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साझा काव्य संग्रह प्रकाशन योजना

रचनाएँ निम्नलिखित ईमेल पर भेजें।

साझा काव्य संग्रह हेतु :
[email protected] विषय : “साझा काव्य संग्रह प्रकाशन हेतु”

न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन विश्व भर में हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार- प्रसार के लिए कृत संकल्पित संस्था है। न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन और विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस के सहयोग से सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई – पत्रिका नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ एवं अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों का आयोजन कर रही है, जिनमें विश्व के विभिन्न देशों के प्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदी सेवी वक्ता के रूप में जुड़ते है और हजारों दर्शकों/श्रोताओं द्वारा ये कार्यक्रम देखे जाते हैं।
साहित्यकारों की मांग पर न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन अब साझा संग्रह प्रकाशन योजना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा है।
न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन की साझा संग्रह प्रकाशन योजना में विभिन्न विधाओं के रचनाएँ प्रकाशित करवाने पर रचनाकारों को निम्नलिखित लाभ एवं सुविधाएं प्राप्त होंगी :-

  1. प्रत्येक रचनाकारों को डिमाई आकार के साझा संग्रह में छः पृष्ठ दिए जाएंगे। एक पृष्ठ पर रचनाकार का परिचय और शेष 5 पृष्ठों पर उनकी रचनाओं को स्थान दिया जाएगा।
  2. प्रत्येक सहयोगी रचनाकार को 5 पुस्तकें (काव्य संग्रह की 10 पुस्तकें) लेखकीय प्रति के रूप में दी जाएंगी।
  3. प्रत्येक साझा संग्रह का लोकार्पण न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन के सहयोग से सृजन ऑस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय ई-पत्रिका द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन / संगोष्ठियों में प्रसिद्ध साहित्यकारों के उपस्थिति में करवाया जाएगा।
  4. साझा संग्रह में जिन रचनाकारों की रचनाओं को संकलित किया जाएगा उन रचनाकारों को न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में अपनी रचनाओं पर बोलने का मौका दिया जाएगा।
  5. यदि कोई सहयोगी रचनाकार किसी कारणवश निर्धारित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में किसी कारण उपस्थित नहीं हो पाता है तो उसे भविष्य में किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में अपनी रचनाओं पर बोलने का मौका दिया जाएगा।
  6. प्रकाशक द्वारा साझा संग्रह का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार- प्रसार किया जाएगा। न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन द्वारा संचालित वेबसाइट, फेसबुक पेज, टेलीग्राम चैनल और सैकड़ों whatsApp समूहों के माध्यम से अधिक से अधिक साहित्य-प्रेमियों तक पहुंचाया जाएगा।
  7. साझा संग्रह की प्रख्यात विद्वानों द्वारा की गई समीक्षा को विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाया जाएगा।
  8. साझा संग्रह की प्रतियाँ राष्ट्रीय पुस्तालयों, ISBN एजेंसी व अन्य आवश्यक स्थानों पर भेजी जाएंगी।
  9. प्रत्येक रचनाकार को साझा संग्रह प्रकाशन योजना में शामिल होने के लिए मात्र रु. 2000/- (रुपए दो हजार केवल) । रचनाकारों द्वारा दी गई सहयोग राशि में रचनाओं का संपादन, पेज सेटिंग, कवर पेज डिजाइन, मुद्रण, पुस्तक भेजने का डाक व्यय व अन्य सभी संबंधित आवश्यक व्यय सम्मिलित हैं। उपरोक्त सहयोग राशि में डाक के माध्यम से पुस्तकों को केवल भारत के भीतर ही भेजा जाएगा। भारत से बाहर भेजने के लिए डाक व्यय अलग से देय होगा।
  10. साझा संग्रह की मांग के अनुसार अगले संस्करण(णों) का मुद्रण कराया जाएगा व प्रकाशक द्वारा यथासमय तय की जाने वाली रायल्टी को सभी रचनाकारों में बराबर-बराबर साझा किया जाएगा।
  11. विभिन्न संग्रहों के लिए विधा अनुसार निम्लिखित मानक तय किया गया है
    (अ) कहानी/व्यंग्य अधिकतम 1000 शब्दों की हो
    (आ) काव्य संग्रह हेतु 5-6 रचनाओं की कुल पंक्तियों की संख्या 100-110 हों
    (इ) ललित निबंध हेतु अधिकतम 1000 शब्दों की रचना हो
    (ई) लघुकथा हेतु प्रत्येक रचना अधिकतम 300 शब्दों की हो

