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तुम्हारा सौंदर्य

अत्यंत कठिन है
तुम्हारे सौंदर्य का वर्णन
तुम्हारे सौंदर्य को देखना ठीक वैसा ही है,
जैसे बारिश के बाद इंद्रधनुष को ढूंढना!
तुम्हारे सुंदरता का उत्कर्ष है तुम्हारे चेहरे की लालिमा
जैसे उदय होता सूर्य है प्राकृत का!
तुम्हारी ध्वनि हृदय को आमोद करती है
जैसे तपती ऊष्मा में मेंह का आगमन!
तुम्हारी सौंदर्य के साथ तुम्हारी सादगी
ऐसी शोभित होती है मानो
किसी वीरांगना के शरीर पर लगे हों
युद्ध के गहरे घाव!!




अंतरराष्ट्रीय अटल काव्य प्रतियोगिता – 2021

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं सुप्रसिद्ध कवि भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती 25 दिसंबर 2021 के अवसर पर विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस,  न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई-पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में “अंतरराष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता – 2021” का आयोजन किया जा रहा है ।

इस प्रतियोगिता में विश्व के सभी देशों के रचनाकारों से उपरोक्त प्रतियोगिता हेतु स्वरचित हिन्दी काव्य रचनाएँ आमंत्रित हैं । 

अंतरराष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता – 2021 हेतु स्वरचित कविता भेजने की अंतिम तिथि : 20 सितंबर 2021  

  • प्राप्त हुई रचनाओं पर निर्णयक मण्डल के निर्णय अनुसार घोषित श्रेष्ठ रचनाकारों को अटल जयंती (25 दिसंबर 2021) पर आयोजित किए जाने वाले “अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन” में चयनित रचना का पाठ करने का अवसर प्रदान किया जाएगा ।
  • निर्णायक मण्डल द्वारा चयनित उत्कृष्ट रचनाओं की संख्या अधिक होने पर शेष रचनाकारों को हमारे किसी अन्य आगामी “अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन” में चयनित रचना का पाठ करने का अवसर प्रदान किया जाएगा ।
  • प्राप्त रचनाओं की संख्या के आधार पर चयनित श्रेष्ठ रचनाकारों की संख्या 21/51/101/151/251 निर्धारित की जाएगी।
  • पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण रचनाएँ प्राप्त होने पर उन्हें संकलित करके आईएसबीएन युक्त काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित किया जाएगा जिसकी पीडीएफ़ प्रति सभी चयनित रचनाकारों को निशुल्क उपलब्ध करवाई जाएगी ।
  • काव्य पाठ में सम्मिलित होने वाले सभी कवियों को प्रतिभागिता प्रमाणपत्र दिया जाएगा ।

प्रतियोगिता में भाग लेने हेतु नियम एवं  शर्तें :

  1. कविता किसी भी विषय पर, मौलिक एवं स्वरचित एवं किसी भी तरह के कॉपीराइट मामले से स्वतंत्र हो ।
  2. कविता में किसी भी व्यक्ति/समूह/संस्था/धर्म/जाति/स्थान के लिए अपमानजनक या आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग न हो ।   
  3.   प्रतिभागी अपनी एक से अधिक कविताएँ प्रतियोगिता हेतु भी भेज सकते है ।
  4. हमारे निर्णायक मण्डल का निर्णय अंतिम एवं सर्वमान्य होगा ।

प्रतियोगिता हेतु काव्य रचनाएँ कैसे भेजें ?

उपरोक्त प्रतियोगिता हेतु काव्य रचनाएँ इस लिंक पर उपलब्ध गूगल फॉर्म के माध्यम से ही स्वीकार की जाएंगी : https://forms.gle/FEjQkogFWBmgGvqu9

अंतिम तिथि : 20 सितंबर 2021 

 




तथाकथित बुद्धिजीवी और स्त्री सशक्तिकरण

मैं अपने गांव का सबसे पढ़ा लिखा लड़का हूं , अच्छी सरकारी नौकरी है , शहर में घर भी है जो मेरे पिता जी ने बनवाई है, और मैं 10 लाख सालाना तक कमा भी लेता हूं ।

गांव और मेरे समाज के लोग अपने बेटे को मुझ जैसा बनने की सलाह देते है । और मुझे बुद्धजीवी कहते है , जो असल में मै मेरी सोशल मीडिया और अखबार में लिखे जाने वाले विचारों को पढ़ कर उनको लगता है ।

