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संतोष कुमार झा की कविता ‘पिताजी का कोट’

पिताजी का कोट

सन्तोष कुमार झा
अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक
कोंकण रेलवे

पिता का कोट पहनते ही
जाने क्या हो जाता है।
सर तना, कदम तेज़
होंठों पर मुस्कान ,
आँखों में चमक
और कंधे सीधे ,
लेकिन हो जाते हैं,
बेहद बोझिल।

पहनते ही कोट बाबूजी का
भर जाता हूँ चिन्ताओं से,
दुनियाभर के।
बोझ अनुभवों के उतर
आते हैं मस्तिष्क से कन्धों पर।
एहसास ज़िम्मेदारियों का
तारी होता जाता है,
होता जाता हूँ
कुछ ही अन्तराल में
बेटे से पिता
खोता जाता हूँ
अल्हड़पन, लड़कपन
होता जाता हूँ
एक बच्चे से आदमी।

गौण होते जाते हैं
अपने सपने, अपनी खुशियाँ,
अपनी आज़ादी, अपने अनमोल पल
अपना एकान्त, अपना अस्तित्व।

होते जाते हैं महत्वपूर्ण
परिवार और दुनियादारी
पत्नी के सुख दुख की परवाह ,
माँ की बीमारी की चिन्ता
घर का लोन,
बच्चों की पढ़ाई
रिश्तों को सहेजने की चिन्ता,
और न जाने क्या कुछ।

अचरज की बात है
फिर भी तैरती रहती है
चेहरे पर दिव्य मुस्कान
और संतोष की ख़ुशी
पिता का कोट पहनते ही।

पहनते ही बाबूजी का कोट
भर जाता हूँ
अनकहे प्रेम से
वात्सल्य से और
आश्चर्यजनक खुशी से।
बच्चों की खुशी में खुशी,
पत्नि की मुस्कान में खुशी,
माँ के आशीर्वाद में खुशी,
ज़िम्मेदारियाँ निभाने में खुशी,
तंगहाली में खुशी
खुशहाली में खुशी।

पहनते ही पिता का कोट
भर जाता हूँ अदम्य साहस से
कर जाता हूँ सामना
किसी भी आपदा से
ढूँढ लेता हूँ हल
हर समस्या का,
जूझ लेता हूँ
किसी भी त्रासदी से।

निकाल फ़ेकना चाहता हूँ
कई बार
पिता का कोट
और हो जाना चाहता हूँ
स्वतंत्र और उन्मुक्त
भाग जाना चाहता हूँ अतीत में
यार दोस्तों के संग
काॅलेज के मौलसरी के पेड़
के नीचे चबूतरे पर
या फिर खुले आसमान के तले
नहर की पुलिया के मुंडेर पर।

पर न जाने क्या हो जाता है
नहीं फ़ेक पाता हूँ
बाबूजी का कोट ।

बावज़ूद तमाम ज़िम्मेदारियों के
अनायास ही,
बस मुस्कुराता रहता हूँ
पहनकर पिताजी का कोट।




इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

इंदौर में 30–31 मार्च को साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्रीय समागम, देशभर के संपादक होंगे शामिल

डॉ. विकास दवे

निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश 

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आगामी 30 और 31 मार्च को इंदौर में आयोजित किया जा रहा दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ देशभर की साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े संपादकों, लेखकों, शोधार्थियों और प्रकाशन विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के समक्ष बदलते समय में उत्पन्न हो रही चुनौतियों, उनके स्वरूप, सामग्री और भविष्य की दिशा पर गंभीर विमर्श के उद्देश्य से आयोजित यह समागम साहित्यिक जगत में विशेष उत्सुकता का केंद्र बना हुआ है। अकादमी के अनुसार, इस आयोजन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित आर्थिक, तकनीकी और पाठकीय संकटों पर न केवल चर्चा होगी, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी खोजने का प्रयास किया जाएगा।

 

समागम का उद्घाटन 30 मार्च को प्रातः 11 बजे से होगा, जिसमें ‘देश और समाज के प्रति साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का दायित्व बोध : वीणा का शताब्दी संदर्भ’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित किया जाएगा। इस सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े विद्वान तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ के संपादक अपने विचार व्यक्त करेंगे। उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका, सामाजिक चेतना के निर्माण में उनका योगदान तथा बदलते मीडिया परिवेश में उनकी जिम्मेदारियों पर विशेष चर्चा अपेक्षित है। इसके बाद आयोजित प्रथम सत्र में पत्रिकाओं के स्वरूप और प्रस्तुति को केंद्र में रखते हुए ‘जो दिखता है वही बिकता है’ विषय पर विमर्श किया जाएगा, जिसमें यह विचार किया जाएगा कि साहित्यिक पत्रिकाओं के कलेवर और लेआउट में आकर्षण की कमी किस प्रकार पाठकों को उनसे दूर कर रही है और उन्हें अधिक पठनीय के साथ-साथ दर्शनीय बनाने की आवश्यकता क्यों है।

