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रफ़ीक ऐसा नहीं था…

लगभग तीन वर्षों के बाद मैं रीवगंज गई थी। रीवगंज से मेरा परिचय हमारे विवाहोपरांत पतिदेव ने ही करवाया था। प्रकृति का समूचा आशीर्वाद मानो इस नन्हे से आँगन में बरबस ही समाया हुआ था लेकिन मुझे यहाँ कुछ ऐसा नहीं दिखता था जो स्मृति बन जाने योग्य रहा हो। सच कहूँ तो यह जगह मुझे कभी पसंद आई ही नहीं थी। शायद भीड़ से लगाव इस तरह हावी था कि सौंदर्य की परख करने वाली आँखों की क्षमता क्षीण हो चुकी थी। हाँ ! एक बात थी जो भुलाए न भूलती थी वह थी रफ़ीक की बिना सिर पैर की गोलमोल बातें। मेरी आश्चर्य से विस्तृत हुई आँखों को उसके तटस्थ उत्तर थोड़ा और विस्तार दे देते-” मैडम ऐसा ही है। किसी भी गिरते हुए को यूँ थाम लो तो वह ऊपर उठ जाता है” और अपने हाथ आसमान की ओर उठाए वह जाने किसे थाम लिया करता??? मैं अचंभित सी रह जाती। रफ़ीक का व्यक्तित्व मेरी समझ से परे था। न व शिक्षा का धनी था, न ही उसके पास सामाजिक सलीके थे। फिर ऐसी बड़ी-बड़ी बातें वह कैसे कर लेता था? मैं सोच में थी कि उसके शब्दों ने मुझे पुनः एक बार झंझोड़ दिया ” कॉफ़ी और जूस की दुनिया से बाहर निकलिए मैडम जी। आसमान से गिरती बूँदों में रूह तक पहुँचने का जज़्बा होता है।” वह शुरू हो जाए तो चुप नहीं होता था। मैं ही चुप रह गई और हल्की सी मुस्कुराहट फेर कर बाहर निकल लाॅन में टहलने लगी। पति हर वर्ष दफ़्तर के काम से यहाँ आते और उनके कमरे की देखरेख रफ़ीक के ही ज़िम्मे आती। मानो ईश्वर ने जिन कुछ बातों को क्रमवार सजा रखा था उनमें एक था रफ़ीक का इन से मिलना तभी तो शायद मैं भी उससे मिल पाई थी। गज़ब का व्यक्तित्व था उसका, दौड़-दौड़ कर सारा काम कर आता था। अपने भी दूसरों के भी। मजाल है थक जाए। उसके थकने का तो भ्रम भी मुश्किल ही था। उसके विषय में जानने की इच्छा जाग्रत हुई जो निराधार नहीं थी। शायद उससे मिलने वाला हर व्यक्ति उसे जानना चाहता। लेकिन इतना ही जान पाई कि भरा पूरा परिवार है, कहाँ है? कौन है? यह जानना शायद शीघ्रता करना था। रफ़ीक मुसलमान था, अल्लाह का नेक बंदा। इतना जान लेना ही बनता था। धर्म की दीवारें इतनी नीची न थी कि उस और झाँक पाना सहज हो पाता। पिछली बार उससे मिली तो कुछ क्लांत दिखा था। हँसी वही थी, स्वर बदल गए थे। कारण मेरी समझ में नहीं आया, न मैंने समझना ही चाहा। आज पूरे 3 वर्षों बाद रीवगंज पहुँचकर निगाहें रफ़ीक को ढूँढ रही थीं। उसकी बातों के लिए कान ठहर-से गए थे, मगर वह कहीं न था। मोहन चाय की ट्रे लेकर आया तो रहा न गया और रफ़ीक के विषय में उससे पूछ लिया। क्षण मात्र को उसके चेहरे पर घृणा और तिरस्कार की कालिमा फैल गई। जिह्वा तिक्त हो गई मानो कुछ कड़वा निगल लिया हो? जाते-जाते कहता गया-” मर गया मैडम जी! मर गया साला। पिछले साल हुए आतंकवादी हमले में उसका बड़ा हाथ था। पुलिस ने उसे पकड़ लिया था। पुलिस चाहती थी अपना अपराध वह मान ले। खूब मारा-पीटा गया लेकिन ऐसी कठिन जान कि टस से मस न हुआ। बस फिर तो कोई रास्ता ही न बचा उसे मार देने के सिवाय।” एक ज़ोर की आवाज़ हुई और दूर कहीं बादल ज़मीन पर आ गिरे थे। उन्हें थामने वाले हाथ जो अब नहीं थे। सच की तस्वीर बदल गई थी। अनगिनत सच काले रंगों में रंग दिए गए थे। होठ इतना ही कह पाए- रफ़ीक ऐसा नहीं था।

