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महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता शीर्षक मां दिनांक 2 जनवरी 2021

मां,,,,,

1,,,

मां चंदा की चांदनी ,मां सूरज की धूप।।

वक़्त पड़े ज्वालामुखी ,वक्त़ पड़े जल रूप।।

2,,,,

सरिता मां की नम्रता, इसमें इतना प्यार।।

जीवन भर टूटे नहीं, जिसकी अविरल धार।।

3,,,,

मां शाला मां है गुरू, मां जीवन आधार।।

पौधा मां के प्यार में, वृक्ष बने छतनार।।

4,,,,

मां मीरा की पीर है,मां कबीर का सत्य।।

मां ईश्वर की प्रार्थना, तुलसी का साहित्य।।

5,,,

मां गीता का सार है, मां है वेद पुरान।।

मां है पावन बाइबिल,मां में हर ईमान।।

6,,,,,

मां में तीरथ धाम सब, मां अटूट विश्वास।।

मां के चरणों में हुआ,जन्नत का आभास।।

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बृंदावन राय सरल सागर एमपी

मोबाइल 7869218525

12/1/2021

 

 

 




देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

“देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता” हेतु

 

साष्टांग नमन तुमको करती,

शत बार नमन तुमको करती।

मिट्टी से इसकी तिलक करूं,

मैं देश नमन तुमको करती ।।

        माथे का मुकुट हिमालय है,

        सागर पद प्रक्षालन करता,

        जीवन अमृत नदियां इसकी,

        गंगा कल कल छल छल बहती।। 

                          मै देश नमन तुमको करती ….

यह वीर प्रसूता धरती है,

वीरों को जन्मा करती है,

राणा का रक्त शिराओं में,

अरिदल पर विद्युत बन गिरती ।।

                         मै देश नमन तुमको करती….

शक हूण मिटे इस धरती से,

गोरी गजनी भी धूल मिले,

पश्चिमी सुनामी लौट गई,

पूंजीपति बर्बरता मिटती ।।

                       मै देश नमन तुमको करती….

घोर निशा अब बीत चली है,

नवल ज्योति अब फूट चली है,

किरणों के कर खोले कपाट,

अब मुक्त हुई अपनी धरती ।।

                        मै देश नमन तुमको करती….

चिर पावन नूतन बीज लिए,

मनु नौका प्लावन पार हुई,

हम विजय गीत गाते बढ़ते,

यह रैन अंधेरी है मिटती ।।

                        मै देश नमन तुमको करती …

                        

   पूर्णतः स्वरचित मौलिक                     

गीता सिंह “शंभु सुता”

व्यवसाय..गृहणी




हिन्दी हमारी शान

हिन्दी हमारी आन है
हिन्दी हमारी शान
हिन्दी से बना हिन्द हमारा
हिन्दी से जिंदा है हिन्दुस्तान

हिन्दी से हमारी जय जयकार
प्रगति का यहीं आधार
शब्द सरिताएं समाती इसमें
सागर सा है विशाल आकर

आओ हिन्दी को आधार बनाये
मातृभाषा को अपना श्रृंगार बनाये
बोलचाल में और राजकाज में
हिन्दी भाषा ही अपनाये

सम्मान हिन्दी को दिला के रहेंगे
अपमान जननी का मिटा के रहेंगे
शान विकास कामिनी की बढ़ा के रहेंगे
हिन्दी को जग में मान दिलाकर रहेंगे

जगदीश गोकलानी “जग ग्वालियरी




प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता

-सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका(प्रेम कविताएँ)
-यही आस अंतिम बाक़ी-
प्यार किया जाता है कैसे,मिले जो तुमसे सीख गए
मोहनी मूरत साँवली सूरत,पर हम तेरी रीझ गए

बच्चों जैसी बातें तेरी,मीठी-मीठी सी मुस्कान
देख सुन लट्टु हो जाए,अलबेला राही अनजान

साहस और हिम्मत है तुझमें,पुरुषों से भी बढ़-चढ़कर
तुमसे मिलकर हमने जाना,प्यार न होता है डरकर

अब तो दिल चाहता है केवल,तेरे संग में ही रहना
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में,बीते अब ये दिन रैना

आओ मिलकर आज करें हम,इक दूजे से ये वादा
शरीर भले ही बिछुड़ें अपने,दिल न होंगे कभी जुदा

प्रेम कहानी लिख जाएँगे,लैला मजनूँ की भाँति
वफ़ा हमारी याद करें सब,यही आस अंतिम बाक़ी।
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम
9717531426

सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका(प्रेम कविताएँ)
-पागलपन-
चाहता हूँ मैं तुमको साथी,मित्र घनिष्ठ बनाना
अपने दिल की गहराइयों में,मूरत तेरी सजाना

मिले मीत ग़र तुम जैसा,मन की बात बतायें
मिल-जुलकर सुख-दुख बाँटे,
एक-दूजे को हर्षायें

अहं मेरा आड़े आता है,तो बेशक आ जाए
किंतु तेरी भोली सूरत, मन-मंदिर बस जाए

तेरा यह व्यक्तित्व निराला,और सुमधुर भावनाएँ
मुझको तो अच्छी लगती हैं,तेरी सभी अदायें

चाहता तो हूँ तुझको अपनी,पलकों बीच बिठाना
तेरी स्मृतियों के साये में,स्वप्न सेज सजाना

चाहने से होता ही क्या है,जब तक तुम ना मानो
मेरी स्वप्निल नगरी को,नहीं जब तक तुम पहचानो

डर लगता है अगर कहीं,तुम बुरा मान जाओगे
इस पागल के ‘पागलपन’ पर,तरस नहीं खाओगे !!
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम

सृजन आस्ट्रेलिया ई पत्रिका (प्रेम कविताएँ)
-हमें बुला लेना-
जब दिल हो कभी उदास तो हमें बुला लेना
अकेलेपन का हो अहसास तो हमें बुला लेना

सोचता हूँ दिन-रात तेरे भले के लिए
जब कोई ना हो पास तो हमें बुला लेना

भरी जवानी में हुस्न के हज़ारों हैं तामीरदार
ढलती उम्र का हो अहसास तो हमें बुला लेना

मुश्किल है मिलना आज भरोसे का आशियाँ
जब किसी पे ना हो विश्वास तो हमें बुला लेना

इस दौर में रिश्ते निभाना काँटों भरा है ताज
रिश्तों में आ जाए खटास तो हमें बुला लेना

यह उम्र हसीन ख़्वाबों तमन्नाओं की नहीं
फिर भी रखते हो आस तो हमें बुला लेना

ज़िंदगी यूँ अंधेरों में नहीं काटना आसाँ
यदि डर का हो आभास तो हमें बुला लेना

ग़र ज़िंदगी रही तो मिलेंगे ज़रूर
हो कहीं भी तेरा वास हमें बुला लेना
पूर्णतः स्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम




International Desh bhakti Kavya pratiyogita

देशभक्ति कविता

 

जय जवान जय किसान

 

यह देश है वीर जवानों का, यह देश है वीर किसानों का।

उनके ही कन्धों पर भार है पूरे हिन्दुस्तान का।

जो सरहद पर दिनरात हमारी रक्षा करते है,

हम अपने घर में बैठे अमन-चैन से सोते हैं।

वन रैंक वन पेंशन पूरी तरह से मिले, सभी सैनिको की माँगे है,

तरह-तरह की पेंशन में भिन्नता, यह उनके लिए सब घाते हैं।

पूरी पेंशन पाने के लिए क्यो वीरता सम्मान वापस करना पड़ता है ?

जब हम वीर जवानों को मजबूर करते हैं उनकी नहीं सुनते हैं।

तब अपनी बात सुनाने के लिए, सरकार तक बात पहुँचाने के लिए,

वीरता सम्मान वापस करने का रास्ता चुनने को मजबूर होना पड़ता है।

हम हमेशा कहते हैं, हम सैनिकों का बहुत सम्मान करते हैं,

सैनिकों क पूरा सम्मान तभी महसूस होगा,

जब पूरी पेंशन आजीवन बिना किसी टेंशन के मिलेगी।

वीर शहीदो को हम देशवासी बार-बार कोटिश: नमन करते है,

और नमन करते है उनके माता-पिता, भाई-बन्धु परिवार को,

जो उनके न रहने पर हर तरह का कष्ट सहते हैं।

हम आजाद होकर अमन चैन से सोते हैं।

जो भी वीर-जवान देश हित में शहीद हो जाये,

उसके परिवार को पूरी पेंशन मिलना जरूरी है।

सेवा शर्तों और नियमावलियों में बदलाव लाना जरूरी है,

पुराने नियम कानून को ही ढोने की क्या मजबूरी है।

सबके प्रति बदल रहे हैं तो जवानों के प्रति क्यों नहीं बदलते है,

उनकी दिक्कतों पर हम  गम्भीरता से क्यों नहीं विचार करते है।

उनके परिवार की कठिनाइयों पर क्यों नहीं ध्यान देते हैं,
इस देश के लिए मर मिटने वाला हर एक सैनिक शहीद है

