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प्रेम काव्य प्रतियोगिता हेतु , . प्रणय पत्र

 

. प्रणय पत्र

 

सोचा

आज एक प्रणय पत्र लिखूँ

दिल हो कागज़ और

काजल हो स्याही

कि तुम जब देखो

तो तुम्हें देखे मेरी नज़र  

 

पर क्या लिखूँ ?

तुम्हारे स्मित भरे हैं अधर

तुम्हारे चमकीले हैं नयन

तुम्हारी खनकती ही आवाज़

या तुम हो मेरे दिल का साज

 

ना जाने क्यों ये बातें

बेमानी –सी लगती है

प्रणय की परिभाषा

क्या ऐसी होती है ?

 

बंधनों –बंदिशों से दूर

चाहतों शिकायतों से परे

प्रिय में समाकर

विश्वास की ड़ोर से बंधा

जीने का नूर है प्रणय

 

शब्दों में ढ़लकर

कम न अधिक हो

क्रिया- प्रतिक्रिया से

सच्ची ना झूठी हो

 

तन की सीमा छोड़

मन की परीधि में

आत्मा से बंधकर

सुंदर एहसास है प्रणय  

 

सृष्टि के कण-कण में

रचा- बसा है प्रणय

शाश्वत सत्य का

साक्षात्कार है प्रणय

तृष्णा में तृप्ति है प्रणय  

समर्पण का भाव है प्रणय  

 

बस पूर्ण  समर्पण है प्रणय

 

 

 

 

 

 




प्रेम काव्य प्रतियोगिता हेतु , साँचा बंधन

साँचा बंधन 

सतवर्णी रंगों से सज कर

जब कान्हा तेरी प्रीत खिले

 राग , अनुराग, भाव, अनुभाव .

 सब जीवन राधा को मिले

 

अधखुले नयन मद से भरे

लरजते अधर रस  से भरे

गोल कपोल लाल, लाल

हुलस कर हिय हिलोर करे

 

न पंड़ित न वेदी न फेरे

मंत्र न सिंदूर भाल मेरे

बांधा साँचा बंधन तुझसे

सजन वचन भी न चाहूँ तेरे

 

देह का रखूँ न मान

मन सम्मिलन को दिया मान

तुझमें ही  समा जाऊँगी

चाहे रहे या जाए प्राण

 




क्या नाम दूँ तुम्हे?

 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कवि सम्मेलन काव्य प्रतियोगिता केलिए

क्या नाम दूँ तुम्हें ?

 

जीना है कब तक देवता का रूप धरकर ?

कितनों ने की है दुनिया में तेरी कदर ?

हे नारी, अबला कहूँ तुझे या नित सबला ?

फिर यूँ ही कहूँ आखिर हो तुम एक महिला ?

 

मायके की सारी यादें समेट लिए,

पग-पग पति-परमेश्वर का साथ दिए,

मेदिनी सी सहकर असीमित प्रसव-पीड़ा,

उठाई जीवन पथ में हर पल सारी बीड़ा।

 

देखते हर पल संतान की सारी लीला,

बढ़ायी सदा अपनी ही वंश की बेला।

मकान को तुमने ही बनाया एक घर,

ममता प्यार की रहीं सदा मीठी सुर।

 

हो बेकार या फिर ला दो आमदनी,

अपने घर की हो तुम नित स्वामिनी।

विज्ञानी हो या रहो अनपढ़ अज्ञानी,

सहती यूँ ही दुःख –दर्द, जैसी अवनि।

 

हर काज में जन्म भर का है सरोकार।

ख्याति मिली बस, कभी ना रहा पारावार।

देश संरक्षण या हो परिवार का रक्षण,

हैं तेरे अहसास जन-जन में अनुक्षण।

 

छोड़ा नहीं हो, तुम ने अब ऐसा कोई कार्य क्षेत्र,

जहां कोई तुझे कहें, करने में हो तुम अपात्र।

फिर भी बंधा है नहीं, जीवन में तेरा सही सूत्र,

दरिंदों के लिए, हो तुम आखिर एक महिला मात्र।

 