2.रचनाएँ यूनिकोड फ़ॉन्ट में टाइप करके, वर्ड फ़ाइल में भेजें और इसे अपने नाम से सहेजें

  1. कृपया मानक वर्तनी का ही उपयोग करें, जैसे किए, लाए, जाए आदि (किये, लाये, जाये नहीं) कृपया केंद्रीय हिंदी निदेशालय के नियम देखें, वर्तनी शोधन कर लें, वर्तनी में एकरूपता रखें, हम नुक़्तों के उपयोग को शामिल करेंगे, लेकिन इन्हें तभी लगाएँ जब आप इनके उपयोग के बारे में निश्चित हों
    4.विरामादिविन्यास का सही उपयोग करें. विशेष रूप से ध्यान दें कि आप संवादों के लिए, कॉमा (डैश नहीं) और डबल या दोहरे इनवर्टेड कॉमा का उपयोग करें।
  2. यदि आपको कोई वाक्यांश या शब्द वगैरह हाइलाइट करना है, तो सिंगल या इकहरे इनवर्टेड कॉमा का उपयोग कर सकते हैं. अधूरी अभिव्यक्ति को दर्शाने के लिए एलिप्सिस या तीन बिंदियाँ केवल तीन ही लगाई जाती हैं, कम या ज़्यादा नहीं
  3. अस्पष्ट चीज़ों को स्पष्ट करें, बोधगम्यता बनी रहनी चाहिए
  4. मानव मूल्यों, समुदायों, विशेष रूप से स्त्री के प्रति अवमानना न हो
  5. जातिसूचक नामों का उपयोग न करें
  6. रचना में किसी भी व्यक्ति विशेष, समुदाय, वर्ग, धर्म, प्रदेश, देश आदि के प्रति नकारात्मक अभिव्यक्ति या आलोचना न हो
  7. बातों को अनावश्यक रूप से दोहराए नहीं
  8. अनावश्यक अभिव्यक्तियाँ न रखें, जो रचना पर बोझ हों
  9. रचना का शीर्षक आकर्षक रखें
  10. व्याकरण और प्रयोगों को ठीक कर लें
  11. नंबरों को शब्दों में लिखें, ज़रूरत होने पर अंतर्राष्ट्रीय अंकों 1,2,3 आदि काप्रयोग करें
  12. आपकी रचना की समीक्षा साथी लेखक द्वारा की जाएगी
  13. संपादकों के पास संपादन का अधिकार होगा और उनका निर्णय बाध्यकारी और अंतिम होगा
  14. आपको आपकी रचना प्रूफ़ शोधन के लिए दी जा सकती है
  15. रचना के साथ कृपया निम्नलिखित भेजें-
    i. इसका प्रमाण-पत्र कि रचना मौलिक है और किसी भी प्रकार के कॉपीराइट विवाद से मुक्त है।
    ii.रचनाकार का परिचय जिसमें निम्नलिखित सूचनाएं हों
  • जन्म स्थान, जन्म तिथि / वर्ष
  • माता-पिता का नाम
  • शिक्षा
  • प्रकाशित रचनाओं का संक्षिप्त विवरण
  • प्राप्त पुरस्कार एवं सम्मान
  • संप्रति / वर्तमान पदनाम, संगठन, शहर/जिला/ राज्य, देश
    iii. 40-50 शब्दों में रचना का सारांश, और
    iv. 40-50 शब्दों में रचना के कथ्य और अभिव्यक्ति से संबंधित उदाहरण सहित विशेषताएँ, जिन्हें भूमिका में शामिल किया जा सकता है
    किसी भी अन्य सूचना के लिए कृपया संपर्क करें : श्री मनोरंजन तिवारी, संपादकीय सहयोगी, साझा कहानी संग्रह प्रकाशन योजना, न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन :
    मोबाईल : +91 – 98990-18149 (कॉलिंग एवं वट्सऐप)