जब हम वीर सैनिकों को शहीद का दर्जा देते है, सम्मान करते हैं,

तब हम सैनिकों के लिए शहीद पेंशन योजना लाने से क्यों कतराते हैं।

तब हम क्यों यह नियम लागू करते है कि सेवाकाल की अवधि यह होनी चाहिए,

जो सैनिक सौभाग्यशाली है, वो पूरी सेवा करते है,

पूरी पेंशन पाते हैं आजीवन और पूरा सम्मान पाते हैं

पर जिस माता-पिता का वीर लाल सेना में जाते ही,

सीमा की रक्षा करता हुआ शहीद हो जाता है

उसका पार्थिव शरीर तिरंगा झण्डा में लपेटकर वापस आता है

पत्नी के हाथों की मेंहदी, पैरों में महावर की लाली,

अभी सूख भी नहीं पायी होती है, माँग का सिन्दूर लुट जाता है

उसके माता-पिता, पत्नी को पूरी पेंशन क्यों नहीं मिल पाती है ?

तब सेवा काल का समय क्यों मापा जाता है ?

क्यों आधार बनाया जाता है समय सीमा का ?

सेवाकाल का समय नहीं, उद्देश्य देखना चाहिए,
भारत माँ के हर वीर लाल को पेंशन मिलना चाहिए।

क्या बात है कि आज किसान आन्दोलन पर उतर आये हैं ?
उनसे वार्ता कर हम उनकी बात को क्यों नहीं सुलझा पाये हैं ?

जब हम मानते है कि किसान ही हमारा अन्नदाता है

वहीं हमें खिलाता है वही हमें जिलाता है।

वह ही हमारे राष्ट्र की रीढ़ की हड्डी है

उसके बिना पूरा राष्ट्र धूल की पगडण्डी है।

जनता के लिए जनता के राज का सपना तभी पूरा होगा,

जब हर जवान, हर किसान के मन का सपना पूरा होगा।

किसानो की उन्नति कैसे होगी ? जब तक हम इस पर विचार नहीं करेंगे,

तब तक उनकी स्थिति में आवश्यक सुधार कैसे होंगे ?

स्वामीनाथन से लेकर अब तक के किसानों की आवाज सुननी होगी।

तभी किसानो की हालत बदलेगी, उनकी बिगड़ी दशा सुधरेगी।

किसानों की उन्नति की बात तो अभी दूर की कौड़ी है

लागत अधिक लगती पर कीमत मिलती बहुत थोड़ी है।

किसान कभी अतिवृष्टि, कभी ओलावृष्टि का शिकार बन जाता है।

कभी सूखा पीड़ित कभी विविध प्रकार के कीटों के नुकसान को सहता है।

उसकी खेत में लगाई हुई लागत, मेहनत भी नहीं मिल पाती है

ऊपर से एम.एस.पी. की माँग भी नहीं पूरी हो पाती है।

हमारा अन्नदाता आत्महत्या करने को क्यों मजबूर हो जाता है ?

जो मेहनत करके दूसरों को खिलाता हैं, वह क्यों खुद खत्म हो जाता है?

उसकी इस समस्या की जड़ को समझना जरूरी है

आत्महत्या करने की मजबूरी को दूर करना बहुत ही जरूरी है।

ऐसी व्यवस्था करनी होगी, हर किसान खुशहाल हो जाये

किसान खुश तभी हो पायेगा, जब उसकी स्थिति बदलेगी।

जब उसके उत्पादन के बदले अच्छी कीमत की गारण्टी होगी।

जब हम जुबान से किसानों का बहुत सम्मान करते है।

तब हम उनकी माँगों को उनके अनुसार क्यों नहीं मान लेते है

किसान भी खुशहाल हो जायें, जवान भी खुशहाल हो जायें।
भारत माँ के हर लाल के चेहरे पर मुस्कान लहराये।

यह देश है वीर जवानों का, यह देश है वीर किसानों का।

उनके ही कन्धों पर है भार सारे हिन्दुस्तान का।

उनको बार-बार नमन करता है सारा हिन्दुस्तान।

जय जवान – जय किसान, जय जवान जय किसान।

 

 

                           एसोशिएट प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष

                  हिन्दी विभाग

                                 जगत तारन गर्ल्स पी.जी.कालेज,

                                     इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज।

 

 

 




डा० स्नेहिल पांडेय की कविता “बनों महान”