 

दोपहर बाद के सत्रों में समागम का स्वर और अधिक व्यावहारिक तथा बहुआयामी हो जाएगा। ‘थोड़ी हँसी, थोड़ी खुशी’ विषयक सत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग्य चित्रों के प्रयोग पर चर्चा होगी, जबकि अगले सत्र में पत्रिका प्रकाशन से जुड़ी प्रशासनिक और आर्थिक प्रक्रियाओं पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया जाएगा। इसमें आर.एन.आई. पंजीयन, दृश्य एवं प्रचार निदेशालय से संपर्क, डाक पंजीयन और वितरण व्यवस्था से संबंधित जटिलताओं को सरल भाषा में समझाया जाएगा। इसी क्रम में सरकारी अनुदान और विज्ञापन प्राप्त करने की प्रक्रियाओं पर भी विशेषज्ञ जानकारी साझा की जाएगी, जो विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर की पत्रिकाओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। दिन के अंतिम चरण में साहित्यिक पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और वैश्विक स्तर पर उनके अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट पर चर्चा करते हुए संभावित समाधान तलाशे जाएंगे, जिसके बाद सायंकालीन विशेष सत्र में देशभर से आए संपादक अपनी-अपनी पत्रिकाओं के अब तक के योगदान और अनुभव साझा करेंगे।

 

समागम के दूसरे दिन, 31 मार्च को, विमर्श का केंद्र साहित्यिक सामग्री की गुणवत्ता, कलात्मक प्रस्तुति और आधुनिक मुद्रण तकनीक पर रहेगा। ‘छपास की भूख के बीच संपादक धर्म का चीरहरण’ विषय पर आयोजित सत्र में पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही रचनाओं के स्तर में गिरावट और संपादकीय मानकों पर पड़ रहे प्रभावों पर गंभीर चर्चा की जाएगी। इसके पश्चात आयोजित सत्र में साहित्य और चित्रांकन के संबंधों पर विचार करते हुए यह देखा जाएगा कि चित्र और कलात्मक प्रस्तुति किस प्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं की सौंदर्यात्मकता और पठनीयता को बढ़ा सकते हैं। दोपहर बाद का सत्र आधुनिक मुद्रण तकनीकों और प्रकाशन के बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहेगा, जिसमें नई तकनीकों के माध्यम से पत्रिकाओं की गुणवत्ता, प्रसार और लागत प्रबंधन पर प्रकाश डाला जाएगा।

 

दो दिवसीय इस समागम का समापन ‘पाथेय’ विषयक उद्यापन सत्र से होगा, जिसमें समागम के निष्कर्षों और भविष्य की दिशा पर समग्र विचार प्रस्तुत किए जाएंगे। आयोजन समिति के अनुसार, इस समागम से प्राप्त सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर साहित्यिक पत्रिकाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज तैयार करने की भी योजना है। साहित्यिक पत्रकारिता के समकालीन परिदृश्य में यह आयोजन न केवल संवाद का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के भविष्य को लेकर ठोस रणनीति बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

बी. एल. गौड़ के गीतों में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता

(काव्य समग्र-गीत के विशेष संदर्भ में)

शोधार्थी : बरबी ललबियाकसाङी साइलो

शोध-निर्देशक : प्रो. सुशील कुमार शर्मा

हिंदी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल

 

सारांश

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ (2023) में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय भावना दो ऐसी धाराएँ हैं जो एक-दूसरे से अलग नहीं — बल्कि आपस में गहरे जुड़ी हुई हैं। गौड़ की दृष्टि में भारत की राष्ट्रीय आत्मा उसकी आध्यात्मिक परंपरा में है। इस शोध पत्र में संग्रह के उन गीतों का विश्लेषण किया गया है जिनमें कबीर, राम, कृष्ण, महावीर जैसी आध्यात्मिक परंपराओं की छाप है, और साथ ही किसान की पीड़ा, राजनीतिक खोखलेपन की आलोचना, और देश-प्रेम का भाव भी है। इस दोहरी धारा की पड़ताल करना इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य है।

 

  1. प्रस्तावना

बी. एल. गौड़ का काव्य एक ऐसे व्यक्ति का काव्य है जो जीवन के हर पहलू को गहराई से देखता है। वे एक इंजीनियर, उद्यमी और साहित्यकार हैं। उन्होंने हिंदी अकादेमी दिल्ली (2010-14), संस्कृति मंत्रालय (2018-19) और शिक्षा मंत्रालय (2021-22) की समितियों में भी काम किया।² इस व्यापक अनुभव ने उनकी काव्य-दृष्टि को एक विशेष गहराई और सामाजिक सजगता दी है।

‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका में ओम निश्चल ने गौड़ की इस दोहरी विशेषता को पहचाना है :

“यों तो वे राजनीतिक कवि नहीं पर जहाँ कुछ गलत होते देखा है उसे कविता में उतारने की चेष्टा भी की है। उनके देखते-देखते लाल किले से जाने कितने भाषण हुए, कितने बीस सूत्री कार्यक्रम बने, गरीबों किसानों मजदूरों और उद्यमियों के लिए योजनाएँ चलाई गयीं। किंतु उनका क्या लाभ हुआ।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि गौड़ की आध्यात्मिकता और उनकी राष्ट्र-चिंता दोनों एक ही सामाजिक सजगता से उत्पन्न हैं।

 

  1. गीत की आध्यात्मिक परिभाषा — एक मौलिक दृष्टि

गौड़ ने ‘काव्य समग्र-गीत’ की भूमिका स्वयं लिखी है। इस भूमिका में उन्होंने गीत की जो परिभाषा दी है, वह अपने-आप में एक आध्यात्मिक दृष्टि है :

“विद्वान गीतकार/लेखक/साहित्यकार यह मानते हैं कि प्रकृति ईश्वर की ही प्रतिकृति है जिसका विस्तार धरती से आकाश तक है। इस प्रकृति में व्याप्त स्पंदन, लय, सौंदर्य और नाद को समेटकर यदि एक शब्द की बात की जाए तो वह शब्द होगा गीत।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

यह परिभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण है। गौड़ के लिए प्रकृति और ईश्वर अभिन्न हैं, और गीत उस दिव्य प्रकृति की भाषा है। यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस धारा से जुड़ा है जो प्रकृति में ईश्वर का दर्शन करती है। आगे वे लिखते हैं :

“अनेक साहित्यकारों ने गीत को अपने-अपने मनोभावों से कई तरह से परिभाषित किया है। मेरे साहित्यकार मित्र रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग ने कहा — गीत भू की गति, पवन की लय, अजस्त्र प्रवाहमय है / पक्षियों का गान, लहर विधान, निर्झर का निलय है / गीत मुरली की मधुर ध्वनि, मंद्र सप्तक है प्रकृति का / नवरसों की आत्मा है / गीत कविता का हृदय है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 17)

इस परिभाषा में गीत को कविता का हृदय कहा गया है। प्रकृति के सभी तत्व — भूमि, पवन, पक्षी, झरना, मुरली — ये सब मिलकर गीत बनाते हैं। यह एक समग्र आध्यात्मिक दृष्टि है।

  1. सरस्वती वंदना — ज्ञान और करुणा की माँग

संग्रह की पहली रचना ‘सरस्वती वंदना’ है। यह वंदना केवल काव्य-परंपरा का निर्वाह नहीं — इसमें गौड़ ने अपनी काव्य-प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है :

“हे माँ तू कुछ ऐसा वर दे / कंठ मेरे तू नवरस भर दे। / जब कागज पर कलम चलाऊँ / तेरा चित्र बना मैं पाऊँ / मुखरित हो ममता मानवता / जब जब मैं तेरे गुण गाऊँ / झाँकृत हो जन जन की पीड़ा / वीणा में ऐसा स्वर भर दे।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 27)

यह वंदना तीन महत्वपूर्ण माँगें करती है — नवरस की शक्ति, ममता-मानवता की मुखरता, और जन-जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति। ये तीनों माँगें मिलकर गौड़ की आध्यात्मिक-सामाजिक काव्य-दृष्टि को परिभाषित करती हैं।

 

  1. कबीर की परंपरा — नैतिक आध्यात्मिकता

4.1 ‘कैसे बनूँ कबीर’

‘कैसे बनूँ कबीर’ गीत गौड़ की आध्यात्मिक चेतना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस गीत में कबीर की परंपरा का प्रत्यक्ष स्वीकार है :

“राम तुम्हारा रूप निहारूँ / या सरयू का तीर / बिना तुम्हारी कृपादृष्टि के / घट न मन की पीर। जब जब मैं दर्शन को आऊँ / अविरल अश्रु बहें / तेरे प्रांगण में आकर सब / केवल राम भजें / जब छोड़ूँ मैं अवधपुरी तो / नयनन बरसे नीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

यह गीत कबीर की राम-भक्ति परंपरा से जुड़ा है। कबीर के राम सगुण-निर्गुण से परे थे — गौड़ के राम भी उसी भाव के हैं। ‘मैं तो मानव साधारण सा / कैसे बनूँ कबीर’ — यह विनम्रता उस आध्यात्मिक यात्री की है जो जानता है कि कबीर जैसा बनना आसान नहीं।

उसी गीत में कबीर की ‘माया’ की अवधारणा भी आती है :

“कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी / कभी न कुछ भी सोचा / अंत समय में सबने देखा / संग न जाय अंगोछा / जीवन की रेखा से पाई / लंबी मौत लकीर।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 43)

