1

बसंत (प्रेम गीत प्रतियोगिता)

प्रीत की प्यारी बनके,
सबकी दुलारी बन के,
मंह-मंह करती,
बसंत त्रृतु आ गई।
धानी चुनर पहने,
उससे मिलन करने,
सपने सुहाने ले के,
मधुमास को रिझा गई।
मंह-मंह करती,
बसंत त्रृतु आ गई।
कलियों ने राग छेड़,
भौरों के साथ खेले,
चूस के पराग रस,
देखो बलखा गई।
मंह-मंह करती,
बसंत ऋतु आ गई।
ताल तलैया देखो,
मन की गौरैया देखो,
फूल बन सरसो,
खेती में लहरा गई।
मंह-मंह करती,
बसंत ऋतु आ गई।
यौवन में निखार भर के,
फूलों से ऋंगार कर के,
देखते ही देखते,
धरती इठला गई।
मंह-मंह करती,
बसंत ऋतु आ गई।
मांग में सिंदूर भर के,
ऑंखों में नूर भर के,
चार दिन की चाँदनी,
धरती नहा गई।
मंह-मंह करती,
बसंत ऋत आ गई। -@अजय कुमार मिश्र “अजयश्री “




प्रो नीलू गुप्ता की अध्यक्षता में अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन सम्पन्न

विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस  न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन एवं सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका के संयुक्त  तत्वावधान में एक  अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन 17 जनवरी 2021 को सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। कैलिफोर्निया, अमेरिका से प्रो नीलू गुप्ता जी के अध्यक्षता में आयोजित हुए इस कवि सम्मेलन में दुनियाभर से हिन्दी रचनाकार सम्मिलित हुए। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. हितेंद्र मिश्रा, पू. प. विश्वविद्यालय, शिलांग, मेघालय, भारत उपस्थित रहे। यह कवि सम्मेलन विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस के महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र जी के सान्निध्य संपन्न हुआ जिसमें सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका के प्रधान संपादक श्री शैलेश शुक्ला ने आयोजक और संचालक की भूमिका निभाई।

विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री हरिहर झा, मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया से एवं डॉ. नूतन पांडेय, दिल्ली, भारत से सम्मिलित हुए । यह कवि सम्मलेन गूगल मीट के माध्यम से ऑनलाइन आयोजित किया गया से फेसबुक लाइव के द्वारा एक हजार से अधिक श्रोताओं ने कार्यक्रम को देखा और सुना । मॉरीशस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, पपुआ न्यु गिनी और सिंगापुर से कविगण उपस्थित हुआ और अपनी कविताओं के सुमधुर पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । सभी प्रमुख वक्ताओं ने वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रसार- प्रसार में सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका द्वारा निभाए जा रहे इस महत्वपूर्ण भुमिका की सराहना की और विश्वास जताया कि आने वाले समय में सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका वैश्विक स्तर पर हिंदी को विश्व की भाषा बनाने में सफलता अपना बहुमूल्य योगदान देगा ।

सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई- पत्रिका की मुख्य संपादक श्रीमती पूनम चतुर्वेदी शुक्ला ने जानकारी देते हुए बताया कि सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका एवं न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन, विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस के साथ मिल कर इस तरह का आयोजन लगातार कर रहा है जिसमें दुनिया भर से हिन्दी प्रेमी शामिल होते है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि हम विभिन्न अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय काव्य लेखन प्रतियोगिता का आयोजन करते है। प्रतियोगिता में शामिल हुए श्रेष्ठ कवियों को चुन कर अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है।

रविवार को आयोजित हुए इस अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में सिंगापुर से शीतल जैन, मॉरीशस से कविराज बाबू, झमन वशिष्ट, अंजलि हजगैबि, राज हीरामन, कैलाश और शिक्षा गजाधार, पापुआ न्यू गिनी से संदीप सिंधवाल ने काव्य-पाठ किया। मॉरिशस से सृजन ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय संयोजन डॉ. कल्पना लाल जी और मॉरीशस में भारत की हिंदी एवं संस्कृति के लिए द्वितीय सचिव सुश्री सुनीता पाहुजा की गरिमामय उपस्थिति रही, दोनों ने अपनी रचनाओं का काव्य पाठ भी किया और सुन्दर आयोजन के लिए सभी कविगण एवं आयोजकों की सराहना की।