देशभक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु रचना, शीर्षक- तुम फिर याद आओगे

शीर्षक – तुम फिर याद आओगे

जब जब वर्षा होगी,
जब जब कोयल बोलेंगी,
तुम मेरे दिल को बहकाओगे,
तुम फिर याद आओगे।

रेत के नक्श है मेरी कहानी,
जुदाई ने भर दी आँखों में पानी,
दर्द बन तुम मुझे तड़पाओगे,
तुम फिर याद आओगे।

चंदा बन तुम देख रहे हो,
तारों के संग खेल रहे हो,
आँखमिचौली कर मुझे सताओगे,
तुम फिर याद आओगे।

कैसा घाव दिया है तुमने,
दर्द बढ़ा दिया मरहम ने,
हिय से तुम न भूले जाओगे,
तुम फिर याद आओगे।

लहूलुहान सा दिखता है जिस्म,
दर्द का है यह कौन सा किस्म,
स्वप्न बन नैनों में छा जाओगे,
तुम फिर याद आओगे।।

रचनाकार- मनोरमा शर्मा
स्वरचित एवं मौलिक 

हैदराबाद 

तेलंगाना 




महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता शीर्षक- प्यार की राह में चलते चलते

संयोग श्रृंगार रस से पूर्ण कविता

शीर्षक- प्यार की राह में चलते चलते

सुनो प्रिय प्यार की राह में चलते चलते,
सहेंगे सुख-दुख हम दोनों हँसते हँसते।

तुम ही हो मेरी मोहब्बत तुम ही मेरे मीत,
साथ हो तुम तो मिलेगी सदा हमें जीत।

प्रिय तेरे संग रहने को मेरा मन चाहता है,
लिपटी रहूँ सदा तुझसे मेरा तन चाहता है।

क्या करूँ मुझे तुम सा कोई नहीं दिखता है,
मन मेरा हर घड़ी बस तेरा नाम लिखता है।

संग हो तुम तो सुलभ हो जाए जीवन-पथ,
छटता तिमिर और मन को मिले रश्मि-रथ।

प्रिय,नहीं रह सकती मैं कभी तुम्हारे बिन,
साथ हो तुम तो मन-दीपक जले हर दिन।

आओ प्रिय,प्यार की राह में चलते चलते,
वक्त बिताएंगे सदा हम दोनों खेलते खेलते।।

रचनाकार-मनोरमा शर्मा
स्वरचित एवं मौलिक।

हैदराबाद 

तेलंगाना 




मनोरमा शर्मा की कविता – ‘दीपावली’

शैली : हाईकु

दीप जलाओ
बनाओ घरौंदों को
आई दिवाली।

पूजा का थाल
फल फूल से भरो
है दीपावली।

दिन है यह
शुभ मानते लोग
महोत्सव में।

नए कपड़े
बाजार में दिखते
पहने सब।

घर है साफ
सजती है दुकान
दीपोत्सव है।

लक्ष्मी गणेश
सजते हैं सर्वत्र
पूजन हेतु।

महापर्व में
बनाते हैं रंगोली
खुश हैं सब।

संपर्क : मनोरमा शर्मा, हैदराबाद, तेलंगाना




इतिहास और वर्तमान का संधि स्थल हैदराबाद

 

