मानवीय एवं सामाजिक संवेदनाओं के आइने में पाटण की सांस्कृतिक विरासत पटोला हस्तकला एवं हस्तकला कारीगरः एक अध्ययन
डॉ. लोकेश जैन एवं डॉ. देबेन्द्र दास
सार संक्षिप्त
हिन्दी साहित्य जगत के मूर्धन्य उपन्यासकार मुंशी प्रेंमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के दर्द को छुआ, अन्दर तक उसकी सिरहन को महसूस किया तथा अदम्य साहस के साथ अपनी लेखनी से उस संवेदना को उकेर कर जनमानस को झकझोरने का जो भगीरथ कार्य किया। उसी तरह की मानवीय संवेदना से प्रेरित होकर ग्रामीण प्रबंधन से जुड़े शोधार्थी ने कबीर की तरह सुनहरे सपनों का ताना-बाना बुनने बाले अत्यंत मंहगी भौगोलिक संकेत वाली (जो क्षेत्र विशेष तक ही मर्यादित होने के कारण वैधानिक रूप से विशिष्टता लिए हुए है) पटोला-साड़ी हस्तकला एवं उसके कारीगरों की कथा-व्याथा तथा उनकी प्रवर्तमान व्यावसायिक, सामाजिक- आर्थिक स्थिति को समझने एवं प्रबुद्ध समाज के समक्ष रखने का प्रयास किया है ताकि इन हुन्नरधारकों के भविष्य को बेहतर व सम्मानजनक बनाने हेतु समाज के विभिन्न पक्षकारों व हितधारकों के हृदय में, नीतिनियामकों में इनके प्रति गहरी व स्पष्ट समझ विकसित की जा सके।
कुंजी शब्द- भारतीय कला संस्कृति, पाटण की प्रभुता, पाटण का पर्यायवाची पटोला, पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाएं, पटोला कारीगरों का कार्य वातावरण, कारीगर समाज की मनो-सामाजिक दशा तथा जीवन यापन का परिदृश्य
भारतीय कला संस्कृति जगत पाटण का पटोला हस्तकला कारीगरी के आलोक मे…….
“कला एक हस्तकला नहीं है अपितु कौशल्य से भरे समाज के रूप में हमारी गर्वीली पहचान है, हमारी समृद्ध गौरवशाली संस्कृति का आइना है, यह कलाकार द्वारा महसूस की गई अनुभूति का प्रसारण है।”
भारत देश सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा है। 64 कलाओं से परिपूर्ण समाज परस्पर पूरकता का पर्याय बना। इस व्यवस्था में विकन्द्रित रूप से समाज के सभी वर्गों का चहुँमुखी विकास हुआ। सभी हाथों को काम मिला, सभी की रचनात्मकता को निखरने का भरपूर अवसर मिला। यह ज्ञान व कौशल्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित तो हुआ ही साथ ही साथ देश काल परिस्थिति की वर्तमान व भावी आवश्यकता के अनुरूप इन कलाओं में नूतन अभिनव प्रयोग जुड़ते रहे लेकिन मानवीयता और मानवीय सुख सदैव इनके केन्द्र में रहे जिनका प्रकृति के अस्तित्व अथवा हितों के साथ शायद ही किंचित विरोधाभास रहा हो। हस्तकलाओं के दायरे में ऐसे समाज ने आकार लिया जो प्रकृति के साथ साथ जरूरतमंद तथा हासिए पर आ चुके लोगों के साथ चलने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रतिबद्धता व्यक्त करता था। इन हस्तकलाओं में सृजनशीलता के साथ सौन्दर्य बोध था, मानवीय संवेदनशीलता थी तथा जीवन के विविध प्रसंगों को जीवंत बनाने वाले रंग प्रसरे हुए थे जो कतिपय सामाजिक भेदभाव को गौण करते थे। समाज परस्पर इन हस्तकला धारकों का सम्मान करता था, उनमें सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करते हुए……। हर हुनर “एक सबके लिए, सब एक के लिए” की मूल सहकारी भावना पर संचालित होता था जिसमें सही मायनों में “सबका साथ और सबका विकास” नियत होता था।
गुजरात राज्य में पाटण की भौगोलिक रूप से चिन्हित हस्तकला एवं हस्तशिल्पियों की सामाजिक – आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति के इस अध्ययन में इन कारीगरों की मनो-सामाजिक, व्यावसायिक स्थति को सांस्कृतिक एवं जीवन यापन के प्रतिमानों के परिप्रेक्ष्य में समझने की मूल विभावना समाहित रही है जिसमें इस कला संस्कृति को नई पीढ़ी तक ले जाने की संभावनाएं गर्भित हैं। मानवीय सामाजिक संवेदना के पटल पर किया गया यह विश्लेषण भारतीय कला संस्कृति एवं कारीगर समुदाय के उत्थान की भावी तस्वीर विविध कोणों से खींच सकेगा।
इस शोध परक आलेख का एक ध्येय विरासत में मिली इस जी.आई. (भौगोलिक विस्तार तक परिसीमित) हस्तकला संबंधी ज्ञान को आगे ले जाने के उद्देश्य से समाज के सामने रखना है, इन कुशलताओं की बारीकी से आने वाली पीढ़ी को ससज्ज करना है ताकि समाज में हुन्नरधारकों के प्रति सम्मान व संवेदना के साथ इस हुनर व प्रतिभा को लुप्त होने से बचाया जा सके।
कोई भी ज्ञान अथवा कला तब विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती है जब उसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता को किन्हीं सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तथा व्यवस्थाकीय कारणों से क्षति पहुँचने लगे, वह आधुनिक प्रवाह के साथ गति न कर सके अथवा बाजार स्पर्धा के सामने टिके रहने का सामर्थ्य स्थापित न रख सके। सामाजिक परिवेश का भी प्रभाव इन हुनर (कला) के अस्तित्व की स्थिति को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। आज का समाज इस कला से एवं कला की विविध प्रक्रिया से जुड़े हुनरधारकों को किस नजरिए से देखता है, कितना सम्मान देता है, इसे समझना भी जरूरी हो जाता है क्योंकि यदि वह स्थिति सम्मानजनक होती है तो इस कला के साथ नई पीढ़ी को सहजता से जोड़ा जा सकता है अथवा जुड़ने की उत्कंठा को अच्क्षुण बनाए रखा जा सकता है अन्यथा इसमें वही लोग जुड़ते हैं जो बाहर कहीं सेट होने की योग्यता खो देते हैं जिसका अपेक्षाकृत विपरीत असर इन हुनरों की निर्माण प्रक्रिया एवं व्यावसायिक परिवेश पर पड़ता है जिसके चलते कला का अपेक्षित उत्थान सुनिश्चित नहीं हो पाता। यदि इन कलाओं के क्षेत्र में रुचि के साथ योग्य मानवशक्ति के जुड़ने की निरंतरता का सामाजिक-सांस्कृतिक अनुकूल एवं प्रोत्साहक वातावरण बना रहे तो ये कलाएं दीर्घकाल तक चिरंजीवी बनी रहती है तथा समृद्ध परंपरागत ज्ञान के द्वारा सफलता के सोपान चढ़ती रहती हैं।
