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तोटक छंद “विरह”

तोटक छंद “विरह”

सब ओर छटा मनभावन है।
अति मौसम आज सुहावन है।।
चहुँ ओर नये सब रंग सजे।
दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।

सखि आज पिया मन माँहि बसे।
सब आतुर होयहु अंग लसे।।
कछु सोच उपाय करो सखिया।
पिय से किस भी विध हो बतिया।।

मन मोर बड़ा अकुलाय रहा।
विरहा अब और न जाय सहा।।
तन निश्चल सा बस श्वांस चले।
हर आहट को सुन ये दहले ।।

जलती यह शीत बयार लगे।
मचले मचले कुछ भाव जगे।।
बदली नभ की न जरा बदली।
पर मैं बदली अब हो पगली।।
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तोटक छंद विधान –

जब द्वादश वर्ण “ससासस” हो।
तब ‘तोटक’ पावन छंदस हो।।

“ससासस” = चार सगण
112 112 112 112 = 12 वर्ण
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया




तिलका छंद “युद्ध”

तिलका छंद “युद्ध”

गज अश्व सजे।
रण-भेरि बजे।।
रथ गर्ज हिले।
सब वीर खिले।।

ध्वज को फहरा।
रथ रौंद धरा।।
बढ़ते जब ही।
सिमटे सब ही।।

बरछे गरजे।
सब ही लरजे।।
जब बाण चले।
धरणी दहले।।

नभ नाद छुवा।
रण घोर हुवा।
रज खूब उड़े।
घन ज्यों उमड़े।।

तलवार चली।
धरती बदली।।
लहु धार बही।
भइ लाल मही।।

कट मुंड गए।
सब त्रस्त भए।।
धड़ नाच रहे।
अब हाथ गहे।।

शिव तांडव सा।
खलु दानव सा।।
यह युद्ध चला।
सब ही बदला।।

जब शाम ढ़ली।
चँडिका हँस ली।।
यह युद्ध रुका।
सब जाय चुका।।
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तिलका छंद विधान –

“सस” वर्ण धरे।
‘तिलका’ उभरे।।

“सस” = सगण सगण
(112 112),
दो-दो चरण तुकांत (6वर्ण प्रति चरण )
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया