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समसामयिक दोहे

  • दोहे ,,,
  • 1,,,
  • इच्छाएं घर से चलीं,कर सोलह श्रृंगार।।
  • लौटी हैं बेआबरू, हो घायल हर बार।।
  • 2,,,
  • आंधी से अनुबंध कर, चुप हैं पीपल आम।।
  • पौधों को सहना पड़े,इस छल के परिणाम।।
  • 3,,,,
  • विपदा बस जब कृषक ने,बेचा अपना खेत।।
  • मिट्टी रोई फूटकर, मैंडैं हुईं अचेत।।
  • 4,,,,
  • रस्ता है कांटो भरा, हम हैं नंगे पांव।।
  • आंखों पर पट्टी बँधी, बहुत दूर है गांव।।
  • 5,,
  • मृगतृष्णा सी जिंदगी, जिसमें भटके लोग।।
  • जीवन जल संदर्भ है,इक अनुपम संयोग।।
  • 6,,,
  • होंठों पर ताले लगे, पैरों में जंजीर।।
  • उसपर भी हम ढो रहे, पर्वत जैसी पीर।।
  • 7,,,
  • उस जंगल सी जिंदगी, कैसे करें कबूल।।
  • जिसमें बट पीपल नहीं,उगते सिर्फ बबूल।।

बृंदावन राय सरल सागर एमपी।

वरिष्ठ कवि एवं शायर सागर मप्र।

मोब,,,7869218525

  •  



जिंदगी एक मधुरस का प्याला

जिंदगी एक मधुरस का,

भरा प्याला है,

पीना जिसको भी यहाँ,

वही सयाना है।।

लोग चलते हैं कि,

प्याले भी झलक,

जाते  हैं, 

तुमको चलना है, 

तो संभल-संभल के चलो,

झलक न जाए कहीं,

ये लघु जीवन,

तुमको यही बचाना है।।

जिंदगी एक••••••••••प्याला है।




“महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता

“महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता

 

मुझे नहीं बनना है अब देवी कोई

 

 

मुझे नहीं बनना है अब देवी कोई,  मुझे तुम साधारण ही रहने दो,

तुम तो यार मेरे बस इतना करो,  मेरे भी ख्वाबों का दरिया बहने दो।

 

तुम्हारा घर, तुम्हारे बच्चे, तुम्हारी नौकरी, तुम्हारी चाकरी,

यह रखती हूं मैं सदैव अपने सर-माथे पे,

पर जो मेरी ये दबी, संकुचाई-सी ख्वाईशें हैं,

धीरे ही सही मगर अब मुझको कहने दो।

 

तुमने तो हमेशा से ही जब भी, कुछ भी, जीवन में करना था,

किया नहीं कभी भी अनुरोध कभी, बस इक आदेश-सा जारी करना था,

ये जो मेरा दिल, मेरी धड़कन मुझसे जो हरदम कहती है,

फिर मेरे सपनों की दुनिया क्यों आखिर युं छिपी-छिपी सी रहती है,

पहचान बनानी है मुझको अपनी, तुम अब यह एहसान जताने रहने दो।

 

मुझसे तो बेहतर लागे पवन मुझे, जो निश्चित होकर तो बहती है,

क्यों व्यर्थ ख्वाब सजाती हो, पलकें आंखों से शिकायत करती हैं,

तुम में, मुझ में तो कोई फर्क नहीं इक जैसा रक्त, इक जैसा दिल

जो तुम्हें सहज मैं देती हूं मुझको देने में क्यों हो तुमको मुश्किल,

साथ निभाउगीं तुम्हारा हरदम, बस बेधड़क मेरे दिल को धड़कने दो,

मीनाक्षी भसीन ©

 

 

 

ये कमबख्त जुबान चलाने वाली शिक्षित स्त्रियां

 