अध्ययन के परिक्षेत्र में जीवनयापन अर्थात् आजीविका प्रतिमानों से जुड़ा आर्थिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि इस समुदाय को इससे बेहतर अर्थोपार्जन के अवसर मिलते हैं तो वह इस कला को अपने जीवनयापन का कार्यक्षेत्र नहीं बनाता और वर्षों से अर्जित प्रयोगजनित ज्ञान तथा प्रतिभा को छोड़ देने में जरा भी नहीं हिचकिचाता। समाजिक पक्ष तो इतना हावी है कि अन्यत्र स्रोत से कम आय मिलने के बावजूद भी कारीगर अपने परंपरागत हुनर में अपनी संतान को जोड़ना नहीं चाहते। इससे उनके रोटी-बेटी के संबंध प्रभावित होते हैं और “घर” की व्यवस्थाएं अस्तव्यस्त होने लगती हैं। यह भी देखने में आता है कि स्थानीय स्तर पर आजीविका के पर्याप्त साधन न होने से, अन्यान्य आय के साधन न होने से वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी काम करने को मजबूर होता है, शोषित होते हुए भी शोषित होने का आभास नहीं कर पाता। उसे भय रहता है कि जितना उसे आज मिल रहा है, जिससे उसका जीवन येनकेन प्रकारेण चल रहा है उस पर संकट आ सकता है।
इसी कार्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य का भी सामने निकल कर आया है जिसकी कल्पना संशोधकों को शोध परियोजना निर्माण करते समय नहीं थी। इस कला की विविध प्रक्रियाओं में श्रमिक कारीगर की तरह काम करते हुए सतत एक ही स्थिति में रहने से और रासायनिकों का उपयोग बढ़ने से, प्रक्रियाजनित प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल रूप से निरंतर प्रभावित हो रहे हैं, जिसकी ये लोग सामान्यतया प्राथमिक स्टेज तक परवाह नहीं करते किन्तु कालान्तर में यह समस्या गंभीर बन जाती है और उनके कार्य की स्थिति को प्रभावित करने लगती है तथा कई बार जीवन को समय से पहले ही पूर्ण कर डालती है। इससे उसकी कार्यक्षमता और आय दोनों ही कम होने लगते हैं तथा जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता चला जाता है।
भारत के प्रमुख जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तशिल्प………
आयरन वुडन क्राफ्ट छत्तीसगढ़, चन्नापटना (कर्नाटक) के खिलौने गुड्डे गुड़ियां, मैसूर रेजवुड इनले, तमिलनाडु की परंपरागत क्राफ्ट, बोबलहेंड डांसिग डॉल तंजावुर, खुर्जा – बुलंदशहर पोटरी, राजस्थान की कठपुतली (स्ट्रिंग पपेट), आसाम की बांस से बनी क्राफ्ट, संखेड़ा फर्नीचर(गुजरात), रोगान प्रिन्ट कच्छ (गुजरात), रावण हस्त वीणा (राजस्थान), पेम्पार्थी शीट मेटल क्राफ्ट (तेलंगाना), करीमनगर सिल्वर फिलिग्री(तेलंगाना), विलियनुर टेराकोटा काम, पुडुचेरी तंजावुर आर्ट प्लेट सी शैल क्राफ्ट, अंडमान, गोवा, उड़ीसा की एतिहासिक पिपली(पुरी) एप्लिक वर्क उड़ीसा, एतिहासिक कोर्णाक स्टोन कटिंग वर्क उड़ीसा, जयपुर ब्ल्युपोटरी(राजस्थान), आदिवासी कारीगर-बांस का कार्य- छत्तीसगढ़, कोकोनट शैल क्राफ्ट-केरल (ब्रास एम्ब्रोइडरी), आंध्रप्रदेश काकुलम जिले की फूल (ब्रास) आगरा की मार्बल की वस्तुएं , टेराकोटा-आसाम (क्राफ्ट) के बर्तन दीपक, घंटी आदि वस्तुएं, सहारनपुर-उ. प्र. वुडन हस्तकला, अमृतसर की भरतकाम वाली मोजड़ी, नागरा तथा पंजाबी जूती, लेदर टॉयज म.प्र., कोल्हापुरी (महाराष्ट्र) चप्पल, सोलापुर (महाराष्ट्र) की चादर, फुलकारी साड़ी-पंजाब, कुल्लु शॉल- हिमाचल, किनल क्राफ्ट-कर्नाटक, मदुरकाठी- पश्चिमी बंगाल, मधुबनी पेंटिंग (परंपरागत चित्र), तथा गुजरात में पाटण की पटोला साड़ी, संखेड़ा फर्नीचर,खंभात के अगेट्स तथा तंगलिया शॉल, जामनगरी बंधनी, माता नी पछेड़ी उत्पाद आदि जी.आई. क्राफ्ट के प्रमुख उदाहरण हैं।
इसके अलावा लोंग पी कोल्ड पोटरी हाथ से बनाई जाती है जिसमें रसोई के बर्तन एवं शो पीस बनाए जाते हैं। तथा तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के निर्मल शहर के कुशल कारीगरों द्वारा हाथ से बनाए जाने वाले खिलौने, पेंटिग और फर्नीचर जी.आई. श्रेणी में रखे गए हैं। अरनमुला कन्नडी, केरल (अरनमुला नामक छोटे से शहर में हाथ से बनाया जाने वाला शीशा है जिस पर धातु का कार्य किया जाता है। इसका उपयोग अरनमुला पार्थसारथी मंदिर में रखने हेतु किया जाता है), धोकरा छत्तीसगढ़ (धोकरा वेक्स मेटल पर बनाए जाने वाला एक प्रसिद्ध क्राफ्ट है जिसमें घोड़ा और हाथी का समावेश किया जाता है) कोंडापल्ली टॉयज आंध्र प्रदेश- विजयवाड़ा के पास कोंडापल्ली गांव में बने ये खिलौने अपनी विशिष्ट थीम व शैली के कारण जी. आई. में पंजीकृत होने जा रहे हैं। तथा कर्नाटक मेटल पीस (कर्नाटक के बिद्रीवेर कस्बे में मेटल से बनने वाली यह वस्तु विश्व विख्यात है जिसका भी निर्यात किया जाता है।)
पाटण की पटोला हस्तशिल्पः एतिहासिक परिवेश…….