नन्हे मुन्ने बनो महान…
तुम सब हो भारत की संतान..
कोयल जैसी बोली बोलो..
शीतल मंद पवन से डोलो…
तरु की घनी छांव सी छाया ..
उपकारी हो तेरी काया..
फूलों की खुशबू से महको..
नन्ही गौरैया से चहको..
बहते नदी सरीखे पानी …
बनो कर्ण जैसे तुम दानी…
साफ- स्वच्छ परिवेश बनाओ..
पेड़ तुम खूब लगाओ..
पानी की हर बूंद बचाओ …
पर्यावरण प्रहरी कहलाओ..
मानवता के रक्षक बनकर…
दीनदुखी की पीड़ा हरकर..
लवकुश जैसे बनो महान..
तुम सब हो भारत संतान…

 

                 रचयिता
         डा० स्नेहिल पांडेय
(राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका)




देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

श्रद्धांजलि

आज मेरा दिल उन वीरों को

श्रद्धांजलि देने के लिए,

अपने आप ही नतमस्तक है,

जिन्होंने अपने प्राणों की

बाज़ी लगाने में तनिक भी

संकोच नहीं किया,

पलटकर सूनी माँग,

सूनी कलाइयों को नहीं देखा,

सुबकते बच्चों, नम आँखों

को नहीं देखा,

माँ की ममता को, गले तले

उतार कर, बाप की लाठी को

उसके हाथों में ही थमाकर,

चल दिये भारत माँ की

रक्षा के लिए,

आज भारत माँ ही नहीं, समूचा

देश तुम्हारा, तुम्हारी जननी का ऋणी है

तुम्हें झुक-झुक कर असंख्य

बार प्रणाम करता है,

करता रहेगा।

तुम धन्य हो, वीर हो,

अमर हो, रहती दुनिया तक

तुम्हारी वीरता का ये

चर्चा चलता रहेगा।




देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

शहीद की माँ

इक बुढ़िया आँसुओं से

आँगन लीप रही थी,

आसमान रो रहा था

धरती काँप रही थी।

बेजान लाश बनी वह

खुद को ढो रही थी,

न जाने धरती में वह

किसको ढूँढ रही थी।

आहट पर मेरी उसने

दो नयन जो उठाये

उन कश्तियों में मानों

पूरी दुनिया डूब रही थी।

इन सरहदों ने उसका

सब कुछ निचोड़ लिया था,

बुत-सी बनी वह

किसकी बाट जोह रही थी।

एक माँ की लाज खातिर

दूजी माँ व्याकुल हो रही थी,

न जाने कितने लहुलुहान चेहरे

वो इन आँसुओं में

धो रही थी।




देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता

-सृजन आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका(देशभक्ति काव्य प्रतियोगिता)
-ओज की रसधार-
माँ वाणी से राष्ट्रहित उपहार माँगता हूँ
शब्द-शब्द में ओज की रसधार माँगता हूँ

बात जब-जब भारत स्वाभिमान की उठेगी
देश ख़ातिर प्राणों के बलिदान की उठेगी
सीमाओं की चौकसी पर ध्यान की उठेगी
राष्ट्र नव निर्माण और उत्थान की उठेगी
लिपिबद्ध करने का बस अधिकार माँगता हूँ
शब्द-शब्द में ओज की रसधार माँगता हूँ

सुनिश्चित करना है आँच देश पर न आए
चिन्हित भी करना है उनको आँख जो दिखाए
मान मनोबल सैनिकों का नित्य बढ़ाते जायें
वर्दी पर कभी दाग उनके लगने ना पाए
वीर जवानो के लिए सत्कार माँगता हूँ
शब्द-शब्द में ओज की रसधार माँगता हूँ

बच्चा बच्चा देश का भारत की जय बोले
शब्दोच्चार से देशप्रेम के ही उगले शोले
शहीदों के आदर्शों पर चल संयम अपना तौले
पूरी निष्ठा लगन भाव से देश ही का हो ले
होनहार ऐसे भावी कर्णधार माँगता हूँ
शब्द-शब्द में ओज की रसधार माँगता हूँ

कलम के हर लेख में हुंकार ही भरा हो
शब्द-शब्द में वीर रस भंडार ही भरा हो
देशभक्ति का जुनून और प्यार ही भरा हो
जोश जज़्बे का उफनता ज्वार ही भरा हो
स्वरलहरी में जोश का संचार माँगता हूँ
शब्द-शब्द में ओज की रसधार माँगता हूँ !!
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
✍️राजपाल यादव,गुरुग्राम
9717531426
-सृजन आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका(देशभक्ति काव्य प्रतियोगिता)
-है नमन उनको मेरा-