मेरी कुछ साल पहले शादी हुई खूब धूमधाम से शादी की पूरी पंचायत में इस बात कि चर्चा थी , और होती भी क्यों नहीं दहेज में बहुत सारे रुपए , चार चक्के की गाड़ी , सोने जेवरात और संसाधन के सभी चीजें मेरे पत्नी के पिता यानी मेरे ससुर ने मुझे दिया । और वो उनकी पूरी जीवन के कमाई से भी अधिक का था ।

मै पढ़ा लिखा बुद्धजीवी शादी के बाद पत्नी को महिला सशक्तिकरण के कई पाठ पढ़ाए , लड़का और लड़की के गैर बराबरी के किस्से सुनाए । भाई बहन के बराबरी के लेख पढ़ाए , पिता के संपति में पुत्र के बराबर पुत्री का अधिकार के मार्ग दिखाएं । 

मेरी पत्नी अपनी हक की लड़ाई लडी और हिस्सा ले आई । अब मै छोटे शहर में नहीं रहता बड़े महानगर में घर ले लिया हूं , मेरे पिता जी अब भी वही छोटे शहर के पुराने घर में है और उनका फोन आया था बता रहें थे मेरी बहन अपना हिस्सा लेने आई है , मै विवश हूं क्या करूं उसकी ( मेरी बहन ) शादी के वक्त मैंने जमीन और घर गिरवी रख दिया ताकि उसकी शादी पढ़े लिखे और सरकारी नौकरी वाले लड़के से हो अगर ये जमीन और घर तुम दोनों में बाट के उसका हिस्सा दे भी देता हूं तो ये कर्ज कैसे भरूंगा ( रोते हुए ) । अब मेरे चिंतन में एक तरह मेरी पत्नी एवं उसके पिता और एक तरफ मेरी बहन एवं मेरे पिता और बीच में मै कल के अखबार के लिए महिला सशक्तिकरण पर लेख लिखने की सोच रहा था ।

ताकि कल जब ये छप कर आए तो मेरे गांव मेरे पंचायत के लोग अपने बच्चे को बोल सकें  इसके जैसा बनो ” 

 

रजनीश तिवारी

दिल्ली विश्वविद्यालय 

(एक छोटी सी लेख महिला सशक्तिकरण के अधीन)

 

 




कर्णधार तनय ( महिला सशक्तिकरण के अधीन एक लेख )

मैं गांव का सबसे पढ़ा लिखा लड़का हूं , अच्छी सरकारी नौकरी है , शहर में घर भी है जो मेरे पिता जी ने बनवाई है, और मैं 10 लाख सालाना तक कमा भी लेता हूं ।

गांव और मेरे समाज के लोग अपने बेटे को मुझ जैसा बनने की सलाह देते है । और मुझे बुद्धजीवी कहते है , जो असल में मै मेरी सोशल मीडिया और अखबार में लिखे जाने वाले विचारों को पढ़ कर उनको लगता है ।

मेरी कुछ साल पहले शादी हुई खूब धूमधाम से शादी की पूरी पंचायत में इस बात कि चर्चा थी , और होती भी क्यों नहीं दहेज में बहुत सारे रुपए , चार चक्के की गाड़ी , सोने जेवरात और संसाधन के सभी चीजें मेरे पत्नी के पिता यानी मेरे ससुर ने मुझे दिया । और वो उनकी पूरी जीवन के कमाई से भी अधिक का था ।

मै पढ़ा लिखा बुद्धजीवी शादी के बाद पत्नी को महिला सशक्तिकरण के कई पाठ पढ़ाए , लड़का और लड़की के गैर बराबरी के किस्से सुनाए । भाई बहन के बराबरी के लेख पढ़ाए , पिता के संपति में पुत्र के बराबर पुत्री का अधिकार के मार्ग दिखाएं । 

मेरी पत्नी अपनी हक की लड़ाई लडी और हिस्सा ले आई । अब मै छोटे शहर में नहीं रहता बड़े महानगर में घर ले लिया हूं , मेरे पिता जी अब भी वही छोटे शहर के पुराने घर में है और उनका फोन आया था बता रहें थे मेरी बहन अपना हिस्सा लेने आई है , मै विवश हूं क्या करूं उसकी ( मेरी बहन ) शादी के वक्त मैंने जमीन और घर गिरवी रख दिया ताकि उसकी शादी पढ़े लिखे और सरकारी नौकरी वाले लड़के से हो अगर ये जमीन और घर तुम दोनों में बाट के उसका हिस्सा दे भी देता हूं तो ये कर्ज कैसे भरूंगा ( रोते हुए ) । अब मेरे चिंतन में एक तरह मेरी पत्नी एवं उसके पिता और एक तरफ मेरी बहन एवं मेरे पिता और बीच में मै कल के अखबार के लिए महिला सशक्तिकरण पर लेख लिखने की सोच रहा था ।

