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ओमप्रकाश गुप्ता की कविता – ‘शाश्वत रिश्ते : नियति के’

माँ,
या पा,
दोनों में
दर्द छिपा
उठे हूक में,
दिल के टूक में,
अन्जाने तार जुडे,
कुछ आँसू में चू पडे,
ये कह पाना है मुश्किल ,
होता किस हालात का दिल,
किसी की आरजू में रो पडा है,
या तुम्हारी सलामती में अडा है।
हो क्यूॅ न,होठों के संपुट खुलने से,
सस्वर प्यार से माँ व पा निकला है,
फिर इस जमाने ने कयूॅ उसे छला है,
कहते हैं , गुस्से में जब माँ होती है,
छलकते ऑसुओ से वह रोती है,
पा रोता नहीं,पर नेत्रों से तरल,
पीता, दिल से चाहे हो गरल,
सताना नहीं यूँ हरकतों से,
चंद शब्दों या जरूरतों से,
वे रहें झोपड़ी या घर में,
आश्रम हो या शहर में,
मन्नतें परवरदिगार से,
करेंगें सदा उदगार से,
ध्यान में वे मग्न हों,
भवन चाहे भग्न हों,
दुआ करेंगे दिल से,
डिगें नहीं तिल से,
आखिर में हैं वो,
तो पा ही हैं,
और माँ ।
– ओमप्रकाश गुप्ता, बैलाडिला, छत्तीसगढ़




काव्य-मंच 

काव्य-मंच 
(मापनी:- 2122  2122  212)

काव्य मंचों की अवस्था देख के,
लग रहा कविता ही अब तो खो गयी;
आज फूहड़ता का ऐसा जोर है,
कल्पना कवियों की जैसे सो गयी।

काव्य-रचना की जो प्रचलित मान्यता,
तोड़ उनको जो रचें वे श्रेष्ठ हैं;
नव-विचारों के वे संवाहक बनें,
कवि गणों में आज वे ही ज्येष्ठ हैं।

वासनाएँ मन की जो अतृप्त हैं,
वे बहें तो काव्य में रस-धार है;
हो अनावृत काव्य में सौंदर्य तो,
आज की भाषा में वो शृंगार है।

रूप की प्रतिमा अगर है मंच पर,
गौण फिर तो काव्य का सौंदर्य है;
फब्तियों की बाढ़ में खो कर रहे,
काव्य का ही पाठ ये आश्चर्य है!

चुटकलों में आज के श्रोता सभी,
काव्य का पावन रसामृत ढूंढते;
बिन समझ की वाहवाही करके वे,
प्राण फूहड़ काव्य में भी फूंकते।

मूक कवि, वाचाल सब लफ्फाज हैं,
काव्य के सच्चे उपासक खो रहे;
दुर्दशा मंचों की ऐसी देख कर,
काव्य-प्रेमी आज सारे रो रहे।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया




गीतिका (अभी तो सूरज उगा है)

गीतिका (अभी तो सूरज उगा है)

प्रधान मंत्री मोदी जी की कविता की पंक्ति से प्रेरणा पा लिखी गीतिका।
(मापनी:- 12222  122)

अभी तो सूरज उगा है,
सवेरा यह कुछ नया है।

प्रखरतर यह भानु होता ,
गगन में बढ़ अब चला है।

अभी तक जो नींद में थे,
जगा उन सब को दिया है।

सभी का विश्वास ले के,
प्रगति पथ पर चल पड़ा है।

तमस की रजनी गयी छँट,
उजाला अब छा गया है।

उड़ानें यह देश लेगा,
सभी दिग में नभ खुला है।

भवन उन्नति-नींव पर अब,
शुरू द्रुत गति से हुआ है।

गया बढ़ उत्साह सब का,
कलेजा रिपु का हिला है।

‘नमन’ भारत का भरोसा,
सभी क्षेत्रों में बढ़ा है।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया




अहसास- पिता होने का

हम तो चाॅद सितारे, उस परिवार के,

जिसमें पिता एक आकाश होता है।

जिसके रोशनी से दमकते पूरा घर,

वह तो पिता का ही प्रकाश होता है।1।

आसमां से ऊंची होती जगह कहीं, 

तो वह बस,पिता का स्थान होता है।

कंधों पे बैठा लेते,तब लगता मुझको,

इस सारे जगत का अभिमान छोटा है।2।

दुलार पर कह सकते नहीं तुम्हें,

पर चुप्पी में छुपा यार नजर आता है।

हमारी खुशी में लाखों गम भूल जाते,

मेरी तोतली पे दिलबाग नजर आता है।3।

जोश आ जाता जग जीतने का जब,

मेरी हथेली तुम्हारी ऊँगली पकड लेती,

परिवारों का आदर्श बन जाते तभी तुम,

मेरी कामयाबी जब चार चाँद लगा लेती।4।

तुम नहीं,तो लगता इस घर की छत नहीं, 

जरा सी हवा में,ये तूफान नजर आता है।

आग के गोले से लगते बन्धुबान्धव मेरे,

झरोखे से,ये शहर वीरान नजर आता है।5।

 

 




जो बूंद से गयी वो

“जो बुंद से गयी वो”

                 [ लघु कथा ]

 