बीना अजय मिश्रा




डिवाइडर

कहानी- डिवाइडर
रात के अंधकार में रिमझिम बारिश की फुहार पड़ रही थी। एक वृद्धा अपने आप को समेटे डिवाइडर पर विराजमान थी।

कहा गया है ,कि, जीवन का आवागमन मोक्ष प्राप्त होने तक जारी रहता है ।पाप पुण्य का हिसाब बराबर होते ही सांसारिक कर्मों से मुक्ति मिल जाती है ।
डिवाइडर पर बैठी वृद्ध महिला न जाने कौन से पाप का फल भुगत रही थी , कि, रात में अकेली अपने परिवार से दूर क्लेश में बैठी है।

वृद्धा संपन्न परिवार की महिला थी, उसका पति ग्राम का प्रधान था ।उसकी समाज में अच्छी प्रतिष्ठा थी। चुनावी रंजिश में चुनाव के समय कुछ विपक्षी सिरफिरे लोगों ने ,प्रधान की हत्या कर दी ।चुनावी सरगर्मी के मध्य पुलिस ने कुछ अभियुक्तों को गिरफ्तार किया, किंतु ,वृद्धा का तो सुहाग उजड़ गया था। उसका एक मात्र बारह वर्ष का बालक था। अबोध बचपन अपनी मां के सहारे जीवन के पायदान पर कदम रख रहा था ।उसे राजनीति की समझ बिल्कुल ना थी। मां ही उसका सबसे बड़ा सहारा थी।

बालक का नाम चेतन था ।चेतन का पालन पोषण उसकी मां ने किया। उसे डिग्री कॉलेज भेज कर उसकी अच्छी शिक्षा का प्रबंध किया ।चेतन ग्रेजुएट होकर अपने गांव वापस आया। गांव में उसके पास कई एकड़ खेत , बाग बगीचे थे, जिन की देखभाल वह करने लगा ।मां निश्चिंत होकर अब बहू के सपने देख सकती थी। उसने निकट के ग्राम में अपनी बिरादरी में सुंदर सी कन्या पसंद की ।चेतन को भी कन्या सरिता की मोहक मुस्कान घर कर गई। दोनों में कुछ वार्तालाप हुआ, और ,दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे। सरिता अधिक पढ़ी-लिखी ना थी ।उसने मिडिल स्कूल तक पढ़ाई की थी। उसके परिवार वाले कन्याओं को अधिक शिक्षित करने की अपेक्षा घर गृहस्ती में दक्ष करना अधिक पसंद करते थे ।सरिता व्यवहार कुशल थी। बड़ों का मान सम्मान करना ,उसे आता था ।

ग्रामीण समाज में पुरुष वर्ग की श्रेष्ठता निर्विवाद रूप से देखी जा सकती है ।आधुनिक समय में ,जब हमारा संविधान लैंगिक समानता एवं बराबरी के अवसर प्रदान करने की बात करता है ,तब,उस काल में ग्रामीण महिलाओं की उपेक्षा दुखद है।

चेतन और सरिता का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ ।सरिता के मायके वालों ने दहेज में खूब धनराशि ,गहने व उपहार देकर अपनी बेटी विदा की ।वह इस आशय से कि उसकी बेटी को ससुराल में कोई कमी नहीं होगी। ससुराल में उसका सिर नीचा नहीं होगा।

शिक्षित समाज में शिक्षा के साथ-साथ दहेज प्रथा एक अभिशाप है ।शिक्षित कन्या घर के लिए एक वरदान साबित होती है। वह न केवल अपने पति का सहारा बन सकती है किंतु, संकट के समय खड़े होकर ,उसे संकट से मुक्त करने की क्षमता भी रखी है ।शिक्षित कन्या हेतु दहेज का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ।वह स्वयं अर्थोपार्जन कर सकती है ।