रिपोर्ट 
शीर्षक- इतिहास और वर्तमान का संधि स्थल हैदराबाद

तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद,श्रमजीवी लोगों का शहर हैदराबाद,जिसका इतिहास और वर्तमान दोनों ही सुंदर है।यह वह स्थान रहा है जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों शांति पूर्वक शताब्दियों से साथ साथ रह रहे हैं।अविभाजित राज्य आंध्र प्रदेश की राजधानी पहले हैदराबाद ही रहा,बाद में 2014 में तेलंगाना राज्य के गठन के बाद इस राज्य की राजधानी हैदराबाद बन गया। हैदराबाद को ‘निजामो का शहर’ और ‘मोतियों का शहर’ भी कहा जाता है। हैदराबाद से सटा सिकंदराबाद शहर है,इन दोनों शहरों को जुड़वा शहर के नाम से जानते हैं। यह शहर दक्कन के पठार पर मूसी नदी के किनारे स्थित है।
ऐसा माना जाता है कि इस खूबसूरत शहर को कुतुबशाही के पांचवे वंशज मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने प्रेमिका भागमती को उपहार स्वरूप भेंट किया था। पहले इसे भाग्य नगर के नाम से जानते थे,बाद में वह हैदर बेगम के नाम से जानी गई और यह शहर भी हैदराबाद के नाम से जाना गया। इस इतिहास को आज भी हम यहाँ के गोलकुंडा के दुर्ग में देख सकते हैं। गोलकुंडा का किला एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक भ्रमण स्थल भी है।
हैदराबाद और सिकंदराबाद के बीच स्थित हुसैन सागर मानव निर्मित झील है जो हमेशा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। यहाँ नेकलेस रोड की खूबसूरती देखते ही बनती है 1591 इस्वी में मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने शहर के बीच चारमीनार का निर्माण करवाया था। चारमीनार का क्षेत्र आज भी विशेष संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। चारमीनार की गलियाँ, चारमीनार की चूड़ियाँ, मोतियों से बने आभूषण के लिए चारकमान बाजार,कलमकारी कलाकृतियाँ,आदि के लिए चारमीनार क्षेत्र जाना जाता है। चारमीनार क्षेत्र को अब पुराना शहर के नाम से जानते हैं, जहाँ मक्का मस्जिद स्थित है।
हैदराबाद शहर अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता है।यहाँ सालार जंग संग्रहालय,बिरला मंदिर, हुसैन सागर में स्थापित बुद्ध प्रतिमा, एनटीआर गार्डन,लुम्बिनी पार्क आदि प्रसिद्ध भ्रमण स्थल हैं। हैदराबाद श्रेष्ठ स्थान है जहाँ बड़े- बड़े अस्पतालों के साथ-साथ फार्मा कंपनियां भी स्थापित हैं।सूचना प्रौद्योगिकी में तो यह बहुत आगे निकल गया है । हैदराबाद को अब साइबराबाद के नाम से पुकारा जाता है।हाइटेक सिटी में हम तकनीकी संस्कृति को देख सकते हैं।
यह शहर विभिन्न संस्कृतियों एवं परंपराओं का मिलन स्थल है।समझ लीजिए यह उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों के बीच का मुख्य द्वार है। तेलुगू फिल्म उद्योग की मातृभूमि हैदराबाद शहर ही है।यहाँ अन्नपूर्णा स्टूडियो,रामा नायडू स्टूडियो, राम कृष्ण स्टूडियो, पदमालय स्टूडियो, रामोजी फिल्म सिटी आदि प्रसिद्ध उल्लेखनीय फिल्म स्टूडियो हैं जहाँ फिल्मों की शूटिंग होती रहती हैं।नवाबी परंपरा, निजामो की संस्कृति,नवाबी भोजन का स्वाद आदि बातें इस शहर को देश-विदेश में अलग पहचान देते हैं तो दूसरी तरफ मंदिरों के खूबसूरत नक्काशी, गणेश पूजा का विशेष रूप ,चिलकूर बालाजी मंदिर आदि सभी को आकर्षित करते हैं। हैदराबाद ऐसा शहर है जहाँ के लोग सामाजिक दायित्व के प्रति सजग रहते हैं। हैदराबाद शहर को सभी मार्गो से जोड़ा गया है इसलिए यहाँ पहुँचना भी आसान है।आज हैदराबाद शहर हमारे देश का गौरव बन गया है,पर्यटक भी काफी संख्या में यहाँ आते रहते हैं।

