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“देशभक्ति काव्य प्रतियोगिता” हेतु

“देशभक्ति काव्य प्रतियोगिता” हेतु

देश का बेटा

गैरों ने तो लूटा था, अपनों ने भी लूटा।
मॉं से बिछड़े थे जो बच्चे, उन्होंने ही लूटा।
ऐसे भी बच्चे थे मॉं के, अपने ही घर को लूटा।

आया जब एक बेटा मॉं का, सब को उसने संभाला।
खिल उठा वो खुद ‘कमल’ सा,
मॉं की गोद को बाग सा बनाया।

अब ना आएगी कभी पतझड़,
बहार उसने जो खिलाई।
हरी-भरी कर दी धरती को,
मॉं का भी आंचल लहराया।

बेटा मॉं का लाडला वो ‘मोदी’ कहलाया।

रचनाकार का नाम: रंजना सोलंकी भगत’रोशनी’
पदनाम: लेखक
पता :सी.503/राधे किशन रेसिडेंसी,कर्नावती मोल,वस्त्राल, ओढव, अमदावाद ३८२४३०.
गुजरात, भारत।
Mo.9727335811
Email id [email protected]




“प्रेम काव्य – लेखन प्रतियोगिता” हेतु

“प्रेम काव्य – लेखन प्रतियोगिता” हेतु

हमको भूला न पाओगे

क्या भूल गए हमें?
दिवाली के दीयों की रोशनी में हम है,
उड़ती पतंग के साथ उड़नेवाली हवा में हम है,
होली के लाल – गुलाबी रंगों में हम है,
कैसे भूलोगे हमें!
सूरज की पहली किरण हम है,
चांद की चांदनी में हम है,
ढलती शाम की रंगत में हम है,
कैसे भूलोगे हमें!
शर्दीओ की कड़कती ठंड में हम है,
ग्रीष्म की तपती धूप में हम है,
बारिश की रिमझिम बूंदों में हम है,
कैसे भूलोगे हमें!
पंछी के गानों में हम है,
तितली की उड़ानों में हम है,
नदी के बहाव में हम है,
कैसे भूलोगे हमें!
तुम्हारे ग़म और खुशी में हम है,
तुम्हारे आंसू और मुस्कान में हम है,
बाहें फैला के तो देखो,
तुम्हारी आगोश में हम है,
क्या अब भी भूला पाओगे हमें?

‌रचनाकार का नाम: रंजना सोलंकी भगत’रोशनी’
पदनाम: लेखक
पता :सी.503/राधे किशन रेसिडेंसी,कर्नावती मोल,वस्त्राल, ओढव, अमदावाद ३८२४३०.
गुजरात, भारत।
Mo.9727335811
Email id [email protected]