मां बहुत ज़ोर देती थी पढ़ाने में मुझे,

पढ़ना जरुरी है, मेरे लिए नहीं,

मेरे भविष्य के लिए,

यदि शादी के बाद कुछ जम नहीं पाया

तो,

कुछ तो होना चाहिए न हाथ में मेरे,

वो क्या है न प्रोफेशनल डिग्री,

ताकि इतना की अच्छा लड़का मिल जाए,

पर थोड़ा कम क्योंकि फिर तुझसे बेहतर

खोजने में होगी मुश्किल,

पर —आज सोचती हूं कि शिक्षा ने तो

ऐसे किवाड़ खोले मेरे मन के,

स्पष्टता से महसूस करने लगती हूं,

मैं वो असमानताएं,

वो सीमाएं,

वो भेद, वो मनभेद

जो हर पग में झेलने पड़ते हैं मुझको,

पर शिक्षित हूं,

अनपढ़ होती तो हर बार मेरी कुंठाओं पर विवेक हावी न होता

क्योंकि शिक्षित स्त्रियों से कुछ ज्यादा ही बढ़िया आचरण की

अपेक्षाएं लगा बैठते हैं लोग,

आप चिल्ला कैसे सकती हैं,

शिक्षित हैं तो घर भी ज्यादा अच्छी तरह संभालना चाहिए न,

  जो हो रहा है, सभी कर रहे हैं, तुम कुछ एहसान नहीं कर रही हो,

सदियों से होता रहा है, होता रहेगा,

 अनपढ़ औरतें ज्यादा समझदार होती हैं,

वे अनुकूल हो जाती हैं इस भेदभाव के परिवेश में रहने के लिए,

पर ये सिरचढ़ी शिक्षित स्त्रियां,

हर समय सिर पर सवार रहती हैं,

जुबान बहुत चलती है कैंची की तरह,

वो क्या है न तिमिर से ग्रसित मन को

जिसमें थोप दिया जाता है कि खाना खिलाना,

कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, साफ-सफाई से लेकर

सारी बिखरी हुई चीज़ों को समेटना,

और तुम्हें खुश रखना ही धर्म होता है,

एक स्त्री का,

तो इन ठूसी हुई दकियानुसी धारणाओं से अभिशप्त

मन से सहन नहीं हो पाती,

अचानक प्रकट हुई

शिक्षित स्त्री के मन से, प्रस्फुटित होती

चमकदार किरणें,

जो हर क्षण भेदना चाहती हें,

इस अंधेरे को,

पूरी शिद्दत के साथ,

कोई हो जाता है प्रकाशित,

तो कोई होने लगता खंडित,

और चीखता रहता, कोसता रहता, सिर पकड़कर

हाय कहां से आ गई यह जुबान लड़ाने वाली,

गलत को सही न कहने वाली,

घर को तोड़ने वाली,

खुदगर्ज, तेज़, चालाक स्त्रियां

ये बदतमीज, सिरचिढ़ी शिक्षित स्त्रियां——-

 

मीनाक्षी भसीन, सर्वाधिकार सुरक्षित  

 

 

कुछ गहरी, कुछ ढीठ, कुछ जिद्दी, कुछ सरसों-सी पीली, कुछ शैतान लहरों-सी मैं—-इक स्त्री

अक्सर भागते-दौड़ते हुए रह जाता है,
कुछ-कुछ आटा मेरी अंगूठी के बीचोबीच,
जो मुस्कराता रहता है और याद दिलाता रहता है,
घर की मुझको,
जो कई बार तो हो जाता है इतना सख्त कि उतरना ही
नहीं चाहता, जिद्दी बच्चे जैसे अड़ जाते हैं अपनी कोई
बात मनवाने को,
कुछ-कुछ हल्दी का रंग भी जैसे मिल गया है मेरी हथेलियों से
इस शिद्दत से ,
अब पता चला कि हाथ पीले होने का वास्तविक अर्थ क्या है,
मन भी समुंद्र सा रहता है आजकल,
खामोश तो रहता है पर भीतर ही भीतर,
उठती, बैठती, मचलती, कूदती, सुबकती, कोसती
रहती हैं लहरों पे लहरें,
शांत ही नहीं होता कई बार दिखाई आंखें मैने
कि बस हो गया अब कितना सोचोगी तुम,
पर मानता ही नहीं है यह ढीठ-सा हो गया है,
भारी-भारी सा लगता रहता है मन,
अरे– गंभीर कुछ भी नहीं,
बस घर को उठा कर चलना पड़ता है,
घर से बाहर भी,
कोई एक कोना नहीं,
पूरा का पूरा घर, हरेक कमरा, हरेक कोना,
सोच कर मकान नहीं जब घर को उठा कर
चलना पड़ता है घर से बाहर, और करना पड़ता है काम,
तो होता नहीं आसान,
तो जब इतना मुश्किल काम कर लेती हैं हम इतनी सहजता
से, सरलता से, कुशलता से,
वक्त बना ही देता हैं हमें सख्त,
तो कुछ गहरी, कुछ ढीठ, कुछ जिद्दी,
कुछ भारी, कुछ सरसों-सी पीली, कुछ शैतान लहरों-सी
कुछ सख्त-सी होकर मैं आजकल चले जा रही हूं,
इतने मुश्किल काम को मुस्कराते हुए,
जो मैं किए जा रही हूं,
तभी तो दो नावों पे सवार हो अठखेलियां भी संग-संग
किए जा रही हूं,
शायद सशक्त होने की जरुरत मुझे नहीं है,
परिवेश को है, समाज को है——
थाम सकते हो मुझको,
धिक्कारने के लिए नहीं किसी को थामने के लिए
ही चाहिए न मजबूती, है यह शक्ति तुम्हारे पास,
नहीं है तो लाओ, चूंकि मैं तो अब रुकने वाली नहीं हूं,
किसी भी स्थिति में अब मैं सिमटने वाली नहीं हूं——–