               निले आकाश मे लाल, सुनहरे रंग बिखरे तब ही पायल घर से बाहर  निकली। एक बो-या और ____, इतना साथ लेके वो चली थी। उसका अंदाज यह  था की सब काम पूरा करके नऊ या दस बजे तक वापस लौटेगी। दूसरे चर्मकार,  मुरदे फाडनेवाले इस डम्पिग ग्राऊंड पर आने से पहले ही पायल वहाँ पहुंच गयी थी। चारो पैर उपर करके एक भैंस का मुर्दा पडा था। कोई मालिक ने रात के अंधेरे  मैं ही भैंस का मुर्दा उस ग्राऊंड पर लाके फेक दिया था। पायल को बहोत आनंद हुआ। वह मुर्दे के आसपास कुत्ते भी इधर उधर नही घुमते थे। वैसे तो वह कुत्ते  बहुत खतरनाक थे। उन कुत्तों में कोई लौंडा भी आता था। तो वो वह धोखादायक  होता था। क्यों कि वह जानवर जंगली और अचानक आदमीपर सीधी चाल करनेवाला था। आज से पहले एक-दो मेहेतर, लोंडे के हमले मे घायल होकर मर  भी चुके थे। आज तो पायल को बडी अच्छी चीज मिलने वाली थी। क्यों कि वह  अकेली ही थी।

                   पायल के बाप का, जिसका नाम नरसू था, उसका चमडी अच्छी तरह कमाने  का व्यवसाय था। यह धंदा उसके पुरखों से घर में चालू था। नरसू जब सात – आठ  बरस का था, तभी से वो यहाँ गंदगी में आता था। मृत जानवर की चमडी निकालने को। मरने के बाद जानवर, वहाँ जल्दी से जल्दी फेक दिया होता तो उसकी चमडी निकालना बहुत आसान हो जाता था। लेकीन जितना जादा वक्त गुजरेगा, उतना जानवर फाडने की बहुत मेहनत और तकलिफ होती थी। पुरी रात या एक – दो –दिन वहाँ पडा रहता तो हथियार की तेजी झटसे उतर जाती थी। कभी कभी, तीन – तीन, चार – चार हथियार भी चमडी निकालने मे नाकाम हो जाते थे। हाथ भी वह कठीन, कडक चमडी निकालने से दुखने लगते थे। वह  डम्पिंग ग्राऊंड तो मृत जानवरों की स्मशान भूमी थी। उधर पीने को पानी भी नहीं  मिलता था। एक प्याली चाय मिलना तो बडी दुरापास्त बात। लेकीन पापी पेट का  सवाल तो है। कडी धूप या रात की घनी अंधियारी, कभी जोरसे घनी बरसात तो कभी बहुत थंडी मरे हुए जानवर छिलनेका काम तो करना पडता था। इस काम मिलाने के लिए सफाईवाले मेहतरो से दोस्ती करनी पडती थी। कभी कोई बैल, म्हैस, घोडा, सूअर, गाय, डम्पिंग मे मुर्दा आ गया तो तुरंतही नरसू को बताते थे। उसे तुरंत ही वहाँ आने का निमंत्रण देते थे। नरसू अपने जानवर की चमडी छिलने के सभी हाथियार तेज करके तैयार ही रहता था। वो वार्ता मिलते ही डम्पिंगपर जाता था। पूरा जानवर को सीधा अखंड छिलने मे नरसू माहिर था। उसका हाथ बैठा था। चमडी निकालते वक्त बहुत कुत्ते वो छिलनेसे खुला हो गया मांस खाने को तरसते थे। कव्वे, गिधड भी ताजा मांस खाने के लिए टुट पडते थे। ये मरे हुए जानवर का मांस कोई खाता नहीं था। क्यों की मरा हुआ जानवर बिमारी से मर जाता होगा, तो मांस आदमीने खाया तो जहरीला दुष्परिणाम भुगतना पडता था। इसिलिए कोई भी आदमी मांस घर पर नहीं ले जाता था। लेकिन, भटकनेवाले मोकाट कुत्ते, कव्वे, गिधड, उल्लू, लोमडा वो बिनाकष्ट से मिलनेवाला मांस को बडी खुशी से खाते थे। इस धंदे से ही नरसू का घरसंसार चलता था। नरसू की पहली पत्नी मर चुकी थी। पायल उसकी लडकी थी। नरसू ने दुसरी औरत से शादी की लेकिन वह दुसरी सौतेली माँ पायल को प्रेम सी पालती थी। माँ – बेटी के घरेलु संबंध बिलकूल अच्छे थे। लेकिन एक बुरी बात उस माँ में ये छुपी हुयी थी। वह बहोत आलसी थी। पायल को उसके काम मे बटोरना कभी भी नही करती थी।

            एक दिन पायल के बदनसीब से नरसू को लकवा मारा। वो बिस्तर मे ही पडा था। अपने कुटुम्ब का कैसे गुजारा करूँ अभी? ये चिंता उसके मन मे अस्वस्थता पैदा करती थी। उसकी बिमारी इस वजह से दिन बे दिन बढती जा रही  थी।

                 पालतू जानवरों की चमडी निकालने के बाद उसे चप्पल, जूते, हॅंड बॅग्स, बनाने लायक नरम और चिकना बनाना पडता है। वह काम बहुत ही मेहनत का था। कल तक वह काम नरसू बडी, कडी मेहनत से और रातदिन कर रहा था।

               कौनसे जानवर की त्वचा हैं?

