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“अंतराष्ट्रीय महिला दिवस प्रतियोगिता” शीर्षक”मां”

माँ
:::::::::
माँ ही शिक्षक महान जगत में अच्छा पाठ पढाती है।
हिम्मत और होंसला दे कर,आगे सदा बढाती है।।1।।
माँ दुनिया की महान विभूति,त्याग तपस्या की मूरत है।
मनुज सृष्टि की रचयिता,माँ ईश्वर की सूरत है।।2।।
माँ में सकल गुण समाहित,सकल गुणों की खान है।
कोई नही है माँ से बढ कर,माँ तो सदा महान है।।3।।
धैर्य ममता सहनशीलता,दया करूणा का सागर है।
प्यार की गंगा माँ के दिल में,कोई न तोर बराबर है।।4।।
सारक तारक पालक पोषक,सहायक नायक माता है।
हमको लायक करने का बस,श्रेय तुम्ही को जाता है।।5।।
तेरे बिन सारा जग सूना,सूना जीवन सारा है।
मत जाना माँ हमें छोड कर,कोई नही हमारा है।।6।।
हर दम ध्यान सभी का रखती,कितनी भोली भाली माँ।
पास बैठ कर हमें जिमाती,तूं भोजन की थाली माँ।।7।।
जब कभी बीमार पडे हम,तूं मन ही मन रोती है।
गऊं की भांति तडपने लगती,नही रात भर सोती है।।8।।
हमे सुलाती थी सूखे में ,खुद गीले में सो जाती थी।
हमरी खुशियो में ही सारी,अपनी खुशियां पाती थी।।9।।
पास हुआ कोई जब तूं सुनती,तूं झूमने लगती माँ।
पूजा कर टीका लगवाती,और चूमने लगती माँ।।10।।
कोई नही है मां से बढ कर,माँ गुरू ईश्वर सारी है।
तेरी महिमा हद से ज्यादा,सबसे ज्यादा प्यारी है।।11।।
तूं पापा के बीच आ जाती,भला बूरा सुन लेती है।
खुद कहती पर ओरों को,कुछ नही कहने देती है।।12।।
निज बच्चों के लिए तूं दिल में,लाखों स्वप्न संजोती है।
रात-दिन बच्चो की रहती,खुद की चिंता ना होती है।।13।।
दादी मां ने खूब बखानी,तारीफ दादा जी ने की थी।
बहुत ही मस्त हमारी भाभी,पक्ष भुआ ने हरदम ली थी।।14।।
दिया न मौका शिकवा कभी,कितने काम तूं कर लेती है।
सबके दिल में तूं खशियों का,बाग खडा कर देती है।।15।।
हम जहां कहां भी होते,ज्यादा चिंता करती है।
लिये सभी के जीती है तूं,जान छिडकती मरती है।।16।।
मां चरणो में अडसठ तीरथ,तव चरणों में चारों धाम।
आशीर्वाद तुम्हारा चाहिये,हे!पूजनीय माँ प्रणाम।।17।।

*** जबरा राम कण्डारा ***
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महिला दिवस काव्य लेखन प्रतियोगिता

सृजन आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई पत्रिका
(महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता लेखन)
(प्रतिभा नारी को भी अपनी दिखलाने दो)