है नमन उनको मेरा जो
देश पर मर मिट गए हैं
प्राणों का उत्सर्ग करके
इतिहास अद्भुत रच गए हैं

है नमन उनको मेरा जो
आसमाँ से भी बड़े हैं
हौसले पर्वत से ऊँचे
लिए सरहद पर खड़े हैं

नमन मेरा उन वीरों को
जो गल्वन में डटकर लड़े हैं
बर्फ़ की शिलाओं में भी
राष्ट्र रक्षा हित खड़े हैं

नमन मेरा उस माँ को जो
क़र्ज़ दूध का माँग रही है
बेटे की शहादत पर अपना
गर्व से सीना तान रही है

नमन मेरा उस बहना को
जो भैया से उपहार ये माँगे
शीश ले आना उस बैरी का
भारत की सीमा जो लांघे

नमन मेरा उस प्राणेश्वरी को
कहती शत्रु का सर लाना
आवश्यकता ग़र पड़ी बालम
रणभूमि में मर मिट जाना

अंतिम नमन मेरा उनको
इतिहास नया जो रच जाते हैं
माँ बहना पत्नी यादों संग
सूली पर भी चढ़ जाते हैं !!
पूर्णतःस्वरचित मौलिक रचना
(राजपाल यादव,आरडी सिटी,गुरुग्राम)
9717531426
-सृजन आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका(देशभक्ति काव्य प्रतियोगिता)
– -बदल रहा है अब कश्मीर-

बदल रहा रहा है अब कश्मीर
बदल रही उसकी तस्वीर
बदला उसका विधि-विधान
बदला सत्ता का संविधान
वेतन-भत्ते बदल गए
हुई पेश अदभुत नज़ीर
बदल रहा है अब कश्मीर

बदली भाषा और परिवेश
बना केंद्र शासित प्रदेश
एक सूत्र में बाँध देश
घाटी की बदली तक़दीर
बदल रहा है अब कश्मीर

हवा नई और नई फ़िज़ा
मिली दिशा और नई दशा
बदल रहे अब नौकरशाह
बदले राजा,रंक,फ़क़ीर
बदल रहा है अब कश्मीर

बदली रंगत,पवन-बयार
बदला है आचार विचार
शांति के बन रहे आसार
खेल रहे सब रंग-अबीर
बदल रहा है अब कश्मीर

बदल रहा है अब माहौल
बदल गया इतिहास भूगोल
जन्नत की घाटी अनमोल
चहक रहा फिर से कश्मीर
बदल रहा है अब कश्मीर

प्रगति के अब द्वार खुले
निवेश के बाज़ार खुले
नियुक्तियों के आसार खुले
यही बन रही है तहरीर
बदल रहा है अब कश्मीर

बदल गया है अब इतिहास
आतंकी सब हुए हताश
लेह-लद्दाख में हर्षोल्लास
प्रफुल्लित संतरी,वज़ीर
बदल रहा है अब कश्मीर
पूर्णतःस्वरचित मौलिक
(राजपाल यादव,गुरुग्राम)
9717531426




देश की मिट्टी

“देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता” हेतु कविता –देश की मिट्टी

 

  देश की मिट्टी

 अपने देश की मिट्टी की,

 बात ही कुछ और हैं|

 खेत खलिहानों में दमकते,

 सरसों की फूलगियों पर

 लहलहाते मदमाती बसंती,

 बहारों का शोर कुछ और है|

 सर्द हवाओं के संगसंग,

 मचलते ये फूलों की डालियाँ

 घेर लेती है अक्सर मुझे,

 मेरे गाँव की अनगिनत पगडंडियाँ

 दूर कहीं क्षितिज के अधरों पर,

 मुसकाती,  खिलखिलाती कलरव करती,

 रह –रह कर, इतराती, बलखाती

 मेरे देश की नदियों के

 लहरों का शोर कुछ और है| 

 अपने देश की मिट्टी की,

 बात ही कुछ और हैं|

धर्म संस्कृति और सभ्यता का

अनुपम पहचान लिए,

सोंधी-सोंधी खुशबू में सिमटी

नार-नवेली देश का अभिमान लिए,

उड़ते पक्षी कलरव करते

खुले गगन के छाँव तले,

वीरों की इस धरती पर

फिर आई नयी भोर है|

अपने देश की मिट्टी की,

बात ही कुछ और हैं|

अपने देश की मिट्टी की,

बात ही कुछ और हैं|

 

डॉ कविता यादव