प्रेम अध्याय

अकेला विसरा अपनी राहों में चला था,
किसी की जरूरत सता रही थी,
जिनसे दिल की बातें करूँ,
दिल के दर्द बयां करूँ,
फिर वो दिन आया जब सब बदल गया,
उसकी आहट से जिंदगी में रंग से भर गए ।

उसकी हंसी जीने की उम्मीद जगाते,
उसकी पर्शायी मुश्किलो से भरी जिंदगी को,
नयी दिशा दे जाती,
सुखी हवा भी ठंडक दे जाती,
उसके साथ चलने से जीवन धन्य हो जाता ।

फिर एक दिन उसने धीमे आवाज़ में पूछा,
मुस्कुराते हुए,
तुम हो तो हमारी जाति के न,
तुम बिन अब गुज़ारा नही हमारा,
उसने (लड़का) थोड़ी ऊँची आवाज़ में बोला,
तुमसे छोटी जाति का हूँ,
पर कमी कोई नहीं आने दूँगा,
पलकों पे बिठाकर,
खुद धुप में जलकर, छाया दूँगा,
उसने (लड़की ) कहा मेरे घर वाले नहीं मानेंगे ।

और फिर,
घर वालों को पता चलते ही,
लड़की की शादी कहीं और करदी,
रोती बिलखती ससुराल जो गयी वो,
उसे यह सुनकर खुदा याद आया और कहा,
क्यों किया ऐसा, बिगाड़ा क्या है मैंने किसी का,
दो पल की ख़ुशी दी थी छीन ली वो भी । 

खुदा ने चुपके से कहा,
मैंने तो इंसान है बनाया, यह तो तूने बनाया,
इसी आग से खेलते जो आये हो,
इसी अहंकार में जीवन बिता रहे,
तुम्हें इसी में जीवन बिताना है, पर हाँ,
इसे बदलने की कोशिश जरूर करना,
एक नया अध्याय मानवता को समर्पित जरूर करना,
ताकि आने वाली पीढ़ी सबक ले,
और तुम्हारी तरह किसी और को तकलीफ न हो । 

 




प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता/ माटी-तन चंदन कर दूँगा

 

माटी-तन चंदन कर दूँगा

 

माटी-तन चंदन कर दूँगा

लग जाने दो बस सीने से

हृदय वृन्दावन कर दूँगा,

छूकर पतित तुम्हारी काया

माटी-तन चंदन कर दूँगा।

 

दिल से दिल का तार जोड़कर

शोणित में मिल जाऊँगा,

साँसों में घुलकर साँसों से

रूह तलक महकाऊँगा।

खोकर तेरे रोम-रोम में

अंग-अंग पावन कर दूँगा।

लग जाने दो बस सीने से

हृदय वृन्दावन कर दूँगा।।

 

जीवन के मरुथल में आखिर

प्रेम-जलद बरसाना होगा,

बाँह पकड़कर साथ-साथ में

प्रणय गान सुनाना होगा।

पा करके सानिध्य तुम्हारा

ऊसर को मधुवन कर दूँगा।

लग जाने दो बस सीने से

हृदय वृन्दावन कर दूँगा।।

 

बिठा घटाओं की डोली में

अम्बर तक ले जाऊँगा,

नंदन वन की निर्झरिणी में

फूलों से नहलाऊँगा।

तेरे रुख से ही पल भर में

पतझड़ को सावन कर दूँगा।

लग जाने दो बस सीने से

हृदय वृन्दावन कर दूँगा।।

 

प्रेम-पंथ पर चलते-चलते

पर्वत यदि टकराएँगे,

दो प्रेमी के बीच में आकर

सागर गर लहराएँगे।

पर्वत, सागर को कर लेकर

शम्भू सा नर्तन कर दूँगा।

लग जाने दो बस सीने से

हृदय वृन्दावन कर दूँगा।।

 

      (स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित)

✍ रोहिणी नन्दन मिश्र

 

सम्पर्क:- 

रोहिणी नन्दन मिश्र 

गाँव- गजाधरपुर 

पोस्ट- अयाह, इटियाथोक 

जिला- गोण्डा, उत्तर प्रदेश- भारत 

पिन कोड- 271202

मो॰ 9415105425

ई-मेल- [email protected] 




महिला-दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कवितायें

(महिला-दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कवितायें)

 

1

अब

तुम्हारे झूठे आश्वासन

मेरे घर के आँगन में फूल नहीं खिला सकते

चाँद नहीं उगा सकते

मेरे घर की दीवार की ईंट भी नहीं बन सकते

अब

तुम्हारे वो सपने

मुझे सतरंगी इंद्रधनुष नहीं दिखा सकते

जिसका न शुरू मालूम है न कोई अंत

अब

तुम मुझे काँच के बुत की तरह

अपने अंदर सजाकर तोड़ नहीं सकते

मैंने तुम्हारे अंदर के अँधेरों को

सूँघ लिया है

टटोल लिया है

उस सच को भी

अपनी सार्थकता को

अपने निजत्व को भी

जान लिया है अपने अर्थों को भी

मुझे पता है अब तुम नहीं लौटोगे

मुझे इस रूप में नहीं सहोगे

तुम्हें तो आदत है

सदियों से चीर हरण करने की

अग्नि परीक्षा लेते रहने की

खूँटे से बँधी मेमनी अब मैं नहीं

बहुत दिखा दिया तुमने

और देख लिया मैंने

मेरे हिस्से के सूरज को

अपनी हथेलियों की ओट से

छुपाए रखा तुमने

मैं तुम्हारे अहं के लाक्षागृह में

खंडित इतिहास की कोई मूर्त्ति नहीं हूँ

नहीं चाहिए मुझे अपनी आँखों पर

तुम्हारा चश्मा

अब मैं अपना कोई छोर तुम्हें नहीं पकड़ाऊँगी

मैंने भी अब

सीख लिया है

शिव के धनुष को

तोड़ना

000

 

2

औरत को सब कुछ

एक साथ क्यों नहीं मिलता

किश्तों में ही मिलता है

जैसे, घर है तो छत नहीं

छत है तो द्वार नहीं

द्वार मिले तो सांकल नदारद

दिन को जीती है तो

रातें गायब

आसमां को जैसे ही देखे

तो जमीन गायब

माँ-बाप की इकलौती हो तो

सबका प्यार पाये

भाई आए तो प्यार फिर

किश्तों में बचा-खुचा पाये

वे आश्चर्यचकित है,

कि माँ की कोख तो एक है

फिर भी मैं परायी और

भाई उनका।

फिर बड़ी हो कर

पति मिल जाए तो

मायका दूर हो जाए

दोनों एक साथ क्यों नहीं मिल सकते

खुद के बच्चे हो

तो सब शिकायत भूल जाये

बहू आए तो बेटे छिन जाएँ

पति जाये, तो घर भी छिन जाये

सब कुछ स्थायी क्यों नहीं रहता

जीवन मिल जाये तो

इतिहास के छोटे टुकड़ों में बांटकर

भी दोबारा औरत का ही जन्म पाने की ख़्वाहिश

कि, इस जन्म में तो किश्तों मे जिया है

चलो अगले जन्म में ही सही शायद

वो घर हो, जहां छत,

द्वार और सांकल सभी एक साथ हो

000

 

3

तुम हमेशा से रखते रहे हो आसमानों की चाह

पर आज देख लो

उड़ानें हमारी अच्छी हैं__

 

तुम खुश रहते थे और हम ज़ाहिर करते रहे

पर आज देख लो

मुसकानें हमारी अच्छी हैं__

 

तुम हमेशा उसूलों की सिर्फ बातें करते रहे

पर आज देख लो

ज़िद हमारी भी अच्छी हैं__

 

तुम्हारे होंसले, बहस सिर्फ वक्ती होते रहे

पर आज देख लो

दलीले हमारी भी अच्छी हैं__

 

तुम्हारे शब्दों की अकड़ हमेशा ऐंठी ही रही

पर आज देख लो

जज़्बातों की स्याही हमारी अच्छी है__

 

तुम होगे बेहतर सिर्फ बाहर बाहर से ही

पर आज देख लो

अंदर बाहर पकड़ हमारी अच्छी है__

 

तुम सोचते हो खुद को कृष्ण हर युग में

पर आज देख लो

सुर और बांसुरी तो हमारी ही अच्छी है__

 