शनै:शनै: गृहस्थी की गाड़ी चलने लगी ।चेतन की मां सुंदर कुशल बहु पाकर अत्यंत खुश थी। बहू घर का सारा काम काज करती ।चेतन की मां पलंग पर बैठे बैठे उसे निर्देश देती थी।

सरिता अब गर्भवती थी ।अब उसे घर का कामकाज करने में परेशानी हो रही थी ।उसकी सास काम ना पूरा होने पर, भाँति -भाँति के ताने देती। उससे सरिता मन ही मन क्षुब्ध रहने लगी।

सरिता ने चेतन के कान भरने शुरू किये। सुबक सुबक कर उसने अपने हालात का वर्णन किया। उसने कहा कि ,उसे सहारे की आवश्यकता है। अब तुम्हारी मां के ताने बर्दाश्त से बाहर हैं। मुझे मायके भेज दो ।
चेतन ने सरिताके हित में निर्णय लेकर, अपनी मां को बहू के निर्णय से अवगत कराया ।चेतन की मां ,इस परिस्थिति के लिए कतई तैयार नहीं थी। बहू की अनुपस्थिति में उसके सिर पर घर की पूरी जिम्मेदारी आने वाली थी ।उसने अपने स्वास्थ्य का हवाला देकर बहू को भेजने में असमर्थता जाहिर की। बहू ने खत लिख कर अपने हालात से मायके वालों को सूचित कर दिया। सरिता के पिता अपनी बेटी को लेने अकस्मात आ पहुंचे ।यह देखकर चेतन की मां नाराज हो गई। उसने खाना पीना छोड़ दिया और अनशन पर बैठ गयी।

चेतन ने ,मां का यह रूप प्रथम बार देखा था। उधर सरिता का रो-रोकर बुरा हाल था। चेतन के एक तरफ पत्नी का आग्रह तो दूसरी तरफ मां का पूर्वाग्रह था। सास और पत्नी के पाटों के बीच बेचारा चेतन हतप्रभ था। आखिर में, पत्नी का पक्ष लेते हुए उसने मां को समझाने की बहुत कोशिश की ,किंतु ,मां अपने निर्णय से टस से मस ना हुई। उसे चेतन का बहू का पक्ष लेना तनिक भी ना भाया। उसने उसी रात घर छोड़ने का निर्णय किया कर लिया ।घर में सरिता, उसके पिता और चेतन को अकेला छोड़ कर चेतन की मां रात्रि के अंधकार में एकमात्र चादर साथ लेकर घर से निकल गयी। उसने हाईवे के डिवाइडर पर अपना बसेरा बनाया बना लिया।

जीवन का मार्ग भी एकल मार्ग तरह होता है ।डिवाइडर के एक तरफ आगमन होता है तो दूसरी तरफ गमन होता है ।जिंदगी के प्रारंभ में जब परिवार का निर्माण होता है ,तो, युवा वर्ग में खुशियों का आगमन होता है। यह युवा वर्ग आगमन पथ का पथिक होता है। जीवन के उत्तरार्ध में वयस्क का गमन होता है। उम्र के इस पड़ाव को पीढ़ियों का अंतराल कहते हैं। बीच में उम्र का डिवाइडर दोनों पीढ़ियों में अंतर स्पष्ट करता है ।

आज चेतन और उसकी मां के मध्य यही डिवाइडर खड़ा है। जिसने दोनों पीढ़ियों में मतभेद जाहिर कर दिया है।

प्रातः चेतन अपनी मां को ना पाकर उसे खोजने निकला ।हाईवे के डिवाइडर पर एक वृद्धा को भीगे बदन ठिठुरते देखा ।उत्सुकता वश उसने बुद्धा का मलिन चेहरा गौर से देखा। उसने पहचाना ,वह उसकी मां थी।वह अपनी मां के पास पहुंचा ,और, क्षमा मांगते हुए उससे घर चलने का आग्रह किया। काफी मान -मनोव्वल के पश्चात उसने घर चलना स्वीकार किया। दोनों मां-बेटे घर लौट आये।उसने अपनी मां की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी ली । बहू सरिता अपने पिता के साथ मायके चली गई थी। मां को बहू की खिलखिलाती हंसी, उसका चहचहाना याद आ रहा था। सूने घर के साथ उसके हृदय का एक कोना भी सूना हो गया था।