प्रतिभा नारी को भी अपनी दिखलाने दो
बाधाओं को लांघ उसे बाहर आने दो
(1)
हर युग में रावण सीता को हरता आया है
चीर हरण दुशासन उसका करता आया है
दाँव पे रखकर नारी को नर छलता आया है
अग्नि परीक्षा लेकर लज्जित करता आया है
राम भरोसे नारी को अब मत रह जाने दो
बाधाओं को लांघ…
(2)
देख अकेली महिला को जो हवस मिटाते हैं
इंसानी रिश्तों को पल में बिसरा जाते हैं
मौक़ा पाकर इज्जत को नीलाम कराते हैं
साक्ष्य मिटाने ख़ातिर हत्या तक कर जाते हैं
ऐसे नर भक्षियो को अब शूली चढ़वाने दो
बाधाओं को लांघ…
(3)
धन के लोभी नारी को जो रोज़ सताते हैं
क्रूर यातनाएँ देकर हत्या करवाते हैं
चाँदी के सिक्कों में बेटों को तुलवाते हैं
पशुओं की मानिंद उनकी बिक्री करवाते हैं
उनके चंगुल से नारी को मुक्त कराने दो
बाधाओं को लांघ..
(4)
जिस नारी को कुल्टा कहकर पुरुष सताता है
बेबश अबला पर अपना पौरुष दिखलाता है
पैर की जूती कहकर मन ही मन मुस्काता है
व्यंग बाणो की बौछारों से उसे रुलाता है
उस नारी को अब तो रणचंडी बन जाने दो
बाधाओं को लांघ…
(5)
जिस नारी ने गर्भ में अपने नर को पाला है
संकट की हर घड़ी में उसको सदा संभाला है
उस नर ने ही नारी को उलझन में डाला है
अहम् भावना ने नर को दम्भी कर डाला है
पुरुष दंभ से नारी को अब मुक्त कराने दो
बाधाओं को लांघ ..
(6)
गर्भ में ही गर्भस्थ शिशु को जो मरवाते हैं
बेटा-बेटी के अंतर को समझ ना पाते हैं
बेटों से बेटी सी सेवा कभी ना पाते हैं
वृद्धावस्था में जाकर फिर वो पछताते हैं
लिंग भेद की प्रथा को अब तो मिट जाने दो
प्रतिभा नारी को भी अपनी दिखलाने दो
बाधाओं को लांघ उसे बाहर आने दो !!
स्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम,स्पेज सेक्टर-93(9717531426)

-मेरी नियति-

कब तक यूँ ही-
तिल-तिल कर
मरती रहूँगी मैं
हर दिन हर पल
ज़िंदा जलती रहूँगी मैं ?
कभी जली हूँ-
दहेज की ख़ातिर
कभी मिटी हूँ-
हवस की ख़ातिर
कभी होती हूँ-
घरेलू हिंसा की शिकार
तो कभी होता है मेरा
लव जेहाद के नाम पर व्यापार
आख़िर क्यों कर रहा है मुझसे
मेरी ही कोख से जन्मा मानव
दानव सरीखा व्यवहार ?

कब तक लड़ती रहूँगी मैं जंग
ज़िंदगी की-
जलती आग से
वहशी जल्लाद से
लव जेहाद से
दहेज लोलुप समाज से ?

क्या यही है मेरी नियति
तिल-तिल कर मरना और
ज़िंदा जलना..?
स्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम(हरियाणा)

(स्त्रीनामा)
बहुत मुश्किल काम है स्त्री होना
स्त्री होकर दूसरों की भावनाओं को समझना-समझाना
स्त्री एक है रुप अनेक
कहीं माँ बन परिवार पालती है
कहीं पत्नी बन घर संभालती है
कहीं बहन बन भाई को दुलारती है
तो कभी बेटी बन घर-आँगन सँवारती है
कब वह चिड़िया बन आसमान में उड़ने लगेगी
कब धरती पर परिश्रम की चाशनी में गोते लगाएगी
पता नहीं चलता

लोग कहते हैं-
महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा
दया ममता करुणा ज़्यादा होती है
मैं कहता हूँ-
किसने कहा पुरुषों में दया ममता करुणा होती नहीं
दरअसल दया ममता करुणा मात्र महिलाओं की बपौती नहीं
कुछ पुरुष महिलाओं से भी अधिक
कोमल करुण संवेदनशील होते हैं
उनकी छाती में फूट-फूट कर
रोया भी जा सकता है और
निश्चिंत हो पहलू में सोया भी जा सकता है
सच तो यह है कि-
स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं
स्त्री अर्धांगिनी तो पुरुष उसकी ज़रूरत है !!
स्वरचित मौलिक
राजपाल यादव,गुरुग्राम(हरियाणा)




चलो मिलते हैं

चलो कहीं मिलते हैं,

पल दो पल की ज़िन्दगी जीते हैं ।

 कुछ तुम कहो , कुछ हम कहें , 

ज़माने की अनसुनी करते हैं । 

हाथों में हाथ लिए बैठते हैं, 

ना कस्मे ना वादे , 

रस्मो- रिवाज़ो को तोड़ते हैं । 

चल ना यार ,

कहीं दू….. र ..चले जाते हैं

– रोशनी                     




ग़ज़ल,,,,, जीवन के संदर्भ,,,,,

ग़ज़ल,,,,,

जीवन के संदर्भ बड़े गंभीर हुए।।

हम कमान पर चढ़े हुए बिष तीर हुए।।

 

मृगतृष्णा केभ्रम में उलझे मृग मानव।

विधवा की सूनी आंखों का नीर हुए।।

 