‘संग न जाय अंगोछा’ — यह कबीर की उसी परंपरा का हिस्सा है जिसमें मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाता है। गौड़ ने इस सत्य को बड़ी सरलता से कहा है।

4.2 कबीर की ‘सोचा हम भी कबिरा जैसी’

एक अन्य गीत में गौड़ सीधे कबीर की ‘चदरिया’ वाली परंपरा का संदर्भ लेते हैं :

“सोचा हम भी कबिरा जैसी / रखें चदरिया साफ / पर हम ने तो ओढ़ लिया है / दोषों भरा लिहाफ़। कहते दुर्बल को न सताना / इससे बड़ा न पाप / पर दुर्बल से छीन छीन कर / करते हम अर्जन।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 65)

कबीर की ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ की परंपरा में गौड़ ने यहाँ एक सामाजिक आलोचना जोड़ी है। हम कबीर जैसा जीना चाहते हैं, पर दोषों से भरा जीवन जी रहे हैं। यह आत्म-आलोचना गौड़ की ईमानदारी का प्रमाण है।

 

  1. राम-भक्ति और आध्यात्मिक आस्था

5.1 ‘आज कहीं चलने का मन है’

इस गीत में गौड़ ने कृष्ण-भक्ति और राम-भक्ति दोनों का सुंदर संगम किया है :

“आज कहीं चलने का मन है / पर मन की तन से अनबन है / क्यों मैं जाऊँ मंदिर मंदिर / जब अंतस में वृन्दावन है। क्या समझाऊँ पागल को / भूल न पाता विगत दिनों को / बीते गया सो बीते गया रे / रट ले अब तू कृष्ण धुनों को।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 36)

‘जब अंतस में वृन्दावन है’ — यह भक्ति की उस धारा का हिस्सा है जो बाहरी तीर्थ की जगह भीतर के तीर्थ को महत्व देती है। कबीर ने भी यही कहा था कि ईश्वर मंदिर में नहीं, मन में है।

5.2 ‘भीतर से कुछ टूट गया है’ — अध्यात्म और पीड़ा

‘भीतर से कुछ टूट गया है’ गीत में आध्यात्मिक खोज और जीवन की पीड़ा का संगम है :

“मन करता कुछ फूल तोड़कर / इष्टदेव पर उन्हें चढ़ाऊँ / फिर उससे अरदास करूँ मैं / जिसको चाहा उसको पाऊँ / पर इस पागल मन को देखो / हार मिली तो रूठ गया है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 63)

ईश्वर से अरदास करना और फिर न मिलने पर रूठ जाना — यह भक्ति का वह मानवीय रूप है जो सूरदास और मीराबाई की परंपरा में मिलता है।

5.3 ‘हमने जिसे पुकारा अब तक’

‘हमने जिसे पुकारा अब तक’ गीत में ईश्वर के मौन का सामना करने की पीड़ा है :

“हमने जिसे पुकारा अब तक / उसने साधा मौन है / भीड़ भरी दुनिया में कैसे / जानूँ अपना कौन है। सारी उमर देव के सम्मुख / हाथ जोड़ मैं खड़ा रहा / मन की चाहत मनवाने को / कर हठधर्मी अड़ा रहा / आँख खुलीं तो मैंने पाया / देव अभी तक मौन है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 58-59)

ईश्वर का मौन — यह एक गहरी आध्यात्मिक पीड़ा है जो हर भक्त को कभी न कभी महसूस होती है। गौड़ ने इसे बड़ी ईमानदारी से कहा है।

 

  1. ‘जलता दीपक’ — नैतिक धर्म का आह्वान

‘जलता दीपक’ गीत में आध्यात्मिक प्रेरणा और नैतिक संदेश का सुंदर संगम है :

“बड़े बड़े चारागर देखे / मन का मिला न एक / पूछा कुछ उपचार बताओ / बोल — हमको खेद। हमने तो तन चीरा-फाड़ा / मन की हम क्या जानें / मन तो है कवियों का गहना / हम तो तन पहचानें।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 60)

‘मन तो है कवियों का गहना’ — यह पंक्ति आध्यात्मिक और काव्य दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। डॉक्टर शरीर ठीक कर सकते हैं, पर मन की पीड़ा केवल कवि ही समझ सकता है। इसी गीत में आगे आता है :

“हर अँधियारी गुफा बताती / तजो न धीरज, धर्म / कितना भी हो सफर कठिन, तुम / तजो न अपना कर्म / अंधकार के पार मिलेगा / जलता दीपक एक।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 61)

‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक’ — यह आशावाद का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। धर्म और कर्म से कभी विमुख न हों — यह भगवद्गीता की उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें फल की चिंता किए बिना कर्म करने का आदेश है।

 

  1. राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति — एक सजग राष्ट्र-प्रेम