पटोला गुजरात की संस्कृति में पूरी तरह रच बस कर सिने गीतों तक पहुँच गया है- छेलाजी रे मारु हाटु पाटणथी पटोला मोंघा लावजो। जनमानस में पाटण का पटोला पाटण की पहचान का पर्याय बन चुका है। रेशम के कीड़े से तैयार अत्यन्त नरम और पतले रेशम से तैयार पटोला वस्त्र दुनिया में अति विशिष्ट है। कहा जाता है कि इसकी शोध चीन में हुई थी। वर्षों तक चीन ने रेशम से कपड़े बनाने की पद्धति को गुप्त रखा और बहुत नफा कमाया। प्राचीन समय में भारत का रेशम से बना यह पटोला कपड़ा इस गुणवत्ता के लिए विख्यात था कि उसे अंगूठी में आर पार किया जा सकता था। अहिंसा में मानने वाले लोग रेशम के कीड़े को मारकर तैयार किए गए इस कपड़े का उपयोग नहीं करते थे।
पटोला बनाने की कला लगभग 900 साल पुरानी है। प्राचीन काल में डिजाइन वाला कपड़ा बनाने की कोई पद्धति नहीं थी तब बांधणी पर कलर करने की कला पाटण के सालवी परिवारों ने अपनी सूझबूझ व हुनर के द्वारा विकसित की थी। इन परिवारों का मूल निवास तो वर्तमान महाराष्ट्र था जहाँ जालना शहर में यह कला विकसित हुई थी। वहाँ के 700 सालवी परिवारों ने 11वी सदी में पाटण के शासक कुमारपाल देसाई के यहाँ राजाश्रय प्राप्त कर इस कला का चहुँमुखी विकास किया जिसके कारण पाटण विश्व के मानचित्र पर एक अलग प्रतिष्ठा के रूप में उभर कर सामने आया। कालक्रम में इन सालवी परिवारों की संख्या घटती चली गई जिससे इस विशिष्ट कला का अस्तित्व खतरे में लगने लगा। वर्तमान में पटोला बनाने वाले मात्र तीन सालवी परिवार हैं जो मालिक और कारीगर दोनों की भूमिका में हैं। अन्य जाति के कारीगर इसकी ताणी और पाटी बांधना, धागा बांधना आदि प्रक्रिया से जुड़े हैं। बुनाई में सालवी परिवार के पुरुष हैं। सालवी परिवारों ने दूसरों को काम सिखाया भी है।
पाटण का पटोला पूर्ण रूप से हस्तशिल्प होने के कारण कुटीर उद्योग के रूप में आकार ले चुका है। मँहगा होने के बावजूद अपनी लोकप्रियता के कारण कोरोना महामारी काल में भी यह हस्तशिल्प उद्योग अपने अस्तित्व को संरक्षित बनाए रख सका है।अति विशिष्ट कामगीरी के स्वरूप के कारण इसकी मांग में बहुत अधिक विचलन उत्पन्न नहीं हुए हैं। पटोला काम में इस समय साड़ी के अलावा दुपट्टा, रूमाल, स्कॉर्फ, टाई, छोटे-बड़े पर्स जिनका उपयोग जैन समुदाय द्वारा मंदिर में पूजा के उपक्रम से किया जाता है, आदि का उत्पादन भी शुरु किया गया है। पटोला की डिजाइन रेशम के तार से तैयार की जाती है जो कर्नाटक से मंगाया जाता है। पटोला की साड़ी को दोनों तरफ से पहना जा सकता है। एक साड़ी की कीमत सवा लाख से लेकर 5 लाख तक होती है। कीमत का यह अंतर डिजाइन की विशिष्टता और डिजाइन के अनुरूप कार्य में लगने वाले समय की अधिकता के कारण होता है। हर श्रीमंत नारी का यह सपना होता है कि वह अपने जीवन में ऑरीजनल पटोला अवश्य पहने क्योंकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है।
पटोला हस्तशिल्पः एक विशिष्ट महत्वपर्ण कला
सरल नहीं पटोला तैयार करना। एक के बाद एक लगभग 20 छोटी बड़ी प्रक्रियाओं- ताणी बांधना, डिजाइन बनाना, धागा बांधना, कलर काम, बुनाई. फनिशिंग आदि से गुजर कर पटोला तैयार होता है। यदि 4 व्यक्ति एक साथ काम करें तो एक पटोला साड़ी तैयार करने में 4-6 महीने का समय लग जाता है क्योंकि इसकी उप प्रक्रियाओं की संख्या अधिक हैं एवं हर एक प्रक्रिया सावधानी की दरकार रखती है किसी भी स्तर हुई जरा सी चूक मेहनत, पूँजी व समय को व्यर्थ कर देती है।
इसमें किसी मशीन या टेक्नोलोजी का उपयोग नहीं होता। इसके लिए बाहर के राज्य से बढ़िया क्वालिटी का नरम मुलायम रेशम मंगाया जाता है।पटोला बनाने हेतु डिजाइन तय कर लेने के पश्चात पहले रेशम के तारों को सीधा करके गिनकर रखा जाता है और उससे ताणी तैयार की जाती है फिर डिजाइन के अनुसार तार बांधने का कार्य हाथ से किया जाता है। इस पट्टी पर एक निश्चित माप के आधार पर डिजाइन के अनुसार धागा बांधा जाता है ताकि बिना बंधे हुए हिस्से पर कलर किया जा सके। साड़ी में जितने कलर होते हैं उतनी ही बार उसे धागा बांधने और कलर करने की प्रक्रिया से गुजरना होता हैं। इस पूरी प्रक्रिया में डिजाइन व माप बहुत ध्यान रखा जाता है कि एक भी धागा कम ज्यादा न हो जाय। नहीं तो वह आगे बुनाई के लिए नहीं जा सकेगा।
एक साड़ी(5मीटर) में आड़े तार 25000-26000 तथा खड़े तार 5000-6000 के करीब होते हैं। इसके पश्चात डिजाइन के हिसाब के अलग अलग कलर एक-एक करके किए जाते हैं जिसके लिए बड़ी सावधानी से शेष भाग को बांधा जाता है। एक से अधिक कलर होने की दशा में इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है क्योंकि डिजाइन हर बार अलग कलर हिसाब से धागे से गिनकर गांठ बांधनी होती हैं। एक डिजाइन 6 तार से बनी होती है। प्राकृतिक रंग के लिए विभिन्न वनस्तपतियों- हरडे. बोडी की लाख, आवंला, हल्दी, हरी तथा नील जैसी वनस्पति के रंगों का उपयोग किया जाता है। इसका खर्च प्रायः अधिक आता है इसलिए वैकल्पिक रूप से रासायनिक रंगों का भी उपयोग होने लगा है।
संशोधन प्रवधि-
पटोला जी.आई. (भौगोलिक संकेत) हस्तकला और उससे जुड़े कारीगरों की सामाजिक, आर्थिक एवं व्यावसायिक स्थिति को समझने के लिए पाटण के छोटे-बड़े व्यावसायिक उपक्रमों में कार्यरत कारीगरों में से 48 उत्तरदाताओं का यदच्छ पद्धति से चयन किया गया जिसमें इस उत्पाद की विविध प्रक्रियाओं से जुड़े कुशल, अर्द्ध–कुशल एवं अकुशल कारीगर सम्मिलित हैं। शोध पद्धतियों में साक्षात्कार, अवलोकन, लक्ष्य समूह चर्चा आदि का उपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त द्वितीयक स्रोतों से भी आवश्यक शोध सामग्री का संकलन एवं उपयोग किया गया।
संशोधकीय विमर्श-
कारीगर समाज की तकनीकी कुशलता व सृजनशीलता को परिलक्षित करती पटोला निर्माण प्रक्रिया के प्रमुख चरण…………..