रचनाकार- मनोरमा शर्मा
स्वरचित एवं मौलिक

हैदराबाद 

तेलंगाना 




महिला दिवस काव्य काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता शीर्षक- “श्रृंगार स्वाभिमान का”

           ”श्रृंगार स्वाभिमान का”

बनावटी सुंदरता से परे रहकर 

आत्मिक गर्व से जो कर्म करे,

आत्म सम्मान निज ह्रदय में रखकर

सीना चौड़ा कर जो कदम धरे,

सत्कर्मों से परिवार का मान बढ़ाएं

कुनबे की नाक का सम्मान करे,

चरित्र हो जिसका दूध सा पाक

पति की हैसियत का गुमान करे,

सबसे खूबसूरत है वह महिला

 जो स्वाभिमान का श्रंगार करे,

सिर ऊंचा कर चले शान से

अभिमान का उसके समाज भी गुणगान करे।

Dr Meenu Poonia

International player and Banker

The Jaipur central co operative bank ltd Jaipur Rajasthan

[email protected]

9414421661

E 30 A Kanha Vihar Bhura Patel marg Gandhi path west Vaishali Nagar Jaipur Rajasthan India pin code 302021

 




देश भक्ति काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता शीर्षक – “अद्भुत हिंदुस्तान”

“अद्भुत हिंदुस्तान”
26 जनवरी 1950 को
हमारे भारत का संविधान बन जाए,
राष्ट्रीय पर्व का मिला दर्जा
गणतंत्र दिवस का त्यौहार बनाएं,
लोकतांत्रिक हिंदुस्तानी बने अब हम
तिरंगा खुले चमन में लहराए,
सरहद पर तने हमारे वीर जवान
भारत माता का मान बढ़ाएं,
दुश्मनों के दांत खट्टे कर
हिंदुस्तानी हद से परे भगाएं,
इन्हीं की बदौलत सुरक्षित हम
लबों से अपने राष्ट्रगान गुनगुनाए,
षट ऋतुओं का दुर्लभ संगम
चंचल चित को गुदगुदाए,
पर्यटन स्थली पैर पसारे यहां
संपूर्ण जग में नाम कमाए,
खाना देशी, रहना देशी यहां
विदेशियों का भी मन ललचाए,
अंतरात्मा सहसा ही बोले
क्यू ना हम यहीं बस जाए ?
प्रकृति हमारी करे आनंद विभोर
मधुर कूक कोयल, पपीहा सुनाए,
पहाड़ और कलकलाती नदियां
ऊपर सतरंगी आसमान जगमगाए,

हर क्षेत्र की न्यारी न्यारी बोली
नाना प्रकार के त्यौहार बनाएं,
रहना, खाना, बाना भी भिन्न भिन्न
अनेकता में फिर भी एकता दिख जाए,
हरे भरे खेत खलिहान यहां
फसलें निज स्वर में लहराए,
विभिन्न धर्मों का यहां बसेरा
मिलजुल कर भारतवासी कहलाएं।

डॉ मीनू पूनिया

अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी एवं बैंकर

जयपुर सेंट्रल को ऑपरेटिव बैंक राजस्थान

[email protected]

9414421661

E 30 A Kanha Vihar Bhura Patel marg Gandhi path west Vaishali Nagar Jaipur Rajasthan India pin code 302021




देश भक्ति काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु कविता शीर्षक- “अद्भुत हिंदुस्तान”

                   “अद्भुत हिंदुस्तान”