मैं

‘मैं’, मैं को ढूंढ रही थी,

नगर-नगर गली, गली, घूम रही थी,

‘मैं’ की तलाश जारी थी,

अब खुद के अंदर देखने की बारी थी,

कस्तूरी मृग की नाभि में थी,

मृगी इधर-उधर भाग रही थी,

हे प्रभु! तो ये मेरे अंदर की नारी थी,

सुला दी गई ,जो बेचारी थी।

सामने मुक्त आकाश था,

अब उड़ने की बारी थी

अभिव्यक्तियाँ निकल निकल,

पन्नों पर इंद्रधनुष बना रही थीं,

सोई हुई कलाओं को, जगा रही थीं,

नाच रही थी, मैं झूम रही थी,

चेहरे पर खुशी छाई थी,

लौटी जब आज घर,हाथों में सम्मान पत्र,

और गुलाबों का गुलदस्ता,

गले मे सम्मानसूचक हार, देखो तो—-

घर मे घुसते ही चिल्लाया था

पर ड्रॉइंग रूम में किसी को न पाया था,

दोनो बेटे थे किचन में,

एक बना रहा था ऑमलेट,

दूजे ने गैस पर चाय चढ़ाया था,

उड़ चली चेहरे की खुशी कपूर सी

हटा उनको, खुद नाश्ता बनाया था,

चेहरे पर स्वेद कण, और संतोष के क्षण,

और शायद हाँ, हाँ शायद,

वो मिल रही थी अब उस ‘मैं’ से,

जिसे जबरन सुला, छाया को जगाया था,

आंतरिक प्रसन्नता को छोड़,

सतही खुशी को अपनाया था।

रश्मि सिन्हा

मौलिक रचना




मैं

‘मैं’, मैं को ढूंढ रही थी,

नगर-नगर गली, गली, घूम रही थी,

‘मैं’ की तलाश जारी थी,

अब खुद के अंदर देखने की बारी थी,

कस्तूरी मृग की नाभि में थी,

मृगी इधर-उधर भाग रही थी,

हे प्रभु! तो ये मेरे अंदर की नारी थी,

सुला दी गई ,जो बेचारी थी।

सामने मुक्त आकाश था,

अब उड़ने की बारी थी

अभिव्यक्तियाँ निकल निकल,

पन्नों पर इंद्रधनुष बना रही थीं,

सोई हुई कलाओं को, जगा रही थीं,

नाच रही थी, मैं झूम रही थी,

चेहरे पर खुशी छाई थी,

लौटी जब आज घर,हाथों में सम्मान पत्र,

और गुलाबों का गुलदस्ता,

गले मे सम्मानसूचक हार, देखो तो—-

घर मे घुसते ही चिल्लाया था

पर ड्रॉइंग रूम में किसी को न पाया था,

दोनो बेटे थे किचन में,

एक बना रहा था ऑमलेट,

दूजे ने गैस पर चाय चढ़ाया था,

उड़ चली चेहरे की खुशी कपूर सी

हटा उनको, खुद नाश्ता बनाया था,

चेहरे पर स्वेद कण, और संतोष के क्षण,

और शायद हाँ, हाँ शायद,

वो मिल रही थी अब उस ‘मैं’ से,

जिसे जबरन सुला, छाया को जगाया था,

आंतरिक प्रसन्नता को छोड़,

सतही खुशी को अपनाया था।

रश्मि सिन्हा

मौलिक रचना




पतंग का चस्का और थानेदार का डंडा

 व्यंग्य

“पतंग का चस्का और थानेदार साहब का डण्डा “

मकर संक्रांति पर सुबह से ही पतंगबाजी का माहौल था। आसमान में रंग-बिरंगी पतंग, ऊंगलियों के इशारों पर नाच रहीं थी, वहीं कुछ उड़नदस्ते गली-गली में घूमकर पतंग लूटने में मशगूल थे। जैसे ही एक पतंग कटकर आंगन में गिरी, बरबस बचपन के दिन याद आ गये, ‘‘संक्रांति के कई माह पूर्व घर में फ्युज बल्ब एवं ट्यूब लाईट को डोर सूतने के लिये सम्हाल कर रख दिया जाता था।’’ जैसे-जैसे संक्रांति के दिन नजदीक आते, नये हुचके एवं पतंग की चाहत मन में उभर जाती। आस-पड़ौस के उन घरों में जहां पतंगे नहीं उड़ाई जाती थी, वहां पहले ही निवेदन कर आते। ‘‘अंकलजी इस बार आपके यहां के फ्युज्ड बल्ब और ट्यूब लाईट हमें ही मिलना चाहिये, वरना हमारी डोर कमजोर रह जाएगी। उन दिनों बस एक ही फंडा याद रहता था, जितना कांच डालो, डोर उतनी ही पक्की होगी, चाहे फिर ऊंगलियां की दुर्दशा ही क्यों न हो जाए ।