समग्र पटोला निर्माण प्रक्रिया यह एक गणितीय एवं अकल्पनीय कठिन प्रक्रिया है। पटोला डबल इकत बुनाई है जिसमें उल्टा सीधा नहीं होता इसलिए इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है। इसके रंग 100 वर्षो में भी फीके नहीं पड़ते। पटोला की डिजाइन में इकत केन्द्र स्थान पर होता है। इकत आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना में उत्पादित कपड़े का एक प्रकार है जो यार्न टेकनोलोजी एवं फेब्रिक जगत में एक सामान्य नाम है। इकत एक डाइंग टेकनिक है जिसमें रेजिस्ट डाइंग प्रक्रिया का समावेश किया जाता है। कुदरती रंगों के लिए केचु, कोचीनील, इन्डिगो, हल्दी, लाख हरडे, मेडर मूल, रत्नजोत, मंडिष्ठा. काथ, केसुडो, अनार का छिलका, महेंदी, गेंदा के फूल आदि का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा फिटकरी, कोपरसल्फेट, फेरस सल्फेट, टीन, क्लोराइड, पोटेशियम, डाइक्रोमेट एवं अन्य मोर्डन पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
समान्य रूप से पटोला पर अमूर्त डिजाइन एवं ज्यामितीय पेटर्न बनाए जाते हैं यथा- हाथी, मानव आकृति, कलश, फूल, शिखर, पान, पोपट आदि। अन्य डिजाइन गुजरात के हेरिटेज आर्किट्रेक्चर से प्रेरित हैं जिसमें एतिहासिक स्मारकों के जटिल डिजाइन भी पटोला साड़ियों पर देखे जा सकते हैं। नवरत्न पटोला की बहु प्रचलित एवं मंहगी पेटर्न मानी जाती है इसी श्रेणी में नारीकुंजर, व्होराजगाजी (माणएक चौक), छाबरी स्नान, चांदभाटी, पाटण भट्ट, लहेरिया, तरलिया, कुलभट्ट, केशर चंदन आदि का समावेश किया जाता है।
मशीनीकरण और पश्चिमीकरण के इस दौर में धारा से विपरीत यह हस्तकला उद्योग प्रदूषण रहित, औद्योगिक जगत के दूषणों से लगभग मुक्त विशाल रोजगार प्रदाता है जिसमें महिलाओं की भागीदारी नोंधनीय है। मात्र रोजगार की बात नहीं अपितु पाटण की पटोला विरासत भारत की समृद्ध जीवंत परंपरा की वाहक बनी हुई है। यदि कारीगरों को पर्याप्त पारश्रमिक मिलता रहा जो यह कला फलती फूलती रहेगी।
इकत इण्डोनेशिया की डाइंग टेकनिक है जिसका उनकी स्थानीय भाषा में शाब्दिक अर्थ है- बाइन्ड। इस टेकनिक का उपयोग टेक्सटाइल पेटर्न के लिए होता है जिसे वेफ्ट यार्न की बुनाई से फेब्रिक की डाइंग के लिए किया जाता है। दक्षिणपूर्व एशिया की अन्य संस्कृतियों में इकत का उपयोग बुनाई की परंपराओं के संदर्भ में किया गया है।एकाधिक कलर एवं सघन डिजाइन वाली इकत प्रक्रिया काफी जटिल व खर्चीली होती है। पटोला निर्माण प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप में निम्म लिखित रूप से समझा जा सकता है-
- रेशम धागे के बंच तैयार करना–
तारों के डिजाइन के अनुसार गिनती करके बंच तैयार किए जाते हैं जिसमें 150, 250, 300, 350 जैसे तार डिजाइन की आवश्यकता के अनुरूप बांधे जाते हैं। इसके पश्चात पाटी तैयार की जाती है।
- ताणी एवं कोटन धागा बांधने का कार्य-
पेपर पर तैयार की गई डिजाइन के अनुसार आड़ी और खड़ी ताणी बनाई जाती है। फिर उस पर कलर करने के लिए अतिरिक्त भाग पर कोटन का धागा इस तरह कसकर बांधने का कार्य किया जाता है कि वह कलर अन्य अवांछित जगह पर प्रवेश न कर पाए। पहले धागे से बनाई गई ताणी पर जगह जगह कोयले से निशान किया जाता है ताकि माप में भूल न हो औरडिजाइन के अनुसार सही जगह पर धागा बांधा जा सके।इसके लिए कोटन के धागे को पहले पानी भिगोया जाता है ताकि वह एक दम फिट कसकर बांधा जा सके। एक ताणी पर एक साथ 9-10 महिला पुरुष कारीगर काम करते हैं। साड़ी का पल्लू बनाने के लिए पाटी तैयार की जाती है।
- धागा बांधने की प्रक्रिया को डिजाइन के अनुसार चेक करना-
ताणी अथवा पाटी जिस पर कोटन धागा की गांठ बांधी जाती है वह डिजाइन के अनुसार ठीक है या नहीं इसको चेक करने का कार्य कार्यस्थल पर ही सुपरवाइजर द्वारा बड़ी सावधानी से चेक किया जाता है तथा जरूरत होने पर तत्काल सुधारा जाता है ताकि पटोला के फाइनल प्रोडक्ट में भूल की संभावनाएं न रहें।
- कलर (डाई) करना-
प्राकृतिक व रासयनिक कलर उबलते गर्म पानी में 10-15 मिनट तक कलर करने वाले भाग को डाला जाता है फिर साफ पानी से धोकर, कपड़े से पोंछ कर सुखा लिया जाता है। फिर दूसरे कलर के लिए प्रोसेस की जाती है। डिजाइन में जितने कलर होते हैं उतनी ही इस धागे को डाई अर्थात् कलर की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
- बुनाई कार्य-
रोजवुड एवं वांस की पट्टियों से बने परंपरागत हार्नेश लूम पर बुनाई कार्य किया जाता है। लूम एक तरफ थोड़ा झुका होता है इसलिए एक लूम पर एक साथ 2 लोगों को काम करना पड़ता है। इसमें वृद्ध, प्रोढ़, युवा महिला – पुरुष सभी कार्य करते हैं। बुनाई और फिनिशिंग का कार्य अंतिम चरण की कामगीरी है जिसमें अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है। कारीगरों ने बताया कि वे यहाँ के फोटो लेने नहीं देते क्योंकि मार्केट में आने से पहले यदि डिजाइन कॉपी हो जाय तो कीमत गिर जाती है। इसलिए यह प्रक्रिया सार्वजनिक होते हुए भी गोपनीय रहती है। इन कारीगरों को बेहतर महेनताना मिल पाता है। ये कारीगर ठेके पर बुनाई और फिनिशिंग का काम करते हैं। ताकि जितना अधिक काम कर सकेंगे उतनी अधिक आय अपने व परिवार के लिए अर्जित कर सकेंगे। अपनी नई पीढ़ी को सिखाने का कार्य भी ये उस्ताद लोग बखूबी करते हैं और अपने शागिर्दों की तरक्की से बेहद खुश भी रहते हैं। बुनाई व फिनिशिंग कार्य से जुड़े एक ही परिवार के महिला व पुरुष सदस्य भी जुड़े हैं। 70 वर्षीय गिरधरभाई-इन्होंने 50 से अधिक शागिर्दों को तैयार किया है। जिन पर इन्हें गर्व हैं। आज भी उतनी ही ऊर्जा के साथ इस कार्य में लगे हुए हैं। इनकी सफाई और दक्षता का आज भी कोई सानी नहीं है।
हस्तकला कारीगर समुदाय के चयनित उत्तरदाताओं की जनसांख्यिक लाक्षणिकताएं एवं प्रतिभाव….