अंतरराष्ट्रीय प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु कविता

 कविता क्रमांक 1

 शीर्षक- चाहत

न वादे न कशमें न रस्मे बड़ी है|

ना चाहत है ,छोटी ना मोहब्बत बड़ी है|

हो तुम हमारे ,है हम भी तुम्हारे,

बस दिल से दिल की ये मंशा बड़ी है|

हां होगी ,शिकायत तुम्हें हमसे लेकिन, 

शिकायत से हरदम ये चाहत बड़ी है|

है नाता, ये दिल का लगी ये बड़ी है|

तुम्हारे सिवा कुछ ना आता नजर है|

समर्पित भी है , प्रेम परिपक्व भी है|

ना समझो अगर तुम, तुम्हारी कमी है|

बड़ी बेफिक्र सी है, चाहत तुम्हारी

मगर ये ही चाहत ,तो मेरी कमी है

तुम्हें चाहना बस ,तुम्हें चाहना ही

ये निर्विकल्प चाहत ,सभी से बड़ी है

समुंदर हो तुम ,एक छोटी नदी में

तुम्ही मैं समाना ,यही जानती हूं |

तुम्हारी हूं लेकिन, तुम्हें मांगती है|

                    रचना स्वरचित मौलिक

 कविता क्रमांक 2

 शीर्षक- परिपक्व प्रेम

हां ,कलयुग में भी होता है, 

सतयुग सा  प्रेम|

जो सिर्फ आकर्षण तक सीमित नहीं रहता|

जिसमें आकर्षण से कहीं अधिकता, 

समर्पण की होती है|

जिसमें पाना मायने नहीं रखता

जिसमें प्रेम  को जिया जाता है|

प्रेम में कभी राधा कभी मीरा

तो कभी रुकमणी सा जीवन जिया जाता है|

इस तरह का प्रेम दायरों को, 

लांघना नहीं जानता

दायरों में बंधना जानता है|

खुद से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है

साथी जिसके लिए समर्पण दिया जाता है|

ऐसा प्रेम अभिव्यक्त कम ही होता है|

मौन होकर भी ,व्यक्त बहुत होता है|

यह प्रेम परिपक्व बहुत होता है|

          रचना स्वरचित मौलिक

 नाम- वंदना जैन

पदनाम- प्रोपराइटर आफ मार्बल शॉप

 संगठन- ब्राह्मी सुंदरी संभाग ज्ञान इकाई महिला मंडल ललितपुर उत्तर प्रदेश

 पता-श्री जितेंद्र कुमार जैन बंदना मार्बल डैम रोड ललितपुर उत्तर प्रदेश

ईमेल पता[email protected]

 मोबाइल नंबर-9696690848

व्हाट्सएप नंबर-9616475366

 




प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु कविता–शीर्षक=”वज़ूद “

कविता

“वज़ूद “

न होते हुए भी

तुम्हारा वज़ूद 

घेरे रहता है जैसे

चंद्रमा को वलय

घंटों चलता है

मौन सन्लाप तुमसे

निकल जाती हूं

बहुत दूर तुम्हारे साथ

किसी पहाड़ी के

नीचे खेत में

सुनती हूं

पसंदीदा गीत

जो गुनगुनाए थे

कानों में मेरे

सामने शीशे से

तुम्हीं देखते हो

मेरी चुस्त पोशाक

‘बड़ी सुंदर हो तुम’

कानों में फुसफुसााते हो 

जिंदा रहते हुए जन्नत

दिखाते हो तुम

अब यह तुम हो या हम

कहना है मुश्किल क्योंकि

तुम्हारा वज़ूद  हमारे वज़ूद  

में घुल सा गया है!!!!!!

 

नाम=डॉ॰रश्मि चौधरी 

पदनाम =व्याख्याता

संगठन=शा0के0आर0जी0कॉलेज,ग्वालियर 

डाक पता=60/1121 यमुनानगर (दर्पण काॅलोनी के पास)थाटीपुर ग्वालियर मध्यप्रदेश,भारत। पिन =474011

ईमेल = [email protected] 

मोबाइल नं0=9039032695

वाट्सअप नं0=9039032695

 

 




देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

कविता

(1)”प्रेम की गहराई”

यदि दिल की गहराइयों से

प्यार करते हो मुझसे

तो सोते फूटेंगे ज़रूर

उन्हीं गहराइयों से बहेगा

झरना झर-झर,कल-कल

हर एक जलकण से

जन्मेगा प्रेम मोती

खिल उठेगी सीप मुंह बाए

सागर की गहराई में

होता है अन्त जहां

प्रेमी युगल विश्राम करते हैं

बातें दो-चार करते हैं

पर प्रेम की गहराई

होती है अनंत !!!!!

(2) “वज़ूद”

न होते हुए भी तुम्हारा वज़ूद 

घेरे रहता है मुझे

जैसे चंद्रमा को वलय

घंटों चलता है

मौन सन्लाप तुमसे

निकल जाती हूं

बहुत दूर तुम्हारे साथ

किसी पहाड़ी के नीचे खेत में

सुनती हूं पसंदीदा गीत

जो गुनगुनाए थे कानों में

सामने शीशे से तुम ही

देखते हो मेरी चुस्त पोशाक

‘बड़ी सुंदर हो तुम’

कानों में फुसफुसाते हो

जिंदा रहते हुए

जन्नत दिखाते हो तुम 

अब यह तुम हो या हम

कहना है मुश्किल क्योंकि

तुम्हारा वज़ूद हमारे वज़द में

थोड़ा घुल सा गया है!!!!!




नीलम जैन की कविता “गुरू”

करुणा का भंडार गुरु
सुखों का आधार गुरु
ज्ञान का विस्तार गुरु
तेरी महिमा अपार गुरु

जीवन के उद्धारक गुरु
ज्ञान के प्रसारक गुरु
अंधकार के विनाशक गुरु
आदर्शों के विचारक गुरु

देते मृदुवाणी मुस्कान गुरु
बनाते नींव पर मकान गुरु
भरकर स्नेह ,ममता से
भरते प्रेम का भंडार गुरु

देते सपनों को आकार गुरु
हौसलों में भर देते उड़ान गुरु
पहुँचा कर हमें मजिलों तक
नहीं माँगते हमसे सम्मान गुरू

नीलम जैन
प्र.वि. रजवारा, ब्लाक -बिरधा
ललितपुर




प्रेम काव्य प्रतियोगिता में शामिल करने हेतु ।।

        “अधखुली आंखों वाली”