देर से ही सही पर मान तो लिया तुमने

इसीलिए तो आज

हर बात तुम्हारी भी अच्छी है__

000

 

4

 

सुनो

जा रहे हो तो जाओ

पर अपने यह निशां भी

साथ ले ही जाओ

जब दोबारा आओ

तो चाहे, फिर साथ ले लाना

नहीं रखने है मुझे अपने पास

यह करायेंगे मुझे फिर अहसास

मेरे अकेले होने का

पर मुझे जीना है

अकेली हूँ तो क्या

जीना आता है मुझे

लक्ष्मण रेखा के अर्थ जानती हूँ

माँ को बचपन से रामायण पढ़ते देखा है

मेरी रेखाओं को तुम

अपने सोच की रेखाएँ खींच कर

छोटा नहीं कर सकते

युग बदले, मै ईव से शक्ति बन गयी

तुम अभी तक अहम के आदिम अवस्था में ही हो

दोनों को एक जैसी सोच को रखने का

खामियाज़ा तो भुगतना तो पड़ेगा

000

 

5

मैं कमजोर थी

तुम्हारे हित में,

सिवाय चुप रहने के

और कुछ नहीं किया मैंने

अब अंतर के

आंदोलित ज्वालामुखी ने

मेरी भी सहनशीलता की

धज्जियाँ उड़ा दी

मैंने चाहा, कि मैं

तुमसे सिर्फ नफरत करूँ

मैं चुप रही

तुमने मेरी चुप को

अपने लिए सुविधाजनक मान लिया था

मैं खुराक के नाम पर सिर्फ

आग ही खाती रही थी,

तुम तो यह भी भूल गए थे कि

आदमी के भीतर भी

एक जंगल होता है

और, आत्मनिर्णय के

संकटापन्न क्षणों में

उग आते हैं मस्तिष्क में

नागफनी के काँटे,

हाथों में मजबूती से सध जाती है

निर्णय की कुल्हाड़ी

फिर अपने ही एकांत में

खोये एहसास की उखड़ी साँसों का शोर

जंगल का एक रास्ता

दिमाग से जुड़ जाता है

उन्ही कुछ ईमानदार क्षणों में

मैंने भी अंतिम निर्णय ले लिया है

मेरी चुप्पी में कहीं एक दरार सी पड़ गयी है

तेरे-मेरे रिश्ते का सन्नाटा

आज टूट कर बिखर गया है

000

 

6

कल ही तो ऊपर सूर्य ग्रहण लगा था

आज नीचे औरत के आकाश का सूर्य ग्रहण हट गया

अब दिखेंगी पगडंडियाँ पर्दे के पीछे वाली आँखों को भी

अमावस जैसे हर बुर्के के माथे पे उगेंगे छोटे नन्हें चाँद

पहला पड़ाव है यह तो

मंज़िलें बच कर कहाँ जाएंगी?

अब तीन लफ्जों को इतिहास बनना ही होगा…..

तुम्हारे हित में,

सिवाय चुप रहने के

और कुछ नहीं किया उसने

तुमने उसकी चुप को

अपने लिए सुविधाजनक मान लिया

उसने तुम्हें स्वीकारा था

अन्तरमन से चाहा था

तुम्हारे दिखाये सपनों के

इन्द्रधनुषी झूले से झूली थी

तुम्हारी उंगली पकड़

तुम्हारी ही बनाई सड़क पर

चलने लगी थी वो

तुम बन गए थे

उसकी पूरी दुनिया

और तुमने क्या किया….

बाज़ार में चलते-चलते ही

थोड़ा सा तुमसे आगे क्या निकली

तुमने मर्द होने के मद में

इतनी सी बात पर

फिर उन तीन लफ्जों का तीर छोड़ दिया

तीन लफ्जों को इतिहास बनना ही होगा…..

