1

रचनात्मकता, संस्कार और रंगमंच का समन्वित अभिव्यक्ति के व्यक्तित्व डॉ ० उमेश कुमार   चौरसिया

रचनात्मकता, संस्कार और रंगमंच का समन्वित अभिव्यक्ति के व्यक्तित्व डॉ ० उमेश कुमार   चौरसिया

भारतीय साहित्य और रंगमंच की समृद्ध परंपरा में कुछ ऐसे सृजनधर्मी व्यक्तित्व  हैं, जो केवल लेखन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अपने समय, समाज और संस्कृति के सक्रिय संवाहक बन कर खुद की एक अलग पहचान स्थापित की है।  उमेश कुमार चौरसिया ऐसा ही एक बहुआयामी और प्रयोगधर्मी नाम है, जिन्होंने न केवल साहित्य के विविध क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि रंगमंच, बाल साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है।

उमेश कुमार चौरसिया का व्यक्तित्व एक साधारण रचनाकार का व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक ऐसे कर्मयोगी का व्यक्तित्व कहा जा सकता है, जो अपनी लेखनी को समाज-निर्माण का माध्यम बनाते हैं। लगभग चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहते हुए आपने अपने लेखन और मार्गनिर्देशन के माध्यम से समाज के विभिन्न आयामों को स्पर्श किया है। वे एक साथ नाट्य लेखक व निर्देशक, बाल साहित्यकार, कवि, गीतकार, लघुकथाकार, लघुफिल्म निर्देशक, समीक्षक और संपादक जैसे अनेक रचनात्मक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। यह बहुआयामी प्रतिभा उनके व्यक्तित्व की व्यापकता और उनकी दृष्टि की गहराई को प्रमाणित करती है।

उनकी रचनात्मकता का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि वह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह मूल्यपरक और संस्कारनिष्ठ दृष्टि को भी अपने साथ लेकर चलती है। विशेष रूप से बाल साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके द्वारा रचित बाल नाटक और कहानियाँ केवल कथानक का विस्तार नहीं करतीं, बल्कि बच्चों के भीतर नैतिक मूल्यों, सामाजिक संवेदनाओं, भीतरी चेतना, मानव मूल्यों और जीवन के व्यावहारिक पक्ष को विकसित करने का कार्य करती हैं। वे बाल मनोविज्ञान को भली प्रकार समझते हैं और उसी के अनुरूप अपनी रचनाओं को आकार देते हैं, यही कारण है कि उनके बाल नाटक देशभर में मंचित होते रहे हैं और दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से भी प्रसारित हुए हैं।

उमेश जी का रंगमंच से जुड़ाव केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और अनुभवसमृद्ध है। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध कलाकार रहे हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् ‘एनसीईआरटी‘ के मान्य नाट्य विशेषज्ञ के रूप में विद्यार्थियों और शिक्षकों को शिक्षा में रंगमंच के प्रयोग का प्रशिक्षण भी ग्यारह वर्ष से निरन्तर दे रहे हैं। उन्होंने संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक संस्थाओं के साथ बच्चों और युवाओं को नाट्य प्रशिक्षण दिया है। रंगमंच के क्षेत्र में चालीस से अधिक वर्षाें का अनुभव उनके द्वारा रचित नाटकों में शिल्पगत कसावट, संवादों की प्रभावशीलता और मंचीय संरचना की सजीवता के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। उनके नाटक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने  की कला और मानवीय मूल्यों को आकार प्रदान करने के लिए होते हैं। वे मंच को समाज का दर्पण ही नहीं मार्गदर्शक भी मानते हैं और उसी के अनुरूप अपने नाट्य लेखन को आकार देते हैं।

उनकी लेखनी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते हैं। यह द्विभाषिक सृजन उन्हें व्यापक पाठक वर्ग से जोड़ता है और उनकी सांस्कृतिक जड़ों की गहराई को भी प्रकट करता है। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, परंपरा और आधुनिक जीवन के बीच सहज संतुलन दिखाई देता है। वे विवेकानंद के आदर्शों से विशेषरूप से प्रभावित हैं, और यह प्रभाव उनके अनेक ग्रंथों में स्पष्ट परिलक्षित होता है।

उमेश कुमार चौरसिया की रचनात्मक यात्रा अत्यंत समृद्ध और व्यापक है। उनकी पचास से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इनमें बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ, नाटक संग्रह, लघुकथाएँ, काव्य संग्रह और संपादित कृतियाँ सम्मिलित हैं। उनकी कृतियाँ केवल संख्या की दृष्टि से नहीं, बल्कि विषयवस्तु और प्रभाव की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके नाटक समाज की विसंगतियों, मानवीय संघर्षों और नैतिक द्वंद्वों को केवल उजागर  ही  नहीं करते हैं बल्कि एक सच्चे पथ प्रदर्शक का कार्य भी करते हैं, वहीं बाल साहित्य में वे प्रेरणा, संस्कार और जीवन-दृष्टि का संचार करते हैं।

उनके कार्य को समय≤ पर विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया है। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रदान किया गया शंभुदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार, नाटक विधा के लिए मिला देवीलाल सामर पुरस्कार, तथा अन्य अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान उनके रचनात्मक योगदान की स्वीकृति के प्रमाण हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी ने उमेशजी पर मोनोग्राफ भी प्रकाशित कर उन्हें देश के प्रमुख नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनके कार्यों पर शोध होना, विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययन होना, और उनकी कृतियों का पाठ्यक्रम में सम्मिलित होना, ये सभी उनकी साहित्यिक महत्ता को स्थापित करते हैं।

उमेश जी का व्यक्तित्व केवल एक लेखक या कलाकार का नहीं, बल्कि एक सस्कृतिकर्मी भी हैं। वे सच्चे निर्भीक और खरे व्यक्तित्व के धनी हैं। वे विभिन्न सामाजिक और साहित्यिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और निरंतर साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका यह सामाजिक दायित्व उनके व्यक्तित्व को और अधिक व्यापक और समृद्ध बनाता है।

यदि उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक वाक्य में अभिव्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है कि वे ऐसे सृजनधर्मी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी को समाज, संस्कृति और राष्ट्र के उत्थान का माध्यम बना लिया है। उनकी रचनाएँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों और मूल्यों की सजीव अभिव्यक्ति कही जा सकती हैं।

अतः यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उमेश कुमार चौरसिया समकालीन हिंदी और राजस्थानी साहित्य तथा रंगमंच के ऐसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, जिनका योगदान बहुआयामी, प्रभावशाली और प्रेरणास्पद है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता रहेगा, जो यह सिखाता रहेगा कि सृजन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है।

आशाः- लेखन से कब और कैसे जुड़ाव हुआ?

इसका एक रोचक प्रसंग है। तब मैं कक्षा पांच में सरकारी स्कूल में पढ़ रहा था। उस समय प्रत्येक शनिवार को बालसभा हुआ करती थी और उसमें किसी विद्यार्थी को सभा अध्यक्ष बनाया जाता था। तो ऐसी ही बालसभा में एक बार मुझे बाल अध्यक्ष बनाया गया। सभा के अन्त में मुझे भी कुछ सुनाना/बोलना था। मुझे कुछ और तो नहीं सूझा बस एक फिल्मी गीत की कुछ पंक्तियां सुना दीं, खूब सारी तालियां बजीं तो मन उत्साहित हो गया। बाद में विचार आया कि खुद भी कविता लिखने का प्रयत्न करना चाहिए। मन में गहरे रोपित इस बीज का यथार्थ प्रस्फुटन हुआ लगभग छ वर्ष बाद। कई बार सुधाऱ करते हुए एक कविता लिखी ‘मेरा नौजवान कहां है?‘ और काॅलेज जाते समय मार्ग में पड़ने वाले एक अखबार के कार्यालय में दे दी। आनन्द की अनुभूति तब हुई जब अगले ही रविवार को यह कविता मेरी फोटो के साथ प्रकाशित हो गयी। बस उसकी कटिंग लेकर मैंने परिवार, पड़ौस, स्कूल-काॅलेज के मित्रों को दिखाई, सबने सराहा। बस फिर लेखन की गति और नैपुण्य धीरे-धीरे बढ़ता रहा। 1989 के आस-पास राजस्थानी लोक कथाओं के नाट्यरूपान्तर का प्रयत्न हुआ। ईशकृपा और वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन से मेरी पहली कृति एकांकी संग्रह ‘सिराध रो दिन‘ का प्रकाशन 1991 में राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी से हुआ।  

आशा:- बाल साहित्य की ओर आपका विशेष झुकाव कैसे विकसित हुआ?

स्कूल-काॅलेज के समय से ही मुझे नाटकों में विशेष रूचि थी। कई नाटक देखे, कहीं प्रयास कर कुछ में अभिनय भी किया। तब यह ध्यान में आया कि अधिकांशतः नाटकों के चयन में ही कठिनाई होती है, कभी अच्छे नाटक नहीं मिलते तो कभी नाटक के अनुरूप अभिनय कलाकार उपलब्ध नहीं होते। इसीलिए अधिकतर स्कूलों में विदेशी लेखकों के एकांकीं/नाटक ही रूपान्तरित कर मंचित हुआ करते थे। आज भी कई बार ऐसा ही होता है। तब मुझे लगता कि यदि भारतीय परिवेश के अनुरूप और कम संख्या के पात्रों वाले बाल नाटक स्वयं ही लिखना चाहिए। मुझ पर बचपन से ही पंचतंत्र और पौराणिक व ऐतिहासिक कथानकों का प्रभाव रहा, सो ऐसे ही कथानक चुनकर लिखना आरंभ कर दिया।

 आशा:- आपके नाटकों में नैतिक मूल्यों  और साहस का समावेश स्वाभाविक रूप से आता है या यह एक सचेत प्रयास होता है?