- पटोला निर्माण कार्य में आधे से ज्यादा उत्तरदाता युवा हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यह हस्त कला युवा आबादी को रोजगार देने की क्षमता रखती है। वहीं 13 प्रतिशत उत्तरदाता किशोर अर्थात् 15 वर्ष एवं उससे अधिकआयु के हैं यदि इसे बालश्रम के कानूनी दायरे से परे रखकर देखा जाय तो यह कहा जा सकता है कि इस कला के क्षेत्र में छोटी उम्र से सीखने सिखाने की प्रक्रिया वर्तमान में अनवरत चल रही है। इनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी का हिस्सा भी हैं। 31-50 वर्ष के लगभग 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं जो संभवतः परिवार की सकल आय में वृद्धि की इच्छाशक्ति के साथ इस कला में संलग्न हैं।
- शोध में लिंगानुसार महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत एक तिहाई है जो कोटन धागा बांघने व पाटी तैयार करने आदि उप प्रक्रिया से जुड़ी हैं।
- पटोला हस्तकला में सामान्य वर्ग के उत्तरदाता 69 एवं अन्य पिछड़ावर्ग के 21 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जन जाति का कोई उत्तरदाता नहीं है। सामान्य जाति वर्ग में ठाकोर, चौधरी, रावल गुप्ता आदि उप जातियों का समावेश किया जा सकता है। इन आंकड़ों को कला और सामाजिक स्तर अथवा कला का समाज में स्थान की दृष्टि से जोड़कर देखें तो कह सकते हैं कि समान्य वर्ग का अधिक प्रतिशत इस बात का गवाह है कि इसमें कार्य करने वालों को सामाजिक तौर पर निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाता।
- शिक्षण की दृष्टि से देखें तो अधिकांश उत्तरदाता पढ़े-लिखे ही हैं लगभग दो तिहाई का समावेश प्राथमिक व माध्यमिक स्तर तक के शिक्षण में हो जाता है। फिर भी उच्च माध्यमिक एवं स्नातक स्तर तक शिक्षण प्राप्त करने सुंक्त प्रतिशत 23 है। इनको शिक्षण ठूटने का ज्यादा गम नहीं हैं क्योंकि काम सीख लेने एवं काम मिल जाने की खुशी जो है।
- विवाहित एवं अविवाहित दोनों ही इस कला से जुड़े हुए हैं।
- कुछ एक उत्तरदाताओं को छोड़कर ज्यादातर कारीगर स्थानीय हैं और पाटण के आसपास से 10-15 कि.मी, के दायरे से आते हैं। इन उत्तरदाताओं की वर्तमान आय का मुख्य स्रोत पटोला की कामगीरी ही है किन्तु कुछ उत्तरदाता का सहायक आय का स्रोत मजदूरी भी है। जाति के अनुसार देखें तो सर्वाधिक ठाकोर समुदाय के उत्तरदाता ही मजदूरी कार्य में द्वितीयक स्रोत के रुप में संलग्न हैं।
- संयुक्त कुटुंब वाले उत्तरदाता 87 प्रतिशत हैं जहाँ 5-8 सदस्य वाले परिवारों की संख्या सर्वाधिक है। ज्यादातर कमाने वाले सदस्य अंशकालिक रोजगारी में संलग्न हैं। अधिकांश उत्तरदाताओं के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अधिक अच्छी नहीं हैं।
- 3500-5000 रूपये मासिक आय में 25 प्रतिशत उत्तरदाता हैं तथा इतने ही 5000-7000 रुपये मासिक में हैं। अर्थात् आधे उत्तरदाता बहुत ही कम मजदूरी लेकर जीवन यापन को विवश हैं। मात्र 25 प्रतिशत उत्तरदाता ही 15000-25000 मासिक आयोपार्जन कर रहे हैं ये वे कारीगर हैं जो पटोला डिजाइन एवं बुनाई जैसे कुशल कार्य में रत हैं। कुटुंब की मासिक आय देखें तो 4000-8000 रुपये मासिक आय वर्ग में सर्वाधिक उत्तरदाता आ जाते हैं।
- मकान उत्तरदाता के सामाजिक आर्थिक स्तर को स्प्ष्ट रूप से प्रकट कर देता है। लगभग 46 प्रतिशत उत्तरदाताओं के मकान कच्चे हैं जिनका स्तर निम्न कहा जा सकता है 10 प्रतिशत अर्ध पक्के मकान वाले उत्तरदाताओं की स्थिति इस पैमाने पर सामान्य के थोड़ा नीचे एवं आसपास कही जा सकती है। मात्र 8 प्रतिशत के मकान पक्के एवं सुविधायुक्त (फ्रिज, टी.वी. बाइक आदि) हैं। मात्र एक तिहाई उत्तरदाताओं के पास ही जमीन है।
- लिंगानुसार इस कला में भगीदारी देखें तो सर्वाधिक 35 प्रतिशत उत्तरदाता ताणी और पाटी बनाने एवं उस पर कोटन की गांठ बांधने वाले काम से जुड़े हुए हैं जिसमें कुल महिला उत्तरदताओं के 69 प्रतिशत उत्तरदाता संलग्न हैं। इसके बाद सबसे अधिक पारश्रमिक वाली बुनाई उप प्रक्रिया में एक चौथाई उत्तरदाता है किन्तु उसमें महिला उत्तरदाताओं का प्रतिशत मात्र 17 है। डाई अर्थात् कलर काम में 21 प्रतिशत उत्तरदाता हैं किन्तु इस प्रक्रिया में कोई भी महिला उत्तरदाता नहीं है। गांठ बांधने के कार्य में संलग्न 10 प्रतिशत उत्तरदाताओं में महिला पुरुष दोनों काम रहे हैं पुरुष – महिला 40 – 60 के अनुपात में हैं।
- सभी जातियों की महिलाएं पटोला निर्माण की विविध प्रक्रियाओं से जुड़ी हैं जिससे सिद्ध होता है कि लिंग के आधार पर इस कार्य एवं इसकी किसी भी प्रक्रिया में कार्य करना सामाजिक रूप से निम्न नहीं माना जाता। दूसरे हम यह भी कह सकते हैं कि कार्यस्थलीय व्यवस्थाओं के प्रति कारीगर समाज का विश्वास बना हुआ है जिससे उन्हें अपने घर की महिलाओं के यहाँ भेजने किसी भई तरह की आपत्ति नहीं है।
- पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि विभन्न स्तरों पर की जाने वाली प्रक्रियात्मक कामगीरी में तकनीकी कुशलता एवं अर्थोपार्जन की दृष्टि से स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
