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तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध है : प्रो. हरीश अरोड़ा

‘तथ्य अनंत हो सकते हैं किंतु वास्तविक तथ्यों की यात्रा को सत्य की परिणति तक पहुँचाना ही शोध का अभीष्ट है।’ ये विचार ‘वाङ्मय विमर्श’ द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहे। उन्होंने इस विषय पर अपने व्याख्यान में शोध के दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए कहा कि ‘ज्ञान के पीछे की प्रत्येक दिशा की ओर पुनः लौटकर ज्ञान के विस्तार की संभावनाओं को निरंतर बनाए रखना ही शोध का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल तथ्यों का संकलन कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें निहित नवाचार को खोजना और उसे समाज के लिए उपयोगी बनाना शोधार्थी का प्राथमिक उत्तरदायित्व है।

‘वाङ्मय विमर्श’ के तत्वावधान में आयोजित व्याख्यानमाला शृंखला की पाँचवीं कड़ी में देश के प्रख्यात विद्वान कवि और लेखक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने शोधार्थियों को संबोधित किया। ‘शोध प्रविधि और प्रक्रिया’ विषय पर केंद्रित इस आभासी सत्र में शोध की वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ शुभम शास्त्री द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात वाङ्मय विमर्श’ के संरक्षक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने अपने स्वागत वक्तव्य में इस अकादमिक प्रकल्प के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह प्रकल्प शोधार्थियों के बौद्धिक संवर्धन हेतु निरंतर क्रियाशील है। डॉ. ‘मणि’ ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर अरोड़ा का अभिनंदन करते हुए इस महत्वपूर्ण विषय पर मार्गदर्शन हेतु उन्हें धन्यवाद एवं बधाई दी।

प्रो. अरोड़ा ने अपने व्याख्यान में शोध के विभिन्न प्रतिमानों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने समकालीन शोध के नवीन आयामों जैसे पारिस्थितिकीय साहित्य एवं पाठालोचन की महत्ता को भी रेखांकित किया। उन्होंने शोध के विभिन्न चरणों की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए एक आदर्श रूपरेखा निर्मित करने के व्यावहारिक सूत्र साझा किए व्याख्यान के उपरांत एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें शोधार्थियों द्वारा पूर्व में ‘गूगल फॉर्म’ के माध्यम से प्रेषित जिज्ञासाओं का प्रो. अरोड़ा ने अत्यंत विद्वतापूर्ण ढंग से समाधान किया। अंत में उन्होंने इस शृंखला के अनवरत संचालन हेतु अपनी शुभकामनाएँ भी प्रदान कीं।

कार्यक्रम का अत्यंत गरिमापूर्ण एवं सुस्पष्ट संचालन साक्षी सिंह द्वारा किया गया। सत्र के समापन पर हंसिका ने मुख्य वक्ता, आयोजक मंडल एवं सहभागी शोधार्थियों के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अकादमिक अनुष्ठान को सफल बनाने में संयोजक अविरल अभिलाष, समन्वयक प्रवीण त्रिपाठी, सह-समन्वयक सोमेश पाण्डेय एवं समस्त शोधार्थियों का सक्रिय सहयोग रहा। प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन हेतु आयोजकों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।




बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा – गर्ग

बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा – गर्ग

आयोजन में हुआ अनेक पुस्तकों का विमोचन

भोपाल। यह बाल साहित्य को संवर्द्धित करने का अवसर है। बालकों को हम जैसा वातावरण देंगे, सांस्कृतिक, पारिवारिक, सामाजिक, जो हमारा है, वो उनको श्रेष्ठ बनाता है। प्राकृ‌तिक चेतना की रक्षा बाल साहित्य द्वारा कर सकते हैं। उपदेश से परहेज क्यों ? बच्चे को दिशा-निर्देश दें। रोकना-टोकना करें, पर प्रकारेंतर से। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार एवं बाल पत्रिका ‘बालवाटिका’ के संपादक भेरूँलाल गर्ग ने बतौर अतिथि कही। अवसर रहा साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना स्मृति बाल साहित्य राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन का, जो भोपाल स्थित एनआईटीटीटीआर (श्यामला हिल्स) में शुक्रवार को हुआ। इसका समग्र संयोजन बाल पत्रिका ‘देवपुत्र’ के सम्पादक गोपाल माहेश्वरी ने किया। प्रातः 11 बजे सैकड़ों बाल साहित्यकारों की उपस्थिति में इस संगोष्ठी का उद्घाटन मंच पर उपस्थित अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे, डॉ. भेरूलाल गर्ग, दिनेश पाठक और राजा चौरसिया ने दीप प्रज्ज्वलन से किया।

