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क्यों पढ़े संस्कृत हम

देशभक्ति काव्य – लेखन प्रतियोगिता

क्यों पढ़े संस्कृत हम

ज्ञान की यह खान
संस्कृति की पहचान
भाषाओं की जननी
देवभाषा है महान।
गागर में सागर समाहित
सदियों से यह आदृत।
वेद ऋचाएँ गंगा – सी
श्लोकों में धारा अमृत की।
यह मनीषियों की तपस्या
आज है कंप्यूटर की भाषा।
श्रवण से स्मरण-शक्ति बढ़ती
वाचन से जिह्वा है टूटती।
शिक्षा के हर क्षेत्र में अब्बल,
जीवन पथ का सक्षम सम्बल।
दुश्मनों की चोट सहती आई
आओ करें चोटों की भरपाई
संतानों को जागरूक करें
जीवन दायिनी संस्कृत भरें।

मौलिक और अप्रकाशित

गणेश चंद्र शाह

असिस्टेंट प्रोफेसर
रामलखन सिंह यादव कॉलेज
बेतिया , बिहार




प्रेम- काव्य लेखन प्रतियोगिता

जमी’ पे तारे जो झिलमिलाए
कहो तो कैसी ये बात होगी ,               
मेरे महल में  जो चाँद उतरे               
कहो तो कैसी  वो रात होगी। 
 
ये मस्त  खुशबू, ये  भौर    गुंजन 
तनुक-सी फुनगी पे फूल -स्पन्दन
प्रभात    बेला,     पुनीत    वंदन
तेरे नयन  का  थिरकता  खंजन
मेरे   हृदय  में   उतर  जो   जाए
कहो  तो  कैसी  ये  बात  होगी । जमी-पे—
 
स्वच्छंद   वीणा  के  तार  बोले
जो कोई  मुक्ति  के द्वार  खोले
मधुर-सा सपना नयन में  डोले
कोई जो प्राणों  में रस को घोले
जो प्रीति-कलिका हृदय खिलाए
कहो  तो  कैसी  ये  बात   होगी  ।जमी  पे—
 
अनंत आकाश का  नील रंजन
तेरे  प्रणय  का  ये  गाढ़  बंधन 
थिरक उठे क्यों  ना मोर बन मन
न क्योँ लगे सिकता स्वर्ण का कण
जो   रस   में   मेरा  हृदय  नहाए 
कहो  तो  कैसी  ये   बात   होगी   ।जमी पे–



प्रेम -काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु

मन महकने लगा, तन बहकने लगा
कर दिया कोई जादू तेरे नाम ने, 
बंद सी आँख मेरी ये कहने लगी, 
तु जरूर आ गई है मेरे सामने। 
 
अब तलक कोई प्राणों में आई ना थी, 
कोई खुशबू रगों में समायी ना थी, 
मन की वीणा पर अंगुली चलाई ना थी, 
प्यार की कोंपले सुगबुगाई न थी, 
तूने पुलका दिया मन के चुप तार को, 
किस यवनिका से आकर मेरे सामने। मन…….. 
 
तेरी पायल की छम- छम बसी प्राण में, 
गर्म साँसों की सीं- सीं सटी कान में
तेरे अलकों की भीनी महक घ्राण में, 
जैसे सद्भाव निखरे हों इंसान में, 
खिल उठा मन- कमल प्राण- सर में विकल
पा तेरी पूर्ण आनन- विभा सामने। मन…. 
 
यों लगा सारा संसार सोने लगा, 
तेरे पदचाप- तालों में खोने लगा, 
फूल के गाल पर ओस सोने लगी, 
चाँद जग को किरण से भिगोने लगा, 
यह कोई स्वप्न था याकि तेरा असर, 
मुझको उल्झा दिया इसी अंजाम में। मन…. 
          –डॉ. अमरकांत कुमर