हितोपदेश में श्रीमन् नारायण पण्डित लिखते हैं कि ‘यन्नवे भाजने लग्नः संस्कारो नाऽन्याथा भवेत्।‘ अर्थात जैसे नए घट पर बनायी गयी रेखाएं उसके फूटने तक नहीं जाती, वैसे ही बालकों के अन्तःकरण पर स्थापित शुभसंस्कार जीवनपर्यनत उनसे दूर नहीं होते। संभवतः ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। हमारे बुजुर्गाें से बचपन में बारम्बार सुनी पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरित्सर, जातककथाएं, बेताल पचीसी, चन्द्रकांता संतति, रामकथा, महाभारतकथा, मारवाड़ी लोककथाएं और अनेक महापुरूषों के रोचक प्रसंगों का ही प्रभाव मन-मस्तिष्क पर रहा। जब भी लिखने बैठता हूं तो मन में एक यही विचार रहता है कि इस रचना से पाठक को क्या लाभ मिलेगा। निरूद्देश्य कुछ लिखना होता ही नहीं। आचार्य भरतमुनि भी कहते हैं कि ‘लेखन में लोकहित का समावेश होना चाहिए।‘ मेरा मानना है कि लेखन में स्वांत सुखाय के साथ सर्वजन हिताय का भाव भी होना चाहिए। और सच मानिये, यह सब मेरे करने से नहीं होता सब ईश्वरीय प्रेरणा से ही संभव होता है। 

आशा:- रंगमंच और साहित्य इन दोनों के बीच आप किस प्रकार संतुलन स्थापित करते हैं? दोनों में से खुद को कहाँ पर अधिक सहज पाते हैं, क्या ठीक से अभिव्यक्त कर पाते हैं?

दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं और सहायक भी। अच्छे नाट्य मंचन के लिए अच्छा नाट्य लेखन आवश्यक है। नाट्यलेखन साहित्यिक विधा है और मंचीय प्रस्तुति कला विधा। जैसा मैंने पहले कहा कि मेरे जीवन में व्यवस्थित लेखन की शुरूआत नाट्य लेखन से ही हुई और रंगमंच के ़क्षेत्र में अभिनय, निर्देशन से भी गहरा जुड़ाव रहा, इसलिए नाटक ही मेरी प्रिय विधा है। इसमें बाल नाटक भी हैं, लघु व नुक्कड नाटक भी और पूर्णांकी नाटक भी।

आशा:- आपके अनुसार आज के समय में बाल रंगमंच की क्या भूमिका है?

वर्तमान समय सांस्कृतिक विभ्रम का बड़ा ही विकट समय है, निर्मूल भौतिकता का प्रभाव अनियंत्रित बढ़ता जा रहा है और नैतिकता का निरन्तर हृास हो रहा है, ऐसे में नयी पीढ़ी को वर्तमान परिस्थितियों से अवगत करवाते हुए मूल्यों को बचाए रखने के सशक्त प्रयत्नों में नाटक विधा महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। आज विश्वभर में नाटक एक सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, इसलिए बच्चों के लिए नाटक लिखा जाना और उन्हें विविध शिक्षा व सामाजिक संस्थानों में मंचित किया जाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी है। जब हम बाल रंगमंच कहते हैं तो यह चितंन भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाल नाटकों के विषय क्या हो। इसमें दो तरह के विचार बाल साहित्यकारों में दृष्टिगत होते हैं, एक यह कि बच्चों के लिए नाटक का ध्येय केवल मनोरंजन हो, और दूसरा ये कि बच्चों के लिए नाटक उन्हें सीख देने वाले हों। मुझे दोनों का समन्वित विचार ही वर्तमान परिप्रेेक्ष्य में यथोचित और उपयोगी लगता है, अर्थात बच्चों के लिए नाटक ऐसे हों जो मनोरंजन के साथ-साथ रोचकता व सहजता से कोई न कोई मूल्य भी स्थापित कर सकें। श्रीमन नारायण पण्डित कहते हैं कि ‘मैं बालकों को मनोरंजक, नीतियुक्त कथाएंँ कहकर उपदेश देने का प्रयत्न करता हूँ।‘ यही समय की आवश्यकता है, मनोरंजन-रोचकता के साथ नीति शिक्षण भी बाल नाटकों के माध्यम से हो। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में भी कहा है कि ‘नाट्य रसों, भावों तथा इन सभी रसभाव आदि के कार्य और क्रियाओं के द्वारा उपदेश प्रदान करने वाला होगा।‘ यही बात विशेष तौर पर बाल नाटकों पर भी लागू होती है। वर्तमान की चुनौतियों के प्रति सजग करते हुए अपनी संस्कृति, अपने गौरवपूर्ण इतिहास और अपने परिवेश का भान कराने वाले कथानक बाल नाटक में होने चाहिए।

आशा:- आपने हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में लेखन इन दोनों क्षेत्रों में अनुभव में क्या भिन्नता रही?

राजस्थानी भाषा को अपना सरस रस लावण्य है, माधुर्य है, अपनत्व है। हमारे घर में मुझे बचपन से ही मारवाड़ी का सानिध्य मिला, व्यवहार में होने से ‘आपणी मायड़ भासा‘ में समझना, कहना सहज रहा। सरकारी विद्यालयों में शिक्षण हुआ तो वहां हिंदी का प्रयोग प्रमुखता से होता रहा। इसलिए दोनों भाषाओं में लिख पाने में कठिनाई नहीं आयी। हां यह भी कहने भी संकोच नहीं कि राजस्थानी भाषा को रचनाकर्म की भाषा बनाने, राजस्थानी में रचित कृतियों को पढ़ने-पढ़ाने में हम राजस्थानियों की भी रूचि कुछ खास नहीं है। संभवतः राजस्थानी भाषा की मान्यता में विलम्ब का कारण भी यही है।

 आशा:- विवेकानंद के विचारों का आपके जीवन और लेखन पर क्या प्रभाव पड़ा?

मैं जो भी, जैसा भी बन पाया हूं, उसमें स्वामी विवेकानन्द के जीवन और विचारों का ही प्रभाव अधिक रहा है। बचपन से ही विवेकानन्द के विषय में पढ़ने-सुनने में रूचि रही, महाविद्यालय में आने पर अधिक गहनता से ‘मनुष्य निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण‘ के स्वामीजी के ध्येय को समझा। उनकेयुवाओं को प्रदत्त व्याख्यान-आह्वान और विश्व समुदाय के समक्ष भारत गौरव की अद्भुत व्याख्या ने मन-मस्तिष्क को बहुत प्रभावित किया। 1892 में कन्याकुमारी स्थित श्रीपाद शिला पर स्वामी विवेकानन्द द्वारा भारत के उत्थान के लिए किये गए ध्यान के सौ वर्ष होने पर देशभर में निकाली गयी ‘विवेकानन्द भारत परिक्रमा‘ जब 1991 में अजमेर आयी तब उन्हीं के प्रभाव से नाटक ‘नरेन्द्र से विवेकानन्द‘ लिख पाया, उसका मंचन भी हमने किया। तब से विवेकानन्द केन्द्र में विविध दायित्वों का निर्वहन करते हुए स्वामीजी पर विस्तृत अध्ययन का अवसर मिला। विवेकानन्द ही मेरे जीवन आदर्श हैं, इसलिए निश्चित ही मेरे लेखन पर बड़ा प्रभाव विवेकानन्द के विचार-चिंतन का रहा ही है।

 आशा:- एक सफल बाल नाटक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या होती है?

मेरी राय में सफल बाल नाटक तो वही हो सकता है जो नाटक बाल मन के निकट हो। इसके लिए हर रचना समय के बाल मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है। हमारे समय के बचपन और वर्तमान समय के बचपन में बड़ा अन्तर है, इसे जानना होगा। बाल नाटक रोचकता लिए हुए होना चाहिए, संवाद छोटे-छोटे और सरल हों (क्लिष्ट भाषा की विद्वता से बचना चाहिए), दृश्यों में लयात्मकता और सहज गति हो, संवाद बालसुलभ और काव्यात्मक रस लिए हों, कथानक परिवेश से जुड़़ा हुआ और जिज्ञासा जगाने वाला हो, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि बाल नाटक विषय आधारित और ध्येयपरक हो, कहीं कुछ व्यवहार, मूल्य, संस्कार सीखने का अवसर भी वहां मिल सके। वर्तमान डिजिटल युग और उपलब्ध तकनीकी सुविधाओं के परिप्रेक्ष्य में बाल नाटक अत्यधिक काल्पनिकता लिए हुए नहीं वरन् तार्किक, वैज्ञानिक तथ्य आधारित होना चाहिए, जो बच्चों में स्वीकार्य हों। ये अनुभव आधारित कुछ बिन्दु हैं, और भी हो सकते हैं।

 आशा:- वर्तमान पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटती रुचि को आप किस प्रकार देखते हैं?

इसके दो पहलू हैं। एक तो कैरियर के प्रति बच्चों, युवाओं और अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाओं के कारण साहित्य पढ़ने का समय ही नहीं होता, और दूसरा यह कि पुस्तकों की भीड़ में ऐसा साहित्य मिलना कठिन हो गया है जिसमें नयी पीढ़ी की रूचि हो। हालांकि बच्चों और युवाओं के साथ अनेक बार चर्चा में यह तो स्पष्ट हुआ है कि साहित्य के प्रति रूचि का कम होना उतना नहीं है जितनी श्रेष्ठ साहित्य की उपलब्धता कम हुई है। नयी पीढ़ी चाहे पुस्तकें खरीदकर कम पढ़ती हो पर विविध डिजिटल, आॅडियो-वीडियो माध्यम से प्रसारित कृतियों की जानकारी तो उनको रहती ही है।

सौ पृष्ठ पढ़ने पर एक पृष्ठ लिखने के बजाय बिना पढ़े केवल और केवल लिखने के इस दौर में साहित्य की प्रामाणिकता और लोकप्रियता का हृास भी हुआ है। अभिभावक घर में श्रेष्ठ साहित्य की पुस्तकें और पत्रिकाएं नियमित लाएं, स्वयं पढ़ें और बच्चों को प्रेरित करें, इसी तरह युवाओं के लिए उपयोगी श्रेष्ठ कृतियों की जानकारी उन्हें मिले, महाविद्यालयो के पुस्तकालय जीवंत हों, वहां पुस्तकों पर चर्चा की प्रक्रिया फिर से बढ़े, यह करना होगा। लेखक अपने अध्ययन को विस्तार देते हुए वर्तमान युग की सोच व आवश्यकता के अनुरूप श्रेष्ठ कृतियों की रचना करें, साथ ही युवाओं को साहित्य लेखन के लिए प्रेरित करे, यह भी आवश्यक है। पाठ्यपुस्तकें कैरियर में तो सफल बना सकती हैं किन्तु श्रेष्ठ साहित्य ही जीवन को सार्थक बना सकता है। 

आशा:- आप द्वारा रचित प्रमुख नाटक कौनसे हैं आपको सबसे अधिक प्रिय कौनसा नाटक है, उनके सृजन की पृष्ठभूमि क्या रही?