- शिक्षण व कामगीरी के संबंध के संदर्भ को लेकर सामान्यीकरण तो नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी तरह की कामगीरी में सभी शैक्षणिक स्तरों का समावेश है किन्तु अध्ययन में यह पाया गया है कि शुरुआती कम कुशलता वाले कार्यों में उत्तरदाताओं का शैक्षणिक स्तर अपेक्षाकृत कम है।
- उम्र एवं कामगारी के संबंध को देखें तो हम पाते हैं कि 20 वर्ष से कम आयु के अधिकांश कारीगर ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने तथा कलर करने के काम में लगे हैं। 21 से 30 वर्ष की वय जिसमें सर्वाधिक उत्तरदाता हैं उसमें से 50 प्रतिशत ताणी बनाने व कोटन की गांठ बांधने के कार्य में रत हैं तथा इसी उम्रवय के 28-28 प्रतिशत उत्तरदाता कलर व बुनाई काम में लगे हुए हैं।
- उत्तरदाताओं के काम सीखने के स्रोत अलग अलग हैं यथा काम करते करते सीख लेना जिसमें आरंभिक प्रक्रिया को सम्मिलित किया जा सकता है। किन्तु जो कारीगर बुनाई के कार्य में लगे हैं उनमें से अधिकांश वंशानुगत एवं गुरु-शिष्य परंपरा की तरह प्रशिक्षित हुए हैं। वंशानुगत रूप से पटोला कार्य में जुड़े कारीगरों का प्रतिशत छठवां भाग ही है। इसलिए संशोधन में सर्वाधिक कारीगर (71प्रतिशत) 3-5 वर्ष के अनुभव वाले पाये गए हैं जो कतिपय कम कुशल प्रक्रियाओं से सरोकार रखते हैं।
- पटोला निर्माण कार्य में अधिकांश कारीगर मजदूर के रूप में काम करते हैं, कुछ प्रक्रियाओं का ठेके पर लेकर पूर्ण किया जाता है। इस उद्योग में मांग पर्याप्त है। सतत उत्पादन तो होता ही है किन्तु ऑर्डर के अनुसार भी उत्पादन कार्य किया जाता है।
- उत्तरदाताओं के कार्य में सर्वाधिक सहयोगी उनके माता पिता हैं, स्कूल तथा घरकाम के चलते बच्चे और पत्नी भी समय मिलने पर मदद कर पाते हैं। कारीगरों के विकास में अवरोधक घटकों में वे पटोला निर्माण कार्य में लगने वाला अधिक समय तथा सामाजिक प्रसंगों की अनिवार्यता वश काम में रुकावट का आना आदि है। इस समस्या के समाधान हेतु वे सीखने की प्रक्रिया में तेजी लाना, एकाग्रता के साथ काम करना, सहयोग के साथ काम करना तथा तनाव को कम करने का प्रयास करना आदि को आवश्यक मानते हैं। इस तनाव के लिए शारीरिक, मानसिक एवं कार्यवातावरणीय संकीर्णता को जिम्मेदार मानते हैं। ये समस्याएं आरंभिक प्रक्रिया स्तर पर उत्तरदाताओं द्वारा अधिक की जाती हैं क्योंकि अपेक्षाकृत प्रतिफल कम और शारीरिक मानसिक थकान एवं अनइजीनेस ज्यादा है। इसके चलते व्यक्तिगत एवं संगठनात्मक स्तर की उत्पादकता तथा परिवारीजनों के शिक्षण स्वास्थ्य आदि जीवन स्तरीय घटकों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पटोला उद्योग मे कार्यरत उत्तरदाताओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को स्पष्ट करती है। एक साथ एक ही तरह का कार्य करने से हाथ-पैर व जोड़ों के दुखने समस्याएं उत्तरदाताओं में देखने को मिलती हैं। उत्तरदातओं के मतानुसार सावधानी रखकर, संवेदना विकसित कर तथा मानवीय मूल्य प्रेरित जवाबदारी महसूस करके यथोचित निदान किया जा सकता है।
- व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए अधिकांश उत्तरदाता डिजिटल ट्रांजेक्सन, एडवांस मार्केटिंग टेक्नोलोजी के ज्ञान कौशल्यों के विकास की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
- अधिकांश उत्तरदाता (83 प्रतिशत) पटोला निर्माण कार्य की विविध प्रक्रियाओं में उन्हें पूर्ण रोजगार मिल जाता है। हालांकि उनका वेतन कम है लेकिन काम की निरंतरता से वे खुश हैं।
- मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
हस्तकला कामगीरी….कारीगर समुदाय तथा उनकी पारश्रमिक व्यवस्था
वर्तमान में इस कला की विविध प्रक्रियाओं में सालवी परिवार के अलावा विभिन्न जाति के स्थानीय महिला, पुरुष किशोर व युवाओं ने अपना स्थान बनाया है। पटोला काम में गुप्ता, ठाकोर, रावल, चौधरी, सालवी, दरबार, पटेल, गोहिल, लींबाचिया, पारीख आदि उप जातियों के लोग जुड़े हैं। महिला और पुरुष दोनों ही इस निर्माण प्रक्रिया में सहभागी हैं। महिलाएं मुख्यतः पाटी में धागा बांधने, कलर वाले धागे बांधने, ताणी बांधने काम कर रही हैं जबकि पुरुष पाटी बनाने, ताणी बांधने, कलर काम तथा बुनकर काम करते देखे गए हैं।
डिजाइन की प्राथमिक संकल्पना इकाई मालिक सालवी परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है जिसमें ग्राहकों की पसंद व मांग को प्राधान्य दिया जाता है वे डिजाइन की प्रकृति के अनुसार उसमें लगने वाले समय व संसाधन का मूल्यांकन करने का कौशल्य रखते हैं तथा निर्णय लेने का सामर्थ्य भी। उनके पास रेशम खरीदने से लेकर विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए कारीगरों की व्यवस्था करने की सत्ता होती है। पटोला मार्केटिंग की व्यूहरचना के केन्द्रीय निर्णयों में भी यही मालिक लोग होते हैं। इसे तकनीकी प्रबंधकीय की शीर्ष स्थिति भी कहा जा सकता है इसलिए लाभ का एक बड़ा भाग इसके हिस्से में रहता है। ये उद्योग साहसिक एवं जोखिम वहनकर्ता होते हैं जो पूँजी व एकम की कामगीरी का बेहतर प्रबंधन करते हैं।