ताकि कल जब ये छप कर आए तो मेरे गांव मेरे पंचायत के लोग अपने बच्चे को बोल सकें ” इसके जैसा बनो ” ।

 

रजनीश तिवारी

 दिल्ली विशवविद्यालय




शक्तिहीन

वह मीठे पानी की नदी थी। अपने रास्ते पर प्रवाहित होकर दूसरी नदियों की तरह ही वह भी समुद्र से जा मिलती थी। एक बार उस नदी की एक मछली भी पानी के साथ-साथ बहते हुए समुद्र में पहुँच गई। वहां जाकर वह परेशान हो गई, समुद्र की एक दूसरी मछली ने उसे देखा तो वह उसके पास गई और पूछा, “क्या बात है, परेशान सी क्यों लग रही हो?”

नदी की मछली ने उत्तर दिया, “हाँ! मैं परेशान हूँ क्योंकि यह पानी कितना खारा है, मैं इसमें कैसे जियूंगी?”

समुद्र की मछली ने हँसते हुए कहा, “पानी का स्वाद तो ऐसा ही होता है।”

“नहीं-नहीं!” नदी की मछली ने बात काटते हुए उत्तर दिया, “पानी तो मीठा भी होता है।“

“पानी और मीठा! कहाँ पर?” समुद्र की मछली आश्चर्यचकित थी।

“वहाँ, उस तरफ। वहीं से मैं आई हूँ।“ कहते हुए नदी की मछली ने नदी की दिशा की ओर इशारा किया।

“अच्छा! चलो चल कर देखते हैं।“ समुद्र की मछली ने उत्सुकता से कहा।

“हाँ-हाँ चलो, मैं वहीं ज़िंदा रह पाऊंगी, लेकिन क्या तुम मुझे वहां तक ले चलोगी?“

“हाँ ज़रूर, लेकिन तुम क्यों नहीं तैर पा रही?”

नदी की मछली ने समुद्र की मछली को थामते हुए उत्तर दिया,

“क्योंकि नदी की धारा के साथ बहते-बहते मुझमें अब विपरीत धारा में तैरने की शक्ति नहीं बची।“




मंदिर मस्जिद का बनना

मंदिर मस्जिद का बनना।
दुनियां में सरेआम हुआ।।

आदमी बन न सका बंदा।
रब्ब यूं ही बदनाम हुआ।।

जात पांत का चक्कर बड़ा।
भक्ति का मार्ग ताम हुआ।।

जंगल जंगल भटकता क्यूं?
मन अपना न धाम हुआ।।

खुदा का घर बना ही नहीं।
ईंट गारा जोड़ना काम हुआ।।

रब्ब को कहां ढूंढे रे बंदे।
संग तेरे सुबह शाम हुआ।

दुआ कर मानसिकता बदल।
वही अल्लाह वही राम हुआ।

दुआ कर कही वैद्य भी मिले।
दवा ला जिससे आराम हुआ।।

वो घर भी तो इक मंदिर ही है।
जहां ज्ञान लिया और नाम हुआ।।

भोला पंछी कहीं भला है।
मंदिर मस्जिद में न जाम हुआ।।

गुरदीप सिंह सोहल
Retd AAO PWD
हनुमानगढ़ जंक्शन
(राजस्थान)




तोटक छंद “विरह”

तोटक छंद “विरह”

सब ओर छटा मनभावन है।
अति मौसम आज सुहावन है।।
चहुँ ओर नये सब रंग सजे।
दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।

सखि आज पिया मन माँहि बसे।
सब आतुर होयहु अंग लसे।।
कछु सोच उपाय करो सखिया।
पिय से किस भी विध हो बतिया।।

मन मोर बड़ा अकुलाय रहा।
विरहा अब और न जाय सहा।।
तन निश्चल सा बस श्वांस चले।
हर आहट को सुन ये दहले ।।

जलती यह शीत बयार लगे।
मचले मचले कुछ भाव जगे।।
बदली नभ की न जरा बदली।
पर मैं बदली अब हो पगली।।
=============
तोटक छंद विधान –