मिट्टी मोल भी कर्म नहीं बिकता अब तो।

क्रेताओं के इतने तुच्छ ज़मीर हुए।।

 

गीली आंखों से जब बिदा किया उसने।

आंसू उसके पैरों की ज़न्जीर हुए।।

 

मोह प्रभावित तुम्हें देख है मन इतना।

हम योगी‌ के जप तप की जागीर हुए।।

 

 अंतस में तुम जबसे सरल के आ बैठे।

भाव हृदय के तुलसी सूर कबीर हुए।।

 

बृंदावन राय सरल सागर एमपी भारत

मोबाइल 7869218525

18/1/2021




प्रेम-काव्य प्रतियोगिता

तुमने ही हृदय बिछाया….

तुम धूप हो, तुम छाँव हो
पसरी हुई निस्तब्धता में
जीवंत हुआ-सा ठाँव हो ।
घिर-घिरकर जब आया तम
तुमने ही दीया जलाया
जब-जब हाथों से छूटे हाथ
तुमने ही हृदय बिछाया ।
अभिलाषा को प्राण दिए
मन को फिर आकाश दिया
विकल हुई बुझती लौ को
अपना स्नेह प्रकाश दिया ।
संसृति की साध मिटी जब-जब
तुमने ही नवसंचार किया
खिलते-हँसते मधुमास दिए
अपना सारा अभिसार दिया ।
मृतप्राय हुए चिंतन को
स्पंदन का अधिकार दिया
शीतल, संसिक्त स्नेह दिए
प्रतिक्षण नूतन संसार दिया ।
(बीना अजय मिश्रा)




पर्व

पर्व… अखंड भारत वर्ष को हमारा कोटि- कोटि नमन, जहाँ कई प्रकार के रंग- बिरंगे मौसम आते- जाते हैं| गरमी, सरदी या बरसात, पतझड़ हो या बसंत- बहार, हर मौसम में हर धर्म के हम सब पर्व- त्योहार मनाते हैं|| इठलाता आता सावन मन-भावन धरती होती जब गुलज़ार, मेले लगते, झूले पड़ते, लोग नाचते -गाते हर्षित हो जाते हैं| कभी सुहानी हवाओं में,कभी झुलसती गर्मी में,वर्षा की बूंदों से, कभी सर्द-बर्फ़ीली फ़िज़ाओं में,लोग हंसते- खाते खो जाते हैं|| कभी शहीदों के नाम, देश को सलाम,राष्ट्र- गर्व,आज़ादी- पर्व, धर्म- निरपेक्ष भारत को अपनी एक अहम् पहचान दिलाते हैं| गुरु-पर्व, क्रिसमस, ईद, दीवाली, पोंगल, लोहड़ी और होली, त्योहारों की बेला में सब कुछ पल आनंद विभोर हो जाते हैं|| भारत की समृद्ध संस्कृति के संवाहक ये हमारे पर्व- त्योहार, हर्ष और उल्लास सहित परस्पर मेल और भाईचारा बढ़ाते हैं| सर्व-धर्म साम्प्रदाय में एकता एवं अखंडता की जलाकर मशाल, भारतीयता एवं मानवता का सबके हृदयों में उजाला फैलाते हैं|| … प्रेम लता कोहली




तुमने ही हृदय बिछाया…

प्रेम-काव्य प्रतियोगिता हेतु रचना

 

तुमने ही हृदय बिछाया….

तुम धूप हो, तुम छाँव हो
पसरी हुई निस्तब्धता में
जीवंत हुआ-सा ठाँव हो ।
घिर-घिरकर जब आया तम
तुमने ही दीया जलाया
जब-जब हाथों से छूटे हाथ
तुमने ही हृदय बिछाया ।
अभिलाषा को प्राण दिए
मन को फिर आकाश दिया
विकल हुई बुझती लौ को
अपना स्नेह प्रकाश दिया ।
संसृति की साध मिटी जब-जब
तुमने ही नवसंचार किया
खिलते-हँसते मधुमास दिए
अपना सारा अभिसार दिया ।
मृतप्राय हुए चिंतन को
स्पंदन का अधिकार दिया
शीतल, संसिक्त स्नेह दिए
प्रतिक्षण नूतन संसार दिया ।

(बीना अजय मिश्रा)