7.1 ‘लाल किले से’ — शासन की आलोचना

गौड़ की राष्ट्र-चेतना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वह एक सजग आलोचना के साथ है। ‘लाल किले से’ गीत में वे सरकारी वायदों की खोखलेपन पर करारा व्यंग्य करते हैं। ओम निश्चल ने भूमिका में इस गीत की पंक्तियाँ उद्धृत की हैं :

“लाल किले से अब तक आए / कितने ही फ़रमान / यदि वे सब सच्चे हो जाते / मरता नहीं किसान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14 में उद्धृत, भूमिका)

यह एक क्रांतिकारी कथन है। किसान की आत्महत्या की समस्या पर यह सीधी टिप्पणी है। यदि स्वतंत्रता दिवस के भाषण के वायदे पूरे हो जाते, तो किसान क्यों मरता? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

7.2 ‘परबत ऊपर राजमहल है’ — सामाजिक असमानता पर व्यंग्य

एक अन्य गीत में गौड़ ने सामाजिक असमानता का चित्रण किया है। ओम निश्चल ने भूमिका में लिखा :

“कवि भले उच्च वर्ग का है पर उसे राम मढ़ैया डाल गरीबी की मार सहते लोगों की चिंता होती है। गौड़ के शब्दों में — सूखा में उपले पाथते हैं / ताल तलैया में / रामधनी अब तक रहता है / फूस मढ़ैया में।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

उसी संदर्भ में ‘परबत ऊपर राजमहल है’ गीत का उल्लेख है :

“देखो राजमहल को देखो / हरदम रहता सजा धजा / बस्ती में रहता अंधियारा / निर्धनता भी एक सजा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14, भूमिका में उद्धृत)

राजमहल और झुग्गी का यह विरोधाभास भारत की सबसे बड़ी समस्या — आर्थिक असमानता — की ओर इशारा करता है।

7.3 ‘नई भोर में सूरज लिखता’ — युवाओं से राजनीतिक अपेक्षा

‘नई भोर में सूरज लिखता’ गीत में गौड़ ने राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए युवाओं से आशा व्यक्त की है :

“बूढ़े नेता पाँव कब्र में / राजनीति ना छोड़ें / अपनी भोगपिपासा को वे / जन सेवा से जोड़ें / बड़े काम उनके आती है / जनता की नादानी।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 75)

‘जनता की नादानी’ — यह एक तीखी टिप्पणी है। नेता जनता की भोलेपन का फायदा उठाते हैं — यह सत्य गौड़ ने बड़ी साहसिकता से कहा है।

  1. ‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ — आदर्श भारत का स्वप्न

‘चलो मन अब तुम ऐसे देश’ गीत में गौड़ ने अपने आदर्श भारत का एक सुंदर चित्र खींचा है। यह गीत आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम है :

“चलो मन अब तुम ऐसे देश / जहाँ पर नयनन बरसे नहे / जहाँ पर सीता-सी हों नारि / जहाँ के नर हों सभी विदेह। जहाँ पर हो कोयल की कूक / भ्रमर की गुंजन का हो गान / जहाँ पर तितली हों आजाद / निडर हो पक्षी भरें उड़ान / जहाँ पर हो निर्मल-सा नीर / जहाँ पर हो मुरली की तान / जहाँ पर हो राजा का न्याय / बड़ों का होता हो सम्मान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 41)

यह केवल एक काल्पनिक देश का स्वप्न नहीं — यह उस भारत की कल्पना है जो कभी था, जो होना चाहिए। सीता जैसी नारियाँ, विदेह जैसे नर, कोयल की कूक, मुरली की तान — ये सब भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

उसी गीत में आगे :

“जहाँ हो गंगाजल-सा प्यार / जहाँ हो लक्ष्मण जैसा भ्राता / जहाँ हों सागर एक विशाल / तैरते जिस पर हों जलयान / जहाँ की धरती पर हो धर्म / जहाँ हों भरे हुए खलिहान।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 42)

गंगाजल जैसा प्रेम, लक्ष्मण जैसा भ्रातृ-प्रेम, धर्म और भरे खलिहान — यह आदर्श भारत की वह कल्पना है जिसमें आध्यात्मिक मूल्य और सामाजिक समृद्धि दोनों एक साथ हों।

 

  1. ‘सर सर करती हवा सरीखी’ — जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध

‘सर सर करती हवा सरीखी’ गीत में जीवन-दर्शन और राष्ट्र-बोध का सुंदर समन्वय है :

“हम सब जीते जग में लेकर / बड़े बड़े मंसूब / बिना कर्म के रह जाते हैं / आधे और अधूरे / जीवन सरल बनाकर जीओ / ज्यों गंगा का पानी। पाना चाहो यदि जीवन में / सत-चित और आनंद / बनो विक्रमादित्य सरीखे / नहीं मगध के नंद।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 79)