उन दिनों संक्रांति की पूर्व संख्या डोर सूतने में निकल जाती थी, उस पर यदि पतंग कट गई तो ऐसा लगता मानो नाक ही कट गई हो। डोर का सारा गणित कांच पर निर्भर रहता था। डोर को नाक के नीचे रगड़कर इस बात का अंदाजा लगाया जाता था कि यह कच्ची है या पक्की। उन दिनों मोहल्ले के मैदान में पतंग के खलीफाओं के बीच मुकाबला होता तब कुछ ढील को बल देते, कुछ खेच को। पेंच होने के बाद किसी एक की पतंग कटना तय थी, मगर जिसकी कट जाती वह हाथ को ऐसे झटका देता मानों टेक्निकल मिस्टेक यहीं से हुई है, वरना क्या मजाल की अगला बरैली की डोर काट जाय।
उस दिन भी संक्रांति पर दो पेंच कुछ ज्यादा ही लंबे खिंच गये, उस चक्कर में सब अपनी-अपनी पतंग उतारकर उन्हें देखने में तल्लीन हो गये। आधे ठाकुर साहब की ओर व आधे रहीम भाई की ओर। जब मामला लंबा खिंचने लगा, तब पेंच देख रहे कपूर साहब भी उत्तेजित हो गये, सुनों यदि डोर कुछ कम पड़ जाये तो , मुझसे ले लेना मगर कहीं से कमजोर मत पड़ना। जो लोग ठाकुर साहब की ओर थे उनमें से एक आगे बढ़कर उनकी मूंछ पर ताव देने लगा, तुम आज बिजी हो, इसलिये मैं ही मूंछ पर ताव दे देता हूँ। सबकी नजरे दोनों पतंग पर टीकी हुई थी और देखते ही देखते पतंग स्पर्धा क्लाईमेक्स पर पहुंच गई। मुझसे देखा न गया तो बाहर आ गया। सड़क पर मुसद्दीलालजी मिल गये। क्यों? आज पतंग नहीं उड़ा रहे हो भैय्या। अब अपन क्या उड़ाये भैय्या मुसद्दी, पतंग तो वहां पार्क में उड़ रही है। लोगों की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे हो रही है। 

चलों वहीं चलते हैं। देखते ही देखते पार्क में विशाल जन-समुदाय एकत्रित हो गया। कोई चाँदभात की तारीफ में लगा था, तो कोई सिर कटे की। इतने में पतंग को गोता लगाते देख एक बीच में बोल उठा ‘‘उस्ताद यह तो खिरनी मांग रही है।’’ अच्छा तो क्या अब इसे उतारकर खिरनी बांधे।
इतने में किसी ने थाने में फोन कर दिया। जरा इधर की स्थिति भी संभालिये थानेदार साहब, भीड़ बढ़ती जा रही है, कहीं भगदड़ हो गई तो लेने के देने पड़ जाऐंगे। वे तुरंत पुलिस के चार जवान लेकर जंग-ए-मैदान में आ गये। थानेदार साहब हवा में डण्डा लहराते हुए बोले ‘‘क्यों बे ये हो क्या रहा है यहाँ? क्या तुम लोगों ने कभी पैच नहीं देखें, और यदि नहीं देखे हो तो हमारे थाने में आ जाओ। ऐसा पंजा लड़वायेंगे कि सारी पतंगबाजी भूल जाओगे। पिछली बार एक पहलवान ने हमें चेलेंज किया था, साले को १५१ में अंदर कर दिया, दो पिछवाड़े पर टिकाए सो अलग। साला प्रशासन को चेलेंज करने चला था। मगर थानेदार साहब हम तो सिर्फ पेंच देख रहे है। देखिए, कितनी टाईट पॉजीशन चल रही है, एकदम सायलेंट मुव्हमेंट है। अच्छा! अब ये पुलिस के सामने भी सायलेंट नहीं रहेंगे तो किसके सामने रहेंगे।
और हाँ, सुनो। यहां से सब सीधे थाने चलोगे। “जेबकटी के सारे मामले वहीं निपटायेंगे “। तभी मुसद्दीलाल हड़बड़ाकर बीच में बोले ‘‘हुजूर आज तो त्यौहार का दिन है। आज तो सबको पेंच देखने की छूट मिलनी ही चाहिए। “शटअप, देखते नहीं, अभी हम ऑन ड्यूटी है “। इस पतंगबाजी के चक्कर में यदि अन्दर हो गये, तो कोई जमानत देने वाला भी नहीं मिलेगा, समझे। और तुम क्या समझते हो, यहां पेच लड़ाये जा रहे है।     