26 जनवरी 1950 को हम

हमारे भारत का संविधान बनाए,

राष्ट्रीय पर्व का मिला दर्जा 

गणतंत्र दिवस का त्यौहार बनाएं, 

 लोकतांत्रिक हिंदुस्तानी बने अब हम

 तिरंगा खुले चमन में लहराए,

 सरहद पर तने हमारे वीर जवान

 भारत माता का मान बढ़ाएं,

 दुश्मनों के दांत खट्टे कर

 हिंदुस्तानी हद से परे भगाएं,

इन्हीं की बदौलत सुरक्षित हम

लबों से अपने राष्ट्रगान गुनगुनाए,

 षट ऋतुओं का दुर्लभ संगम

 चंचल चित को गुदगुदाए,

पर्यटन स्थली पैर पसारे यहां

संपूर्ण जग में नाम कमाए,

खाना देशी, रहना देशी यहां

विदेशियों का भी मन ललचाए,

अंतरात्मा सहसा ही बोले

 क्यू ना हम यहीं बस जाए ?

प्रकृति हमारी करे आनंद विभोर

मधुर कूक कोयल, पपीहा सुनाए,

पहाड़ और कलकलाती नदियां

ऊपर सतरंगी आसमान जगमगाए,

हर क्षेत्र की न्यारी न्यारी बोली

नाना प्रकार के त्यौहार बनाएं,

रहना, खाना, बाना भी भिन्न भिन्न

अनेकता में फिर भी एकता दिख जाए,

हरे भरे खेत खलिहान यहां

फसलें निज स्वर में लहराए,

विभिन्न धर्मों का यहां बसेरा

मिलजुल कर भारतवासी कहलाएं।




अंतरराष्ट्रीय “देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता”

ऐसे हैं हम भारतवासी

हिमशिखर उत्तुंग उठा कपाल,

चरण पखारता सागर विकराल,

गंगा यमुना संचारित रक्तनाल,

असम चायबागान लहराते केशबाल, 

अद्भुत सोनचिरैया ऐसी, पूरी दुनिया थी अभिलाषी.

ज्ञान ध्यान की ज्योति जलाते, ऐसे हैं हम भारतवासी.

.

सत्य अहिंसा के अनुयाई, कहते सबको भाई-भाई,

बुरी नजर वाले का लेकिन, हिसाब चुकाते पाई-पाई

गौतम गाँधी नानक हैं हम, दूसरा थप्पड़  खाते तड से.

शिवाजी राणा चाणक्य भी है, मट्ठा डाल सुखा दे जड़ से.

शांति पुरष्कार दुसरे ले जाते, विश्व बंधुत्व के हम विन्यासी.

किया न आम्रमण कभी किसी पे, ऐसे हैं हम भारतवासी.

.

शांतिप्रियता को अरि ने, हमारी कमजोरी समझ लिया,

अन्नपूर्णा पावन धरती को, रक्तिम रणभूमि बना दिया.

हिन्द का खड्ग प्रलय बन टूटा, शत्रु-शीश से पाट दिया

लेकिन पीछे से जयचंदों ने, पीठ में छुरा उतार  दिया.

जीत सके ना कोई हमसे, अपनों से हारे हम अघनासी

गद्दारों की  कमी नहीं है, ऐसे हैं हम भारतवासी.

.

इतिहासों से सबक न लेते, छुद्र स्वार्थ में लिप्त हुए,

अपनी ही जड़ खोद रहे हैं, जांत-पांत में बंटे हुए,

पंजाब सिंध बंग कश्मीर, पूरा कहाँ रहा अब देश में.

दुश्मन आ के सब खा जाए, ना जाने किस वेश में.

रणवीरों हुंकार भरो अब, त्यागो तंद्रा और  उदासी,

कलम से भी तलवार बनाते, ऐसे हैं हम भारतवासी.

.

एक से एक जुडो अब वीरों, जांत-पांत का नाश करो,

भाषा बोली क्षेत्र से ऊपर, भारत माँ को याद करो,

गद्दारों को ढूंढ निकालो, उनका पर्दाफ़ाश करो,

शत्रुदल काँपे अंदर बाहर, प्रत्यंचा टंकार करो,

अफजल कसाब अब निकट न आवैं, धधकी महादेव की काशी,

त्रिनेत्र-ज्वाला बन भस्मित कर जाते, ऐसे हैं हम भारतवासी.