किसी भी रचनाकार को तो सभी रचनाएं प्रिय होती हैं। हां कुछ नाटकों का उल्लेख कर सकता हूं जिनका मंचन अधिक हुआ है। राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हुए दो नाटक संग्रह हैं, एक ‘विद्यालय रंगमंच के देशभक्तिपूर्ण नाटक‘ और दूसरा ‘शौर्य प्रधान नाटक‘, इनमें मत चूके चैहान, वीरांगना पन्नाधाय, दाहरसेन का बलिदान, नन्ही हवा, वीर दुद्धा, कुंभा का बलिदान, बालमन आदि नाटक हैं। एनबीटी से प्रकाशित विवेकानन्द के बाल्यकाल पर केन्द्रित बाल नाटक ‘मेधावी नरेन्द्र‘ चार राज्यों के समग्रशिक्षा में शामिल है। जवाहर कला केन्द्र से प्रकाशित ‘राम कबीरा एक है‘ और ‘सूर्यपुत्र करण‘ तथा नरेन्द्र से विवेकानन्द, इदं राष्ट्राय स्वाहा, लोकमाता अहिल्याबाई, ओ! अहिल्या, एकलव्य, कर्तव्यपथ, ओ! शर्मिष्ठा, आजादी की कहानी, बापू की बालपोथी, टूटता भ्रम, दानवीर भामाशाह, केशव, वीर शिवा और हास्य एकांकी संग्रह ‘अतिथि देवो भव‘, राजस्थानी एकांकी संग्रह ‘सुख सै दुखी‘ व विवेकानन्द केन्द्र प्रकाशन विभाग से प्रकाशित ‘लक्ष्य की ओर‘ इत्यादि। राजस्थानी नाटक ‘म्हूं तो भूलगो‘ के तो देशभर में 150 से अधिक मंचन हुए हैं।      

आशा:- नाट्य लेखन और मंचन के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों/पात्रों पर नाटक लिखना दुरूह कार्य है। विस्तृत और गहन अध्ययन करना होता है ताकि तथ्यात्मक और प्रामाणिक कथानक बुना जा सके, फिर उसे वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक बनाने के लिए सामयिक परिस्थितियों का आंकलन भी करना होता है। कई बार तो एक वर्ष से अधिक का समय लग गया नाटक पूरा होने में। नाट्य लेखन धैर्यपूर्वक विषय केन्द्रित रहकर काम की एक लम्बी प्रक्रिया है। मंचन की बात करूं तो जब हमने शुरू किया तब नब्बे के दशक में महिला कलाकारों की उपलब्धता बहुत कम रहती थी इसलिए कई बार नाटक के कथानक, संवाद और दृश्यों को सीमित करना पड़ता था। अब ऐसी कठिनाई तो नहीं है पर नाटक के लिए कर्मठ टीम जुटाने में समय लगता है। एक बड़ी चुनौति होती है अर्थव्यवस्था की। नाटक की रिहर्सल और प्रस्तुति बेहद खर्चीला उपक्रम है। जहां सरकारी संस्थानों का सहयोग मिल जाता है वहां तो आसानी रहती है, पर स्वयं के स्तर पर नाटक कर पाना आज भी बहुत ही कठिन है। टिकिट खरीदकर नाटक देखने का तो प्रचलन ही नहीं दिखता, वरन् दर्शकों को मिन्नत करके बुलाना पड़ता है। इसीलिए आज भी नाटक सर्वाधिक प्रभावी विधा होने पर भी लोकप्रिय विधा नहीं बन पायी है।

 आशा:- आपने 40 वर्षों की अपनी साहित्यिक और रंगमंचीय  यात्रा में, साहित्य और रंगमंच में क्या विशेष बदलाव महसूस किए?

पहले नवलेखन पर परस्पर चर्चा हुआ करती थी, नयी रचना पर वरिष्ठ साहित्यकारों से मार्गदर्शन लेकर सुधार की ललक रहती थी। किन्तु आज अधिकांशतः देखने में आता है कि लेखक स्वकेन्द्रित हो गए हैं, उनकीे न तो श्रेष्ठ साहित्य के नियमित अध्ययन में रूचि है और न ही अपनी रचना पर आलोचना सुनने की साहस। अपने लिखे को श्रेष्ठ मान लेने की प्रवृत्ति से सृजन का स्तर घटा है। जैसा मैंने पहले कहा, साहित्य में पाठकों की रूचि कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है। रंगमंच के क्षेत्र में देखें तो आज अधिकांशतः नए कलाकारों में भी तुरंत ही निर्देशक व फिल्म अभिनेता बनने की महत्वाकांक्षा रहती है, इससे नाट्य अनुशासन प्रभावित होता है। साथ ही रील, यूट्यूब, शार्टफिल्मों के इस दौर में कलाकारों की आर्थिक अपेक्षाएं भी बढ़ गयी हैं। सरकारी संस्थानों का सहयोग केवल चंद कलाकारों को ही मिल पाता है, कई योग्य रंगकर्मी श्रेष्ठ प्रतिभा होने पर भी नाट्य प्रस्तुतियां कर पाने में असमर्थ होते हैं।

 आशा:- क्या आपको लगता है कि बाल साहित्य को अभी भी पर्याप्त महत्व नहीं मिल सका?

मैं अक्सर कहता हूं कि छोटी गोष्ठियों से लेकर बड़े-बड़े साहित्यिक सम्मेलनों तक में भी बाल साहित्य पर चर्चा बाल साहित्यकारों और वरिष्ठजनों के मध्य ही होती है, उनमें अक्सर बच्चों की सहभागिता का अभाव ही रहता है। लिखा जा रहा बाल साहित्य बच्चे के मन के अनुरूप है अथवा नहीं, और बच्चें के लिए कैसा साहित्य रचा जाए, इस पर सार्थक प्रतिक्रिया बच्चे ही बेहतर दे सकते हैं। इसलिए बाल साहित्य पर चर्चा बच्चों के मध्य होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से सामयिक परिप्रेक्ष्य में बाल मनोविज्ञान को, बच्चों की अपेक्षाओें को समझे बिना लिखा गया साहित्य बच्चों में पढ़ने की रूचि नहीं जगा पाता। समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में भी बाल साहित्य को अत्यल्प स्थान मिलता है। विद्यालयों में बाल पुस्तक मेलों का आयोजन भी होना चाहिए।

 आशा:- आपके अनुसार एक अच्छे लेखक के लिए कौन सा गुण सबसे आवश्यक हैं?

मुंशी प्रेमचन्द कहा करते थे कि ‘एक अच्छा व्यक्ति ही अच्छा लेखक हो सकता है।‘ तो स्पष्ट है कि अच्छा लेखक बनने के लिए अच्छा मनुष्य बनना प्रथम आवश्यकता है। व्यक्तित्व और कृतित्व में असमानता होने पर कृति परायी सी लगती है। संभवतः यही वह कारण भी है कि मैं कभी भी किसी प्रकाशक या संस्थान की मांग के अनुरूप नहीं लिख पाया। अन्तर्मन से किसी विषय पर लिखने की प्रेरणा ही उत्तम कृति की रचना का मार्ग प्रशस्त करती है। साथ ही जिस समाज में हम रह रहे हैं, जो राष्ट्र हमारा पोषण कर रहा है, उसके हित के प्रति लेखकीय कत्र्तव्य का भान सदैव रहना चाहिए। रोज लिखने के बजाय, रोज श्रेष्ठ साहित्य पढ़ना-चिंतन करते रहना, और जब लोकमंगल के ध्येय को पुष्ट करने वाला उपयुक्त सार्थक विषय दृष्टिगत हो तभी लिखना, यह प्रक्रिया मुझे उचित लगती है, इसी का पालन भी करता हूं। 

आशा:-आपके जीवन में मिला कोई ऐसा सम्मान जो आपके लिए विशेष रूप से मायने रखता हो जिसने आपको यह एहसास दिलाया हो कि आपकी रचना धर्मिता का सही मूल्यांकन हुआ है?

सम्मान को रचनाधर्मिता के मूल्यांकन के तौर पर देखना उचित नहीं है। किसी पुरस्कार या सम्मान का कोई विशेष प्रभाव मुझे कभी अनुभूत नहीं हुआ। हां राजस्थान साहित्य अकादमी ने पहली बार नाटककार के नाते मोनोग्राफ प्रकाशित किया तो लगा कि कहीं तो नाट्य विधा को साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

 आशा:- लेखन में कौन सा बिंदु अधिक महत्वपूर्ण है सामाजिक सरोकार अथवा कलात्मकता?

दोनों ही। सरोकार से जुड़े होंगे तो पाठक के मन को छू सकेंगे और कलात्मकता या शिल्पगत वैशिष्ट्य रहेगा तो रोचकता और विधा अनुकूलता बनी रहेगी।

 आशा:- आपके लिए ‘सृजन’ का वास्तविक अर्थ क्या है?

महर्षि अरविन्द कहते हैं कि ‘साहित्य सृजन मानव की अतुल शक्तिमयी अभिव्यक्ति की पिपासा है।‘ यह अभिव्यक्ति कैसी हो, इस पर कहा है कि ‘साहित्य में सत्यम् और शिवम् की सुन्दरतम् अभिव्यक्ति होती है।‘ समय के सच को कल्याण और शुभता के शिवत्व के साथ मानवीय संवेदना, कल्पना और अभिव्यंजना की अभिव्यक्ति, इसे ही यथार्थ सृजन कहेंगे। मुंशी प्रेमचन्द ने भी कहा है कि ‘जो कुछ लिख दिया जाए वह सबका सब साहित्य नहीं है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो और जिसकी भाषा समृद्ध, परिमार्जित और सुन्दर हो तथा जिसमें मन व मस्तिष्क को प्रभावित करने का गुण हो।‘ किसी भी राष्ट्र का साहित्य उसकी सभ्यता और संस्कृति का संवाहक होता है, आज नवाचार, नवप्रयोग के दौर में इसका ध्यान रखना भी रचनाकारों का दायित्व है।

 आशा:- साहित्य में नाटक विधा का स्थान कहानियों और कविताओं की तुलना में कैसा है? क्या इसे समान महत्त्व मिल पाता है?