‘सत-चित-आनंद’ — यह हिंदू दर्शन की उच्चतम अवस्था का बोध है। इसे पाने के लिए विक्रमादित्य जैसा न्यायी और कर्मशील राजा बनने की प्रेरणा दी गई है। यहाँ आध्यात्मिक लक्ष्य और राष्ट्रीय आदर्श एक ही बात कह रहे हैं।

 

  1. ‘तारा मंडल का यही नियम’ — भवसागर और मृत्यु-दर्शन

‘तारा मंडल का यही नियम’ गीत में गौड़ का आध्यात्मिक दर्शन अपनी गहराई में दिखाई देता है :

“तारा मंडल का यही नियम / जो चला गया सो चला गया / टूटा जो नभ से एक बार / वह सदा सदा को चला गया। मैं तो धरती का हिस्सा हूँ / मेरी भी एक कहानी है / है ज्ञान मुझे यह बचपन से / यह सारी दुनिया फानी है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73)

‘यह सारी दुनिया फानी है’ — यह वेदांत का वह मूल विचार है जो संसार को क्षणिक मानता है। पर गौड़ इससे निराश नहीं होते — वे इसे स्वीकार करके आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

उसी गीत में :

“भवसागर की महिमा न्यारी / लगती है सबको अति प्यारी / जितने भी संत धरा पर हैं / सबकी धारा न्यारी न्यारी / ना मिली डगर कोई ऐसी / जो सत्यलोक तक ले जाती।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 73-74)

‘सत्यलोक तक ले जाने वाली डगर’ की खोज — यह आध्यात्मिक यात्रा का वह बिंदु है जहाँ हर संत अपने-अपने रास्ते से जाता है। गौड़ इस विविधता को स्वीकार करते हैं।

 

  1. ‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ — ईश्वर और प्रकृति

‘गिरते निर्झर का गीत लिखूँ’ गीत में प्रकृति, ईश्वर और जीवन-संघर्ष का त्रिवेणी-संगम है :

“गिरते निर्झर का गीत लिखूँ / या लिखूँ नगर की चहल-पहल / जब पूरब दिशा लालम हुई / मंदिर से आया शंखनाद / कानों से आकर टकराया / वह परम सत्य वह चिर निनाद / जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 77)

मंदिर का शंखनाद — ‘वह परम सत्य वह चिर निनाद’ — यह ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव है। पर साथ ही प्रश्न भी है — ‘जाने क्यों मौन रहे रघुवर / दुखियों के नयन बहे अविरल।’ ईश्वर का मौन रहना और दुखियों का रोना — यह आध्यात्मिक पीड़ा गौड़ की काव्य-चेतना का एक गहरा पहलू है।

 

  1. ‘निराला’ पर गीत — साहित्यिक राष्ट्र-चेतना

‘वसंत के शब्दशिल्पी (निराला)’ गीत में गौड़ ने निराला को एक राष्ट्र-कवि के रूप में याद किया है। यह गीत साहित्यिक राष्ट्र-चेतना का एक सुंदर उदाहरण है :

“इक महर्षि ने बरसों पहले / जब वसुधा पर पाँव धरा / देवों ने दुंदुभी बजाई / सूर्यकांत शुभ नाम पड़ा। त्याग तुम्हारा पर्वत जैसा / प्यार घन जंगल-सा था / कर्म तुम्हारा योगी जैसा / जीवन गंगाजल-सा था / सारी वसुधा एक कुटुम्ब है / जन जन मन संदेश भरा।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 52)

‘सारी वसुधा एक कुटुम्ब है’ — यह वसुधैव कुटुम्बकम् का वह आध्यात्मिक-राष्ट्रीय भाव है जो भारतीय संस्कृति की पहचान है। निराला का त्याग, प्रेम और कर्म — ये तीनों गुण भारतीय आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं।

 

  1. आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता का संगम

गौड़ के गीतों में आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जब वे कबीर की माया का उल्लेख करते हैं, तो साथ ही समाज की असमानता की आलोचना भी करते हैं। जब वे आदर्श देश का स्वप्न देखते हैं, तो उसमें गंगाजल जैसा प्रेम और भरे खलिहान दोनों हैं।

ओम निश्चल ने भूमिका में इस दोहरेपन को पहचाना है :

“बी.एल.गौड़ एक उद्यमी कवि हैं। यानी अपने उद्यम से उन्होंने कल्पना के भवन ही नहीं, भुवन तैयार किए हैं। किंतु वे जिस भुवन के स्वामी हैं वह उनकी अपनी कविता का भुवन है। उनका मन भवन में नहीं, भुवन में रमता है।”

(गौड़, बी.एल., काव्य समग्र-गीत, हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. 14)

‘भवन में नहीं, भुवन में रमना’ — यह उस आध्यात्मिक दृष्टि का प्रतीक है जो भौतिक संपदा से परे जाकर विश्व-बोध को महत्व देती है।

 

  1. निष्कर्ष

बी. एल. गौड़ के ‘काव्य समग्र-गीत’ में आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीयता एक साथ चलती हैं — जैसे गंगा-यमुना की दो धाराएँ। उनकी आध्यात्मिकता कबीर, राम, कृष्ण, महावीर — सभी परंपराओं को समेटती है, पर किसी एक से बंधती नहीं। उनकी राष्ट्रीयता भावनात्मक जयघोष नहीं, बल्कि एक सजग आलोचनात्मक राष्ट्र-प्रेम है जो किसान की आत्महत्या पर प्रश्न उठाता है और बूढ़े नेताओं की भोगपिपासा की आलोचना करता है।

इन गीतों का केंद्रीय संदेश है : ‘अंधकार के पार मिलेगा जलता दीपक एक।’ यह आशावाद आध्यात्मिक है और राष्ट्रीय भी — व्यक्तिगत भी और सामाजिक भी। यह अध्ययन PhD शोध के तृतीय अध्याय के ‘आध्यात्मिक आयाम’ तथा ‘अन्य आयाम’ (राष्ट्रीयता) उप-अध्यायों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

संदर्भ ग्रंथ-सूची

  1. गौड़, बी.एल. (2023). काव्य समग्र-गीत. हंस प्रकाशन, नई दिल्ली. (ISBN: 978-93-89389-78-4)

  2. गौड़, बी.एल. (2012). कब पानी में डूबा सूरज. ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाजियाबाद.

  3. बरबी ललबियाकसाङी साइलो. (2024). बी. एल. गौड़ के साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन (शोध प्रस्ताव/Synopsis). मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल.

  4. शुक्ल, रामचन्द्र. (2010). हिंदी साहित्य का इतिहास. नागरी-प्रचारिणी सभा, वाराणसी.

  5. चतुर्वेदी, रामस्वरूप. (2018). हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.

  6. राधाकृष्णन, एस. (1963). धर्म और समाज. राजपाल एण्ड संस, दिल्ली.

  7. पाण्डेय, शंभुनाथ. (1977). भारतीय जीवन और संस्कृति. केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा.

  8. सिंह, राजकिशोर. (1975). भारतीय संस्कृति. विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा.

  9. नामवर सिंह. (2004). आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ. लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली.

  10. हरदयाल. (1985). साहित्य और सामाजिक मूल्य. विभूति प्रकाशन, दिल्ली




मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—हक़ या केवल सपना? – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब तक बराबरी ज़मीन पर नहीं उतरती, अधूरा है लोकतंत्र

— डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत का लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान रखता है। यह केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और सपनों का प्रतिबिंब है। संविधान ने हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा किया है, लेकिन यह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या यह वादा वास्तव में हर नागरिक तक समान रूप से पहुँच पाया है? क्या आज भी एक गरीब और एक अमीर व्यक्ति के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय की सुविधाएँ बराबर हैं? यदि नहीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि हमारा लोकतंत्र अभी भी अधूरा है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। दवाइयों को ब्रांड के बजाय “साल्ट” के आधार पर उपलब्ध कराने की पहल ने यह साबित किया है कि सही नीति और नीयत के साथ आम जनता को बड़ी राहत दी जा सकती है। सस्ती दवाइयाँ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का माध्यम बनती हैं। यह एक उदाहरण है कि जब सरकार समानता को केंद्र में रखकर काम करती है, तो बदलाव संभव है। यही सोच यदि शिक्षा और न्याय जैसे क्षेत्रों में भी लागू की जाए, तो देश की तस्वीर बदल सकती है।

शिक्षा आज के समय में केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा की व्यवस्था दो भागों में बंटी हुई है—एक ओर महंगे निजी स्कूल और संस्थान हैं, जहाँ विश्वस्तरीय सुविधाएँ और संसाधन उपलब्ध हैं, और दूसरी ओर सरकारी स्कूल हैं, जहाँ कई जगह बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। यह विभाजन केवल संस्थानों का नहीं, बल्कि अवसरों का विभाजन है। एक अमीर परिवार का बच्चा जिस स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है, वह एक गरीब परिवार के बच्चे के लिए अक्सर एक सपना बनकर रह जाता है।

ऐसी स्थिति में यह विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि क्यों न पूरे देश में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए। एक ऐसा ढांचा, जहाँ हर कक्षा के लिए एक जैसी किताबें हों, एक जैसा पाठ्यक्रम हो और हर बच्चे को समान अवसर मिले। इससे शिक्षा के स्तर में संतुलन आ सकता है और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी एक समान आधार तैयार हो सकता है। यह व्यवस्था न केवल सामाजिक समानता को बढ़ावा देगी, बल्कि देश की प्रतिभाओं को भी एक समान मंच प्रदान करेगी।

