है। संविधान ने हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा किया है, लेकिन यह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या यह वादा वास्तव में हर नागरिक तक समान रूप से पहुँच पाया है? क्या आज भी एक गरीब और एक अमीर व्यक्ति के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की सुविधाएँ बराबर हैं? यदि नहीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि हमारा लोकतंत्र अभी भी अधूरा है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। दवाइयों को ब्रांड के बजाय “साल्ट” के आधार पर उपलब्ध कराने की पहल ने यह साबित किया है कि सही नीति और नीयत के साथ आम जनता को बड़ी राहत दी जा सकती है। सस्ती दवाइयाँ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का माध्यम बनती हैं। यह एक उदाहरण है कि जब सरकार समानता को केंद्र में रखकर काम करती है, तो बदलाव संभव है। यही सोच यदि शिक्षा और न्याय जैसे क्षेत्रों में भी लागू की जाए, तो देश की तस्वीर बदल सकती है।

शिक्षा आज के समय में केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा की व्यवस्था दो भागों में बंटी हुई है—एक ओर महंगे निजी स्कूल और संस्थान हैं, जहाँ विश्वस्तरीय सुविधाएँ और संसाधन उपलब्ध हैं, और दूसरी ओर सरकारी स्कूल हैं, जहाँ कई जगह बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। यह विभाजन केवल संस्थानों का नहीं, बल्कि अवसरों का विभाजन है। एक अमीर परिवार का बच्चा जिस स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है, वह एक गरीब परिवार के बच्चे के लिए अक्सर एक सपना बनकर रह जाता है।

ऐसी स्थिति में यह विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि क्यों न पूरे देश में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए। एक ऐसा ढांचा, जहाँ हर कक्षा के लिए एक जैसी किताबें हों, एक जैसा पाठ्यक्रम हो और हर बच्चे को समान अवसर मिले। इससे शिक्षा के स्तर में संतुलन आ सकता है और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी एक समान आधार तैयार हो सकता है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक समानता को बढ़ावा देगी, बल्कि देश की प्रतिभाओं को भी एक समान मंच प्रदान करेगी।

हालाँकि, यह भी समझना आवश्यक है कि भारत की विविधता इतनी व्यापक है कि पूरी तरह एकरूप शिक्षा प्रणाली लागू करना सरल नहीं है। अलग-अलग राज्यों की भाषाएँ, संस्कृतियाँ और स्थानीय आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए एक “कॉमन कोर” के साथ-साथ क्षेत्रीय लचीलापन भी जरूरी है, ताकि समानता और विविधता के बीच संतुलन बना रहे।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। निजी अस्पतालों की ऊँची फीस आम आदमी के लिए एक बड़ी बाधा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा जैसी समस्याएँ हैं। कई बार एक साधारण बीमारी भी आर्थिक संकट का कारण बन जाती है। ऐसे में यह विचार सामने आता है कि यदि सभी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें एक समान व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए, तो हर व्यक्ति को समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकती हैं। डॉक्टरों और कर्मचारियों को सरकार द्वारा वेतन दिए जाने से सेवा का भाव बढ़ सकता है और मुनाफाखोरी पर अंकुश लग सकता है।

न्याय व्यवस्था भी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन आम नागरिक के लिए न्याय तक पहुँचना आज भी एक कठिन प्रक्रिया है। न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या, कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और वकीलों की ऊँची फीस—ये सभी मिलकर न्याय को महंगा और दूर बना देते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना कई बार असंभव जैसा हो जाता है। यदि न्याय व्यवस्था को सरल, सुलभ और निशुल्क बनाया जाए, तो यह लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

इन सभी क्षेत्रों—शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—का पूर्ण राष्ट्रीयकरण एक आदर्श समाधान प्रतीत होता है। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सरकार सभी संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेकर सभी कर्मचारियों को वेतन दे और सेवाओं को निशुल्क एवं समान रूप से उपलब्ध कराए। यह विचार सुनने में आकर्षक है और एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना को मजबूत करता है। लेकिन इसके साथ कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती है आर्थिक संसाधनों की। पूरे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय को पूरी तरह निशुल्क और उच्च गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराना एक बहुत बड़ा वित्तीय दायित्व है। इसके लिए सरकार को अपने बजट में बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे, कर व्यवस्था को मजबूत करना होगा और संसाधनों का कुशल प्रबंधन करना होगा।

दूसरी चुनौती है गुणवत्ता और जवाबदेही की। पूरी व्यवस्था सरकारी होने पर कई बार कार्यकुशलता में कमी आ जाती है। निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा कई बार सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। यदि पूरी व्यवस्था केवल सरकार के हाथ में होगी, तो नवाचार और सुधार की गति धीमी पड़ सकती है।

इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर भी इतनी बड़ी व्यवस्था को संचालित करना आसान नहीं है। भ्रष्टाचार, लापरवाही और संसाधनों के दुरुपयोग जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि किसी भी नीति को लागू करते समय इन संभावित चुनौतियों का समाधान पहले से ही तैयार किया जाए।

इस परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय के क्षेत्र में मजबूत सार्वजनिक ढांचा तैयार करे, जहाँ हर नागरिक को न्यूनतम स्तर की उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएँ सुनिश्चित हों। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे सख्त नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रखा जाए।

शिक्षा में एक समान “कॉमन कोर करिकुलम” लागू किया जा सकता है, जिससे पूरे देश में बुनियादी स्तर पर समानता सुनिश्चित हो, जबकि क्षेत्रीय विषयों और भाषाओं के लिए लचीलापन रखा जाए। स्वास्थ्य सेवाओं में “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज” की दिशा में काम किया जा सकता है, जिससे हर नागरिक को बुनियादी इलाज मुफ्त या अत्यंत सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक और सरल प्रक्रियाओं के माध्यम से पारदर्शिता और गति लाई जा सकती है।

अंततः, लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में निहित होती है। जब तक एक गरीब व्यक्ति अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकता, जब तक वह बीमारी के समय उचित इलाज नहीं पा सकता, और जब तक उसे समय पर न्याय नहीं मिल सकता—तब तक लोकतंत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह समय केवल विचार करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। समान शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और निष्पक्ष न्याय केवल आदर्श नहीं, बल्कि एक सशक्त और समावेशी लोकतंत्र की आधारशिला हैं। यदि हम इन क्षेत्रों में वास्तविक समानता स्थापित कर पाते हैं, तो न केवल लोकतंत्र पूर्ण होगा, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी मजबूत होगी।

अब प्रश्न यह नहीं है कि यह लक्ष्य कठिन है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे प्राप्त करने के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति दिखाने को तैयार हैं। यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत का लोकतंत्र केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में समान रूप से दिखाई देगा।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)




हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत

🔹‘गली बचपन की’ विषय पर राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में जुटे देशभर के बाल रचनाकार
🔹साहित्य अकादमी मप्र के महती आयोजन में साहित्यकार व
शोधार्थियों ने बताए समस्याओं के समाधान
🔹समापन सत्र में निदेशक डॉ. दवे की भावना पर भावुक हुए रचनाकार

भोपाल (मप्र)। हमें वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बच्चों तक पहुंचाने के तरीकों पर विचार करना होगा।रचनात्मकता के साथ शालाओं में स्मारिका प्रकाशन की तरफ भी और ध्यान देना चाहिए। वैश्वीकरण के दौर में भारतीय बाल साहित्य की वैश्विक पहचान और अनुवाद की संभावनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। अनुवाद पुल है। बाजारीकरण और मानवीय मूल्यों की सुरक्षा पर जोर देना पड़ेगा। अपने मन में, अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा। हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत है।
यह विचार विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन का वह सार है, जो उन्होंने भोपाल में बाल साहित्यकार स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना (सम्पादक- देवपुत्र) की स्मृति में ‘गली बचपन की’ विषय पर साहित्य अकादमी मप्र द्वारा आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में दूसरे दिन के विभिन्न सत्र में व्यक्त किए। अकादमी ने यह बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम स्मार्ट रोड स्थित एनआईटीटीटीआर परिसर (श्यामला हिल्स) में आयोजित किया, जिसमें विभिन्न राज्यों से बाल साहित्यकार, शोधार्थी तथा साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए और नन्हे-मुन्नों के बदलते परिवेश में बाल साहित्य की भूमिका पर गंभीर विचार-विमर्श करते हुए विभिन्न समस्याओं के समाधान भी प्रस्तुत किए। अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे की उपस्थिति में दूसरे दिन इस संगोष्ठी का समग्र संयोजन ‘देवपुत्र’ के संपादक गोपाल माहेश्वरी ने किया।
शाम को साढ़े 5.30 बजे समापन सत्र में विदाई भाव निदेशक डॉ. दवे ने व्यक्त किया। इनकी मन की बात सुनकर अनेक रचनाकार विदाई के पल में बड़े भावुक हो गए। आपने डॉ. जीवन रजक (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मंत्री संस्कृति) के सम्बोधन एवं उपस्थिति के लिए विशेष आभार व्यक्त किया। समग्र वृत्त की जिम्मेदारी बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने निभाई।