डॉ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, प्रेम
वरिष्ठ परामर्श दाता, प्रभारी रक्त कोष
जिला चिकित्सालय, सीतापुर।
9450022526




तुम्हारे गीत मेरी आवाज़

*तुम्हारे गीत मेरी आवाज़*
विधा : कविता

कभी गमो का साया भी
नहीं पड़े तुम पर।
खुशी की गीत गाओ
उदासियों की महफ़िल में।
बहुत सुकून मिलेगा
मायूसो के चेहरे पर।
महफ़िल में रोनक आ जायेगी
तुम्हारे गीतों को सुनकर।।

मिले गमो का साया भी,
उसको भी गीत बना लेंगे।
तेरी जुल्फों की साया में
हम सारी रात बिता देंगे।
क्योंकि सुनकर तुम्हारे गीत
मै मोहित हो गया हूँ।
भूल गया सारे गमो को
और दिवाना हो गया हूँ।
दिलकी धड़कनो में अब
तुम ही तुम धड़क रही हो।।

अब मुझे न नींद आ रही
न ही मन मेरा लग रहा है।
अब तेरी याद सता रही है
और बेचैनी बड़ा रही है।
मुझे अपना मीत बना लो
होठों से मेरे गीत सजा लो।
तुम्हारी बेचैनी मिट जायेगी
जब दिलमें शमा जाओगी।।

अब तुम्हें देखकर लिखता हूँ।
और बस तुम्हें ही गाता हूँ।
आवाज़ मेरी होती है
पर दिलसे तुम गवाते हो।
और मेरी वाह-2 करवाते हो।।

जय जिनेंद्र देव
संजय जैन (मुंबई)
17/01/2021




अंतरराष्ट्रीय “प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता” “प्रेम का आधार”

प्रेम का आधार

मेरे प्यार के सपनों की दुनिया में, तुम आकर तो देखो ।
ना जाने क्यों इतने दूर हो, मेरी बाहों में समाकर तो देखो ।
बहुत सहली दूरियाँ, मुलाकातों का सिलसिला चलाकर तो देखो ।
कभी पास अपने बुलाकर, कभी पास हमारे आकर तो देखो ।
कभी प्रेम को, अपना आधार बनाकर तो देखो ।

कभी मुझे अपने दर्द का, हमदर्द बनाकर तो देखो ।
फूल बन जाओ कभी, भंवरा मुझे बनाकर तो देखो ।
कभी अपने हर राज़ का राज़दार बनाकर तो देखो ।
कभी चाँद तुम बन जाओ, चाँदनी हमें बनाकर तो देखो ।
कभी प्रेम को, अपना आधार बनाकर तो देखो ।

सर्वस्व माना तुम्हें, कभी अपना तुम भी बनाकर तो देखो ।
कभी राधा के कृष्ण, कभी मीरा के घनश्याम बनाकर तो देखो ।
दूरियाँ मिटाकर, कभी तुम भी पास आकर तो देखो ।
कभी मैं तुममे, कभी तुम मुझमे समाकर तो देखो ।
कभी प्रेम को, अपना आधार बना कर तो देखो ।

कभी हाँथ थामकर, सपनो को हक़ीकत बनाकर तो देखो ।
जीवन भर के लिए, अपना हमसफ़र बना कर तो देखो ।
प्यार है अगर हमसे, तो ज़माने को झुकाकर तो देखो ।
प्रेम का अनोखा एहसास, मन का अन्धकार मिटाकर तो देखो ।
कभी प्रेम को, अपना आधार बना कर तो देखो ।

कभी इस दिल पर, अपना अधिकार जताकर तो देखो ।
अपने प्यार पर, रिश्ते की बुनियाद बना कर तो देखो ।
अपनी चाहत की खुशबू से, साँसों को महकाकर तो देखो ।
इस अंधेरे दिल में कभी प्रेम का दीपक जलाकर तो देखो ।
कभी प्रेम को, अपना आधार बना कर तो देखो ।

                                                                                  ***

PRERANA ARIANAICK

ADDRESS: ROYAL ROAD LA ROSA, NEW-GROVE, MAURITIUS

18 YEARS/ COLLEGE: MGI MOKA, MAURITIUS

CLASS: 12/ EMAIL: [email protected]

+23059238444/ +23059119263




” अंतराष्ट्रीय महिला दिवस प्रतियोगिता”