पटोला साड़ी तैयार करने की प्राथमिक प्रक्रियाओं यथा-पाटी या ताणी तैयार करना, बंच बनाना, कोटन का धागा बांधना, हर स्तर पर डिजाइन की चौक्कसाई की जांच करना, कलर काम करने वाले जो काफी कम वेतन पर कार्य करते है। अनुभव के आधार इसमें थोड़ा बहुत इजाफा होता है। कलर से पूर्व कोटन धागा बांधने वाले कारीगर यद्यपि तकनीकी कार्य करते हैं किन्तु रूटीन कार्य होने से उनका 3500 से 5000 प्रतिमाह के मध्य ही रहता है। इनका रिप्लेसमेंट आसानी से कभी भी किया जा सकता है। अर्थात् इस कार्य को थोड़ी मेहनत व लगन से करके गति दक्षता प्राप्त की जा सकती है। यह असंगठित श्रम समुदाय है इसको मजदूरी के अलावा अन्य कोई लाभ नहीं मिलता।
इनके सुपरवाइजर धागा बांधने के कार्य को दी गई डिजाइन के अनुसार जाँच करते हैं जिनका वेतन इनसे लगभग डबल और अनुभव के आधार पर बढ़ता चला जाता है। हर एक सामूहिक कार्य की डिजाइन मेचिंग अनुरूप जाँच कम मेहतन और कम जिम्मेदारी वाला कार्य नहीं है। इसलिए इनका रिप्लेसमेंट बहुत जल्दी संभव नहीं होता। लेकिन इनका वेतन बहुत संतोषकारक तो नहीं कहा जा सकता।
बुनाई के काम की मेहनत, चौक्कसाई, तथा डिजाइन गुप्तता आदि के साथ यदि इन कारीगरों को मिलने वाले पारश्रमिक को देखते हैं तो इनकी स्थिति अधिक महत्वपूर्ण तथा बेहतर मानी जा सकती है ये महीने में 18000-25000 या 30000 तक कमा लेते हैं। इन पर सालवी परिवार से जुड़े एवं निकटस्थ परिवारों का वंशानुगत कब्जा है। सीखना सिखाना भी लगभग वंशानुगत है। इस प्रक्रिया में भी बहुत जल्दी किसी को भी रिप्लेस नहीं किया जा सकता। ये लोग ठेके पर भी बुनाई का काम ले लेते हैं। फिनिशिंग व समयसर कामगीरी इनके गुणवत्ता मानक हैं। इसलिए इस अंतिम प्रक्रिया को कार्य की जटिलता व पारश्रमिक दोनों ही दृष्टि से अति महत्व का माना जा सकता है।
अधिकांश कारीगर मालिक के इकाई में मजदूर या कर्मचारी के रूप में ही काम करते हैं स्वतंत्र रूप से नहीं। वे 8-12 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हुए जीवन निर्वाह करते हैं। कुछ कारीगर ठेके पर (कार्य के अनुसार एक मुश्त प्रतिफल) पर कार्य करते हैं। वे सभी निम्न मध्यम स्तरीय कम महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न रहते हैं। उनकी जगह किसी भी नए व्यक्ति को आसानी से बदला जा सकता है। जबकि सालवी परिवार के सदस्य बतौर मालिक कार्य करते हैं। बुनाई का काम करने वाले कारीगर सालवी परिवार से पुराना निकटतम संबंध रखते हैं। यह कार्य अंतिम तबक्के का है इसे कार्य की जटिलता और प्रतिफल की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इकाई मालिकों का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। किन्तु इन विविध स्तरीय प्रक्रियाओं से जुड़े कारीगरों को प्राप्त होने वाले दैनिक औसत पारश्रमिक पर दृष्टिपात करें तो अंतर स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगता है।
इस पटोला उद्योग में अधिकांश कारीगर संयुक्त कुटुंब से आते है जहाँ सदस्य संख्या 6-8 है। मुखिया पर घर का भार होता है कुटुंब में से 2-3 व्यक्ति ही कमाते हैं। काम के अवसर मिलने पर घर की महिलाएं कम मजदूरी में भी इस कार्य से जुड़ जाती है। जो लड़कियां बीच में शिक्षण छोड़ चुकी हैं वे भी इसमें जुड़ी हैं। कम उम्र के बच्चे भी ये कार्य कर रहै हैं। सालवी कुटुंब के बच्चे इस कार्य से जुड़े हैं। ये कारीगर अपने बच्चों का शिक्षण भी पूरा नहीं करा पाते उन्हें बीच में ही छुड़वा देते हैं। कुछ आय होने से परिवार व समाज में उनकी स्थिति बेहतर बनती है और वे घर की बुनियादी जरूरतों के पूरा करने में अपनी कुछ योगदान कर पाती हैं। कई कारीगरों के घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है उनके मकान कच्चे, अर्ध पक्के हैं जिसमें प्रमुख बुनियादी सुविधाओं की कमी दिखाई देती है। इस मजदूरी से उनका भरणपोषण चलता है।
रेशम का धागा मुलायम अवश्य है किन्तु धारदार है। इसलिए यदि उंगली पर कपड़ा ठीक से न बंधा हो तो कलर करने वाले व धागा बांधने वाले कारीगरों की उंगली को घायल कर देता है। इस कार्य में एक 4 घंटे एक ही पोजीशन बैठे रहने से कारीगरों को कमर का दर्द एवं शारीरिक थकान अधिक महसूस होती है। बुनाई का कार्य सघन व गहन होने से आंख के नंबंर तथा सिर दर्द की समस्याएं बनी रहती है।
इस हस्तकला की संचालन व्यवस्था में सामान्य तकनीकी का प्रवेश तो हुआ है जिसके साथ काम करने के लिए नये पुराने कारीगरों को इसका अभ्यस्त होना पड़ता है किन्तु इस हस्तकला में प्रयुक्त होने वाले संसाधनों पर कारीगरों का समान अधिकार नहीं है और न ही उन पर अधिकार करने की आर्थिक क्षमता। इसलिए इनके उपयोग के लिए हस्तकला इकाइयों के मालिकों की मर्जी पर निर्भर रहना पडता है एवं तदनरूप कार्य निर्णयों को आकार देना पड़ता है। हस्तकला के क्षेत्र में मार्केटिंग की समस्या बनी हुई है। जी.आई. टेग के बावजूद अन्य का हस्तक्षेप यहाँ दिखाई देता है। जैसा कि पाटण का पटोला हस्तकला इकाई के मालिक एवं एशोसिएशन के सदस्य पदाधिकारी ने बताया कि हम मांग के अनुरूप ही उत्पादन कर पाते हैं जिन लोगों को आर्जिनल माल खरीदना होता है वे हमसे सीधे संपर्क करते हैं इसिलए हमें नकल करने वालों से ज्यादा परेशानी नहीं होती।
उपसंहार-
अंत में यह कहा जा सकता है कि हस्तकला कारीगरों में मालिकी का प्रमाण घटने लगा और वे कुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक के रूप में चिन्हित होने लगे। इसके परिणाम स्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति डंवाडोल होने लगी और वे रोजगारी के अन्य विकल्पों की ओर भी पूरक व स्वतंत्र रूप से उन्मुख होने लगे। कारीगर समुदाय कतिपय कारणों से अपनी योग्य संतानो एवं परिजनों को इसमें लाना नहीं चाहते क्योंकि इसमें उन्हें समुन्नत जीवन यापन हेतु आर्थिक सुनिश्चितता दिखाई नहीं देती।