सुनिए..
जीवन दर्शन में
रिश्तों के अहमियत पर
क्या ख्याल है आपका..
क्या सच में..
एक स्नेह पूर्ण जीवन जीने के लिए
रिश्तों के विभिन्न आयामों के
उपर गहन विमर्शोंपरांत ही 
इस डोर में बंधा या बांधा जाता है
नहीं..
कभी – कभी तो मूक संबंध भी
एक ठोस रिश्ता में परिवर्तित हो जाता है
और वक्त के साथ वो रूहानी हो जाता है
नैसर्गिक रूप से प्रस्फुटित रिश्ता 
ज्यादा प्रबल होता है
जहां दैहिक आकर्षण गौण हो जाता है
देखिए..
मुझे रिश्तों को नाम के दायरे में 
समेटने में घबराहट होती है
क्योंकि अक्सर देखा है इसे
टुटते हुए, बिखरते हुए या बदलते हुए
माना कि मैनें आपको
स्वामी के रूप में स्वीकार किया है 
और यह नश्वर देह समर्पित है 
पर सुनिए.. 
संबंध दर्शन के परिधि से निकल कर
मुझे सिर्फ असीम निश्छल प्रेम चाहिए 
जो पल्लवित – पुष्पित होता रहे 
इस धरा पर यूं हीं चिर काल तक..
बड़ी ही सहजता से समझा गई
प्रेम दर्शन में स्पर्श, स्पंदन और समर्पण  
वो अधखुली आंखों वाली लड़की ।।

  • डॉ. अजय कुमार

 

 

 

 




गणतन्त्र दिवस है आज भारत में

                                       शीर्षक – ‘गणतन्त्र दिवस है आज भारत में’

          गणतन्त्र दिवस है आज भारत में, राष्ट्र ध्वज का  सब करें सम्मान।

          हम  भारतीय  पूत भारती के,  यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

  1. विविध भाषी इस देश की जनता  पर परस्पर रहे सब में एकता।

            हिन्दु, मुश्लिम, सिख, ईसाई सब भाई न कभी  परस्पर भेद था।

            वैभव कीर्ति अटल, विश्व पटल पर भारत, का गोरा इसकी गाथा सुना था।

            गुरुद्वारा, चर्च, मन्दिर, मस्जिद के आगे,  सदा सबका शीश झुका था।

            गीता कुरान हो या बाइबिल सबने, उपदेशों को इनके हसकर  सुना था।

            पुण्यभूमि है ये ऋषिमुनयों की जहाँ राम-कृष्ण हुए जन-जन के भगवान।

             गणतन्त्र दिवस है आज भारत में…… यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

  1. ज्ञान का सागर देश हमारा, विज्ञान अध्यात्म की ये है खान।

           रामानुज, धनमन्तरी, चरक कलाम, इन सबका होता यहाँ यशो गान।

           गंगा, कावेरी, गोदा का कल-कल जल, नित देश प्रेम की छेडे तान।

           शंकरमठ है यहाँ ज्ञान के मन्दिर, हरते सदियों से सबका अज्ञान।

           धरणी ओढ़े हरित-फरित चुनरिया, पीली सरसों बढाए वसन्त की शान।

           गणतन्त्र दिवस है आज भारत में…… यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

  1. संविधान ने दिया यहाँ पर, जन-जन को  जीवन जीने का अधिकार।

          ऊच-नीच का भेद मिट गया,  सबको खुला है यहाँ शिक्षा द्वार।

         बस राम राज्य हो यहाँ गान्धी का, चहुँ दिश प्रजातन्त्र की वहे ब्यार।

         ज्ञान, परिश्रम, मानवधर्म, यहाँ हो सबके जीवन का  आधार।

        देश प्रेम के बलिदान की खातिर, सदा रहे हर भारतीय  तैय्यार।

        राष्ट्र सेवा और मानव सेवा, हो जन नायक  की  यही  पहिचान।

        गणतन्त्र दिवस है आज भारत में…… यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

    4. राम-कृष्ण प्रसूता ये भूमि, बुद्ध,महावीर,नानक, की है तपस्थली।

        कर्म क्षेत्र सुभाष आजाद, भगत का गान्धी विवेकानन्द की उपदेशस्थली।

        उदित है सूरज यहाँ ज्ञान विज्ञान का, जिसकी किरणों से है दुनिया उजली।

        मन्त्री हो या कोई अफसर,  जनता जनार्दन है सबसे शक्तिशाली।

       देश का नायक यहाँ जन सेवक है छोड के अपना स्वार्थ, अभिमान।

        गणतन्त्र दिवस है आज भारत में…… यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