◾विभिन्न बिन्दुओं पर किया चिंतन
इस संगोष्ठी में दूसरे दिन ‘बाल-साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’ विषय पर डॉ.रेखा लोढ़ा ‘स्मित’, नीलम राकेश, डॉ. उमेशचंद्र सिरसवारी, दिनेश पाठक ‘शशि’ आदि ने अपनी बात रखी, तो वरिष्ठ लघुकथाकार मीरा जैन (उज्जैन) ने भी अपना वक्तव्यीय योगदान दिया। इसी कड़ी में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ.आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले, शिवचरण चौहान, शरद शबल और रेनू सैनी आदि रचनाकारों ने अपने भाव व्यक्त किए। ‘बाल-साहित्य में पठन की चुनौती : तकनीक की बदलती प्रवृत्तियां, आडियो-वीडियो और बाल फिल्में-धारावाहिक’ विषय पर सुषमा व्यास, रजनीकांत शुक्ल, इन्दु पाराशर और प्रगति मिमरोट ने विभिन्न बिंदुओं कों चिंतन के रूप में सामने रखा, जबकि बीज वक्तव्य भाषाविद और साहित्यकार डॉ. पूजा अलापुरिया ‘हेमाक्ष'(मुम्बई) ने देते हुए कहा, कि आज बच्चों की बहुत सारी चीजें बदल गई है। आज वह हमारी तरह से नहीं सोचते हैं। हम अपडेटेड नहीं हैं। हमें अपडेटेड होने के लिए बच्चों से बात करनी पड़ेगी। अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए अगर कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा।
ऐसे ही ‘बाल-साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजीटल युग में बाल-साहित्य की चुनौतियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव’ विषय पर डॉ. पूनम अग्रवाल, सुषमा सिंह, वंदना यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं मुकेश तिवारी (इंदौर) आदि ने भी अपने विचारों की बानगी दिखाई।

🔹71 वक्ताओं ने दी मंचीय अभिव्यक्ति
14 मार्च को दूसरे दिन अलग-अलग सत्र में ‘बाल साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजिटल युग में बाल साहित्य की चुनौतियाँ और एआई का प्रभाव’, ‘बाल अवस्था के रचनाकारों की बाल साहित्य सृजन में भूमिका’ आदि विषयों पर कुल 5 सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों की पूर्णतः सक्रिय सहभागिता रही। संगोष्ठी में कुल 11 सत्र हुए, जिनमें 10 मुख्य विषयों पर गहन विमर्श करते हुए 51 वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, साथ ही 21 अध्यक्षों और बीज वक्ताओं सहित कुल 71 वक्ताओं ने मंच से अपनी अभिव्यक्ति दी। आयोजन में लेखक अजय जैन ‘विकल्प’ का विशेष सहयोग रहा।

🔹 शोधार्थियों का विशेष सत्र-
आयोजन की एक विशेषता के रूप में एक सत्र बाल साहित्य के पीएचडी शोधार्थियों के लिए विशेष विमर्श का भी रहा। निदेशक डॉ. दवे ने इसमें बाल साहित्य पर पीएचडी करने वाले शोधार्थियों और उनके गाइड डॉ. पूजा अलापुरिया आदि से चर्चा की। इसमें शोधपरक आयामों पर चर्चा से समझा गया कि बाल साहित्य पर और कैसे विषयों पर शोध की आवश्यकता है एवं इसे बढ़ाया जाए।

🔹मंच से 20 पुस्तक विमोचित-
इस महती आयोजन में विभिन्न राज्य के साहित्यकारों की बाल साहित्य की 20 पुस्तक एवं 1 मासिक पत्रिका का लोकार्पण होना भी अपने-आपमें कीर्तिमान है। रचनाकार डॉ. मीनाक्षी दुबे की पुस्तक ‘नाम नौनिहालों के:पाती वीर सपूतों की’, किशोर श्रीवास्तव पुस्तक ‘विश्वास की रक्षा’, ‘मेहनत का फल’ और ‘खुशियों की वापसी’ का विमोचन अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने मंच पर किया, वहीं डॉ.भैरूँलाल गर्ग की पुस्तक ‘चलो चलें नानी के गाँव‘, समीक्षा तैलंग की पुस्तक ‘बेड़ा गर्क है’, शिवम सिंह की पुस्तक ‘नन्हे मुन्ने गीत’, डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’ की 2 पुस्तक ‘बुंदेली संस्कृति के रंग’-छई छपाक छपर छपर’, सुषमा सिंह की 2 पुस्तक ‘नन्हा पाखी’-‘कच्चा पापड़’ एवं माधुरी व्यास ‘नवपमा’ की पुस्तक ‘अनुभूति’ का लोकार्पण यहाँ किया गया। डॉ. मंजरी शुक्ला की पुस्तक ‘उड़ चले जादुई बर्तन’, नीलम राकेश की पुस्तक ‘सतरंगी दुनिया’ व द ‘रैनबो वर्ल्ड’, प्रो. प्रभा पंत की पुस्तक ‘मुझको सूरज बनना है’, ‘डिबिया में बंद चींटी व ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’, डॉ. अशोक व्यास की पुस्तक ‘स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला’ आदि सहित मासिक पत्र ‘राष्ट्र समर्पण’ के अंक का लोकार्पण निदेशक ने किया।