हिन्दी : भारत का अभिमान

हिन्दी : भारत का अभिमान

ध्वज हिंदी का चूमता आसमान है

अजय हिंदी यह भाषा महान है,

पाणिनी की  संस्कृत जन्मदात्री,

पाली प्राकृत अपभ्रंश सखी समान है,

देवनागरी लिपि ,शब्दों का वरदान है।

हम हिंद हिंदी की संतान है,

नवजागृत भोर सी हिंदी, हर और प्रकाशमान है।

कमल, सरोज, पंकज, नीरज, जलज,

रवि, दिनकर, आदित्य ,सूर्य, भानु, प्रभाकर,

एक शब्द के कई उपनाम है।

” हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फारसी क्या, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद,अपने मुंह मियां मिट्ठू, नाच ना जाने आंगन टेढ़ा। “

हिंदी मुहावरों में भी बलवान है ,

भारत की पावन भूमि में हिंदी मजबूत वृक्ष समान है।

साहित्य के कोरे कागज पर हिंदी कलम के अंकित अद्भुत निशान है ।

प्रेमचंद्र का निर्णय इसमें, जयशंकर के चंद्रगुप्त बलवान है, महादेवी की नायिका सर्वशक्तिमान है।

हरिवंश की मधुशाला ,  गोस्वामी के राम भी इसमें विद्यमान है।

चहुँ दिशाओं में फैली हिंदी,

मातृत्व में हिंदी, हिंदी जन उल्लास है 

काली, रणचंडी, हिंदी शंखनाद है ।

शीश नवाकर मेरा हिंदी को प्रणाम है ।

 

हिन्दी दिवस के लिए मेरी रचना। यह मेरी मौलिक रचना है। 




महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता

  • नारी जग की तारिणी

    नारी जग की तारिणी, नारी जग आधार।
    नारी जग की शक्ति है, नारी से संसार।।1।।

    नारी से ही है सुता, नारी से ही मात।
    नारी बहना रूप है, श्रद्धा की सौगात।।2।।

    नारी सम शोभा नहीं, नारी सम नहिँ छाँव।
    नारी सम दौलत नहीं, नारी सम नहिँ ठाँव।।3।।

    यदि पतंग परिवार है, नारी उसकी डोर।
    टूट गई तो है पतन, वरना उन्नति ओर।।4।।

    नारी रहती है सदा, बड़ी गुणी गम्भीर।
    दुख हो कितना ही भले, होती नहीं अधीर।।5।।

    डॉ जोगेन्द्र कुमार
    एसोसिएट प्रोफेसर
    बी एल जे एस कॉलेज
    तोशाम(भिवानी)
    हरियाणा




महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता

नारी

नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।
ईश्वर की ये अनुपम रचना,
मानव जीवन का वरदान।।

अस्तित्व नहीं था लहरों का,
जलधि यदि नहीं होता आज।
शक्ति भक्ति जगत की जननी,
बिन नारी न होता समाज।।
नारी है अस्तित्व हमारा,
उसका खूब करो गुणगान।
नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।।

सागर सी गम्भीर रहे ये,
पर्वत सी रहती ये धीर।
आसमान सा आँचल इनका,
बहे नैनों में नदी नीर।।
इनको फिर जो अबला कहते,
करते वह नारी अपमान
नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।।

जन्म सुवीरों को जो देती,
कैसे कहें उसे कमजोर।
त्याग करुणा और ममता की,
सच में नारी पक्की डोर।।
भूखी प्यासी रहकर खुद ये,
रहे परिवार पर कुर्बान।
नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।।

मानते परिवार पतंग हम,
नारी उसकी डोर स्वरूप।
नारी शोभा और सहारा,
नारी ही है छाया धूप।।
जल में थल में नभ में घर में,
बना रही नारी पहचान।
नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।।

नारी धन है जीवन नारी,
नारी लक्ष्मी कुल का मान।
माता पत्नी बेटी बहना,
बिन इनके जीवन सुनसान।।
वैदिक ऋचा ये कृष्ण गीता,
ममता की है अनुपम खान।
नारी का सम्मान करो रे,
करो नहीं उसका अपमान।।

-डॉ. जोगेन्द्र कुमार-
एसोसिएट प्रोफेसर
बी एल जे एस कॉलेज
तोशाम (भिवानी)
हरियाणा
Mob. 9466234509




महिला दिवस-2021,काव्य प्रतियोगिता हेतु प्रेषित मेरी प्रविष्टि(कविता)

स्वरचित कविता (महिला काव्य प्रतियोगिता हेतु प्रेषित  प्रविष्टि)