सबसे सुन्दर सर्वोपरि हो,सकल गुणों की खान हो।
सबसे ऊंचा कद तुम्हारा,तीन लोक में महान हो।।
धैर्य तो है धरती के जैसा, क्षमाशील हो नामी।
सर्व गुण सम्पन्न हो नारी, कछु नहीं है खामी ।।
दादी माता बुआ बहिन हो,पुत्री प्यारी-प्यारी ।
पत्नी बन परिवार बढाती,धन्य हो तुम नारी।।
सुख-दुःख सारे सह कर भी,विचलित नही होती।
ध्यान सभी का रखती पूरा,सुला के सबको सोती।।
दादी लडती कभी अकडती,तुम कैसे सह लेती हो।
बडी ही सहनशील हो माता, धैर्य न डिगने देती हो।।
बहिन ऐसी भाई-बहिन हित,जान छिडकती रहती हो।
सदा भला सभी का चाहती,निर्मल जल-सी बहती हो।।
पुत्री बन कर मां-बाप को,इतना खुश कर लेती हो।
दुखः सह कर भी मायकै पै,आंच न आने देती हो।।
सुख-दुख की सहभागी बन,जीवन बाग खिलाती हो।
खुशियों को संभव कर देती, प्यार का रस पिलाती हो।।
गुरू बन कर निज बच्चो में,भर देती संस्कार सभी।
जब तक वो सफल न होते,जरा न पाती चैन कभी।।
नारी बहुत बढ़ गई आगे,बदल गयी सब झाकी है।
हर क्षैत्र में पदासीन हुई ,बचा नहीं कोई बाकी है।।
लक्ष्मी रूपा गौरी रूपा , और शारदा की छवि हो।
लेखक साहित्यकार निराली,वाक्ई सक्षम कवि हो।।
नेता-अभिनेता भी तुम हो,विश्व पटल पर छा गयी हो।
बन वैज्ञानिक चंद्र लोक पर,घुम-घुमा कर आ गयी हो।।
नारी तुम देवी रूपा हो, आन-बान और शान हो।
तुम दर्शनीय तुम वंदनीय,तुम प्रशंशनीय महान हो।।
तुम सम्मानित हम सम्मानित,ऐसै ही मन भाव संवारै।
नारी का अपमान नहीं हो, ऐसा ही सब सोच -विचारै।।
आदर और सम्मान योग्य ये,हम युग-युग आभारी है।
कोटि-कोटि वंदन है तुमको,तुम जग की महतारी है।।
महिला का सम्मान करै सब यही, हमारा कहना है।
सारे जग की शोभा नारी ,नर का अनुपम गहना है।।
महिला दिवस की तरह सदा,महिला का हो सम्मान ।
संस्कारों की दाता सक्षम, है ये तो दो घरों की शान।।
नर बडा तबही बनता है, जब महिला आगे आती है।
नारी के बिन सब जग सूना ,सृष्टि नहीं चल पाती है।।
महिलाओ का सच्चे दिल से, करै सब मान-सम्मान।
हर क्षेत्र में आगे होगी,सच में होगा ये भारत महान।।

*** जबरा राम कण्डारा ***




प्रेम काव्य प्रतियोगिता हेतु रचना “दिल पर रंग”

 

दिल पर रंग चढ़ा कर देखो,
गीत लबों पर ला कर देखो।
दुनियां दारी यूँ ही चलेगी,
दिल अपना बहला कर देखो।

पशोपेस में उम्र गुज़री,
दिल तो ज़रा लगा कर देखो।
मीत मिला जो मन का यारों ,
उस पर प्यार लुटा कर देखो।

मौसम इतना हँसी हो गया है,
पलकें ज़रा उठा कर देखो ।
कभी हो नग़मा कभी हो आँसू,
धड़कन आग बना कर देखो।

मंज़िल को पाना है राही,
एक- एक कदम बढ़ा कर देखो।
जाति वर्ग की जगह न कोई ,
हर दीवार हटा कर देखो ।

( शिक्षिका )
फ़तेहपुर उत्तर प्रदेश




अन्तर्राष्ट्रीय प्रेम-काव्य-लेखन प्रतियोगिता

*अंतरराष्ट्रीय “प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता”*

   शीर्षक :     ” बसन्त “

होने लगा है जिस पल से मुझको
खुद में तेरे होने का एहसास।
मैं खो सी गई । मैं,मैं न रही ,
बस तू ही मुझमें ,बस तू ही ख़ास।

मेरे अन्तर्मन की गहराई में कभी
बहती नदिया की अविरल धारा।
और कभी लहरों का तूफाँ लेकर
सागर  समा जाता सारा।

जैसे बसन्त के आने पर
धरती करती अपना श्रंगार।
तेरे एहसास की आहट से ,
बज उठता मन का तार-तार।

बार-बार ये करता प्रश्न
मेरा एकाकी और शंकित मन
कौन हो तुम? कहाँ से आए ?
बसन्त हो तुम या हो सावन ?