मेरी राय में नहीं। गोष्ठियों, साहित्य सम्मेलनों, पत्र-पत्रिकाओं, पुरस्कारो इत्यादि सभी जगह कविता-कहानी की तुलना में नाटक विधा को प्राप्त स्थान नगण्य सा ही है। यह भी तब जब आचार्य भरतमुनि नाट्यविधा को सर्वश्रेष्ठ विधा मानते हुए लिखते हैं कि ‘न तज्ज्ञानं न लच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। नासौ योगो न तत्कर्म यन्नाट्येस्मिन्न दृश्यते।।‘ अर्थात ऐसा कोई ज्ञान नहीं, ऐसा कोई शिल्प नहीं, ऐसी कोई विद्या नहीं, ऐसी कोई कला नहीं, ऐसा कोई योग नहीं, और ऐसा कोई कर्म नहीं, जो इस नाट्य में दिखाई न देता हो।

आशाः-कहानियों और कविताओं की अपेक्षा नाटकों का लेखन अपेक्षाकृत कम क्यों हो रहा है? इसके मुख्य कारण क्या  हो सकते हैं?

अभी जो कहा उसी क्रम में यह भी जोड़ लें कि एक तो कम महत्व मिलने के कारण लेखकों की रूचि भी नाट्यविधा की ओर कम ही है। दूसरे नाट्यविधा का शिल्प कठिन है, इसे नाट्यमंचन को दृष्टिगत रखते हुए समझना होता है, साथ ही नाट्यलेखन में अतिरिक्त श्रम, समय और धैर्य की अपेक्षा भी होती है। 

 आशा:- बाल नाटकों के मंचन में बच्चों की भागीदारी उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है?

बच्चे जब नाटक में भाग लेते हैं तो इसकी तैयारी प्रक्रिया में उनका बौद्धिक व भावनात्मक विकास भी निश्चित ही होता है। नाट्य प्रस्तुति की प्रक्रिया में सबसे पहले होता है एक नाट्यालेख या स्क्रिप्ट। नाटक की जब रीडिंग होती है तब बच्यों को उसके कथानक के माध्यम से इतिहास, काल, प्रसंग और सामाजिक परिवेश की जानकारी होती है। फिर रिहर्सल के दौरान इसका बार-बार दोहरान होता है तो बच्चों को इसे बेहतर समझने का अवसर मिलता है। जो पात्र मिलता है उसके अभ्यास में बच्चा उस पात्र की आदतों, कार्याें, अन्य पात्रों के साथ संबंधों-रिश्तों को जानता है, अन्य पात्रों और समाज के अन्य लोगों के साथ व्यवहार को समझता है। रिहर्सल में सभी कलाकार बालक-बालिकाएं साथ-साथ रोज अभ्यास करते हैं तो सामूहिकता में रहने, परस्पर सहयोग-समन्वय, अनुशासन की समझ विकसित होती है। संवादों के माध्यम से भाषा, उच्चारण, स्थानीय बोलियों-शब्दों और भाव-परिस्थिति के अनुरूप स्वर-विन्यास या वाइस मोड्यूलेशन को भी समझता-सीखता है। फिर नाटक की प्रस्तुति बच्चों की क्षमताओं का आंकलन ही तो है, इससे आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति कौशल, निडरता, सकारात्मकता और गल्तियों से सीखने का गुण विकसित होता है। इसीलिए बाल रंगमंच को बाल व्यक्तित्व के विकास का आधार भी माना गया है।

 आशा:- साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर सरकारों का रवैया कैसा रहता है, सहयोगात्मक या उदासीन?

प्रत्येक राज्य/राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास में कला और साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है,  सांस्कृतिक उन्नति ही राज्य प्रगति का आधार भी है। इसलिए कला और साहित्य को सरकारी प्रश्रय व प्रोत्साहन तो मिलना ही चाहिए, यह कला-साहित्य के संरक्षण और विकास के लिए आवश्यक भी है। किन्तु इनका राजनीतिकरण नहीं हो तो सांस्कृतिक प्रगति और वैचारिक संबलीकरण अधिक प्रभावी रूप से हो सकेगा।




पावन माँ गंगा का मानव जीवन के विभिन्न आयामों में महत्व

पावन माँ गंगा का मानव जीवन के विभिन्न आयामों में महत्व

(The Importance of Holy Mother Ganga in Various Dimensions of Human Life)

डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव

जनपद-प्रतापगढ़ (प्रयागराज मंडल) उत्तर प्रदेश-भारत

संपर्क मोबाइल: 9415350596 ई-मेल: [email protected]

 

 सारांश

माँ गंगा भारतीय संस्कृति, धर्म, साहित्य, विज्ञान और पर्यावरण की प्रतीक हैं। यह शोध पत्र गंगा के ऐतिहासिक, पौराणिक, औषधीय और सामाजिक महत्व का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है। वेद, पुराण, लोकगीत, फिल्मी गीत और सरकारी रिपोर्टों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि गंगा केवल नदी नहीं, अपितु भारत की जीवन रेखा है। ‘नमामि गंगे’ जैसी सरकारी योजनाएं जन-चेतना के बिना अधूरी हैं। प्रस्तुत शोध में स्वरचित कविता के माध्यम से जनजागृति का प्रयास भी किया गया है।

बीज शब्द : गंगा, नमामि गंगे, भारतीय संस्कृति, प्रदूषण, लोक साहित्य

 

1. शोध का शीर्षक

“पावन माँ गंगा का मानव जीवन के विभिन्न आयामों में महत्व का विस्तृत अध्ययन”

*माँ गंगा: के धार्मिक आस्था से लेकर आध्यात्मिक,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक,पौराणिक,धार्मिक,सामाजिक,

ऐतिहासिक, पर्यावरणीय,औषधीय ,महत्व से पारिस्थितिक संकट तक एक महत्वपूर्ण समग्र अध्ययन*

 

2. प्रस्तावना 

इस शोध कार्य का प्रमुख उद्देश्य गंगा मैया के धार्मिक आस्था से लेकर आध्यात्मिक,सांस्कृतिक,धार्मिक

पौराणिक,वैज्ञानिक,ऐतिहासिक,पर्यावरणीय,औषधीय और सामाजिक महत्व को विभिन्न दृष्टिकोणों से संज्ञान में लेना अध्ययन करना और इसके महत्व को समझना है।

 

3- शोध के मुख्य उद्देश्य 

1- माँ गंगा के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का विश्लेषण करना।

प्राचीन काल से ही हमारे ऋषियों,मुनियों और महाविद्वानों द्वारा रचा वेद पुराण,श्रुति और रिचाएँ हमारी पुरातन वैदिक सनातन धर्म संस्कृति का एक मजबूत आधार एवं स्तंभ के साथ ही साथ आधिकारिक और प्रामाणिक प्राचीन विशालतम सनातन हिन्दू परंपरा और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण उपयोगी व् शास्त्र संवत् ज्ञान,तर्क,कर्म,धर्म और संस्कार का समाज को मार्गदर्शन प्रदान करने वाला एक ऐतिहासिक उपयोगी ग्रंथ रूप में वेद पुराण ही रहा है। हमारा वेद ही तो सबसे प्राचीन परंपरा का ऐतिहासिक महत्व का विशेष द्योतक धर्म ग्रंथ है। “वैदिक काल से ही गंगा को सप्त नदियों में सर्वोपरि माना गया है। स्नान और पूजा में प्रथम पूज्य श्री गणेश जी और सपरिवार बाद शिवजी के उपरांत मुख्यतः माँ गंगा जी का ही स्मरण किया जाता रहा है और आज भी किया भी जाता है।

विभिन्न भारतीय पवित्र नदियों में माँ गंगा का महत्व

इसे जनमानस इस श्लोक से भी बहुत अच्छी तरह से जान और समझ सकते हैं।

“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।”

भावार्थ है : हे! माँ गंगा,माँ यमुना,माँ गोदावरी,माँ सरस्वती,माँ

नर्मदा,माँ सिंधु और माँ कावेरी सातों पवित्र नदियों। आप सभी मेरे इस स्नान के जल में पधारिए और अपनी कृपा व् उपस्थिति से इस जल को पवित्र कीजिए।

कहने का तात्पर्य यह है कि वेद काल में ही पावन गंगा नदी को अति पवित्र और जीवनदायिनी माँ गंगा के रूप में माना गया है।

अर्थात मानव जीवन में पावन माँ गंगा का महत्व केवल एक नदी मात्र रूप में नहीं है, बल्कि भारतीय यह संस्कृति,सभ्यता,आस्था और जीवन के आधार के रूप में प्राचीन काल से ही ये संस्थापित है। कल-कल करती बहती ये अविरल प्रवाहमान सरिता (गंगा नदी) करोड़ों घरों के लोगों को जीवन देने के साथ-साथ पीने का जल और जीविकोपार्जन का उन्हें और उनके परिवारों को एक वृहद संसाधन भी प्रदान करती है। गंगा का मैदानी इलाका भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक माना जाता है,जो कृषि-किसानों को उनकी आय को बढ़ाने में सर्वदा सहायक सिद्ध होता रहा है और उन्हें अधिक प्रगति और बढ़ावा देता है। पावन माँ गंगा के लिए प्रसिद्ध श्लोक और स्त्रोत का प्रमुख अंश एक श्लोक रूप में बहुतों गंगा प्रेमियों ने इसे अवश्य पढ़ा होगा, फिरभी एक बार अपने इस शोध प्रबंध में उसका उदाहरण देना शोधकर्ता की नजर में सर्वथा सार्थक रहेगा।

श्लोक : देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगें।

शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले।।

इस श्लोक का मेरे अपने शब्दों में हिंदी अर्थ:हे! देवों की देवी परमेश्वरी,माता भगवती गंगा जी! आप तो तीनों लोकों को तारने वाली हैं। आपकी तरंगें चंचल हैं,आप भगवान श्री भोले शंकर त्रिनेत्रधारी शिवजी के मस्तक पर विराजती और सद् विहार भी करती हैं। आप पवित्र और अत्यंत निर्मल हैं। मेरी बुद्धि आपके श्रीचरणों/श्रीकमलों में सदा सर्वदा लगी रहे और आप निरंतर उसको तीव्रता और शुद्धता प्रदान करती रहें,आप सदैव उसमें अपना वास करें। वैदिक काल के बाद पुराणों में गंगा को धरती पर लाने की एक प्रख्यात पौराणिक अत्यंत सुंदर कथा/कहानी भी तो मिलती है। गंगा पूजन,भजन,गुणगान,आरती पावन गंगा मैया के समस्त प्रसिद्ध तटों पर काशी क्षेत्र,वाराणसी,हरिद्वार,प्रयागराज संगम आदि में निशदिन संध्या बेला में घंटों,घड़ियालों,

दुंदुभी,शंखध्वनि और विभिन्न वाद्य यंत्रों के साथ होता है। इसे देख सुनकर मानस पटल पर भक्ति का अमिट छाप तो बनती ही है,अंतर्मन में प्रवाह भी गुंजारित होता है तथा हृदय को आनंदित और अत्यंत भाव विभोर भी कर देता है।

भारतीय संस्कृति में नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है और इनमें भी गंगा नदी का स्थान सर्वोच्च है। वैदिक काल के ऋषियों ने भी कहा है-“गंगे च यमुने चैव…..”अर्थात सभी पवित्र नदियों में गंगा मइया का नाम सबसे पहले लिया जाता है। ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में माँ गंगा को प्राणदायिनी,पापनाशिनी,संकटहरणी संग मनोकामना पूर्णकरणी और भवतारिणी तक कहा गया है। तीर्थराज प्रयागराज के संगम पर और हरिद्वार,उज्जैन,नासिक के तटों पर भी लगने वाले कुंभ मेले में भी करोड़ों भारतीय,विदेशी, प्रवासी भारतीय श्रद्धालु महिला-पुरुष-वृद्ध-बच्चे जन उसी एक प्राचीन संस्कृति व् परंपरा,आस्था और विश्वास के साथ गंगा और अन्य पवित्र नदियों का स्नान करने तथा स्थानीय प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों पर हजारों किलोमीटर की यात्राएँ रेल मार्ग,सड़क मार्ग, जल मार्ग अथवा हवाई मार्ग की यात्राएँ तय कर उसी अंतरिक श्रद्धा,आस्था और विश्वास से आते हैं जैसा कि हजारों वर्ष पहले भी हुआ करता था और वर्तमान में भी होता चला आ रहा है।

2. माँ गंगा के पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता का अध्ययन करना।

3. प्रदूषण, बाँध और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों को चिन्हित करना।

4. सरकारी योजनाओं जैसे ‘नमामि गंगे’ की सफलता और कमियों का मूल्यांकन करना।

5. माँ गंगा के निर्मलता,स्वच्छता और संरक्षण हेतु जनभागीदारी एवं सतत समाधान सुझाना।

 

4- शोध की परिकल्पना 

यदि माँ गंगा को केवल एक “जल स्रोत” और बहती जलधारा न मानकर इसको एक “जीवित पावन इकाई” के रूप में संरक्षित किया जाए,और इसे आस्था,विज्ञान से से लेकर इसके विभिन्न आयामों से जोड़ा जाए, तो अविरल प्रवाहमान विशाल पवित्र गंगा नदी का पुनर्जीवन १०० प्रतिशत पूर्ण संभव है।

 

5- शोध के मुख्य बिंदु 

पौराणिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

(।) – गंगा अवतरण कथा और भागीरथ तप।

यहाँ एक और बात समझने की नितांत आवश्यकता है। वह यह है कि माँ गंगा जी को उनकी बहन माँ सरस्वती जी से ही कभी किसी कारण एक श्राप मिला था। उन्होंने माँ गंगा जी को श्राप दिया कि तुमको मृत्यु लोक जाना पड़ेगा। धरती पर जाकर रहना होगा और सभी मनुष्यों के पाप कर्म को धोना भी पड़ेगा। धरती पर जाने की ये बात सुनकर माँ गंगा बहुत घबरा गईं। उन्होंने माँ सरस्वती से बहुत ही अनुनय विनय किया कि मुझे पृथ्वी पर नहीं जाना है। मुझे ब्रह्मा जी के कमंडल में ही रहना है। उसी समय में एक विशेष घटना भी घटी। कहते हैं कि हर घटना के ही पीछे ही कोई न कोई तो कारण अवश्य ही छुपा होता है।

माँ गंगा को भू पर लानें में भगीरथ का भागीरथ प्रयास

अत्यंत प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार धरती पर माँ गंगा का अवतरण सूर्यवंशी महाराजा सगर के कुलीन वंशज रहे राजा भगीरथ के अत्यंत कठिन एवं कठोर जप और तपस्या से ही ये संभव हो सका। यद्यपि कि इस अत्यंत पुरातन पौराणिक कथा से सभी धार्मिक,आध्यात्मिक लोग अवगत ही होंगे फिर भी इस प्रसंग का यहाँ एक बार जिक्र करना जरूरी है। गंगा अवतरण का प्रसंग इस प्रकार से है।

महाराजा सगर ने एक बार अश्वमेघ यज्ञ करने का विचार किया और अश्वमेध का एक घोड़ा छोड़ा था। वह घोड़ा देवराज इंद्र ने चुरा लिया और महान ऋषि कपिल मुनि के आश्रम में उसे छुपा दिया। महाराजा सगर के 60,000 पुत्रों ने घोड़े को ढूंढते-ढूंढते महर्षि कपिल मुनि के आश्रम तक जा पहुँचें तो वहाँ अश्वमेघ का ये घोड़ा बँधा देख कर सभी पुत्रों ने एक साथ आश्रम पर अपना धावा बोल दिया। इससे तपस्या में लीन महर्षि कपिल मुनि का ध्यान भंग हो गया तो वह अत्यंत क्रोधित हो गए। वो अपने ज्ञान और तपस्वी शक्तियों से बहुत बड़ा श्राप दे दिया। क्रोधित महर्षि कपिल मुनि के श्राप से ही महाराजा सगर के वो साठ हजार पुत्र वहीं के वहीं जल कर भस्म हो गए और राख की ढेर बन गए।

ऋषिवर के श्राप से भस्म अपने पूर्वजों की भटकती आत्मा को शांति प्रदान करने और उन्हें तारने के लिए ही महाराजा सगर के वंशज भागीरथ ने ब्रह्मलोक से गंगा जी को पृथ्वी पर लाने का दृढ़ संकल्प लिया। राजा भगीरथ ने वर्षों तक अत्यंत ही कठिन जप और तपस्या करना प्रारंभ कर दिया,जिससे प्रसन्न होकर ही भगवान ब्रह्मा जी गंगा माँ को पृथ्वी पर भेजने के लिए तैयार तो हो गए। किंतु गंगा के अति तीव्र वेग को केवल भगवान सदाशिव ही संभाल सकते हैं और कोई भी सक्षम ही नहीं है,ब्रह्मा जी ने महान तपस्वी भगीरथ से ये भी कहा। गंगा जी के अत्यधिक वेग से पृथ्वी के रसातल में चले जाने के भय से राजा भागीरथ ने तब भगवान भोलेनाथ शिवजी की स्तुति,वंदना,आराधना,प्रार्थना एवं अनुग्रह करते हुए सम्पूर्ण ध्यान शिवजी में केंद्रित कर उनका ही नमन करने लगे। ब्रह्मा जी जब अपने कमंडल से माँ गंगा जी को निकाल बाहर छोड़े तो हिमालय पर देवों के देव महादेव स्वयंभू भगवान शिवजी ने अपनी जटाओं में माँ गंगा के वेग को सुरक्षित रूप से समेट लिया और फिर एक शांत धारा के रूप में वह उन्हें एक जटा खोल का पृथ्वी पर प्रवाहित किया।

 

(।।)- वेद, पुराण, श्रुति, ऋचाओं, बाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस व् साहित्य में माँ गंगा का वर्णन।

रामायण काल के एक प्रसंग से भी माँ गंगा को यहाँ पर जोड़ना एकदम सही है। वो प्रसंग इस प्रकार है।

माता कैकयी को महाराजा दशरथ द्वारा दिया गया तीन वरदान और पिता के वचनों के निर्वहन हेतु श्रीराम प्रभु का राज महली राजसी ठाठ त्याग कर श्रीराम-माता जानकी और अनुज लक्ष्मण के साथ वनवासी वेष भूषा में पिता का आशीर्वाद लेने वनवास जाते समय वे चरण छूने गए और वह तीनों वन गमन को निकल गए। उस समय अयोध्या के सभी नर नारी अश्रुपूर्ण आँखों,दुःखी मन से बहुत दूर तक रोते विलाप करते उनके पीछे पैदल चलते उन्हें विदा करने गए।

श्रीराम जी वनगमन करते जब श्रृंगवेरपुर पहुँचे तब निषादराज केवट ने उनका और माता सीता तथा लक्षण का पैर धोया और अपनी नाव पर बैठा कर उन्हें गंगा पार कराया है। ये सब प्रसंग महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस में उनके द्वारा लिखी चौपाइयों में उद्धरित हैं।

श्रीराम चरित मानस के अयोध्याकांड में वर्णित केवट-श्रीराम संवाद में भक्तवत्सल श्रीहरि विष्णु जी के अवतारी श्रीराम जी के प्रति ऐसी अगाध भक्ति,प्रेम और चेहरे पर झलकते हुए आत्मीय हास्य का एक अनोखा,अद्भुत,आकर्षक,हृदय को छू जाने वाला एक मधुरम संवाद का प्रसंग है। वह चौपाई इस प्रकार है।

“पाहन तें न काठ कठिनाई। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाइ।

बाट परइ मोरि नाव उड़ाई। बहइ जनु पाटकहू तेहि धाई।।”