.

सर्वशक्तिमान बने अब भारत, कर लो ऐसा काम शुरू,

भूमण्डल के कण-कण में गरजें, होकर फिर से विश्व गुरु,

अब न रहे कोई भूखा नंगा, खुशहाली का राज रहे.

धर्म अर्थ शान्ति शक्ति का, विश्व में आगाज रहे.

ज्ञान-विज्ञान में हो पारंगत, जहाँ भी जाए हिन्द निवासी.

उठ खड़े  सभी सम्मान से बोलें, देखो ये है  भारतवासी.

.

D K Singh

Project Director

Telecommunications Consultants India Ltd

10, Darwin Avenue, Quatre Bornes, Mauritius.
Mob: +230-59652377




मैं समाज हूँ

मैं समाज हूँ

बेटी मैं समाज हूँ।
अपराध नहीं है
तुम्हारा बेटी होना।
मैंने ही तो तुम्हें
सदियों से बेटी बनाया
जब जन्मी थी तुम
तो सिर्फ इंसान ही तो थी
मैंने तुम्हें बेटी बनाया ।

मैं समाज हूँ बेटी
तुम्हें बेटी होना भी तो
मैंने ही था सिखलाया ।
करवाया हर पल एहसास
तुम्हें बेटी होने का।
मैं समाज हूँ बेटी
मैंने तुम्हें कभी बेटी
तो कभी बहन
तो कभी मां
बनकर जीना-मरना सिखलाया।
हर बात का दोषी
हर बार तुम्हें बनाता आया
अपनी कमजोरियों को
उसके भीतर छिपाता आया
मैं समाज हूँ बेटी ।

सभ्यता और संस्कृति के
छद्म आवरण में
मैंने तुम्हें चुप रहकर
सब सहकर,घुट घुट कर,
हर पल मरना सिखलाया
मैं समाज हूँ बेटी
मैंने ही तो तुम्हें
आज अपराधी बनाया।

शिक्षा तुम्हें उचित मैं दे न सका
सुरक्षा तुम्हें उचित मैं दे न सका
सम्मान तुम्हें उचित मैं दे न सका
अधिकार तुम्हें उचित मैं दे न सका
मैं समाज हूँ बेटी।

अगर जो तुम्हें भी बचपन में नाना मिलते,
अगर जो तुम रानी होती,
तो तुम भी सिर्फ लक्ष्मी नहीं
सन सत्तावन की लक्ष्मी बाई होती।

कभी देवी बना के पूजा
कभी अस्मत को भी लूटा
कर वादा दिन रात तेरी
रक्षण का, संरक्षण का।
हमने ही तो रौंदा तुम्हें।
बेटी मैं समाज हूँ।

कभी संस्करों के नाम पर
कभी संस्कृति के अभियान पर
कभी कर्त्तव्यों के दाम पर
तुझे मैंने जलते देखा
तेरी अस्मिता को मिटते देखा।
बेटी मैं समाज हूँ।

जिंदा थी तो सुध तुम्हारी
मैं कभी ले न सका।
सुरक्षित समाज तुम्हें
कभी दे न सका
तुम्हारी चिता को भी
सम्मान कभी दे न सका
अब इंसाफ दिलाने आया हूँ
काली सैकड़ों पर रोशनी लेकर
खुद को जिंदा कहने को
बेटी मैं समाज हूँ।

जिंदा तुम जलती रही।
हर दिन तुम लड़ती रही
खुद को इंसान कहती रही
मैं अंधा बेहरा गूंगा था
और खुद को जिंदा कहता था।
बेटी मैं समाज हूँ।

फिर कहता हूँ
बेटी तुम्हारा बेटी होना
कोई अपराध नहीं।
हमने तुम्हें अपराधी बनाया है
इंसान छोड़ कर हर रूप
तुम्हारा तुम्हें समझाया है
बेटी मैं समाज हूँ
बेटी मैं ही समाज हूँ।