शीर्षक-“जाग रहीआधीआबादी”

जाग रहीआधीआबादी,दु:ख छिपकर अब सोता है।

देश मेरा गर्वित है इनपर,सुख-स्वप्नों में खोता है ।।

दिन चमकीले,रात सुहानी,घर-घर गूंजे यही कहानी।

कहीं राष्ट्रप्रेम की ठानी,कहीं बनी घर की पटरानी।।

सीमा पर तैनात गरजती,दुश्मन हरदम रोता है।

बेटी है वरदान नियति का,नेह का मेह भिगोता है।।

जाग रही…

सेवा,ममता,उल्फत,साहस,हर इक क्षेत्र में रम जाती है। 

मां,बहना,प्रियतमा सभी रूपों में झटपट ढल जाती है।।

पालक,चालक,नर्स,चिकित्सक, नेता,कलमकार,संरक्षक। 

कर्मक्षेत्र की कलाकार यह,आंखों में भरपूर चमक।।

तन किसान मानस-वसुधा पर बीज हर्ष के बोता है।

पारिजात से खिल जाते,सांसों में सुरभि समोता है।।

जाग रही…

प्राची में है रवि किरण सी,उगती आशाओं का पूर।

चटक चांदनी चमकाती सी,मुख पर ले चंदा का नूर।।

बरछी,भाले कटि पर बांधे,अरि पर करती वार।

काम चले ना गर शस्त्रों से, कलम बने तलवार।।

‘बिन घरनी घर भूत का डेरा’ कहकर ये जग रोता है।

जो देवी का दर्द बढ़ाए ,पाप की गठरी ढोता है।।

जाग रही…

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स्वरचित, मौलिक,सर्वथा अप्रकाशित एवं अप्रसारित कविता-

कवयित्री-डा. अंजु लता सिंह, नई दिल्ली 

 

 

 

 

 




महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु , “स्त्री जीवन का सफर”

“स्त्री जीवन का सफर”

पलकों के झपकने में

जितना वक्त लगता है

उतना ही वक्त लगता है

एक स्त्री की जिंदगी को

मौत तक पहुँचने में

देखिए जरा

उसकी हत्या 

कितनी बार होती है? 

और कहाँ कहाँ से? 

एक स्त्री जब माँ के गर्भ में पलती है

तकनीक उसकी जाँच करती है

गर्भ में पल रही बेटी के नाम पर

माँ फिर से मौत के दरवाजे देखती है

लड़ती है अपनी बेटी के लिए

घर परिवार से

समाज से

फिर हार जाती है

और उसके गर्भ में पल रही बेटी 

मार दी जाती है

यहाँ स्त्री एक बार फिर से

काल के गोंद में चली जाती है

पैदा हुयी स्त्री

जब अपने नवयौवन तक पहुँचती है

समाज की नजरों में

एक बार फिर से मर जाती है

उनके कटार जैसे शब्दों से कटती है

अपनी इज्जत बचाती है

और अपने आपमें एक स्त्री

फिर से मर जाती है

पिता और भ्राता की अंकुश को तोड़कर

अपने दायरे से बाहर

जब निकलती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

प्रेम की गहराई में

जब डूबती है स्त्री

अपने प्रेमी को जाहिर

करती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

उसके अन्तर्मन को जाने बिना

एक मन्त्र के माध्यम से

पराये के घर में फेंकी जाती है स्त्री

तो एक बार फिर से मर जाती है

उस पति के इशारे पर नाचती स्त्री

आवाज उठाती है अगर

विरोध करती है स्त्री 

तो समाज की नजर में

एक बार फिर से मर जाती है

और किसी कारण बस

पति की मौत हो जाए 

तो मृत पति के चिता पर

जलायी जाती है स्त्री

वहाँ एक बार फिर से मर जाती है

विधवा स्त्री अगर जिंदा है

तो समाज के हर कोने -कोने में 

उसकी शून्यता बरकरार है

स्त्री होकर भी वो मर गयी है

अपने अस्तित्व को खोकर रह गयी है

स्त्री के नाम पर

उसके सफर की घड़ी

यहीं आकर रूक गयी है |

 