                  वह कितनी नरम, चमकदार बनायी गयी है। उसके हिसाब से एजंट लोग, अडत्या लोग, या चप्पल, जूते बनानेवाले सभी चर्मकार चमडी की किंमत लगाते थे। ’बोली’ लगाई जाती थी। ये सब प्रासेस मे नरसू बहोत होशियार था। कुडा –कचरा, गंदगी, मृत जानवरोकी सडे हुए शरीर दुर्गंधी, ये सब बातो से उसका कोई भी लेन – देन नहीं था। उसको बाँस ही आती नहीं थी। लेकिन वो समाज का एक घटक था। अति मौल्यवान लेकिन बहुत गंदा काम कर रहा था। उसकी सफाई से गाँव में बिमारीयाँ नहीं थी। इतना अनुपमेय काम वो करता था, लेकिन समाज तो उसको, हीन आदमी, दरिद्री, मेहेतर, शुद्र ऐसा ही संबोधित करते थे। ये दुख उसके आंतर्मन मे दर्द दे रहा था। कई बार उसके मन मे आता था, कि ये काम छोडेंगे। परंतु अभी इस उम्र मे दुसरा क्या धंदा – व्यापार करना भी उससे मुश्किल था। इतने पैसे भी नहीं थे उसके पास। कई बरसों से यही काम करते करती वह उसमे स्थिर हुआ था। अब तो कुछ नया काम शुरू करना भी आसान नहीं था। नरसू बिछाने पर लेटा ही रहता था। उसको बैठने की भी उम्मीद नहीं थी।

                   पायल की शादी के लिए जमा की हुई पुंजी, उसकी पहली पत्नी और खुद के  दवा – दारू में खर्च हो चुकी थी। समाज सुधर गया। उसके ज्ञाती बांधव भी उस गंदगी से छुटकर कोई अलग काम करने लगे थे। वैसे तो पुरा विश्व मे झटपट बदलाव हो रहा था। सुख के बहुत से साधन आये। लोगों को बहुत पैसा मिलने लगा। लेकीन बेचारा नरसू वही दारिद्र्य मे, अनपढ और रोग, दु:ख जर्जर ही जिना  जी रहा था।

                   “आगे क्यां होगा? प्रपंच कैसा चलेगा?”

                   यही एक चिंता उसे सताती थी। माथे में बहुत दर्द करती थी। जब वो  चिंता से बहुत व्यथित होता था, उस समय अपनी दुसरी पत्नी पारूल को हुक्का भरके देने को कहता था। हुक्के की धुआ से उसे जो नशा आती थी, उसीमे वो सब  विचार, सारी चिंताए,सारे दु:ख भूल जाता था और हुक्का पीते पीते ही सो जाता था।

             “अपना क्या होगा पारू? ” वो पत्नी को निराश अवस्था में पुछता था।

               “क्या होगा? आज भी दिन आते है, जाते है। वैसा ही चलेगा। हम भूखे नही  मरेंगे। पारूल उसे विश्वास देती थी।

              “नही मेरा पूछने का मर्तबा यह नहीं हैं। मेरी तबियत कब सुधरेगी। मेरी वजह से पायल को वो काम करना पडता हैं। अब तो वो जवान हो गयी है। उसकी शादी करनी पडेगी। लेकिन पैसा तो नही है। वो कहाँ से लाएंगे?” पायल तो जवान है। अकेली सुबह जल्दी वहाँ जाती हैं। उसके कष्ट कितनी लेंगे? और हम दोनो घर मे बैठे बैठे ही खायेंगे?      

                  “बडी हो गयी, सयानी हो गयी तो क्या हुआ? कुछ काम – धंदा तो करना ही  चाहिए उसने भी। मैनें भी बाहर आँगन मे सब्जी बेचने की दुकान लगायी हैं ना? पेट तो भरता हैं ना, किसी भी तरह। जी आप जरा मस्तिष्क को शांती दो। कुछ  ऐसे बुरे,पगलापन की बाते मत सोचो। चूपचाप पडे रहो। वो ही तबियत को अच्छा  है। सो जाओ। ”

              “मैं तुझे हजार बार बोला हूँ, की उसे मत भेजो। आखिर तू सौतेली माँ  है तू। वो अकेली जाती है। दिन खराब आये है। उसे कुछ अच्छा – बुरा हो गया तो…? ”

                    “कुछ नहीं होता। वो तो किसी को घबरती नहीं हैं। उसमे किसीसे दो हाथ करने की हिम्मत और ताकद भी है। और आप तो रात को भी जाते थे वहाँ। जानवर फाडने को। वैसा तो पायल नहीं जाती है ना। वो तो दिन मे जाती है।”

              “अरे, पारूल, पायल की माँ, अब किसी का भरोसा नहीं है। कौन कैसा होगा,  कुछ समझता ही नही। पायल तो स्त्री जाती की है। जवान भी है। वहाँ तो जुगार के अड्डे लगते है। जवान लडके शराब पीने को आते है। मुझे तो पायल रानी की बहुत फिक्र लगी रहती है। जब तक वो घर वापस नहीं आती।”

              “आप तो ऐसी चिंता और फिक्र करके बैठो घरमे। आपको ये मालुम है?