निरंतर समाते जा रहे हो
मेरे हृदय के धरातल में
मैं सकुचाई सी, मौन सी
सिमट रही बस आँचल में ।

यूँ ही सदा छाए रहना तुम
जीवन में मेरे ऋतुराज बसन्त।
मदमस्त ,बेफिक्र, अल्हड़ सी
तितली सी उडूँ जीवन-पर्यन्त।

यूँ ही सदा छाए रहना तुम
जीवन में मेरे ऋतुराज बसन्त.

(स्वरचित )

…समिधा नवीन वर्मा
लेखक/ब्लॉगर/अनुवादक/यूट्यूबर
पता: लवली लॉज, गिल कालोनी,
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश )
भारत ।
Ph. 9456027187




विषय:- प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु कविता:- बात उन दिनों की थी

विषय:- प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु
कविता:- बात उन दिनों की थी

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बात उन दिनों की थी
जब मैं पहेली बार तुझसे मिलने को आया
थोड़ा सरमाया थोड़ा घबराया
तू थोड़ा सा बेताब सी थी
मुझसे मिलने को उत्सुक सी थी
तुझसे मिले अरसा सा हो गया था
तुझ तक पहुचने में खर्चा सा हो गया था
तुझे उठाया
गले से लगाया
तुझसे मिलने की बड़ी आरजू थी बड़ी बेताबी थी
तुझे देख कर
तेरे चहेरे पर हर शब्द पढ़ लिया मैंने
तुझमे लिखा हर छण जी लिया मैंने
ये बात उन दिनों की थी

जब तुझे पढ़ कर हर इम्तेहान दे दिया करता था
तुझे सीने से लगा कर पूरी रात सो लिया करता था
कभी तुझे उठाने में मेरी कमर नहीं झुकी
कभी तुझे भुजता देख मेरी सांसें नहीं रुकी
तुझमे लिखा हर शब्द मुझे भाता था
तुझे पढ़ कर मेरा रोम रोम खिल जाता था
ये बात उन दिनों की थी

जब तू ही तो थी
जो मेरे साथ उठती बैठती थी
मेरे लाख कोशिशों बाद भी मैं तुझे मना न सका
तुझे अपने इम्तेहान के वक़्त लेजा न सका
मुझे पता था तू मुझसे नाराज थी
पर क्या करता मुझे भी खुद से आस थी
ये बात उन दिनों की थी

जब मैं तुझसे दूर जा रहा था
किसी और के करीब आ रहा था
अब वो बात नहीं थी
तुझसे बिछड़ कर मेरी कोई रात नहीं थी
वो चहरे पर शब्द पढ़ लेना
वो तुझमे लिखा हर छण जी लेना
तू थी तो हर इम्तेहान पास हो जाता था
तुझे पाकर ये जीवन आम से खास हो जाता था
तू गई तो ये जीवन वीराना सा हो गया है
सब कुछ अब अनजाना सा हो गया है
ये बात एक दिन की नहीं कई दिनों की थी
ये कोई और नहीं
ये मेरी किताब थी
ये बात उन दिनों की थी
ये बात उन दिनों की थी……….||

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रचनाकार का नाम:- रितेश जिंदल
पदनाम:- अधिवक्ता
डाक पता:- पुरानी मंडी, वार्ड न.08, सितारगंज, उधम
सिंह नगर, उत्तराखंड, पिन कोड- 262405
ईमेल पता:- [email protected]
मोबाइल/ व्हाट्सएप्प नंबर:- 8433193713




