कविता क्रमांक 1
शीर्षक- कमजोर नहीं है नारी
जरूरी नहीं कि नारी है ,तो बेचारी ही होगी|
हां होती है परवरिश थोड़ी अलग,
इसलिए कमजोर दिख सकती है|
पर नारी कमजोर नहीं होती है|
हिमालय को लांघना भी उसे आता है|
वक्त पड़ जाए तो सबक सिखाना भी जानती है|
किसी का भरोसा, किसी की उम्मीद ,किसी का
सहारा होती है|
पर नारी हरगिज़ कमजोर नहीं होती है|
तन और मन दोनों से ही मजबूत होती है|
नारी हर क्षेत्र ,हर मुकाम पर पहुंच जाती है|
नारी सा सब्र कहां सब में पाया जाता है|
हर स्तर पर खुद को परिभाषित करती है|
दिखाए भले ना पर बहुत बार खुद से ही लड़ती है|
गलत का प्रतिकार करना जानती है|
खुद को स्थापित करना उसे आता है
संस्कारित होती है नारी,
इसलिए सब के साथ हर वक्त खड़ी रहती है|
स्वप्न दूसरों के पूरे हो जाएं ,इसलिए
हमेशा दूसरे पायदान पर खड़ी रहती है|
रचना स्वरचित मौलिक
कविता क्रमांक 2
शीर्षक- स्त्री का घर
स्त्रियां बचपन में पिता के घर को,
अपना मानती हैं|
सजाती हैं संवारती है स्नेह से,
फिर एक दिन अचानक से कह दिया जाता है|
बेटी तुम तो पराई हो,
तुम्हें पराए घर जाना है|
मन को समझाती हैं ,स्त्रियां
फिर इस घर को थोड़ा सा भुलाकर,
नए घर को सजाने संवारने में लग जाती है|
यह दूसरा घर भी स्त्रियों का नहीं होता,
यह घर उनके पति का होता है|
पर वह इसे भी अपना ही मानती हैं|
पर तब स्तब्ध सी हो जाती है|
जब ससुराल वाले अचानक से,
एहसास कराते हैं|
कि तुम हमारा भला नहीं सोच सकती,
क्योंकि तुम तो पराई हो ,पराए घर से आई हो
तब स्त्री फिर सोचने लगती है|
कि जिसे वह अपना समझ कर संवार रही है|
वह घर भी उसका अपना नहीं है|
तब वास्तव में उसका अपना घर कौन है
यही प्रश्न हर स्त्री को
जीवन भर परेशान करता है
कि जब वह दोनों घर जिसे उसने
अपना सर्वस्य दिया
वही उसके अपने नहीं है
तो वास्तव में वह कौन हैं
अपना वजूद ,अपना घर तलाशती स्त्री
सदियों से अनुत्तरित है|
वंदना जैन
रचना स्वरचित मौलिक
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नाम- वंदना जैन
पदनाम- प्रोपराइटर आफ मार्बल शॉप
संगठन- ब्राह्मी सुंदरी संभाग ज्ञान इकाई महिला मंडल ललितपुर उत्तर प्रदेश
पता श्री जितेंद्र कुमार जैन वंदना मार्वल डैम रोड ललितपुर उत्तर प्रदेश
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