जब द्वादश वर्ण “ससासस” हो।
तब ‘तोटक’ पावन छंदस हो।।

“ससासस” = चार सगण
112 112 112 112 = 12 वर्ण
******************

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया




तिलका छंद “युद्ध”

तिलका छंद “युद्ध”

गज अश्व सजे।
रण-भेरि बजे।।
रथ गर्ज हिले।
सब वीर खिले।।

ध्वज को फहरा।
रथ रौंद धरा।।
बढ़ते जब ही।
सिमटे सब ही।।

बरछे गरजे।
सब ही लरजे।।
जब बाण चले।
धरणी दहले।।

नभ नाद छुवा।
रण घोर हुवा।
रज खूब उड़े।
घन ज्यों उमड़े।।

तलवार चली।
धरती बदली।।
लहु धार बही।
भइ लाल मही।।

कट मुंड गए।
सब त्रस्त भए।।
धड़ नाच रहे।
अब हाथ गहे।।

शिव तांडव सा।
खलु दानव सा।।
यह युद्ध चला।
सब ही बदला।।

जब शाम ढ़ली।
चँडिका हँस ली।।
यह युद्ध रुका।
सब जाय चुका।।
============

तिलका छंद विधान –

“सस” वर्ण धरे।
‘तिलका’ उभरे।।

“सस” = सगण सगण
(112 112),
दो-दो चरण तुकांत (6वर्ण प्रति चरण )
***************

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया




*युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक कविता*

*युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद*
(स्वामी विवेकानंद जी के पुण्यतिथि पर समर्पित)
****************************************

रचयिता :
*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*

 

12जनवरी1863 कोलकाता धरती महान।
जन्मे जहाँ श्री स्वामी विवेकानंद जी महान।

कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार ईश्वर प्रदत्त।
इनका नाम है वास्तविक श्री नरेन्द्र नाथ दत्त।

स्वामी जी गुरु राम कृष्ण देव के प्यारे शिष्य।
सनातनधर्म संस्कृति आध्यात्म पूर्ण हैं शिष्य।

वेद वेदांतो का ज्ञानी पंडित प्रकाण्ड विद्वान।
30वर्ष के आयु में युवासाधु को बड़ा है ज्ञान।

11सितंबर1893 शिकागो अमेरिका प्रस्थान।
विश्व धर्म महासभा में सनातन धर्म को स्थान।

‘मेरे अमेरिकी प्रिय भाई व बहनों’ से संबोधन।
शांति एवं एकाग्र हुए विदेशी सुन ये संबोधन।

प्रतिनिधित्व कर भारत का दिए धर्म का ज्ञान।
भाषा शैली चरित्र उत्कृष्ट भाषण से पाये मान।

महासभा में वेदधर्म भाषण सुने तालियाँ गूँजी।
स्वामी जी ऐसे थे ज्ञानी भारत की जो हैं पूँजी।

स्वामी का आध्यात्मिकता से पूर्ण वेदांत दर्शन।
योरोप के हर देश में बना आजभी है आकर्षण।

श्री रामकृष्ण मिशन ये स्थापित किये हैं स्वामी।
युवाओं के हैं प्रेरणा स्रोत ये विवेकानन्द स्वामी।

उठो, जागो, स्वयं जाग कर औरों को जगाओ।
कहते थे अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाओ।

तब तक नहीं रुको चाहे जितनी भी बाधा आये।
जब तक जीवन में पूर्ण लक्ष्य प्राप्त ना हो जाये।

स्वामीजी के ओजस्वी व्याख्यान हैं विश्व प्रसिद्ध।
ज्ञानवर्धक सारगर्भित वेद वेदांत दर्शन है प्रसिद्ध।

ध्यान योग में करने में भी ये स्वामी जी रहे समर्थ।
ध्यानावस्था में अपने ब्रह्मरंध्र को भेदने में समर्थ।

महासमाधि को प्राप्त कर लिया एवं सिधारे स्वर्ग।
4जुलाई1902 को 39वर्ष के अल्प आयु में स्वर्ग।

शत शत नमन एवं वन्दन है स्वामी जी श्रद्धांजलि।
कोटि कोटि नमन आप को समर्पित है पुष्पांजलि।

 

रचियता :
*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
संपर्क : 9415350596




*वैश्विक आध्यात्मिक गुरु-स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक लेख*

