मैं स्त्री हूं
मैं स्त्री हूं
मैं स्त्री हूं, मैं संसार से नहीं
संसार मुझसे है,
जीवन का सार मुझसे है
मनुष्य का आधार मुझसे है
कुछ स्वार्थी जो करते
व्यापार नारी का `
वो नहीं बन सकते कभी
सम्मान नारी का
करते जो अधर्म कुटिलता
करते उसके चरित्र को तार-तार
संभल न पाएगा करेगी जब पलटवार
उनके लिए स्त्री, स्त्री नहीं
है रूप काली और दुर्गा का
संभल जा तुच्छ स्वार्थी प्राणी
संपूर्ण मनुष्य जाति का विनाश हो जाएगा
यदि रूठ गयी, जो नारी
इस संसार की चलायमान है नारी
नारी दिव्य है देवी है
नारी को मां कहलाने का आशीर्वाद
क्यों डरे स्वार्थी प्राणियों से जब
सिर पर उस विधाता का हाथ
जो रखोगे नारी का मान चलोगे
संग उसके मिला के कदम ताल
ऐश्वर्य धन-धान्य से कर देगी मालामाल
स्त्री जीवनदायिनी है
फिर भी सहती है पीड़ा
समाज में फलित कुत्सित
लोग, ढोंग रचते हैं
नहीं समझते स्त्री के जीवन के मायने
कभी लोगों के तानों के वार
कभी कोड़ों की मार सहती
जीवन भर अत्याचार सह, रचती है
सुनहरे भविष्य का निर्माण
कई जिंदगी को पालती करती
जीवन सुधार,
फिर क्यों मजबूर करता
उसे यह झूठा भ्रमित जहां सारा
कर लेती आत्मदाह
लेती खुद के प्राण
कवयित्री
पिंकी हरि भार्गव
माता पिता- श्रीमती सुमित्रा, श्री मनीराम भार्गव
कराला, उत्तरपश्चिम- ब,
नई दिल्ली
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