इस कार्यक्रम का संचालन गोपाल माहेश्वरी ने किया। इस 2 दिनी संगोष्ठी में पहले दिन 12 से 1.30 बजे तक प्रथम सत्र में ‘बाल मनोविज्ञान और बाल साहित्य सृजन’ विषय पर समीक्षा तैलंग, डॉ. रश्मि अग्रवाल, डॉ. वर्षा महेश, शीला पाण्डेय, डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, शशि पुरवार, राजकुमारी चौकसे, देवी प्रसाद गौड़, और देवेन्द्रसिंह सिसौदिया ने वक्ता के नाते अपनी अभिव्यक्ति दी। 

ऐसे ही द्वितीय सत्र में ‘बाल-साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’ विषय पर डॉ. रेखा लोढा, नीलम राकेश, उमेशचंद्र सिरसवारी, मीरा जैन और निरुपमा त्रिवेदी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। तीसरे सत्र में ‘बाल-साहित्य में देशप्रेम, राष्ट्रीयता, पर्यावरण तथा भारतीय संस्कृति का भाव विषय पर सपना साहू ‘स्वप्निल’, आशा पांडेय, सत्यनारायण सत्य, विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ और हरीराम पथिक आदि ने बाल साहित्य के बिंदु प्रस्तुत किए।

देर शाम चौथे सत्र में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ. आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले सहित मीरा तिवारी आदि ने अपने भाव व्यक्त किए। इस महती आयोजन में अकादमी से सम्बद्ध बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक और प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका डॉ. मीनू पाण्डेय ‘नयन’, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ आदि की उपस्थिति रही।
‘गली बचपन की’ शीर्षक से आयोजित उक्त संगोष्ठी में देशभर के बाल रचनाकार जुटे हैं, जो बदलते परिवेश में बाल साहित्य की भूमिका पर 14 मार्च को दूसरे दिन भी गंभीर चिंतन करेंगे।

◾देर शाम हुआ कवि सम्मेलन
अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे और सैकड़ों बाल साहित्यकार की मौजूदगी में अनुरंजन कार्यक्रम 8.30 बजे से कवि सम्मेलन के रूप में हुआ। विभिन्न बाल रचनाकारों ने इस में अपनी रचनाओं से सबको प्रभावित किया।




“आगि लगै ऐसे फागुन में” – बी. एल. गौड़

 

आगि लगै ऐसे फागुन में

आगि लगै ऐसे फागुन में

बुढ़ऊ तक बौरावें

बिना बात के खांसी खांसें

बिना बात मठरावें।

देवर की तौ बात कछू ना

जेठन लाज गँवाई

कौनी मार बगल ते निकरें

ऐसी का बेहाई। 

अनुज बधु कन्या सम होती

तुलसी बात बताई

पर इन सबके कूढ मगज कू

ना भाई चौपाई

अब तुम्ही बताओ सजन हमारे

कैसे गात बचावें।

मेरौ गोरौ मुखड़ौ है तौ

मेरौ का है दोस

देवर मलें गुलाल गालन पै

भरि भरि पूरौ जोस। 

मैं तौ करूँ बहुत बरजोरी

पर वे हट ना छोड़ें

भाभी से देवर कौ रिस्ता

जनम जनम से जोड़ें

आंखि तरेरें सासू माजी

का उनकू बतलावें।

होरी तौ होरी है सासू

या कौ बुरौ न मानों

जे शरीर तौ माटी कौ है

माटी में मिल जानों। 

या माटी के पांच तत्व

तौ माटी में मिल जाने

कौन जनम में कौन मिलैगौ

जे ईश्वर ही जाने

प्रेम तत्व ही ईश तत्व है

कबिरा जी समझावें।




“मंज़िल तक कैसे पहुँचें” – बी. एल. गौड़

“मंज़िल तक कैसे पहुँचें”

 

 

हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

तुम तो ऐसे बिछुड़े जैसे
मेले में खोया बालक,
अक्सर मिलता कभी नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

गर तुम केवल रूठे होते
तो तुम्हें मना लाते,
हम किंकर्तव्यविमूढ़ हुए
क्योंकि तुम्हारा
कोई पता नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

राहों में धूल बहुत है
पांवों में छाले भी हैं,
फिर भी चलना पड़ता है
क्योंकि ठहरना
अब कोई बात नहीं,
पर यह पीड़ा तब होती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

सपनों की दीपशिखाएँ
अब भी जलती रहती हैं,
मन का मंदिर खाली है
फिर भी आशा
पूरी तरह से राख नहीं,
पर यह विरह तभी गहराता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

याद तुम्हारी आती जैसे
साँझ ढले घर लौटे पंछी,
लेकिन मेरे आँगन में
अब वैसी कोई
मधुर बरसात नहीं,
और यह सूना सा लगता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

फिर भी मन को समझाते हैं
धैर्य धरा का धर लेते हैं,
शायद फिर मिल जाओ तुम
यह आशा भी
पूरी तरह से समाप्त नहीं,
पर मिलन कठिन हो जाता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

इस जीवन की हर डगर पर
एक भरोसा रख लेते हैं,
शायद फिर से साथ चलो
यह सपना भी
पूरी तरह से मिथ्या नहीं,
पर मंज़िल दूर ही रहती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।

हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।