*वैश्विक आध्यात्मिक गुरु-स्वामी विवेकानन्द*
(पुण्यात्मा स्वामी विवेकानंद जी की पुण्य तिथि पर एक लेख)
****************************************

 

लेखक :

*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

 

वेद वेदांतों के प्रकाण्ड विद्वान और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु विश्व प्रसिद्ध स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। स्वामी विवेकानंद जी का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में 11 सितंबर 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत के धर्म संस्कृति, आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदांत दर्शन अमेरिका और योरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद जी के उत्कृष्ट सम्मोहनीय भाषण के द्वारा ही पहुँचा। उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना किया था,जो आज भी अपना काम कर रहा है। उनके गुरु राम कृष्ण देव थे। वे अपने गुरु से बहुत प्रभावित थे। स्वामी जी अपने गुरु के एक विद्वान, सुयोग्य,सदाचारी,परमप्रिय व महान शिष्य थे। स्वामी जी ने अपने गुरु से यह भी सीखा कि सारे जीवों में स्वयं परमात्मा का वाश होता है,उसी का
अस्तित्व है। इस लिए मानव के रूप में जन्मे हुए जो मनुष्य दूसरे जरुरतमंदों की मदद या सेवा करते है तो इसके द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।

अपने गुरु रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का सघनतम दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा विभिन्न स्थितियों-परिस्थितियों का प्रत्यक्ष पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद 30 वर्ष की आयु में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत के हिन्दू धर्म-सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने संयुक्त राज्य अमेरिका के शहर शिकागो के लिए प्रस्थान किया।

शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में बोलने के लिए विवेकानन्द जी को आयोजकों द्वारा मात्र 2 मिनट का ही समय दिया गया था। स्वामी जी ने सनातन धर्म पर अपने भाषण की शुरुआत करते इसके पहले महासभा में उपस्थित विद्वानों और जन समूह को अपने संबोधन में “मेरे अमेरिकी प्रिय भाई एवं बहनों” कह कर सस्नेह, सहृदयतापूर्ण, आदरपूर्वक संबोधन किया। स्वामी जी के इस प्रथम वाक्य ने ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों का दिल जीत लिया था। अपने भाषण के द्वारा हिन्दू और सनातन धर्म को विश्व में सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। स्वामी विवेकानंद जी ने संयुक्त राज्य अमेरिका,इंग्लैण्ड और यूरोप में हिन्दू दर्शन के सिद्धांतों का वृहद् प्रचार प्रसार किया और कई निजी तथा सार्वजनिक व्याख्यानों का आयोजन किया।
भारत में विवेकानंद जी को एक देश भक्त युवा सन्यासी के रूप में माना जाना जाता है और उनके जन्म दिवस 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय युवा दिवस से एक सप्ताह तक 12 जनवरी से 18 जनवरी तक राष्ट्रीय युवा सप्ताह के रूप में बड़े हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है,जिसका समापन 19 जनवरी को किया जाता है।

*गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने एक बार कहा था कि* “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं,तो स्वामी विवेकानंद जी को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे,नकारात्मक कुछ भी नहीं।

*रोमां रोलां ने स्वामी जी के बारे में कहा था,उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है।*वे जहाँ भी गए वहाँ सर्वप्रथम ही रहे।अद्वितीय ही रहे।*हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था।स्वामी जी ईश्वर का एक प्रतिनिधि रूप थे। सब पर अपना प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी अपनी विशिष्टता थी।*

*हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री स्वामी जी को देख ठिठक कर रुक गया,और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा ! “शिव”। यह तो कुछ ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना स्वयं का नाम उसके माथे पर लिख दिया हो।*

स्वामी विवेकानंद जी केवल एक वेदांत और सनातन धर्मी सन्त ही नहीं,वह एक अग्रणी महान देशभक्त,प्रखर वक्ता,उत्कृष्ट लेखक,प्रेरक व्यक्ति,
उच्च विचारक के साथ ही साथ एक मानव प्रेमी भी थे।अमेरिका से लौट कर उन्होंने देश वासियों का आह्वान करते हुए कहा था”नया भारत निकल
पड़े मोची की दुकान से,भड़भूजें की भाड़ से,हाट से,बाजार से,कारखाने से,निकल पड़े झाड़ियों, जंगलों,पर्वतों,पहाड़ों से” और इस जनमानस पर स्वामी जी के पुकार का असर पड़ा उसने उत्तर दिया। जनता गर्व के साथ निकल पड़ी। महात्मा गांधी को आजादी की लड़ाई में जो जन समर्थन मिला वह वास्तव में देखा जाये तो विवेका नन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार देखा जाये तो स्वामी विवेकानंद जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है। यहीं
बड़े बड़े ऋषियों मुनियों व महात्माओं का जन्म हुआ। यही सन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं
केवल यहीं आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। स्वामी विवेकानन्द के कथन-