अरे! थानेदार साहब फिर इतने सारे लोग यहां खड़े-खड़े क्या कर रहे है ? हम यही पता करने आये है बच्चू। जानते हो जो यहाँ खड़े है उनमें से कई तो ऐसे हैं, जिन्हें हम सालों से ढूंढ रहे है। अब नजर आये है। यदि पहले मिल जाते, तो कभी का इंक्रीमेंट हो गया होता। और यदि तुम्हें पेच ही देखना है तो, यहां क्या कर रहे हो। दिल्ली के कॉफी हाऊस में जाकर देखों, कई पेंच पांच-पांच साल से फंसे पड़े है, कितने ही पेंच स्टेट गर्वनमेंट ने हायकमान को ट्रांसफर कर दिये हैं। और तुम जबरन यहां खड़े-खड़े समय खराब कर रहे हो। फिर तुम्हें इससे मिलेगा भी क्या।” यदि कल को कोई लंबी ऊंच-नीच हो गई तो सही-सलामत घर तक भी नहीं पहुंच पाओंगे “।
उधर दोनों ही पतंग हवा के अभाव में गोते लगाने लगी। पेंच लड़ाने वाले दोनों सुरमाा समझ चुके थे कि अब किसी भी समय किस्मत का फेसला हो सकता है। लोग दिल थाम कर आकाश की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे, एकाएक जोरदार आवाजें आसमान छूने लगी काटा है…। दोनों पतंग अपनी अपनी डोर से आजाद होकर आसमान की सैर कर रही थी। खुशगवार माहौल में ठाकुर साहब और रहीम चाचा एक-दुसरे के गले लग गये। मैदान में ‘‘अल्लाह हो अकबर, जयश्री राम’’ के नारे गूँजने लगे। चारों ओर खुशी की लहर छा गई। मारे खुशी के मुसद्दीलाल ने भी थानेददार साहब की पीठ पर जमकर धोल जमा दी, और फिर समझ आने पर वे खिसिया कर कोने में दुबक गए ।
अनिल गुप्ता 




‘देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता ‘ हेतु प्रेम कविता-शीर्षक: प्रेम कुटीर

प्रेम कुटीर
————-

हम कम बोलते हैं आपसे
नज़र मिलाते हैं ज्यादा
ज्यादा कोशिश तो करते हैं पर टिक
नहीं पा रहे हैं दिल कमज़ोर है ज्यादा

सोचा रोमियो जैसे पीछे पड़ूं !
मजुनू जैसे दिल कोलकर प्यार करूं!
दिल में तिल टूटने लगे हैं डर रहा हूं
कहीं उनके जैसे इतिहास न बनूं

याद आयी राधा-कृष्ण की जोड़ी, पवित्र
प्रेम-बन्धन से बदल गई समय की घड़ी
स्नेह के नाम पर प्रेम करूं ! या प्रेम के                  नाम पर स्नेह करूं ! बस सोचता ही रहा

दिन बीत गयें साल-साल निकल गयें
खेले आंख-मिचौली कहीं वसंतें
कभी बन्द न होने लगी दिल की खिड़की
बस चलती थी हमारी प्रेम की गाड़ी

आयी प्रेमिका बनकर  प्रेम देवी  सामने
दिन महीने साल निकलें, भगवान जाने
निकले थे अलग-अलग दिशाओं में
बन्दी थे मोह-जीवन से, आज हम स्वतंत्र हैं

आज हम बोलते हैं ज्यादा आपस में
नज़र मिलाते हैं विश्वास से भी ज्यादा
दिल में लड्डू फूटने लगे हैं, डर किसका
प्रेम का वसंत आया पवित्र प्रेम में नहाया

हम न बन पाये लैला मजुनू या न बने
रोमियो जूलियट या सलीम आनरकली
बस पवित्र प्रेम कुटीर में एक हुएं, स्नेह से
प्रेम से इस वृद्धाश्रम में हम स्वतंत्र हुएं ।




अंतरराष्ट्रीय “प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता” हेतु

रचना शीर्षक : “प्रणय निवेदन”

विचलित से हैं भाव मेरे,
तेरे सम्मुख आ जाने आने पर,
फेर सको गर नज़रें तुम,
कुछ शब्द लिखूं पैमाने पर…!