‘तेरे बिना’ प्रेम काव्य प्रतियोगिता हेतु

मुझे याद आता है-

                      गुजरा हुआ

                      हर एक पल

                      जो

                      तेरे बिना

                      तनहाई में

                      गुजारे मैने

मुझे याद आते हैं-

                       वो लम्हे

                       जो

                       तेरे साथ

                       चोरी-चोरी

                       जी लिए मैंने

                       तन्हाइयों को

                      अंगूठा दिखा कर

मुझे याद आता है-

                       वो स्पर्श

                       जो

                       तेरे होंठ से लेकर अंतर्मन तक

                       जिला गया मुझको

                       तुच्छ से कुछ तक का

                       सफर करा गया

                       मुझको

मुझे याद आता है-

                      वो मेरा हाथ थामना

                      वो मेरे आँसू पोंछना

                      यकीन दिलाना मुझको

                      कि

                      तुम मेरी हो

                      हमेशा – हमेशा

                      रहोगी मेरे सीने में

                      मेरे प्राण बनकर

मुझे याद आता है-

                       मुझे

                       करीब आते देखकर

                       वो तेरा मुस्करा देना

                       लब खोलकर

                       मुझको

                      आमंत्रित करना

                       कि देखो

                      लाली भले खराब हो

                      कोई देख न ले

                      प्रमाण

                      अपने प्रेम का

मुझे याद आता है-

                      वो फट से अपने गालों को

                      मेरी ओर फेरना

                      कि देखो

                      कोई देख न ले

                      हमको

                      हमारे प्यार को

                      नज़र न लगे

                      किसी अपने – पराये की

मुझे याद आता है-

                       वो तेरा आखिरी धक्का

                       या कहूँ ‘धोखा’

                       कि तुमने

                       क्यूँ किया ऐसा

                       अपनों की भीड़ में खोकर

                        मुझे

                       फिर छोड़ दिया तन्हा

                       घुट-घुट कर मरने को

                       मजबूरन जीने को

मुझे याद आता है-

                       मेरा भगवान आज फिर

                       कुछ ऐसा हो जाए

                       इक बार के लिए

                       तू फिर से आ जाए

                       मुझको सिखा जाए

                       कैसे जीऊँगा मैं

                       तन्हा तेरे बिना

                                                             -‘चाँद दईजरी’




महिला- दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता – ” बेटी “

                        बेटी

                   पढ़ें बेटियाँ, बढ़ें बेटियाँँ                                                     उच्च शिखर पर चढ़ें बेटियाँ                                                सदाचार की भट्ठी मे तप                                                    अपना जीवन गढ़ें बेटियाँ ।

   चूल्हे चौके तक ही सीमित                                      नहीं रही अब तो यह बेटी ।

    पढ़ लिखकर घर का,स्वदेश का                               मान बढ़ाती है यह बेटी ।

     बनती है शिक्षिका, चिकित्सक                               निज कर्त्तव्य निभाती बेटी ।

     करती नव पीढ़ी को शिक्षित                                    स्वस्थ समाज बनाती बेटी ।

      मातृभूमि की रक्षा हित अब                                    सेना मे भी जाती बेटी ।

       सरहद पर दुश्मन को भी अब                                  डटकर सबक सिखाती बेटी ।

        पर्वत की ऊँची से ऊँची                                           चोटी पर चढ़ जाती बेटी ।

        और तिरंगा गाड़ वहाँ                                             भारत का मान बढ़ाती बेटी ।

         राजनीति मे जब जाती है                                        ऊँची कुर्सी पाती बेटी ।

          राह समर्पण-सेवा का                                             अपनाती,नाम कमाती बेटी ।

          पत्रकार बनकर समाज को                                    सच्ची राह दिखाती बेटी ।

           माँ-पत्नी-बेटी-बहना का                                        भी है फर्ज निभाती बेटी ।

            घर बाहर के सब कामों मे                                      सामंजस्य बिठाती बेटी ।

            समय पड़े होती कठोर पर                                      यूँ होती अति कोमल बेटी ।

            अपना भारत धन्य जहाँ                                         घर-घर मे पूजी जाती बेटी ।

 

   उपर्युक्त कविता मेरी मौलिक और स्वरचित है।इस पर किसी तरह का कापीराइट विवाद नहीं है ।                          अनन्तप्रसाद ‘रामभरोसे’                                         ग्राम पोस्ट-सागरपाली ,      जिला-बलिया।                  पिन कोड-277506    (उ.प्र.)   भारत                    मो. न.-9838408017