*”उठो,जागो,स्वयं जाग कर औरों को जगाओ। अपने मनुष्य जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको,जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये”*

उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में विवेकानन्द जी लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रांति के जरिये भी देश को आजाद कराना चाह रहे थे,किन्तु उनको जल्द ही यह विश्वास भी हो गया था कि वर्तमान परिस्थितियाँ अभी उन इरादों के लिए परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही स्वामी विवेकानन्द जी ने “एकला चलो” की नीति का पालन करते हुए एक
परिव्राजक के रूप में भारत और पूरी दुनिया को खंगाल डाला। उन्होंने कहा था मुझे बहुत से युवा सन्यासी चाहिए जो भारत के ग्रामों में फ़ैल कर देशवासियों की सेवा में खप जायें। यद्यपि कि उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द जी
पुरोहितवाद,धार्मिक आडम्बरों,कठमुल्लापन और
रूढ़िवादी विचारों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक
चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा और लिजलिजा तथा वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे,दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाये और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियां को हटा दिया जाये।
स्वामी विवेकानन्द जी का यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिघ्घी बंध गयी थी। आज कोई दूसरा साधू तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मंदिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती। स्वामी जी के जीवन की अन्तर्लेय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की है तो वह वास्तव में भारत ही है।
उन्होंने पुरोहितवाद,ब्राह्मणवाद,धार्मिक कर्मकांड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ाई और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विभिन्न विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है।
स्वामी जी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरुरत भी है लेकिन हमें कभी भी याचक नहीं बनना चाहिए। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ
है जिसको हम पश्चिम को दे सकते हैं और वास्तव में पाश्चात्य देशों को उसकी नितान्त आवश्यकता भी है।
यह बात कहना स्वामी जी का अपने देश की धरोहर के लिए उनका बड़बोलापन या दम्भ नहीं था। यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ,वस्तुपूरक,आवश्यक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में स्वामी जी की उसी बात पर अपनी मुहर लगाई। स्वामी जी के ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि सम्पूर्ण विश्व में है। जीवन के अंतिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा “एक और विवेकानन्द चाहिए,यह समझने के लिए कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।” उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रातः नित्य की भांति ही 2-3 घण्टे ध्यान योग किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरंध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा नदी के तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अंतिम संस्कार हुआ था। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने स्वामी जी की स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द जी व उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी के विचारों और संदेशों को प्रचारित प्रसारित करने के लिए 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना किया,जो आज भी चल रहे हैं।
स्वामी जी के बारे में जितना भी लिखा जाय वह कम है। उनके अनेकों और भी दृष्टान्त और विचार हैं जो उनके दर्शन के बारे में हमें गहरी जानकारी देते हैं,किन्तु सभी संदेशों,वृतांतों का एक छोटे से लेख में वर्णन कर समाहित करना संभव नहीं हैं।
विवेकानन्द जी ऐसे महान व्यक्तित्व के पूज्यनीय स्वामी थे। आदर्श युवा साधु थे,वेदांत के प्रकाण्ड विद्वान,प्रखर वक्ता थे। ओजस्वी विचारक, धर्म व दर्शन के ज्ञाता एवं भारतवर्ष के गौरव थे।

स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी यह बताती है कि स्वामी जी मात्र 39 वर्ष की ही अल्पायु में जो कार्य कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक हमारी आने वाली पीढ़ियों का भी मार्गदर्शन करती रहेंगी,तथा सदैव अनुकरणीय रहेगी।

स्वामी विवेकानन्द जी के पुण्य तिथि दिवस 4 जुलाई की इस पावन बेला पर मैं अपने हृदय के अनंत श्रद्धा पुष्प उन्हें सादर समर्पित कर शत शत नमन करता हूँ और उनके दिखाये मार्ग और दर्शन पर चलने का संकल्प लेता हूँ।

 

लेखक :

*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर-नार्थ इंडिया
2020-21,एलायन्स क्लब्स इंटरनेशनल,प.बंगाल
संपर्क : 9415350596