  के.एम.रेनू

  शोधार्थी

 हिंदी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

 

 

 




चलती नहीं हैं

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हो जहाँ मरुथल वहाँ कश्तियाँ चलती नहीं हैं ।
हों अपाहिज अश्व तो बग्गियाँ बढ़ती नहीं हैं ।।
देख ले करके जतन स्वार्थ की इस जिन्दगी में ,
हो भरी यदि रेत कर में मुठ्ठियाँ बँधती नहीं हैं ।।
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बिन पवन पानी सुनों पत्तियाँ खिलती नहीं हैं ।
द्वार पर आये बिना कुण्डियाँ बजती नहीं हैं ।।
तुम हथेली पर अरे सरसों उगाना चाहते हो ,
हो उजाला सूर्य का तो बत्तियाँ जलती नहीं हैं ।।
**********************************
हाथ को सीधे किये बिन उँगलियाँ तनती नहीं हैं ।
बिना सूत कपास कभी तकलियाँ चलती नहीं हैं ।।
इन शिराओं का सुनों रक्त दूषित मत करो तुम ,
रक्त यदि मौजूद न हो धमनियाँ चलती नहीं हैं ।।
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डाँ आदेश कुमार गुप्ता पंकज




देशभक्त मां

अंतर्राष्ट्रीय देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु प्रस्तुत रचना

देशभक्त मां
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छाती से आंचल लिपटाकर घूमूं सारे गांव रे।
एक दिन आयेगा लाल मेरा मैं बैठी अपनी ठांव रे।
रोज सबेरे सूरज आकर, मेरा मन बहलाता है ।
चांद चंदनिया के संग आकर थपकी देकर जाता है।
धरा भी ऊपर उठ-उठ कर,ममत्व मेरा सहलाती है,
अंबर नीचे आकर के धीरज मुझे दिलाता है।
आंखें मेरी पथरा गई अब अश्रु नहीं बहाती हैं ।
सूख के अश्रु धारा पथ तेरा बन जाती है।
मेरी मुंडेर पे रोज बोलता कागा कांव-कांव रे।
एक दिन आयेगा लाल मेरा मै बैठी अपनी ठांव रे।

छाती से आंचल….

परवा नहीं करना तुम युद्ध भूमि मे ज़ख्मों की।
मन मे बस संकल्पित रखना मातृभूमि की कसमों की।
तूफानों को काट देना, लड़ना गरम हवाओं से,
भिड़ जाना तुम हत्यारे आतकीं आकाओं से।
ज़ख्म हैं बेटे गहने तेरे, हँस के तुम धारण करना।
हर एक ज़ख्म पे जय-जय-जय हिंद,जय मेरा भारत करना।
आओगे मै चूम भी तेरे घायल पांव रे।
एक दिन आयेगा लाल मेरा मैं बैठी अपनी ठांव रे।

छाती से आंचल…

दुश्मन जब सिर पर आ जाये, शेरों सा भिड़ जाना तुम।
गीदड़ो के झुंड को औकात याद दिलाना तुम।
कहना तन मे खून हिंद का, दूध है भारत मैया का।
सच्चाई मे गांधी हूं और सीना भगतसिंह भैया का।
मार-काट मच जाये अगर तो इंच-इंच तुम कट जाना,
पर सौगंध हैं, दूध की मेरे इंच नहीं पीछे आना।
कफन तिरंगे का लिपटा हो, तिलक तेरा सिदूंरी हो,
वो भी मैं अपना लूंगी ,गर पीछे मुड़ने की मजबूरी हो।
गर्वित हो मैं कर दूंगी अपने आंचल की छांव रे।
एक दिन आयेगा लाल मेरा मै बैठी अपनी ठांव रे।

छाती से आंचल लिपटाकर घूमूं सारे गांव रे।
एक दिन आयेगा लाल मेरा मैं बैठी अपनी ठांव रे।

स्वरचित रचना-
रागिनी मित्तल
पूरा डाक पता: सरस्वती स्कूल के पास, जगमोहनदास वार्ड, नई बस्ती, कटनी, म.प्र. – 483501
ईमेल पता: [email protected]

मोबाइल नंबर: 8989728770
व्हाट्सएप नंबर: 8989728770