जहाँ निषाद राज केवट अपने विशेष बुद्धिमत्ता पूर्ण तर्क से प्रभु श्री राम जी का पैर पखार लिए बिना अपने निज काठ की नाव पर बैठाने के लिए तैयार नहीं होता है। उन्हें एक पैर पर ही खड़े रहने के लिए वह विवश कर देता है। मेरे निजी शब्दों में जिसका यह अर्थ है। निषादराज केवट श्री राम जी से कहता है—हे!नाथ हे!जगत के स्वामी मेरे प्रभु श्रीराम जी मैं आपके चरण-कमल धोए बिना तो आपको अपनी नाव पर कभी नहीं चढ़ाऊँगा। हमने सुना है लोग ऐसा कहते हैं कि आपके चरणों की धूल में कोई जादुई जड़ी-बूटी है, जिसके छूते ही पत्थर की सिला भी एक सुंदर स्त्री बन गई थी। मेरी नाव तो सूखी लकड़ियों की बनी हुई है। काष्ठ तो पत्थर से अधिक कठोर बिल्कुल भी नहीं हो सकता है। यदि मेरी यह लकड़ी की छोटी सी नैय्या कहीं महर्षि गौतम मुनि जी की पत्नी (अहिल्या) की तरह तर गई और एक स्त्री बन गई तो हम क्या करेंगे ? तब तो मेरे जीवनयापन हेतु जरूरी मेरी ये रोजी-रोटी भी छिन जाएगी। इसलिए हे! प्रभु श्रीराम जी,जब तक मैं आपके पावन चरण-कमल को अच्छी तरह से धो न लूँ,मैं आपको अपनी नाव पर नहीं बैठाऊँगा। केवट के इस भाव, प्रेमपूर्ण आग्रह और मधुर हट को देखकर अंततः भगवान श्रीराम जी हँसते हुए निषादराज केवट की इस बात को दिल से सहर्ष स्वीकार किया,तभी जाकर कृपानिधान के सुकोमल कमलवत श्रीचरणों को प्रेम के साथ केवट ने धोया और अपनी नाव में आदर पूर्वक बैठा कर श्रृंगवेरपुर घाट से श्रीराम जी सीता मैया एवं लक्ष्मण भइया को पावन गंगा नदी पार करवाया है।

 

(।।।)- स्वतंत्रता आंदोलन और गंगा तट के तीर्थ नगर।

पावन माँ गंगा तट के विभिन्न तीर्थ नगर,बड़े कस्बे और शहर न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था के केंद्र ही नहीं रहे, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान यह शहर राजनीतिक चेतना भी प्रदान किया,आंदोलनकारी रणनीतियों,वृहद क्रांतिकारी गतिविधियों और राष्ट्रीय एकता के प्रमुख गढ़ तथा केंद्र स्वरूप भी साबित हुए। इन पावन के किनारो/तटों ने हमारे देश को नई दिशा और अद्भुत ऊर्जा भी दी।

स्वराज भवन और आनंद भवन,प्रयागराज (इलाहाबाद) का शहर तो स्वतंत्रता संग्राम गतिविधियों का मुख्य केंद्र बिंदु था, जहाँ से देश के शीर्ष नेताओं ने बैठकें कर विशेष रणनीतियाँ बनाईं और उसपर सफलता पूर्वक कार्य भी किया। यहाँ से देश को पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे महान शख्शियत और राजनीतिक गुरु तथा नेतृत्व करने वाले राजनेता मिले। गंगा-यमुना के इस पावन तट संगम पर क्रांतिकारियों के द्वारा अनगिनत जनसभाएँ की गईं,जिन्होंने जनता में देशभक्ति की राष्ट्रीय भावना की एक अलख जगाई और जन मानस के अंदर एक उत्साहवर्धक जागृति उत्पन्न करने का सफल कार्य किया। हमारी प्राचीन नगरी (काशी/वाराणसी में) पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित किया एशिया का सब से बड़ा शिक्षण संस्थान बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जिसे (बीएचयू) के नाम से दुनिया जानती है। ये राष्ट्रवादी सोच और बौद्धिक क्रांति का एक विशाल केंद्र बना। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस प्राचीन तीर्थ नगर का कई बार दौरा किया एवं यहाँ के युवाओं को स्वाधीनता संग्राम आंदोलन से जोड़ा। इसका युवाओं पर बहुत सुंदर प्रभाव भी पड़ा। गुप्त बैठकों और आंदोलनों के संचालन में गंगा नदी के घाटों के आसपास का सनातनी और सामाजिक परिवेश काफी मददगार रहा। इन गंगा घाटों की कांतिकारी जन आंदोलन में भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक पुरातन नगरों के संतों महात्माओं ने देश के स्वाधीनता सेनानियों को नैतिक बल और वैचारिक मंथन करने हेतु सजग किया और उनके अंदर अदम्य शौर्य-साहस भरने के साथ ही साथ वे उनको विशेष कार्यकारी प्रेरणा भी प्रदान किया। विभिन्न क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश दमन चक्र से बचने के लिए गंगा नदी के इन तटीय इलाकों और पर्वतीय क्षेत्रों में उस समय गुप्त शरण भी ली थी। इसी तरह माँ गंगा नदी के अन्य तटीय क्षेत्रों एवं स्थानों में बसे चुनार और फतेहपुर जैसे ऐतिहासिक क्षेत्रों में भी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा कड़ा संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुतियाँ दी। प्रतापगढ़ जिले के मानिकपुर-कालाकांकर किले का भी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही रही हैं। यहाँ विदेशी वस्त्रों की होली जला कर ब्रिटिशों के खिलाफ स्वाधीनता प्राप्ति हेतु विभिन्न सार्थक सहयोग किया गया था। इस प्रकार कितने भारतीय सपूतों ने भारत की आजादी के लिए वीर क्रांतिकारियों ने फाँसी पर चढ़ हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने सर्वोच्च बलिदान से इतिहास रच दिया। माँ गंगा के निर्मल अविरल प्रवाह ने हर दौर में भारतीयों को सदा एकजुट होने और अपनी संस्कृति व स्वतंत्रता की रक्षा करने का संदेश दिया। इस जनक्रांति से सांस्कृतिक चेतना के हुए जागरण के कारण ही आज 15 अगस्त 1947 से अनवरत आजादी का राष्ट्रीय महापर्व मनाया जा रहा है। इसमें गंगा नदी के तटीय क्षेत्रों के विभिन्न शहरों,युवाओ,क्रांतिकारियों और बलिदानियों का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान रहा है,जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

2 : वैज्ञानिक, औषधीय, भौगोलिक और पारिस्थितिक महत्व

(।)- उद्गम से डेल्टा तक का वृहद जल मार्ग: गंगोत्री से गंगा सागर तक।

पावन माँ गंगा का न केवल एक बड़ा आध्यात्मिक,सांस्कृतिक,पौराणिक,धार्मिक,ऐतिहासिक और औषधीय महत्व है बल्कि मानव जीवन में बहुत बड़ा वैज्ञानिक महत्व भी है। आधुनिक विज्ञान ने भी माँ गंगा की महिमा और उसकी सुचिता को हृदय से स्वीकार किया है। विभिन्न वैज्ञानिकों ने गंगा के विशेष निर्मल जल पर अत्यधिक गहराई के साथ किए गए अपने वृहद गहन शोध,अध्ययन,अन्वेषण और विश्लेषण में बड़ा आश्चर्यजनक, अद्भुत,परोपकारी,गुणकारी,लाभकारी,अत्यंत चमत्कारिक और सकारात्मक परिणाम पाया है। वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा जल में “बैक्टीरियोफेज” नामक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो जल से हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसी कारण से गंगा जल को विशुद्ध माना गया। माँ गंगा का जल वर्षों तक रखने पर भी वह न तो खराब होता है और ना ही उसकी निर्मलता और शुद्धता में कोई कमी आती है यहाँ तक कि गंगा जल के इस श्वेत रंग में भी कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता है। इसे गंगा की स्वयं शुद्धिकरण क्षमता भी आप कह सकते हैं। पवित्र गंगा नदी में ही नियमित स्नान करते रहने से विभिन्न चर्म रोग,वात रोग,पित्त रोग और कफ रोग का भी शमन होता है और उसमें बहुत आराम भी मिलता है।

चूँकि गंगा नदी हिमालय के गंगोत्री से निकल कर देवप्रयाग होते हुए बंगाल की खाड़ी तक की पावन गंगा नदी की यात्रा 2525 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बहने वाली यह नदी भारत के 11 राज्यों और 40 करोड़ से अधिक लोगों के जीवन से ये सीधे जुड़ी हुई है जो विभिन्न पहाड़ों,झरनों से यह बहती हुई भारत की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण ये गंगा नदी विभिन्न आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों और गंधक जैसे गर्म जल श्रोतों के गर्म जल आदि पर भी कहीं न कहीं अपनी विशेष कृपा बरसाती हुई विशाल जल धारा भारतीय मैदानी इलाकों में आती है। इसलिए माँ गंगा के जल में अनेक औषधीय गुणों के कारण उसके स्पर्श स्नान से भी अनेक रोग ठीक हो जाते हैं। जब माँ गंगा में निरंतर स्नान किया जाता है तो सौभाग्य तो प्राप्त होता ही है हृदय भी प्रसन्न होता तथा अंतर्मन और शरीर भी शुद्ध हो जाता है। ये गंगा केवल जलधारा मात्र नहीं है बल्कि हमारी सभ्यता,संस्कृति और आस्था की पुण्य धुरी भी है। यहाँ भी माँ गंगा के विशेष जल की गुणवत्ता,महत्ता और उसकी उपयोगिता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

(।।)- गंगा बेसिन, सभ्यता विकास और कृषि पर प्रभाव।

वेद काल में ही पावन गंगा नदी को अति पवित्र और जीवनदायिनी माँ गंगा के रूप में माना गया है।

अर्थात मानव जीवन में पावन माँ गंगा का महत्व केवल एक नदी जलधारा मात्र रूप में नहीं है,बल्कि भारतीय संस्कृति,सभ्यता,आस्था और जीवन के आधार के रूप में प्राचीन काल से ही ये संस्थापित है। कल-कल करती बहती ये अविरल प्रवाहमान सरिता (गंगा नदी) के किनारे किनारे बसे लोगों में सभ्यता का विकास भी करने में अति सहायक रही हैं,जिसका उदाहरण हड़प्पा और सिंधु घाटी की सभ्यता का विकास तो है ही इसी के साथ यह नदी करोड़ों घरों के लोगों को जीवन देने के साथ-साथ पीने का जल और जीविकोपार्जन का उन्हें और उनके परिवारों को एक वृहद संसाधन भी प्रदान करती है। गंगा का मैदानी इलाका तो भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक माना जाता है,जो कृषि-किसानों को उनकी आय को बढ़ाने में सर्वदा सहायक सिद्ध होती रही है,उन्हें अन्न और भोजन भी उपलब्ध कराती है। यह नदी उन्हें अधिक प्रगति करने तथा आर्थिक रूप से मजबूत एवं सुदृढ़ करने में भी सहायक होती है और बढ़ावा देती है। इससे न जाने कितने परिवारों का गुजर बसर होरहा है और वे अपने उपलब्धि से खुशहाल एवं सुखी भी हैं।