तुम अपने छोर

अपनी दुनिया के खूँटों पर

अटका कर आते रहे

और वो ढकी औरत 

अपने होने के कुछ मानी को माने

तो तुमसे छूट जाती रही

तुम्हारे छोर को पकड़ती

तो खुद से छूट जाती रही

सोचती ऐसा क्या करूँ

कि, तुम उसके साथ भी चलो

और वो भी तुम्हारे साथ-साथ चले

बहुत दिखा दिया तुमने

और देख लिया उसने 

उसके हिस्से के सूरज को

तीन लफ्जों की ओट से

तुमने ग्रहण लगाए रखा सदियों से

वो तुम्हारे अहं के लाक्षागृह में

खंडित इतिहास की कोई मूर्त्ति नहीं थी 

नहीं चाहिए उसे अब अपनी आँखों पर

तुम्हारा चश्मा

अब वो अपना कोई छोर तुम्हें नहीं पकड़ायेगी

दर्द की तेज़ धार पर चलते चलते

घावों को लिखती यह औरतें

उस औरत ने भी आज

सीख लिया है

ग्रहण पार देखना

पहला पड़ाव है यह तो

मंज़िलें बच कर कहाँ जाएंगी?

तीन लफ्जों को इतिहास बनना ही होगा…..

इतिहास को इतिहास ही रहने दो

उस औरत ने  नया आकाश तराशने के लिए

एक नयी औरत को

आमंत्रण दिया है

देखना तुम…..

पहला पड़ाव है यह तो उसका

तुम्हें तो साथ आना ही होगा

फिर मंज़िलें बच कर कहाँ जाएंगी?

000

 

नाम :  डॉ अनिता कपूर

संगठन: ग्लोबल हिन्दी ज्योति (संस्थापक एवं अध्यक्ष)

पता:    975 टेन्नीसन गार्डेन, फ्लेट #203, हेवर्ड, कैलिफोर्निया 94544 (अमेरिका)

ईमेल:  [email protected]

मो./ व्हाट्स अप 1-510-894-9570

 

 

 

 




मेरी मंज़िल

तुम ईंट फेंकना मैं पुल बनाऊँगी।
तुम इस पार रहना मैं उस पार जाऊँगी।

तुम बम लगाना मैं पौधे उगाऊँगी।
तुम विनाश के गीत गाना मैं पक्षियों का कलरव सुनाऊँगी।

तुम्हारी फेंकी ईंटों से मैं घबराती नहीं हूँ।
तुम्हारी फेंकी ईंटों से मैं घबराती नहीं हूँ।

सिंहनी हूँ मैं, कि गीदड़ों को मुँह लगाती नहीं हूँ।

तुम्हारी फेंकी ईंटें तुम्हारा भय बताती हैं।
मुझ से ज़्यादा ये तुम्हें भरमाती हैं।
इतिहास गवाह है,
कि हर ईंट फेंकने वाला पछताया है।
और इतिहास गवाह है,
कि हर ईंट खाने वाले ने कुछ अनोखा पाया है।

ईंट फेंकने वाले को दरकार होती है
ज़िद्दी हौसले की,
पर वो नहीं जानता
कि ईंटें, ज़िद्दी हौसले की
ख़ुराक होती हैं।
तुम फेंकते जाना,
मैं समेटती जाऊँगी।
तुम घटते जाओगे,
मैं बढ़ती जाऊँगी।

अपने भय के तुम ख़ुद शिकार हो।
और यह भय शिकार को शिकारी बताता है।

सुनो!
सुनो कि

इन ईंटों से पहले भी तोड़े होंगे तुम ने मनोबल।
और उस ध्वस्त इमारत से भी बटोरी होंगी ईंटें।
और उन ईंटों से लिखी होगी
फिर एक ध्वंस गाथा।
क्योंकि तुम यही कर सकते हो।
गढ़ना तुम ने कभी सीखा ही नहीं।
सृजन कभी तुम्हारा ध्येय नहीं रहा।
कल्पना कभी तुम्हारे स्वप्न में भी नहीं आयी।
विचारों के बीजांकुर को कभी स्वच्छ भाव-भूमि तुम दे न सके।
अपने ग़लीज़ व्यक्तित्त्व में कोई सुधार तुम कर न सके।

देखना!
देखना एक दिन
अपने भय में जीते तुम इतिहास हो जाओगे।
तुम्हारी ईंटों का हिस्सा ख़त्म हो जायेगा।
तुम्हारी ईंटों का हिस्सा ख़त्म हो जायेगा।

लेकिन!
लेकिन तब भी
ईंट खाने वाले कम न होंगे।
पुल बनाने वाले कम न होंगे।
पुल बनाने वाले कम न होंगे।