                 “क्यां? मुझे कुछ नही मालूम। तुझे मालुम है तो बता देना मुझे। ”

                “आपकी लाडली पायल अकेली नहीं रहती उधर। उसके आगे – पीछे चांग्या भी रहता है। वो उसको मदद करता है। उन दोनों का आपस मे प्रेम हैं। उसका काम खत्म हो चुका तो उसको वो कचरा – गाडी में बैठकर घुमने को ले आता है।  समझे जी? आप इधर खटिया पर लेटे रहते है। आकाश के तारे गिनते है। एक दिन तुम्हारी बेटी पायल को चांग्या उसे लेकर भाग जाएगा, तब आपकी आँखे खुलेगी।

                  “कुछ नहीं, चांग्या तो सज्जन लडका है। और क्यां होता है उसकी गाडी से, उसके साथ घुमती,फिरती है, तो उसमे क्या बडी बात है। बुरी तो बात नहीं कुछ भी। उसकी उम्र ही अभी ऐसा है,आईने में दस बार देखनेका, और खुद को सजाने का? अच्छी दिखनी का? तेरा क्यों शक पायल पर। तू क्यों जलती हैं अंगार मे बिनाकारन? ”

               “अभी और समय ना गुजारो। लडकी के हाथ पिले कर दो। आपकी चिंता, टेन्शन भी दूर हो जाएगा। उसको मत भेजो वहाँ गंदगी मे मृत जानवरों की  चमडी निकालने को। हम, सब्जी बिकेंगे। उसमे भी बहोत प्रोफिट मिलता है।

              “लेकिन पायल को मंगनी तो आनी चाहिये, और उसकी ढेर सारे पैसे लगेंगे, वो कहाँ से लाऊँ? ”

               “आप भी ऐसे ना एक बात मैने सुझायी तो आप मुझे दस बाते सुनाते हो। मरने दो। मुझे क्या पडी है। मैं तो आपकी दुसरी पत्नी। पायल की सौतेली माँ। मुझे ही आप बुरा मनोगे। जिसका करते भला वो कहता है मेरी ही बात सच्ची है। आप और पायल जो करना है वो करो। मै बीच में कुछ नहीं बोलूंगी।

              आज भी पायल घर से जल्द निकली। तब नरसू बोला- “वापस आते समय भुईमूग की सेंग, प्याज, तेल, मटन और मसाला भी लाना बेटी। ”

             लेकीन आज पायल बदनसीब हुयी। उसके जाने से पहले ही किसी कसाई ने जानवर फाड के चमडा ले गया था। पायल को बडा अफसोस और दुख भी हुआ। उसके मन मे आया – पिताजीने जो चिजे लाने को बोला है। वह कैसे खरीदूंगी? इतने मे कुडा – कर्कट भरी गाडी लेके, चांग्या उधर आ पहुँचा।

             “हाय, मेरी पायल, आज तेरा धंधा लॉस मे है क्या? नाराज मत होना। मैनें तेरे लिए कुछ खास लाया है। गिफ्ट, कागज मे पॅक की हुई वह चीज उसने पायल  के हाथ सौंप दी।

              “अरे क्या है? वडा – पाव? अच्छा हुआ तू ने लाया। मुझे बहोत भूख लगी थी।

                दुसरे दिन पायल सुबह जल्दी उठ के गंदगी मे आयी। फिर आज और एक गाय का मुर्दा पडा था। उसने झटसे अपने हथियार – ‘रापी’ निकाली। पुरी चमडी निकालने तक दोपहर हो गयी। दिखने मे सादा लेकिन करने को बहोत कठिन और गंदा काम था। वह कल जैसे उस घने पेड की ठंडी छाया मे पसीना पोछते पोछते बैठी थी। प्यास भी लगी थी और भूक भी। उसने पानी की बोतल लायी थी। पानी पिया। आत्मा शांत हो गया। लेकिन भूख कैसी मिटेगी। घर तो जाना ही पडेगा। आज भी चांग्या आगया वडा पाव लेके तो अच्छा होगा। इतने मे चांगो की रोज की  गाडी आयी। पूरी गाडी कचरे से भरी थी। पायल को अच्छा लगा। आनंद हो गया। अब चांग्या गाडी मे से घर तक छोड देगा। धूप तो नहीं लगेगी। यह विचार वो कर रही थी। गाडी से ड्रायव्हर उतर गया। वो चांगो नहीं था। वो रामशरण था। रामशरण बोतल और ग्लास लेके आया था। पायल घबरा गयी। दिल मे थरथराहट होने लगी। लेकिन इस बात का उसे आश्चर्य बिलकूल नहीं लगा। क्यों की यहाँ तो बहोत शराबी, गांजेकस, अफिम पिनेवाले, गर्दुले सब आते थे। ये तो कुछ नहीं कोई आदमी तो रंडिंयोंको भी इधर लाते थे। और खुले आसमान के नीचे, बेशरमी से संबंध बनाते थे। ये तो सभी रोजमर्रा की बातें थी। कोई अचरज नहीं लगा पायल को। 

                 “ए पोरी, इकडे ये। तेरे को प्यास लगी होगी ना? ”

                “नहीं, नहीं। मुझे प्यास भी नहीं और भूक भी नहीं लगी है। आज चांगो नहीं आया। क्यो? मैं अपने घर जाती हूँ।

                “नही पोरी, मी तर हाय ना। मेरे साथ चलो। तुमको बाजारमधी घेऊन जातो। होटल मे प्याज, पालख की भजीया, पकोडे खाने को देता हूँ। चल मेरे साथ। क्या सोच रही है तू पगली?