(।।।)- जैव विविधता: गंगा डॉल्फिन, कछुए, जलजीव एवं मत्स्य संपदा।

गंगा नदी अन्य बड़ी नदियों की ही तरह जैव विविधता का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें गंगा डॉल्फिन जैसी मछलियों के साथ ही साथ कछुओ, जलजीवों और अपार मत्स्य संपदा की बहुतायत है। विशाल गंगा नदी और अन्य नदियों की इस संपदा का भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है।

3 : आध्यात्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक आयाम

(।)- आस्था, तीर्थयात्रा, मेला: विभिन्न कुंभ, छठ पर्व।

आज भी हर गंगा तटीय क्षेत्रों में दैनिक मेले तो लगते ही हैं विशेष पर्वों पर काफी विशाल मेला लगता है,

लोग गंगा स्नान,गंगा पूजा और सूर्य को अर्घ्य प्रदान करते हैं। छठ पर्व तो बहुत वृहद रूप में मनाते हैं।

 

(।।)- लोक जीवन, लोक संस्कृति, लोकगीत और लोक कला में माँ गंगा।

मनोकामना पूर्ति की अपेक्षा का महिलाओं द्वारा गाए जाने वाला एक प्रचलित गीत का तो विशेष अवलोकन करने की भी यहाँ नितांत आवश्यकता है,जिसे आप बहुतों ने कहीं न कहीं कभी तो जरूर ही सुना भी होगा।

वह भोजपुरी गीत इस प्रकार है।

“हे! गंगा मइया तोहें चुनरी चढ़ईबै,गोदिया मा अईहैं जब ललनवा हो रामा………..।”

वर्ष 1963 में आई पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहें पियरी चढ़इबो’ का है, इसे गीतकार शैलेन्द्र जी ने लिखा और स्वरकोकिला लता मंगेशकर जी और ऊषा मंगेशकर जी ने मधुर कर्णप्रिय आवाज में गाया तथा संगीतकार चित्रगुप्त जी ने इसे संगीतबद्ध किया था।

इसी तरह एक गीत और पारंपरिक अवधी कजरी/भोजपुरी लोकगीत में गंगा माँ से प्रार्थना करती हुई ग्रामीण महिलाएँ गाती हैं जब गंगा मैया बरसात में फाफी बढ़ी हुई होती हैं और आस पास के सभी इलाके जलमग्न होते हैं। वह गीत कुछ इस प्रकार से है। “गंगा पाँच मिनट घट जातू,भौजी मोरी नइहर जइहैं ना……..।”

यद्यपि कि इस प्राचीन पारंपरिक लोकगीत का इसके किसी एक मूल रचयिता, आधुनिक गायक या गायक कलाकार/संगीतकार का नाम अस्पष्ट रूप से तय नहीं है, क्योंकि इसे पीढ़ियों से ग्रामीण अंचलों में महिलाएँ खुद गाती चली आ रही हैं। विधा कजरी का ये एक लोकप्रिय लोकगीत है,जो सावन के महीने में विशेष रूप से महिलाओं द्वारा झूला झूलते हुए भी गाया जाता है। यह ग्रामीण अवधी क्षेत्र की एक ऐसी महान लोक कला परंपरा का भोजपुरी/अवधी गीत है जिसे माँ गंगा एक प्रार्थना के रूप में गाया जाता है। ये भारतीय लोक गीत परंपरा की ही महान देन है, जो मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँची है।

पावन गंगा मैया के महत्व आदि के संदर्भ में मेरी एक स्वरचित कविता है पावन माँ गंगा ही जीवन नैया

पतित पावनी माँ गंगा मैया,करती सदा जगत उद्धार।

मोक्षदायिनी गंगा की निर्मलता,करती मानव उद्धार।।

गंगा माँ खोलें मोक्ष द्वार और,कराएँ ये भवसिंधु पार।

गंगा ही जीवन है-गंगा जीवन नैया,गंगा ही संस्कार।।

भगवान आदि गुरु शंकराचार्य,जी के यह पावन मंत्र।

शंकराचार्य जी के अद्वैत सिद्धांत,का यह सुंदर मंत्र।।

‘चरैवेति’सतत आगे बढ़ते,रहने की प्रेरणा का है मंत्र।

आदि गुरु के अद्वैत सिद्धांत,पर स्थापित ये गुरुमंत्र।।

दिव्य पावन गंगा स्वच्छता,पावनता बनी रहे है ध्येय।

पावन गंगा की निर्मलता,अविरलता का पुण्य ध्येय।।

इसे अक्षुण्य बनाए रखना ही,दृढ़ संकल्प और ध्येय।

सनातन संस्कृति की,अमर ज्योति जलाना है ध्येय।।

पावन गंगा मैया का बढ़ता,जल प्रदूषण रोकना यारा।

कोई कूड़ा कचरा बहते देखें,तो निकाल बाहर डारा।।

गंगा का करना,संरक्षण सेवा संकल्प हमारा आधार।

मंत्र सुनें हैं हिन्दू सारे’गंगा तव दर्शनात् मुक्ति’ सार।।

हे!गंगा माँ तेरे दर्शन मात्र से,मुक्ति मिलती है स्मरण।

पुराणों में यह वर्णित,आदि काल में गंगा अवतरण।।

दिव्य गंगा को श्रीहरि विष्णु ने,ये कह आशीष दिया।

गंगा का स्पर्श स्नान दर्शन,पूजन जिसने भी किया।।

नमामि गंगे योजना ये नदी,रक्षार्थ तक न सीमित है।

मानवता के उत्थान एवं रक्षा,को भी ये समर्पित है।।

“नर सेवा नारायण सेवा” की,भावना से ये सेवारत।

पतित को ऊर्जावान जागरूक,बनाने को ये रत है।।

इसके लिए है संकल्पित देश,भक्ति की प्रेरणा देता।

समाज के सभी कोने तक,सेवा मिशन संदेश देता।।

दिव्य गंगासेवा मिशन-सा,ट्रस्टों की यही योजना है।

‘वेद’ से’ विज्ञान’ गौरव एवं,परंपरा की स्थापना है।।

इसकी पुनर्स्थापना से,गुरुकुलों का संचालन करना।

हिंद देश-दुनिया में,सांस्कृतिक पुनर्जागरण करना।।

नव पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम एवं,संस्कारों का संचार करना।

ऊर्जावान युवा पीढ़ी में,नैतिक मूल्यों को है भरना।।

दिव्य गंगा सेवा प्रण के,मुख्य कार्यक्षेत्र याद रखना।

जाह्नवी में पावन प्रवाह,निर्मलता है बनाए रखना।।

इसकी अविरलता संग,गंगा तटों की सफाई करना।

वृक्षारोपण जन-जागरण,अभियान चलाते रखना।।

सनातन संस्कृति और,गंगा सभ्यता संरक्षण करना।

गुरुकुल शिक्षा वेद से विज्ञान तक,संवर्धित करना।।

स्वास्थ्य शिक्षा सेवा माध्यम से,जनकल्याण करना।

सांस्कृतिक आध्यात्मिक,नैतिक जागृति है करना।।

राष्ट्रप्रेम सेवा भावना से,युवाओं को प्रेरित है करना।

आदि गुरु शंकराचार्य जी के,सिद्धांतों संग चलना।।

उसपे आधारित समाज,संस्कृति का उत्थान करना।

चरैवेति सिद्धांतगत सतत,समाजसेवा करते रहना।।

सांस्कृतिक विरासतें,धर्मशील मेरे देश की अनमोल।

‘वसुधैव कुटुंबकम्’ सोच,वाला भारत है अनमोल।।

हम वृक्ष को देव सम मानें,माँ सम भू को मानें बोल।

निर्मल मन के सीधे-साधे,विनम्र हमारा सदैव बोल।।

हरेक जगह होने चाहिए,माँ गंगा पर जरूरी विधान।

‘गंगा माँ की निर्मलता’ में,चुनौतियाँ एवं समाधान।।

मानवीय स्वास्थ्य पर भी,दो दिवसीय हो आयोजन।

विचार गोष्ठियों द्वारा निकले,यह निष्कर्ष-प्रयोजन।।

राष्ट्रीय विचार मंथन-सेमिनार एवं साहित्य समागम।

माँ गंगा पर शोध रखें जारी,प्रायोजक से प्रयोजन।।

अहा!अति सुंदर आयोजन,सफल होगा ये समागम।

इस कविता के रचयिता का,जो मानना है स्व मन।।

मेरी स्वरचित ये कविता है,इसमें पुण्य भाव हमारा।

हिमालय-गंगोत्री-देवप्रयाग से,गंगासागर जलधारा।।

स्थापना स्थली देव भूमि,हरिद्वार-उत्तराखंड हमारा।

प्रेरणा स्रोत रही है हमारी,माँ गंगा की पावन धारा।।

रचयिता की एक सर्वाधिकार सुरक्षित ©® कविता

(।।।)- विभिन्न पावन गंगा तटों पर वृहद शंख नाद एवं घंटों ध्वनि संग गंगा आरती।

 

गंगा नदी का पूजन,भजन,गुणगान,आरती, प्रासाद आदि वास्तव में पावन गंगा मैया के रूप में समस्त प्रसिद्ध तटों पर काशी क्षेत्र,वाराणसी,हरिद्वार,प्रयागराज संगम आदि क्षेत्रों में निशदिन संध्या बेला में बहुत ही सुंदर मनोहारी रूप में घंटों,घड़ियालों,दुंदुभी,शंखध्वनि और विभिन्न वाद्य यंत्रों के साथ होता है। इसे देख सुनकर मानस पटल पर अपार भक्ति का अमिट छाप तो बनती ही है,अंतर्मन में एक धार्मिक उत्साह का प्रवाह भी गुंजारित होता है तथा हृदय को आनंदित और अत्यंत भाव विभोर भी कर देता है। कितना अदभुत ,अनुपम और सुखद लगता है जो सनातन धर्म, संस्कृति और आस्था को बल और अटूट विश्वास प्रदान करता है।