हालाँकि, यह भी समझना आवश्यक है कि भारत की विविधता इतनी व्यापक है कि पूरी तरह एकरूप शिक्षा प्रणाली लागू करना सरल नहीं है। अलग-अलग राज्यों की भाषाएँ, संस्कृतियाँ और स्थानीय आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए एक “कॉमन कोर” के साथ-साथ क्षेत्रीय लचीलापन भी जरूरी है, ताकि समानता और विविधता के बीच संतुलन बना रहे।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। निजी अस्पतालों की ऊँची फीस आम आदमी के लिए एक बड़ी बाधा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में भीड़, संसाधनों की कमी और लंबी प्रतीक्षा जैसी समस्याएँ हैं। कई बार एक साधारण बीमारी भी आर्थिक संकट का कारण बन जाती है। ऐसे में यह विचार सामने आता है कि यदि सभी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें एक समान व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए, तो हर व्यक्ति को समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकती हैं। डॉक्टरों और कर्मचारियों को सरकार द्वारा वेतन दिए जाने से सेवा का भाव बढ़ सकता है और मुनाफाखोरी पर अंकुश लग सकता है।

न्याय व्यवस्था भी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, लेकिन आम नागरिक के लिए न्याय तक पहुँचना आज भी एक कठिन प्रक्रिया है। न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या, कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और वकीलों की ऊँची फीस—ये सभी मिलकर न्याय को महंगा और दूर बना देते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना कई बार असंभव जैसा हो जाता है। यदि न्याय व्यवस्था को सरल, सुलभ और निशुल्क बनाया जाए, तो यह लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

इन सभी क्षेत्रों—शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—का पूर्ण राष्ट्रीयकरण एक आदर्श समाधान प्रतीत होता है। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सरकार सभी संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेकर सभी कर्मचारियों को वेतन दे और सेवाओं को निशुल्क एवं समान रूप से उपलब्ध कराए। यह विचार सुनने में आकर्षक है और एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना को मजबूत करता है। लेकिन इसके साथ कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती है आर्थिक संसाधनों की। पूरे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय को पूरी तरह निशुल्क और उच्च गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराना एक बहुत बड़ा वित्तीय दायित्व है। इसके लिए सरकार को अपने बजट में बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे, कर व्यवस्था को मजबूत करना होगा और संसाधनों का कुशल प्रबंधन करना होगा।

दूसरी चुनौती है गुणवत्ता और जवाबदेही की। पूरी व्यवस्था सरकारी होने पर कई बार कार्यकुशलता में कमी आ जाती है। निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा कई बार सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। यदि पूरी व्यवस्था केवल सरकार के हाथ में होगी, तो नवाचार और सुधार की गति धीमी पड़ सकती है।

इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर भी इतनी बड़ी व्यवस्था को संचालित करना आसान नहीं है। भ्रष्टाचार, लापरवाही और संसाधनों के दुरुपयोग जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि किसी भी नीति को लागू करते समय इन संभावित चुनौतियों का समाधान पहले से ही तैयार किया जाए।

इस परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय के क्षेत्र में मजबूत सार्वजनिक ढांचा तैयार करे, जहाँ हर नागरिक को न्यूनतम स्तर की उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएँ सुनिश्चित हों। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे सख्त नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रखा जाए।

शिक्षा में एक समान “कॉमन कोर करिकुलम” लागू किया जा सकता है, जिससे पूरे देश में बुनियादी स्तर पर समानता सुनिश्चित हो, जबकि क्षेत्रीय विषयों और भाषाओं के लिए लचीलापन रखा जाए। स्वास्थ्य सेवाओं में “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज” की दिशा में काम किया जा सकता है, जिससे हर नागरिक को बुनियादी इलाज मुफ्त या अत्यंत सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक और सरल प्रक्रियाओं के माध्यम से पारदर्शिता और गति लाई जा सकती है।

अंततः, लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में निहित होती है। जब तक एक गरीब व्यक्ति अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकता, जब तक वह बीमारी के समय उचित इलाज नहीं पा सकता, और जब तक उसे समय पर न्याय नहीं मिल सकता—तब तक लोकतंत्र का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह समय केवल विचार करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। समान शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और निष्पक्ष न्याय केवल आदर्श नहीं, बल्कि एक सशक्त और समावेशी लोकतंत्र की आधारशिला हैं। यदि हम इन क्षेत्रों में वास्तविक समानता स्थापित कर पाते हैं, तो न केवल लोकतंत्र पूर्ण होगा, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी मजबूत होगी।

अब प्रश्न यह नहीं है कि यह लक्ष्य कठिन है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे प्राप्त करने के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति दिखाने को तैयार हैं। यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत का लोकतंत्र केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन में समान रूप से दिखाई देगा।

  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)