             “हां, लेकिन पहले मुझे जरा दवा लेनी है।” उसने बोतल ढक्कण निकाल दिया| दो ग्लासो में शराब डाली और बोला ‘धे,पी,तेरी प्यास थंडी हो जाएगी”।

               “पायल मेरा कहना ये है की, तू ये धंधा छोड दे। हम दोनो शादी करेंगे। मैं तो ड्रायव्हर की नोकरी म्युनिसीपाल्टी मे कर रहा हूँ। तुझको मैं मुर्गे और मुर्गिया लेके दे दूंगा। तू मुर्गी के अंडे बिकना। ये गंदगीवाला काम तेरी तबियत को तकलिफ देगा आगले जीवन में।”

               “मेरे पिताजी बिमार हैं। उनकी दवादारू करने को पैसा लगता हैं। इस वजह से में काम करती हूँ। दो बार खाना तो मिलता है।”

              “मेरी माँ को बहू देखनी है। मैं आता हूँ तेरे पप्पा को मिलने को! ”

             “हाँ कब आयेगा तू? कल? परसू? नरसू…”

               “देखता हूँ। टाइम निकालना पडेगा। जल्दी ही आऊंगा। तेरे बिना अभी जिना मुष्किल है, पायल।”

             पायल ये सुनकर बिन कुछ सोचे बिगर चांग्या को चिपक गयी। मिठी मे वो तो कभी नहीं गयी थी। आज पहली बार उसक होश उड गया था।

             दिर्घ काल तक पायल चांग्या को बिलख कर वैसी की वैसी रही।

            एका का एक पायल के ध्यान मे आया की बजार मे जाना है। कुछ खरीदना है। पप्पा बोले वही चीजे। लेकिन आज पैसे भी नहीं थे। उसने चांग्या के पास उधार माँगे। लेकिन वो शरमिंदा, संकुचित हुई। पैसा माँगने के कारण।

            दुसरे दिन वो गंदगी में आयी। सुबह जल्दी उठकर। उसने बडी तेजी से वो गैय्यन का मुर्दा बहुत कम समय में चमडी निकालना शुरू किया। पुरी गैय्यन फाड डालने तक दोपहर हो गयी। वह बहुत थक गयी थी। ये कोई आसान काम नहीं था। पायल एक घनेगर्द पेड के नीचे ठंडी छाया में बैठी थी। इतने में चांगो की रोज आनेवाली बडी गाडी कुडा कचरा लेकर आ गयी। पायल को खुशी हुई। इतनी कडी धूप मे घर जाने को आज गाडी है। चांग्या घर तक पहुँचा देगा।

            “नहीं नहीं बिलकूल नहीं। मैं ऐसा नहीं पिती। कभी पिया भी नही। मेरे को खाली सोडा वॉटर दे। बहोत प्यास लगी है।

            उसने पायल को पकड के जबरदस्ती करके उसको शराब का ग्लास खाली करवाया।

             बहूत रात हो चुकी थी। सुबह से गयी हई पायल अभी तक घर नहीं आयी, इसिलिए नरसू और पारूल चिंताग्रस्त हो चुके थे। नये नये अंदाज लगाते बाते कर रहे थे। टाईम पास करने के लिए। इतने मे चांगो, पायल की घर आया। उसने पहले ही पुछा “पायल कहाँ है। दिखती नहीं।”

             “अरे वो तो आज अभी तक आयी ही नयी है। कोई सहेली मिली होगी। उसके साथ घुमती-फिरती होगी। बच्ची है। ना समझ है।

             आखिर चांगो ने पायल के लिए लायी हुई एकदम भारी और सुंदर सारी, नरसू के हाथ में सौप दी। उसको भी बहुत परेशानी हो गयी, ये सुनकर।

             पारूल चांगो को बोली, “चल बेटा सगाई का समय आयातो पायल कहाँ गूम हो गयी। कोई भटकनेवाले कुत्ते ने उस पर हमला तो नहीं किया? कोई जंगली भेडिया, लोमडी, कुत्ते जैसा, उसने उसे मार के खाया तो नहीं?”

            “अभी तू ही चल मेरे साथ। उस गढी मे, गंदगी में जा के खोज लेंगे।”

          “हाँ चलो माँ जी। अभी पता चलेगा। इतने रात मे मै भी कभी उधर नहीं गया हूँ। मुझे भी डर लगता है।”

             पारूल और चांगो दोनो हाथ मे मशाल लेके बाहर निकले। अंधियारी तो घनी थी। वो दोनों उस अंधेरे मे ठेस खा खा के चलते चलते, पायल की खोज कर रहे थे। दोनो ने बहोत बडा डम्पिंग का भाग चून चून के खोज लिया। एक वटवृक्ष के नीचे कोई आदमी सोया है और वो चिल्ला रहा है। चीख रहा है। ऐसा उनको सुनने को मिला। वह दोनो उधर पहुँचे। पायल दुखसे किसी की मदद के लिए चिल्ला रही थी। उसका चिल्ला चिल्ला के कंठ सुखा था। वो वटवृक्ष के नीचे अकेली अंदाधुंद पडी थी। उधर एक भी गाडी नहीं थी। रामशरण भी नहीं था। पायल उठ गयी। उसने अपने कपडों पर नजर डाली। नीचे का पूरा अंग खूनसे बहबहके लालेलाल, खराब हुआ था। उसको उठने की, चलने की, बिलकुल ताकद नहीं थी।

