लोक दर्शन की अवधारणा
हिन्दी ललित निबंध मे लोक दर्शन
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हिन्दी ललित निबंध मे लोक दर्शन
प्रेम!
आजकल प्रभावित है…
उपभोक्तावादी बाजारी संस्कृति
और फिल्मी देह बाजारी से।
फलिभूत कर्ज और उधारी से।
रोज नए फूल खिलते,
तन से तन मिलते,
कौड़ियों के भाव पर
अवसरवादी स्थापित-विस्थापित
भावनात्मक जुड़ाव है।
मादा की क्षणिक काया,
नर के पाकेट की माया,
दिल-कबड्डी बस रास आया।
नकलची ऐसा है दौर लाया,
समलिंगी-रिश्ते फैशन चले।
घर-परिवार,रिश्ते-नाते!
असुरक्षित-असहज,
असंतुलित,
काल्पनिक होकर
बन रही बीते दिनों की बातें।
चकाचौंध-महत्त्वाकांक्षाओं की
बलि वेदी पर बलवती घातें।
कचड़े की तरह फेंकने को आतुर
कहीं भी कोई स्थान नहीं,
बचपना और बुढ़ापा पाते।
गुजरती भटकाव में,
अस्त-व्यस्त दिनचर्या वाली
दिन और रातें।
पाण्डेय सरिता
डर कर,थक,ऊब कर
वह प्रत्येक स्त्री!
जो आत्महत्या करके मर गई;
कमल और कुमुदिनी थी।
और जो जिंदा रह गई
फिक्र में घर-गृहस्थी,
बाल-बच्चों के।
वह औरत मुझे,
पोखर की हेहर/थेथर
(नहर, तालाब के किनारे
उगने वाले हरे पौधे)
की डालियाँ लगी।
जिन्हें लाख उखाड़ कर फेंको,
पुनः फफक कर बेतहाशा
चली आती हैं।
जीवन की संभावना में,
पोखर के उरस जाने के बाद भी
मौजूदगी उनकी,
अचंभित कर जाती मुझे।
जिंदा कब्रगाह हैं,
उस पोखर के याद की,
संघर्षशील अस्तित्व बर्बाद सी।
पाण्डेय सरिता