उड़ान…

उड़ान…

सुनो! भारी हो गए हैं तुम्हारे पंख
झटक दो इन्हें एक बार
उड़ान से पहले इनका हल्का होना
बहुत आवश्यक है
इन पर अटके हैं कुछ पूर्वाग्रह
कुछ कुंठाएँ जिन्हें तुमने सहेजा है
और सहेजे जा रही हो
उड़ान की यदि है कामना
नन्हे कोंपलों की भांति
चीर दो ज़मीन का सीना
यदि है तुम्हें उड़ना
पंखों को झटक डालो
न सोचो कि वह क्या सोचेगा
उसकी सोच का एक भी हिसाब
तुम अपने पास मत रखो
बहुत कष्टप्रद होता है
किसी हिसाब का पाई-पाई तय करना
पहली बरसात और धरती के..
हरे होने के बीच जो संबंध है
वह स्वयं में नैसर्गिक है
इनके लिए किसी प्रकार के ऋण को
उंगलियों पर गिनना
तुम्हें सीमाओं में बाँट देता है
और तुम अपने पंखों पर फिर से
टाँक लेती हो कई सवाल
और उनके उत्तर ढूँढती धीरे-धीरे
इन पंखों को स्वयं में समेट लेती हो
और….
थोप देती हो अपनी उड़ान को
आने वाली किसी पीढ़ी पर…

(बीना अजय मिश्रा)




महामारी का समय…

महामारी का समय ….

यह महामारी का
अपना समय है
समय सबका होता है
सबका ‘नितांत ‘अपना
कभी पूर्ण पाश्विकता का
कभी अदेखी मानवता का
और कभी..दोनों ही में
एक ही अनुपात में उलझा
यहाँ ‘नितांत अपना होना’
हर पंक्ति में अर्थ बदलता है
इसके समस्त ‘मापदंड’
इसकी क्रीड़ा में लीन
अपना ‘मैं ‘ खो बैठते हैं
यहाँ रात और दिन की
गिनती अपने कर्मों-सी
लेन और देन की तख़्ती
सबकी अपनी परिभाषा है
और सब अक्षरशः सत्य हैं
सुनना है सुनने की भाँति
लंबे होते चीत्कार को
थोड़ा-बहुत सहेज पाना
है अपने भीतर बहुत भीतर
यह एक संघर्ष है
शायद संघर्ष से अधिक
यह एक महायुद्ध है
और स्वयं को इस रच गए
चक्रव्यूह का अभिमन्यु बना
महाभारत के अक्षर पुनः गढ़ने हैं
समय का अंत है, भय निराधार है
एक सामंजस्य बना है
निस्तब्धता से कहकहों का
अब यही संपूर्णता का
न मिटने वाला आधार है
आओ! इस आधार को फिर समेट लें
हर कण में श्वास भर दें
और कण-कण लपेट लें….

(बीना अजय मिश्रा)




होली उसे कहो….

होली उसे कहो….!

जब रंग रमे रस अंग-अंग भींगे
तब होली उसे कहो
जब हृदय हरित-हरित हो फिर
तब होली उसे कहो
जब फागुन वही बयार बहे
तब होली उसे कहो
जब प्रिय का फिर अभिसार मिले
तब होली उसे कहो
जब नैन,अधर कंपित हों फिर
तब होली उसे कहो
जब मौन, मूक को शब्द मिलें
तब होली उसे कहो
जब वाद्य ध्वनित हों गात-गात
तब होली उसे कहो
जब विरह-मिलन हों आत्मसात
तब होली उसे कहो
जब तृषा तृप्त हर हो जाए
तब होली उसे कहो
जब व्यथा विकल हो मुस्काए
तब होली उसे कहो
जब बन-बन दहक उठे पलाश
तब होली उसे कहो
जब गुँथ जाए पत्तों में श्वास
तब होली उसे कहो
जब लाल भरम में पड़ जाए
तब होली उसे कहो
जब गाल-गाल चढ़ इतराए
तब होली उसे कहो
जब काला कुलिश प्रहार करे
तब होली उसे कहो
जब घृणा, द्वेष संहार करे
तब होली उसे कहो
जब रंग वैजयंती अमलतास
तब होली उसे कहो
जब हर मन की पूरी हो आस
तब होली उसे कहो
जब दुखिया के घर रोटी हो
तब होली उसे कहो
जब मुनिया नींद भर सोती हो
तब होली उसे कहो
जब रंग वही रंग बन जाएँ
तब होली उसे कहो
जब ऐसी होली फिर आए
तब होली उसे कहो ।

(बीना अजय मिश्रा)