               पारूल और चांग्याने उसको वही गंदगी में बिठाया। आस्ते कदम से पायल आखिर घर पहुँची। थोडी लेटकर आराम करने के बाद चांग्याने, पायल के लिए खरीद कर लाई हुई सुंदर भारी किमतवाली सारी उसको दिखायी। लेकिन निस्तेज आँखों से उसने साडी पर एक नजर फेर ली। थोडीसी हँसी आयगी पायल को।

                 “चांगो ये सारी तुम वापस ले जाओ।” पायल अचानक बोली।

                 “क्यों पायल, तुझे ये कलर,डिझाईन, पल्लू पसंद नहीं हैं क्या? चल मेरे साथ कल ये बदल के तेरी पसंद से दुसरी सारी खरीदेंगे।”

                 “चांगो, तुझे अब कौनसे शब्दों मे समझाऊँ? तेरी ये सारी मुझे नहीं चाहिए। और तेरे साथ शादी का मैने जो वादा किया था। वह भी भूल जा। तू दूसरी  कोई लडकी देख लेना।”

                “पायल, मेरी लाडली ऐसा मत करना। चांगो को बहुत दुख हो जाएगा। रख ले वो सारी। बडे प्रेम से उसने दी है।” नरसू समझा रहा था।

                “बापू, मै तो शरीर से अपवित्र हो गयी। मुझ पर रामशरण ने बलात्कार किया है। मेरा मन भी घायल हुआ है। अंदर से तो अभी खून बह रहा है। बापू मैं तुम्हारी सेवा करूंगी। कुँवारी ही रहुंगी मै। मर्द बहुत फसाते है।”

               दूसरे दिन वो सँवर गयी। रापी और अन्य हथियार लेके घर से निकली। अभी एक कुंवारी लडकी ने सम्हलना चाहिए था, वो तो लूट गया था। उसको डर नही था। शादी की इच्छा नही थी। इस घटना की वार्ता या जाहिरात हुई नही। इस देश मे ऐसी कितनी पायल होगी जो सर्वस्व लुटी हुई है। उनका दोष या गलती यह है की उनका यौवन सुंदर दिखना। और क्या?

               “पायल, अभी हम पुलिस थाने मे जाएंगे। तुम चलो मेरे साथ।”

               “उधर क्या करेंगे? पुलिसवाले चार कागज लिखापढी करेंगे और मुजरीम रामशरण को दोन दिन गिरफ्तार करेंगे। वो पैसा दबाएगा। दो दिन बाद छुट जाएगा।”

               “नहीं मैं तेरा कुछ भी नही सुनुंगा। चलो, सब चलो।”

              “अरे चांगो लेकिन जो बूंद से गयी वह हौद से नही आती” गरीब का कोई वाली नहीं है।

              चांगो मानने को तैयार नहीं था। वो सब पुलिस थाने म पहुँचे। चांगो ने फिर्यादी होकर गुन्हा रजिष्टर करने की बिनती की। पुलिसवालो ने भी नाटक किया। रामशरण को गिरफ्तार कर दिया। दो-चार चाटे लगाए। पायल, चांगो, बापू, पारूल सबको जबानी लेके छोड दिया।

                चांग्याने पायल को समझाया। “उसमे तेरा क्या दोष है?”

               “नहीं लेकिन मेरे जीवनपर लगा हुआ ये धब्बा कभी भी नही जाएगा।”

                थोडे अवसर के बाद चांग्याने फिरसे शादी का प्रस्ताव बापू-रूपल को बयाता। दोनों की शादी हो गयी। उस दिन से पायल ने डम्पिंग पर जान बंद किया। लेकिन हर दिन मन में आता था, “बूंद से गयी वो………”                                             

    

 

 




बाल साहित्य तथा बालक का चतुर्मुखी विकास

अंचल सक्सेना,

उप प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय कानपुर केण्ट कानपुर

मो.: 8004912415, ईमेल पता : [email protected]

 

शोध सारांश- बाल साहित्य वह साहित्य है जो बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, जिज्ञासावृत्ति, मानसिक विकास, चारीत्रिक व व्यक्तित्व विकास एवं प्रेरणाप्रद सामाजिक बोध के लिए लिखा जाता है तथा जो बच्चों की रुचियों, कल्पनाओं, बौद्धिक क्षमताओं, सूझ-बूझ, परिवेश, बाल मनोवृत्ति, बाल मनोभावों, बाल वृत्ति तथा बाल सोच को समझ कर तद्नुरूप रचनात्मकता से प्रेरित साहित्य ही बाल साहित्य कहलाता है।

बालक के चतुर्मुखी विकास के लिए उनमें अच्छे गुणों की अभिवृद्धि करना, उनमे शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक व चारित्रिक विकास के लिए उनमे अच्छे गुण विकसित करने होते हैं; यथा उत्साह, विश्वास, विनय, स्वाभिमान, अनुशासन, सदाचार, समय पालन, आत्मबल, साहस, निर्भयता, आज्ञापालन, सात्विकता, अनुसंधान, त्वरित निर्णय, उत्सुकता, निश्चय आदि।

बालक मे चरित्र के विकास के लिए भगवान राम व कृष्ण, जवाहर लाल नेहरू व मोहन दास करमचंद गांधी, वल्लभभाई पटेल, बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि महान देशभक्तों पर लिखी गई बाल कहानिया ही नही, वरन “गिल्लू” “नीलकंठ” जैसे संस्मरण भी सहायक होते हैं। भगत सिंह तथा अब्राहम लिंकन ने ऐसे ही बाल साहित्य को पढ़कर अपने चरित्र व भविष्य का निर्माण किया था।