 

(।v)- गंगा की स्त्री रूप में मान्यता और एक “माँ” की अवधारणा।

अध्याय-4 : संकट और चुनौतियाँ

(।)- प्रदूषण के स्रोत : घरेलू, नगरीय, औद्योगिक, धार्मिक अपशिष्ट।

(।।)- विभिन्न बाँध, बैराज और जल प्रवाह में कमी।

(।।।)- प्लास्टिक, कचरा, अतिक्रमण अवरोध और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव।

अध्याय- 5 : संरक्षण प्रयास और गंगा का भविष्य

(।)- नमामि गंगे मिशन, गंगा एक्ट, NGT के आदेश।

(।।) – सामुदायिक भागीदारी: गंगा प्रहरी, गंगा भक्तों, एनजीओज़ ( NGO) की भूमिका।

(।।।)- सतत प्रयास मॉडल : इको-टूरिज्म, जैविक खेती, स्वच्छता।

6- : शोध पद्धति

1. द्वितीयक स्रोत : सरकारी रिपोर्ट, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड डेटा ( CPCB Ddta ) शोध पत्र।

2. क्षेत्रीय अध्ययन : इलाहाबाद/प्रयागराज, वाराणसी, हरिद्वार जैसे तटवर्ती क्षेत्रों का अवलोकन।

3. साक्षात्कार : स्थानीय लोग, पुजारी, नाविक, गंगा संरक्षक ,पर्यावरणविद् ।

4. सांख्यिकीय विश्लेषण : उपलब्ध जल गुणवत्ता डाटा का तुलनात्मक अध्ययन।

7: रोकथाम की आवश्यकता
विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों शोधों से पता चला है कि गर्मियों के दौरान मैदानी इलाकों में गंगा के प्रवाह को बनाए रखने में ग्लेशियर के पिघलने की तुलना में भूजल प्रणाली (Aquifers) की भूमिका सबसे अहम है।
नगरीय क्षेत्रों से निकलने वाला अनुपचारित सीवेज (Sewage) और औद्योगिक अपशिष्ट जल नदी में प्रदूषण का 75% से अधिक हिस्सा बढ़ा रहे हैं। अर्थात जल प्रदूषण का मुख्य श्रोत बन गए हैं। वाराणसी और कानपुर जैसे प्रमुख केंद्रों के पास नदी के तलछट और जल में भारी धातुएं (Heavy Metals) तथा कार्बनिक प्रदूषक तत्व खतरनाक स्तर तक पाए गए हैं। इससे जल प्रदूषण अत्यधिक मात्रा में बढ़ता जा रहा है। भूगर्भ जल की
अत्यधिक जल निकासी और सहायक नदियों की उपेक्षा के कारण भी गंगा की ‘अविच्छिन्न धारा’ (Aviral Dhara) प्रभावित हुई है, जिससे जलीय जैव विविधता पर भी भारी संकट मंडरा रहा है। अतः सुधार और इसे रोकने की नितांत आवश्यकता ताकि गंगा जलधारा का अविरल प्रवाह बना रहे । यह पावन सरिता नदी माँ गंगा निरंतर प्रवाहमान बनी रह सके। आएँ हम सब मिल कर दिल से ये संकल्प लें कि गंगा मइया को स्वच्छ, पावन बनाए रखने में घर-घर अपना व्यक्तिगत योगदान देंगे। इसे मैली नहीं होने देंगे।

8- अपेक्षित निष्कर्ष

गंगा का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी विशाल संकट है। यह

विभिन्न विश्वविद्यालयों (जैसे दिल्ली, लखनऊ, देहरादून/रुड़की, वाराणसी, इलाहाबाद इत्यादि और साथ ही साथ आईआईटी संस्थानों द्वारा गंगा नदी पर किए गए संयुक्त व स्वतंत्र शोधों में यह निष्कर्ष सामने आया है कि नदी का प्रवाह मुख्य रूप से भूजल रिसाव (Groundwater Discharge) पर निर्भर करता है, और इसका जल शहरी क्षेत्रों व औद्योगिक कचरे के कारण अत्यधिक प्रदूषित हो रहा है। इसे जन सामान्य के निजी सहयोग और विभिन्न कार्यदायी संस्थाओं एवं स्वायत्तशासी सेवा संगठनों के विशेष मानवीय प्रयासों

और सख्त सरकारी कानून, जागरूकता, आस्था, विज्ञान , जनजागरण और जनभागीदारी के भी सम्मिलित समन्वय और शुचि प्रयास से ही “अविरल और निर्मल पावन माँ गंगा” का लक्ष्य अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए अभी संपूर्ण समाज के दिली प्रयासों ,आंतरिक प्रबल इच्छाशक्ति और उन्नत वैचारिक सोच को

विकसित करने की भी नितांत आवश्यकता है ताकि महत्वपूर्ण अपेक्षित लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके और गंगा माँ की पावनता, निर्मलता, स्वच्छता, अविरल प्रवाहमान धारा के रूप में कल कल करती और बहती देखी जा सके। वह भी न केवल किसी एक क्षेत्र विशेष में बल्कि गंगा नदी के किनारे के सभी नगरों एवं घाटों तथा गंगोत्री से गंगासागर के बीच पड़ने वाले संपूर्ण रास्तों में मोक्षदायिनी ,पापनाशिनी, जगतरिणी गंगा नदी और उसकी पावन जलधारा की एकरूपता दिखाई पड़े।

9-महत्व

यह शोध देश के नीति निर्माताओं, समस्त सरकारों, छात्र-छात्राओं, अध्यापकों, अभिभावकों, गंगा प्रेमियों और गंगा स्वयं सेवियों तथा आमजन को पावन माँ गंगा को समग्र रूप से समझने और अखंड विश्वास करने में मेरा मानना है यह शोध निश्चित ही महत्वपूर्ण साबित होगा और नवीन शोधार्थियों को भी ये अध्ययन मदद करेगा और अपनी अहम भूमिका भी निभाएगा।

इलाहाबाद जैसे पावन संगम नगरी क्षेत्र और गंगा किनारे बसे विभिन्न विशाल शहरों महानगरों आदि कानपुर, वाराणसी, काशी, चुनार, मिर्जापुर, फतेहपुर, मानिकपुर, कालाकांकर, हरिद्वार-देहरादून जैसे नगरों के संदर्भ में इस शोध पत्र का विशेष महत्व और अमूल्य योगदान होगा।

 

अंत में मेरी दृष्टि से एक गीत की कुछ लाइन और सर्वविदित संस्कृत का एक श्लोक भी यहाँ रखना ये मुझे परमावश्यक लगता है।

1978 में बनी फिल्म ‘ गंगा की सौगंध ‘ का ये अनुपम गीत ‘ मानो तो मैं गंगा माँ हूँ न मानो तो बहता पानी ‘ यह प्रसिद्ध गीत गीतकार अनजान जी द्वारा लिखा गया है और इसे स्वर की बेताज साम्राज्ञी स्वरकोकिला लता मंगेशकर जी द्वारा अपने सुमधुर कंठ से गाया गया है, मशहूर संगीतकार कल्याण जी-आनंद जी ने इसे संगीत प्रदान किया है।

“गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः”

मेरे निजी शब्दों में इसका भावार्थ :

हे! पापनाशिनी , पतितपावनी माँ गंगा। तुम्हारे पुण्य दिव्य दर्शन मात्र से ही रोम-रोम आह्लादित हो जाता है और मानव प्रजाति को मुक्ति मिल भी जाती है।

जय माँ गंगा ! जय माँ गंगा ! जय माँ गंगा ! जय माँ गंगा ! जय माँ गंगा ! तेरी सर्वदा जय हो! माँ।

 

10- संदर्भ ग्रंथ / References -( APA 7th)

1. प्राथमिक स्रोत / Primary Sources

(।)-Rigveda_. (2015). (Gita Press, Trans.). Gita Press Gorakhpur. (Original work ca. 1500 BCE)

(।।)-Tulsidas. (2018). Shri Ramcharitmanas (Gita Press, Trans.). Gita Press Gorakhpur.

(।।।)-Valmiki. (2020). The Ramayana (Gita Press, Trans.). Gita Press Gorakhpur. (Original work ca. 500 BCE)

(।v)Vyasa. (2019). The Vishnu Purana (Gita Press, Trans.). Gita Press Gorakhpur.

2. सरकारी रिपोर्ट एवं दस्तावेज़ / Government Reports

(।)-Central Pollution Control Board. (2024). Ganga water quality report 2024. Ministry of Environment, Forest and Climate Change. https://cpcb.nic.in

(।।)-National Mission for Clean Ganga. (2024). Namami Gange Mission: Progress Report. Ministry of Jal Shakti, Govt. of India. https://nmcg.nic.in

3. पुस्तकें / Books

(।)-Sen, S. (2019). Ganga: The many pasts of a river. Yale University Press.

4. लोक साहित्य, संगीत एवं फिल्म / Folk Literature, Music & Cinema

(।)-Lyrics: Anjaan (1978). Ganga Ki Saugandh, ”Maano to main Ganga Maa hun….”(Song) Singer: Lata Mangeshkar, Music : Kalyanji-Anandji (Saregama India Ltd.) ,

(।।)-Lyrics: Shailendra (1963) Ganga maiya tohe piyari chadhaibo, “He Ganga Maiya tohe Piyari chadhaibo…..”(Song) Singers: Lata Mangeshkar & Usha Mangeshkar, Music : Chitragupta ji

(।।।)-Lok Sanskriti Shodh Sansthan. (2015). Bhojpuri lokgeet sangrah(Collection of Bhojpuri folk songs)

5. अप्रकाशित स्रोत / Unpublished Source

Srivastava, Dr.V. K. (2026). “Pawan Maa Ganga hi Jeevan Naiya” [Original Hindi Poem]. Unpublished manuscript. © Author

 

सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

 

प्रस्तुतकर्ता एवं शोधकर्ता :

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी. कालेज प्रतापगढ़ (प्रयागराज मंडल,प्रयागराज) उ.प्र.-भारत
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक एवं वरिष्ठ समाजसेवी)
संपर्क मोबाइल: 9415350596 ई-मेल: [email protected]