  1. केसरी कश्मीर ललाट भारती का, धडकता दिल है दिल्ली लाल किला राजधानी।

        गुजरात, मालवा,बुंदेलखण्ड, पंजाब सितारे, जिन से चम-चम चमके  चूरनधानी।

        पग धोता अरब सागर इसका, दामन निर्मल करता पावन गंगा का अमृत पानी।

       स्वर्ग से सुन्दर इस देश की खातिर, मिटा दिए अनगिन वीर  हसते हसते अपनी जबानी।

       हमें मान है ऐसे भारत पर, जिसकी गाथा गाए विश्व के जन-जन अपनी जुबानी।

       राम-कृष्ण के हम वंशज ‘कमल’ जो  दे गए भारत को विश्वगुरु  की पहिचान।

       गणतन्त्र दिवस है आज भारत में…… यहाँ प्रजातन्त्र है इस देश की शान।।

 

 

                                                                                                                   डां. नन्द किशोर नामदेव ‘कमल’

                                                                                                                     (Associate Professor )

                                                                                                                        भारतीय भाषा विभाग

                                                                                       महर्षि महेश योगी वैदिक विश्व विद्यालय

                                                                                                करोंदी परिसर कटनी म.प्र.-483332

                                                                                                  मो.8827167620,

e-mail- [email protected]

 

।। सभी सम्मानीय सदस्यों को गणतन्त्र दिवस की  अग्रिम शुभकामनाओं सहित।।

।। जय हिन्द, जय भारत।।




महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु…रचना शीर्षक ” बेटी “

बेटी…!!!

बेटे की चाह में देखो तो,
कैसे बेटी वो छोड़ गए,
मुख मयंक आभा से कैसे,
वो क्रूर हृदय मुख मोड़ गए…!

हरि इच्छा के जो है अधीन,
वो भी तुमको स्वीकार नहीं,
क्यूं कोख दिया फिर बेटी को,
जब थी वो अंगीकार नहीं…!

परित्यक्त भाव से पुरित हो,
तुमने बेटी का त्याग किया,
निज जननी को भी भूल गए,
हा धिक…! कैसा दुष्पाप किया…!

इक मां ने तुझको जन्म दिया,
इक मां को ही तुम त्याग रहे,
जिस श्वास वायु से जीवित रहे,
उस वायु से ही तुम भाग रहे…!

करके अनाथ उस बेटी को,
बेटे की चाह में रोते हो,
चित्कार रुदन सुनते सुनते,
कैसे भर नींद तुम सोते हो…!

पशुवत सा व्यवहार लिए,
तुम मानव रूप में जन्म लिए,
हो विवेक से हीन मूर्ख,
कैसे कैसे ये अधर्म किए…!

अब बेटी की रक्षा को तुम,
हे ईश्वर…! इक संधान करो,
जिनको स्त्रीत्व का बोध नहीं,
हे ईश्वर…! निः संतान करो…!!

सादर🙏😊




प्रेमकाव्य लेखन प्रतियोगिता , “तलाश”

“तलाश”

वे वक्त के साथ

अपने आपको बदल लेते हैं |

हम उनके भीतर

झाँकते है |

निहारते हैं

उनकी परछाईयों को |

उनके प्रेम

कभी दिखते नहीं |

हमें खोजते-खोजते

और कितने वक्त 

गुजर जाते हैं |

उनकी सादगी और

मायुशी को पढ़ने की

कोशिश करते हैं |

फिर 

खो जाते हैं

उनके चेहरे पर 

खींची लकीरों में |

शब्दों को पहचान पाना |

और उनके प्रेम की

थाह लगाना |

मेरे लिए 

सागर में 

डूबने जैसा है |

जहाँ तैरना नहीं आता 

मेरे और अथाह सागर के बीच

सिर्फ गहराईयाँ ही रह जाती हैं |

वहाँ हमें कोई दूसरा

बचाना नहीं आता |

हम तलाशते

अपने प्रेम को

जिससे जीवन हमें

सजाना नहीं आता |

भटकते रहे

तलाश करते रहे

राहों पर कई काँटे चुभते रहे

जिस काँटे को हमें 

खुद निकालना नहीं आता |

और प्रेम उसी बीच में

उलझकर रह जाता है

फूल और काँटों की तरह |

जिससे कभी हमें  

सुलझना नहीं आता |

 

  के.एम.रेनू

  शोधार्थी

 हिंदी विभाग

 दिल्ली विश्वविद्यालय