“हितोपदेश”, “सिहासन बत्तीसी”, “बेताल पचीसी” तथा बिष्णु शर्मा कृत “पंचतंत्र” जैसी कहानियाँ, दक्षिण भारतीय मासिक पत्रिका “चंदामामा”, “नन्दन” जैसी मासिक पत्रिकाएं तथा राजस्थान साहित्य अकादमी का बाल साहित्य विशेषांक की कुछ कहानियां निश्चित रूप से बालमन मे अच्छे संस्कार का निर्माण करतीं हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान की “झांसी की रानी” ,विपुल ज्वाला प्रसाद की “आओ करे देश से प्यार” जैसी कई रचनाएँ तथा “बाल दर्पण” जैसी पत्रिकायें, बालमन मे न केवल राष्ट्रीय चरित्र का विकास करतीं है, वरन राष्ट्र के प्रति मर मिटने की भावना का विकास करती है।

 हिन्दी रचना “पर्वत की पुकार” तथा अग्रेज़ी स्पाइरी कृत “हीडी” जैसी रचनायेँ बालमन मे प्रकृति के प्रति प्रेम जाग्रत करती है। वही भारतीय साहित्य की “आधुनिक मीरा” “श्रीमती महादेवी वर्मा” की कहानी “गिल्लू” जिसमे एक गिलहरी के बच्चे के साथ उनके संस्मरण तथा “नीलकंठ” जिसमे एक मोर के साथ उनके संस्मरण तथा “मेरे बचपन के दिन” आदि मे उन्होने बालमन को प्रेरित कर उसमे पशुओं के प्रति प्रेम को जाग्रत करती हैं। इसी प्रकार अंग्रेज़ साहित्यकार “रुडयार्ड किपलिंग” की पुस्तक “जंगल बुक्स” मे अनेक ऐसी घटानाओं का समावेशन है, जो यह दर्शाती हैं कि प्रेम व सहानुभूति से खूंखार जानवरों को भी वश मे किया जा सकता है तथा यह जीव जन्तुओं के प्रति प्रेम को विकसित करती है ।

 वहीं जान रस्किन की रचना “किंग आफ द गोल्डन रिवर” कथा, रूसी लेखक अकार्ड गैदर का बाल उपन्यास “ तीमूर और उसकी टोली”, टालस्टाय की कहानी “बड़ों से अच्छे बच्चे” तथा राजस्थान साहित्य अकादमी मे प्रकाशित डा0 (सुश्री) लीला मोदी की कहानी “दीवार ढह गई” जैसी बाल कहनियाँ मानवीय प्रकृति व मानवीय प्रवृत्तियों का चित्रण करते हुये मित्रता की भावना का, मानव का मानव से प्रेम तथा मानवीयता की भावना का विकास करती है।
 हिन्दी बाल साहित्य तथा विश्व साहित्य मे ऐसी पर्याप्त रचनाएँ जो बालकों का चतुर्मुखी विकास तथा संवर्धन करने मे सक्षम है तथा उसका अध्ययन बालमन के सभी पक्षों का विकास करता है।

कीवर्ड्स/बीज शब्द – बाल साहित्य वस्तुत: बालमन के वहुमुखी विकास के लिए पूर्णतया सक्षम है ।

परिचय:- बाल साहित्य वह साहित्य होता है जो बालकों के लिए लिखा जाता है अर्थात् वह साहित्य जो बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, जिज्ञासावृत्ति, मानसिक विकास, चारीत्रिक व व्यक्तित्व विकास एवं प्रेरणाप्रद सामाजिक बोध के लिए लिखा जाता है तथा जो बच्चों की रुचियों, कल्पनाओं, बौद्धिक क्षमताओं उनकी सूझ-बूझ, उनका परिवेश, उनकी मानसिकता आदि को केन्द्र में रखकर लिखा गया हो। बाल मन प्रोढ़ मन से भिन्न होता है। बाल मन निर्मल, निष्कपट, कोमल, कल्पनाशील होता है। बाल साहित्य लिखने के लिए बाल मनोवृत्ति, बाल मनोभावों, बाल वृत्ति तथा बाल सोच को समझना होता है। इस तरह बाल मनोविज्ञान को समझने वाला तथा तद्नुरूप रचनात्मकता से प्रेरित साहित्य ही बाल साहित्य कहलाता है। बालसाहित्य के स्वरूप का निरूपण करते हुए महीयसी महादेवी वर्मा ने एक सार्थक टिप्पणी की थी कि ’’वैसे वह स्वयं एक काव्य है स्वंय ही साहित्य है ,हम उस साहित्य को एक दिशा देते हैं, सीमाएं बांधते हैं और इसे बाल साहित्य कहते है।‘‘