कला का अस्तित्व कारीगरों की हस्ती पर टिका होता है। छोटे कारीगर जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है वे किस प्रकार स्वयं को टिकाए रख सकते हैं इस तरफ गंभीरता से विचार करना होगा। एक अहम् प्रश्न हस्तकला कारीगरों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तनों को लेकर है कि अनुकूल परिवर्तन कैसे लाया जाय, कार्यस्थलीय वातावरण को कैसे सहज और प्रभावी बनाया जाय, संघर्ष व तनाव कैसे घटाया जाय तथा कार्य निष्पान गुणात्मक मात्रात्मक सुधार हो और बिना किसी टकराव के उनका व उनके परिवार का जीवनस्तर कैसे ऊपर उठ सके। पटोला हस्तकला के अधिकांश कारीगरों की मजदूरों जैसी स्थिति का होना,उनका समग्र कला की किसी एक प्रक्रिया विशेष तक ही सीमित होना, सौदेबाजी की कमजोर क्षमता का होना, कार्य संबंधी अपर्याप्त शिक्षण-प्रशिक्षण का होना आदि इस क्षेत्र में विद्यमान हैं। इसलिए वे जिस कार्य को कर रहे हैं उसी तक ही मर्यादित रह जाते हैं। कदाचित हस्तकला कार्य में आंशिक या बहुतायत से मशीनों का प्रवेश हो जाय तथा नफा-नुकसान के गणित पर हस्तकला व्यवसाय पर मालिकाना हक रखने वाले मूल कारीगरों को ही सुनियोजित रूप से उनके स्थान से अलग थलग न कर दें, इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
यदि हस्तकला व्यावसायिक इकाइयों को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश कारीगरों की समाजिक –आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। क्योंकि उनकी दैनिक मजदूरी भी मनरेगा के अन्तर्गत मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। स्वास्थ्य के इश्यु बने ही हुए हैं।
कामगीरी का स्वरूप और उससे होने वाली आय में कामगीरी का स्तर प्रतिबिम्बित होता है। पटोला मालिकों द्वारा पटोला निर्माण की सभी प्रक्रियाएं समान कही जाती है, समान महत्व की मानी जाती हैं तथापि उनके मध्य आर्थिक स्तर पर एक अंतर अवश्य दिखाई देता है जिसे इस सारणी में दर्शाया गया है। लगभग आधे उत्तरदाता निम्न स्तर पर आपनी कामगीरी का सम्पादन करते हुए सीमान्त आय का सृजन कर रहे हैं, जिनके बीच में छोड़कर चले जाने से मालिकों को विशेष फर्क नहीं पड़ता। कोई भी दूसरा उनकी जगह आसानी से ले सकता है अथवा थोड़ी सी प्रेक्टिस करके सीख सकता है, कार्य सम्पादित कर सकता है।
निम्न मध्यम स्तर में वे उत्तरदाता हैं जो इस स्तर पर कार्य करते हुए कुछ अनुभवी हो गए हैं जिनकी कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है और वे अपेक्षाकृत अधिक पारश्रमिक ले पा रहे हैं। मध्यम स्तर पर सुपरवाइजरी तथा बुनाई के क्षेत्र में आरंभिक स्थिति में हैं। मध्य एवं उच्च स्तर उन कारीगरों का है जो बुनाई आदि प्रक्रिया से जुड़कर आपनी श्रेष्ठ कार्यकुशलता के आधार पर एक अच्छा पारश्रमिक लेने की स्थिति में हैं।
इस कला के अस्तित्व के संदर्भ में मालिकों से हुई बातचीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे इस प्रवृत्ति के संचालन हेतु किसी भी प्रकार की सरकारी वित्तीय सहायता नहीं लेते अपितु अपने निजी स्रोतों और अपने बैंक से इसकी व्यवस्था करते हैं। कच्चे माल सामान रेशम, कलर आदि की व्यवस्था में उन्हें वर्तमान में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
मानव संसाधन के संदर्भ में मांग से अधिक पूर्ति की स्थिति होने के कारण उन्हें आसानी अर्ध कुशल मानव शक्ति आसपास के विस्तार से आसानी से मिल जाती है। क्योंकि इस कार्य को सहजता थोड़ा सा ध्यान से काम करने पर आसानी से सीखा सिखाया जा सकता है इसलिए कारीगरों के बीच में छोड़कर जाने पर समस्या सामान्य रूप से नहीं होती। हाँ, उत्पादन पर अवश्य फर्क पड़ता है यदि सीखने के बाद कारीगर छोड़कर चला जाय। सामान्य रूप से चेकिंग, बुनाई और बंच बनाने वाले कारीगर काम छोड़कर कम ही जाते हैं। यदि काम ऑर्डर के कारण जल्दी पूर्ण कराना हो तो कारीगरों ओवर टाइम के लिए राजी करना पड़ता है। मालिकों का अच्छा व्यवहार ही उनके लिए प्रेरणास्पद साबित होता है।
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विनोबा भावे(1942) स्वराज शास्त्र, गूजरात विद्यापीठ प्रकाशन, अहमदाबाद
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मोहनदास करमचंद गांधी- ग्राम स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
मोहनदास करमचंद गांधी- हिन्द स्वराज, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
मोहनदास करमचंद गांधी- मंगल प्रभात, नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद
द्वारा-
डॉ. लोकेश जैन
प्रोफेसर, ग्रामीण प्रबंधन विभाग, प्रबंधन संकाय
गूजरात विद्यापीठ-आश्रम मार्ग, अहमदाबाद(गुजरात) 380009
E-Mail: [email protected] mob. 9427026647
एवं
डॉ. देबेन्द्र दास
सदस्य सचिव (कार्यकारी) एवं सहायक निदेशक (R&N)
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण शिक्षा परिषद(MGNCRE), हैदराबाद
E-Mail: [email protected] mob.7416417852