शब्द, शून्य की सीमा पर,
कैसे तारीफ के शब्द लिखूं…?
मुख पर मुस्कान की आभा है,
मैं कैसे भाव अनेक लिखूं…??

मेरे शब्दों के उपर है,
सुंदरता तेरे मन की,
है काव्य तुच्छ मेरा सुन लो,
गर भान करूं तेरे तन की…!

जो अपने मन के भाव कहूं,
ये तिरछे नैन अधीर करें,
मुस्कान तेरे अधरों की तो,
हृदय बेध मन पीर भरें…!

प्रेम भरी आंखों और,
भौहों की भाषा बतला दो…?
अधरों की आधी मुस्कानों का,
ये भेद ज़रा तुम दिखला दो…!

बतला तो दो कैसे मन की,
सुंदरता को तुम प्राप्त किए…?
तन के प्रेमी इस युग में तुम,
कैसे निर्मलता व्याप्त किए…??

ख़ामोशी को ओढ़ भला,
तुम कैसे मुस्कान बिखेर रहे…?
मैं व्यग्र तुम्हें पढ़ पाने को,
क्युं मेरे मन को घेर रहे…??

वास करूं तेरे मन में,
इक स्वप्न मेरा साकार करो,
इस युग ना सही अगले युग में,
तुम प्रणय मेरा स्वीकार करो…!
तुम प्रणय मेरा स्वीकार करो…!!

सादर,
ऋषि देव तिवारी




छेडना था : बस यूँ ही

तुमने  ये गजरे कयूॅ नहीं लगाये,

चंदन सा बदन क्यो नहीं महका,

ये जुलफें वैसे कयूॅ नहीँ बलखाई,

तेरा चितचोर इसलिए नहीं बहका,

ऐ!इत्ती सी बात पर तुम रूठी मुझसे,

छेडना था मुझे बस यूँ ही कह दिया।1।

        तेरी हर अदा पे तो गुलिस्ताॅ कुरबाॅ है,

        हर डाल पर सारे बुलबुल मेहरबाँन है,

         गेसुएॅ लहराती तो ये कहर बरपाती, 

        हम कयूॅ झाँकते फिर अपनी गिरेबाॅ है,

         ऐ! इत्ती सी बात पर तुम रूठी मुझसे,

        छेडना था मुझे  बस यूँ ही  कह दिया ।2।

बरखा की बूंदो से,सिहरता है ये मन,

हरे भरे सावन में, दमकता तेरा दामन,

पानी की फुहार, जब छेडते तेरा बदन,

हवा के बहाव में बहके तब मेरा कदम,

ऐ! इत्ती सी बात पर तुम रूठी मुझसे,

छेडना था मुझे, बस यूँ ही  कह दिया ।3।

 




पुस्तक

 

कोने में ,जर्जर सी अकेली खड़ी है,
साथियों के साथ एक रैक में पड़ी है।
अपने सारे पन्नों को समेटे,
ऊपर गंदा सा आवरण लपेटे।

थोड़ी बदहवास सी पुरानी लगती है,
किसी की आपबीती कहानी लगती है।
खुद की मौत को दे रही दस्तक है,
ये लाइब्रेरी में पड़ी एक पुस्तक है।

तकनीकी के चलते लोगों ने,
पुस्तकों को पढ़ना छोड़ दिया।
मोबाइल से जोड़कर अपना नाता,
इन से क्यों मुंह मोड़ लिया?

एक समय था वह हर मेज पर,
पड़ी भाग्य को इठलाती थी।
अपने अंदर ज्ञान समेटे,
वो विद्या दीप जलाती थी।

एक समय सखियों के साथ,
लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाती थी।
छोटे बड़े बच्चे बूढ़ों को,
नई कहानियां सुनाती थी।

बदली समय की ऐसी धारा,
घट गया पुस्तक का मोल।
खुद को अकेले में कोस रही
जो थी कि कभी अनमोल।