तुम अपने भय का अट्टहास करना, मैं मुक्ति का उत्सव मनाऊँगी।
तुम अपनी कारा के क़ैदी बनना, मैं उन्मुक्त गगन में उड़ान भरूँगी।

भय के इस बीहड़ में एक दिन तुम्हारे पास
केवल विभीषिकाएँ रह जायेंगी।
और पुल के उस पार मुझे मेरी मंज़िल मिल जायेगी।




” महिला दिवस काव्य प्रतोयोगिता हेतु कविता ” कविताओं का शीर्षक, ” अस्तित्व ”, ” नदी ”.

अस्तित्व
 
सागर से फिर मुलाकात हुई
पहले की तरह
करता रहा आकर्षित
बाहें पसार कर
बुलाता रहा अपने पास
मन हो चला नदी-नदी सा
बह जाने से पहले ही
पैर ठिठक गये
समर्पण का अर्थ
कयों है
अपने अस्तित्व को
बिसार देना.
 
 
 
नदी
 
नदी के मायने है खो जाना
समुद्र की गहराई में
नदी के मायने है
लुप्त हो जाना पाताल में
नदी के मायने है
सुखी एक लकीर बन जाना
नदी के मायने है
बस्ती बसा लेना किनारे अपने
गढ़ लेना एक सभ्यता अपने आंचल में
नदी के मायने है
प्रगल्भा बन किनारा लांघ
तुम्हें छू लेने की कोशिश
प्रलयंकारी बन उत्ताल मत्त
सब तहस-नहस कर देना भी है
नदी के मायने
सुधिर निर्झर कलकल नाद
बहते पत्थर को तराश कर बना दे
भगवान
मदी के मायने
औरत भी है
                 सुजाता शिवेन
 
 
Adds
Sujata Shiven
Adity Celebrity Homes
Flate no – 704
Sector- 76
Noida- 201301
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India
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“प्रेम-काव्य प्रतियोगिता”

प्रेम
— — — —
प्रीत पुरातन रीत रही मन मीत नही जग है दुखदाई।
खोल कहे मन की जिस बात को प्रेम बिना नजदीक न आई।।
प्रेमविहीन जिको उर जानहुँ बंजर खेत समान कहाई।।।
प्रेमबिना जग में कछु नाहिन वो दिल पत्त्थर रूप अंगाई।।1।।

जानहुँ वेश आभूषण धारहुं भाल न जा लग काढत टीका।
नैन न फाबत काजल के बिन बैन न मृदुल भाव सलीका।।
नेह बिना निज गेह जंचे किमि स्वाद न देवहि भोज न तीखा।।।
प्रेम बिना सब शून्य बराबर मानुस जीवन लागत फीका।।2।।

तात स्वभाव उग्र दिखही मन भीतर प्यार उबाल भरे हो।
मात सदा ममता दरसावत ले सुध सार-संभाल करे हो।
भ्रात कहे भगिनी बतलावत भ्रात को भ्रात हि ख्याल करे हो
प्यार पितामह बेहद राखत प्रेम प्रिया को बेहाल करे हो।।3।।

प्रेम रूलावत प्रेम हंसावत प्रेम दिखावत रूप जु नाना।
प्रेम बुलावत औ अकुलावत प्रेम सदा बुनवै मन ताना।।
प्रेम हिये सुर तान अलापत गावत है मन ही मन गाना।।।
प्रेम बिना सब नीरस लागत प्रेम ही भक्ति रूप रिझाना।।4।।

नौकर-चाकर औ सुविधा सब देख नही मन को हर्षावै।
कार मकान दुकान सबै लख-कोटिन संपत्ति धूल कहावै।।
प्राण प्रिया बिन ये जियरा तड़पे पल एक न चैन न पावै।।।
जोहत बाटन आंख तकी रह घेर वियोग की पीड़ सतावै।।5।।

संगत की उखड़े सब रंगत यो मनडो फिर कै विधि लागै।
बात-चर्चा कछु और करे पर प्रेम नही मन दूरहि भागै।।
आदर के बिन हाथ बढ़ेय न भोज बत्तीस रखे भल आगै।।।
प्रेमहि है अनमोल सबै कहि प्रेम यकायक प्रेम हि मांगै।।6।।

प्रेम बिना असरंग जंचे न धमाल संगीत न ताल-तरानों।
बेसुर लागत गायक- पायक मंच-पंडाल सबैहि बिरानों।।
औपत-सौपत नाहिं नजारन नृतक को नव नृत दिखानो।।।
प्रेम बयार चलै न जहाँ उस ठौर न भूल करैय न जानो।।7।।

प्रेम लुटे धन प्रेम लुटे मन प्रेम लुटे तन संपति सारी।
प्रेम बंसी सुन मोहि सबै ब्रज-गोकुल गांवन की नर-नारी।।
प्रेम अगाध सपूत वियोग उच्चारत राम को प्राण गंवारी।।।
प्रेमन के वस वा चकवी रह जाग्रत रैन बिताय बिखारी।।8।।

बारन बार न मानुस जीवन है अनमोल जु प्रेम-खजाना।
संत भक्त बिरला बस प्रेम की कीमत प्रेयसि-प्रेमिहि जाना।।
प्रेम कराय सर्वस्व अर्पण पराजय होत महाबलवाना।
प्रेम निगाह डिगाय हियो बस मार प्रभावहि भान भुलाना।।9।।

प्रेम अगाध सदा हर को अमिया बिन ना पल एक रहाई।
गोपिन के बिन कृष्ण रह्यो कद याद करी मुरली धुन गाई।।
विष्णु रह्यो न रमा बिन देखहुँ है चित्र पाँव पखारति पाई।।
नाम नरायन की रट टेरत नारद के मन प्रेम समाई।।10।।

प्रेम वही मन पाक सदा अरु वंचकता रति अंश नहीं हो।
भ्रात,पिता,पुत्र मातुल कोउक आदत को बस कंस नही हो।।
काक स्वभाव लगार न भावहि हो गुणवान तो हंस कही हो।।
मीत वही दिल मानवता बस दानववृति का वंश नही हो।।11।।

नैन लुभावन बैन सुहावन चैन नहीं जियरा कलपावै है।
प्राण प्रिया हर प्राण गयी गत मीन समी जल हीन कहावै।।
याद सतावत नींद न आवत मोहनि मंत्र विधा गई बावै।।।
खान न पान न अंग न लागत प्राण प्रिया बिन नाहि सुहावै।।12।।

— जबरा राम कंडारा




“प्रेम-काव्य प्रतियोगिता”

प्रेम
— — — —
प्रीत पुरातन रीत रही मन मीत नही जग है दुखदाई।
खोल कहे मन की जिस बात को प्रेम बिना नजदीक न आई।।
प्रेमविहीन जिको उर जानहुँ बंजर खेत समान कहाई।।।
प्रेमबिना जग में कछु नाहिन वो दिल पत्त्थर रूप अंगाई।।1।।

जानहुँ वेश आभूषण धारहुं भाल न जा लग काढत टीका।
नैन न फाबत काजल के बिन बैन न मृदुल भाव सलीका।।
नेह बिना निज गेह जंचे किमि स्वाद न देवहि भोज न तीखा।।।
प्रेम बिना सब शून्य बराबर मानुस जीवन लागत फीका।।2।।

तात स्वभाव उग्र दिखही मन भीतर प्यार उबाल भरे हो।
मात सदा ममता दरसावत ले सुध सार-संभाल करे हो।
भ्रात कहे भगिनी बतलावत भ्रात को भ्रात हि ख्याल करे हो
प्यार पितामह बेहद राखत प्रेम प्रिया को बेहाल करे हो।।3।।

प्रेम रूलावत प्रेम हंसावत प्रेम दिखावत रूप जु नाना।
प्रेम बुलावत औ अकुलावत प्रेम सदा बुनवै मन ताना।।
प्रेम हिये सुर तान अलापत गावत है मन ही मन गाना।।।
प्रेम बिना सब नीरस लागत प्रेम ही भक्ति रूप रिझाना।।4।।

नौकर-चाकर औ सुविधा सब देख नही मन को हर्षावै।
कार मकान दुकान सबै लख-कोटिन संपत्ति धूल कहावै।।
प्राण प्रिया बिन ये जियरा तड़पे पल एक न चैन न पावै।।।
जोहत बाटन आंख तकी रह घेर वियोग की पीड़ सतावै।।5।।