मीनाक्षी भसीन, सर्वाधिकार सुरक्षित

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रचनाकार का नाम-मीनाक्षी भसीन

पदनाम– कनिष्ठ हिंदी अनुवादक

संगठन-आईसीएमआ-राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान

सैक्टर-8, द्वारका, नई दिल्ली-110 075

 

पूरा डाक पता– ग्रीन वैली अपार्टमैंट, सैक्टर-22, जी-403 द्वारका, नई दिल्ली-110 077

 ईमेल पता[email protected]

 मोबाईल नंबर-9891570067

 

 




अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन

विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन

दिनांक:17 जनवरी 2021,

समय :- सुबह 11 बजे से (भारत)

अध्यक्ष: प्रो. नीलू गुप्ता, कैलिफोर्निया, अमेरिका

मुख्य अतिथि : प्रो. हितेंद्र मिश्रा, पू.प. विश्वविद्यालय, शिलांग, मेघालय, भारत

सान्निध्य: प्रो. विनोद कुमार मिश्र, महासचिव विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस

विशिष्ट अतिथिगण :

1. श्री हरिहर झा, मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया

2. डॉ. नूतन पांडेय, दिल्ली, भारत

आमंत्रित कविगण

1. शीतल जैन, सिंगापुर 2. कविराज बाबू, मॉरीशस 3. संजीव शर्मा, भारत 4. झुम्मुन, मॉरीशस 5. अंजलि, मॉरीशस 6. राज हीरामन, मॉरीशस 7. कैलाश, मॉरीशस8. शिक्षा गजाधार, मॉरीशस9. संदीप सिंधवाल, पपुआ न्यू गिनी

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उत्तरायण हो चलो प्रभाकर

उत्तरायण हो चले प्रभाकर
अंधेरो की लंबी रात गयी
चाहूं ओर फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुवन सा सारा।।
खेतों में हरियाली झूमती
धान- गेहूँ की बाली कलियों का खिलना भौरों का गुंजन फूलों की गमक नव जीवन जांगरण चेतना।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
मधुर राग कोयल की प्रातः बेला
मंदिर में घंटे घड़ियालों की संध्या पूजा
सूर्य , शनि पिता पुत्र का संगम
शुभ काल कलेवर का अभिनंदन
उल्लास उदित प्रातः संध्या का युग मेला।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
सर्द शाम की आग ताप में
तिलकुटिया गुड़ ढोल नगाड़ो की
थाप पंजाबियत की लोहड़ी का प्यारा पंजाब।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
धान की फसलें आयी मनोकामना की
पूर्णतया गांव किसान के संग लायी गांव किसान की अविनि खुशिया संसार पोंगल निराला प्यारा परम्परा पर्व शान।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
पूर्वोत्तर की शान निराली
हरियाली मुस्कान का प्राणी प्राण
विहू धन धान्य का स्वागत विश्वाश।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
हर प्रातः सूर्य का पूरब में उदय उदित
लाली लालिमा जीवन का याथार्त
विहू मानव की खुशी खूबसूरती का
प्रबाह।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
पावन नदियों में स्नान दान पुण्य
जीवन का धर्म मर्म सत्य सनातन
भारत की विश्व पहचान।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
तिल -तिलकुट चुड़ा -दही
नैवेद्य संस्कार की संस्कृति
मकर संक्रांति का उपहार।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
पतंग उड़ाते बच्चे बूढ़े जवान
हर हृदय भावों में जश्न जोश
लहलाती फैसले आशाओं के मंगलमय
मधुमास बसन्त का दस्तक स्वागत
मकर संक्रांति उल्लास।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।
भारत भूमि की बात निराली
जहाँ ऋतुये मौसम भी न्यारी प्यारी
हर मौसम ऋतुओं का निराला भाव
त्योहारों की मस्ती मानव हद हस्ती का अंदाज़ ।।
उत्तरायण हो चलो प्रभाकर
अंधेरों की लंबी रात गयी
चाहूं फैला उजियारा
उत्साह उत्सव की गूंज
युग मधुबन सा सारा।।

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर




देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगता हेतु-एक गीत प्रेम वेदना के नाम

 मम वेदना का एक अंश, 

सम्भाल लो तो जान लूं। 

संतप्त मरु दृग नीर बिन्दु, 

खंगाल लो तो जान लूं।

              मेैं निरा निर्धन जगत का,

              एक खोटा द्रव्य हूं।

              निज भार के अतिरिक्त ढोता,

              श्रमिक मैं अति श्रव्य हूं।

असीम कंटकपूर्ण जंगल पथ मेरा, जिस पर चला,

              मेरे पगों का एक शूल,

              निकाल लो तो जान लूं।

                             मम वेदना का…..!