संगत की उखड़े सब रंगत यो मनडो फिर कै विधि लागै।
बात-चर्चा कछु और करे पर प्रेम नही मन दूरहि भागै।।
आदर के बिन हाथ बढ़ेय न भोज बत्तीस रखे भल आगै।।।
प्रेमहि है अनमोल सबै कहि प्रेम यकायक प्रेम हि मांगै।।6।।

प्रेम बिना असरंग जंचे न धमाल संगीत न ताल-तरानों।
बेसुर लागत गायक- पायक मंच-पंडाल सबैहि बिरानों।।
औपत-सौपत नाहिं नजारन नृतक को नव नृत दिखानो।।।
प्रेम बयार चलै न जहाँ उस ठौर न भूल करैय न जानो।।7।।

प्रेम लुटे धन प्रेम लुटे मन प्रेम लुटे तन संपति सारी।
प्रेम बंसी सुन मोहि सबै ब्रज-गोकुल गांवन की नर-नारी।।
प्रेम अगाध सपूत वियोग उच्चारत राम को प्राण गंवारी।।।
प्रेमन के वस वा चकवी रह जाग्रत रैन बिताय बिखारी।।8।।

बारन बार न मानुस जीवन है अनमोल जु प्रेम-खजाना।
संत भक्त बिरला बस प्रेम की कीमत प्रेयसि-प्रेमिहि जाना।।
प्रेम कराय सर्वस्व अर्पण पराजय होत महाबलवाना।
प्रेम निगाह डिगाय हियो बस मार प्रभावहि भान भुलाना।।9।।

प्रेम अगाध सदा हर को अमिया बिन ना पल एक रहाई।
गोपिन के बिन कृष्ण रह्यो कद याद करी मुरली धुन गाई।।
विष्णु रह्यो न रमा बिन देखहुँ है चित्र पाँव पखारति पाई।।
नाम नरायन की रट टेरत नारद के मन प्रेम समाई।।10।।

प्रेम वही मन पाक सदा अरु वंचकता रति अंश नहीं हो।
भ्रात,पिता,पुत्र मातुल कोउक आदत को बस कंस नही हो।।
काक स्वभाव लगार न भावहि हो गुणवान तो हंस कही हो।।
मीत वही दिल मानवता बस दानववृति का वंश नही हो।।11।।

नैन लुभावन बैन सुहावन चैन नहीं जियरा कलपावै है।
प्राण प्रिया हर प्राण गयी गत मीन समी जल हीन कहावै।।
याद सतावत नींद न आवत मोहनि मंत्र विधा गई बावै।।।
खान न पान न अंग न लागत प्राण प्रिया बिन नाहि सुहावै।।12।।

— जबरा राम कंडारा




प्रेम काव्य अंर्तराष्ट्रीय प्रतियोगिता

तुम—
मुझे अच्छा लगता है जब कोई मुझे तुम कहता है।
सुन रहे हो न तुम,
मुझे अच्छा लगता है जब कोई मुझे तुम कहता है।
क्योंकि मैं
तुम में ही तो हूँ,
तुम से ही तो हूँ,
तुम में ही तो मैं विलीन हूँ।
क्योंकि,
मैं हूँ ही नहीं, तुम ही तुम हो,
मेरे ख्यालों में, मेरे सवालों में,
मेरी नींदों में , मेरे ख्वाबों में,
मेरी जागृति में, मेरे फैसलों में,
मेरे अस्तित्व में, मेरे रोम- रोम में।
तुम ही तुम हो, मैं कहीं नहीं।
मेरे मानस पटल की हर दीवार और कौने में,
हो सके तो झांक कर देख लो,
क्या मालूम तुम फिर कभी आईना न देखो।
मुझे अच्छा लगता है जब कोई मुझे तुम कहता है।
क्योंकि मैं तुम में ही हूँ, तुम से ही हूँ।
क्या तुम्हें कुछ अच्छा नहीं लगता?
लग भी कैसे सकता है,
क्योंकि तुम तो तुम हो।
एक दिन जब तुम, तुम नहीं रहोगे,
तब,
तुम्हें भी कुछ अच्छा लगेगा।
मुझे अच्छा लगता है जब कोई मुझे तुम कहता है।