              जैसे जलद है जान जाता,

              भू की उजली प्यास को।

              बिन कहे सुन ले पवन,

              फूलों की बुझती सांस को।

हिलते अधर, रुंधती नज़र,निर्वाक कंठ रहे मेरा,

             पलकों से छू मेरी व्यथा,

             पहचान लो तो जान लूं।

                        मम वेदना का…..!

             ऐसा मिलन तन-मन से हो,

             छत का मिलन आंगन से हो।

             ऐसे बने सम्बन्ध अपना,

            जल का ज्यों जीवन से हो।

जीवन डगर हो सरल ऐसे ,जल में जैसे मीन का,

            हँसी में कही कटु बात हँसकर,

            टाल दो तो जान लूं।

                      मम वेदना का…..!




पतंग सी लहराए दिल

  1. पतंग सी लहराए दिल
    ऊंची जीवन की उड़ान हो,
    तील और गुड़ जैसा मीठा बनें
    सबके होठों पर मुस्कान हो!!
    पावन पर्व संक्रांति की,
    प्रकाशित सबके जीवन को करे
    नई ऊर्जा, नया उल्लास,
    प्रेम और विश्वास
    हर दिल में भरे!!



मन ही मन

मन ही मन..
—————————
मेरे मन के ख्याल….!
मौन साक्षी हैं
कितने ही बार
तेरे मनआगमन पर आने पर
मनाई है मन ही मन दीपावली

कितनी बार ही कोसा है
जब कोई भंग किया है ख्याल
उस पर तुम्हारे साच्क्षात
अनचाही रख़्सतो पर
जतायी है मातम
मन ही मन…!

करते रहे हैं प्रतिक्षा
बुनते हैं रहे हैं सन्नाटे
पल प्रति पल
बरस दर बरस
सोख लेते हैं विषाद
देते हैं आमंत्रण
सुखद स्मृतियों और
करते हैं क्षमायाचना
मन ही मन…!

जो ठेस पहुँचाई हो कभी
इन तमाम संभावनाओं के साक्षी
तुम मेरे मन के प्रीत
मीत मौन ही गुनते अब
इतिहास के साक्षी होने का
तठस्थ होकर
वर्तमान भूत भविष्य को भोगते
मन ही मन…!

-समि…..✍

 




मन ले चल

मन ले चल.. डॉ.प्रदीप शिंदे
सुबह सुरज की किरन
नींद से जगाती आंगन
गांव पाठशाला शिक्षक
शिक्षा मिली अनमोल
समान इतवार सोमवार
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                       
पनघट घड़े लेकर दुल्हन
पायल की सुंदर छम छम
अनेक खेलों में मन मेल
हार जित में नोंक झोंक
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                       
मेले घुमना झुले झुलना
खुशी से झुम उठना
दादी की कहानी सुनना
खुले आकाश ख्वाब देखना
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                         
रुठने मनाने के हसीन दिन
हंसते रोते वे खुले दिल
शाबाशी से पीठ थपथपाना
थप्पड़ में भी स्नेह पाना
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
प्रा.डॉ.प्रदीप शिंदे  7385635505




मन ले चल

मन ले चल.. डॉ.प्रदीप शिंदे
सुबह सुरज की किरन
नींद से जगाती आंगन
गांव पाठशाला शिक्षक
शिक्षा मिली अनमोल
समान इतवार सोमवार
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                       
पनघट घड़े लेकर दुल्हन
पायल की सुंदर छम छम
अनेक खेलों में मन मेल
हार जित में नोंक झोंक
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                       
मेले घुमना झुले झुलना
खुशी से झुम उठना
दादी की कहानी सुनना
खुले आकाश ख्वाब देखना
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
                         
रुठने मनाने के हसीन दिन
हंसते रोते वे खुले दिल
शाबाशी से पीठ थपथपाना
थप्पड़ में भी स्नेह पाना
मन ले चल मेरे बचपन,
आज उदास है आलम
प्रा.डॉ.प्रदीप शिंदे  7385635505