बाल साहित्य के सृजन के महान उद्देश्यों के अंतर्गत बालक के कोमल व्यक्तित्व का चतुर्मुखी विकास भी प्रासंगिक है। बालक के चतुर्मुखी विकास के लिए उनमें अच्छे गुणों की अभिवृद्धि कर नई पीढ़ी को एक स्वर्णिम भविष्य प्रदान करना बाल साहित्य का एक महान उद्देश्य है । परन्तु बालक का बहुमुखी विकास एक सामान्य व सरल कार्य नही है । इसके लिए उनमे अच्छे गुण विकसित करने होते हैं। बालक मे नियमित व्यायाम ब खेल के साथ पौष्टिक आहार लेने की प्रेरणा जागृत करनी होती है तथा उनके मानसिक, संवेगात्मक व चारित्रिक विकास के लिए उनमे अच्छे गुण विकसित करने होते हैं; यथा उत्साह, विश्वास, विनय, स्वाभिमान, अनुशासन, सदाचार, समय पालन, आत्मबल, साहस, निर्भयता, आज्ञापालन, सात्विकता, अनुसंधान, त्वरित निर्णय, उत्सुकता, निश्चय आदि। बाल साहित्य बच्चों को मनोनुकूल, उनका मनोविज्ञान समझकर, उन्हीं के स्तर पर उतरकर, उन्हीं की भाषा में उनके समझने योग्य अभिव्यक्ति पर उतरकर ही लिखा जाना होता है ।

शोध विधि–उपरोक्त विषय से संबन्धित वास्तविक तथ्यों के अन्वेषण के लिए प्राथमिक व द्वितीयक दोनों ही डाटा का अध्ययन किया गया इसके लिए न केवल मूल पुस्तकों का अध्ययन किया गया वरन पुस्तक समीक्षाओं को भी अवलोकन किया गया । चूंकि बाल साहित्य का क्षेत्र किसी एक भाषा तथा एक देश मे ही सीमित नही है अतएव देश व विदेश के लेखकों के कृतित्व का अवलोकन अध्ययन किया गया तथा विभिन्न भाषाओं के रचनाये इस अध्ययन मेसम्मिलित की गई। चूंकि विषय बाल साहित्य से बालक के प्रत्येक पक्ष के विकास को सुनिश्चित करने का है, अत: यह जानना भी आवश्यक है कि बाल साहित्य क्या है तथा बालक का चतुर्मुखी विकास किस प्रकार संभव हो सकता है? अतएव बाल साहित्य तथा बालक के चतुर्मुखी विकास की समीक्षा करते हुये साहित्य की समीक्षा की गई ।

साहित्य समीक्षा – बालक मे चरित्र का विकास करना एक बड़ी चुनौती है परन्तु बाल साहित्य लेखक विभिन्न महान चरित्र यथा आजाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल बहादुर शास्त्री की तरह देशभक्तों तथा भारतीय पौराणिक ग्रन्थ जैसे वेद ग्रंथों, रामायण तथा महाभारत से सम्बन्धित छोटी-छोटी कहानियां जब बालक बालिकाओं के लिए लिखते हैं तो भगवान राम की भांति बनने की प्रेरणा वे इन्हीं कहानियों से प्राप्त करेंगे तथा प्रेरणा का बाल मन पर विशेष प्रभाव होता है यथा विश्व के महानतम गणितज्ञों मे एक थे कार्ल फ्रेडरिक गौस जो बचपन से ही अंको के पैटर्न का अवलोकन कर गणनाये कर लेते थे उन्होंने गणित विषय मे कई शोध प्रस्तुत किये । जब इनकी प्रतिभाओं के विषय मे मरियम मिजकानी नामक एक ईरानी बालिका ने जब इनके विषय मे पड़ा तो वे इतना प्रभावित हुई तो उन्होने गणित विषय मे रुचि लेना प्रारम्भ किया तथा गणित का अध्ययन करना प्रारंभ किया तथा कई वर्षों के अध्ययन के बाद वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर बनी। उन्होने 2014 मे गणित का सर्वोच्च पुरस्कार “फील्ड मैडल” अर्जित किया । वे इस पुरस्कार को अर्जित करने वाली प्रथम महिला बनी ।

बाल मन का इतने मानसिक चारित्रिक विकास के ऐसे कई उदाहरण हैं नेहरू जी ने बाल साहित्य की अनेक उत्कृष्ट पुस्तकें पढी थीं और उनके बाल मन पर वे पुस्तकें जो प्रभाव डाल सकीं उसी के परिणाम स्वरूप उन्होंने बडे होने पर बच्चों के बौद्धिक विकास की महत्ता को समझा और इसके विकास के लिए प्रयत्नशील भी रहे। भगत सिह ने अपने बाल्यकाल मे क्रांतकारियो के वीरत्व की कहानिया पढ़कर सुनकर अपने पित से खेत मे बंदूकें बोने की बात की थी। अब्राहम लिंकन के जीवन का प्रेरणास्रोत भी बचपन में पढी एक पुस्तक ही रहीं जिसने उनके भविष्य का निर्माण किया। पाश्चात्य विद्वान पॉल हेजार्ड का यह कथन इस संदर्भ में द्रष्टव्य है “बच्चों की पुस्तकों के द्वारा इंग्लैंड का पुननिर्माण किया जा सकता है।”

नई शिक्षा नीति 1986 मे बालको को बाल साहित्य के द्वारा चारित्रिक विकास का समर्थन किया है । चिलड्रन बुक ट्रस्ट की पुस्तक “महान व्यक्तित्व पार्ट एक से दस तक” भी व्यक्तित्व निर्माण हेतु उपयोगी है। बाल साहित्य का उद्देश्य एक ऐसे चरित्र का निर्माण करना है जो विश्व कल्याण, विश्व बंधुत्व, मानवमात्र का कल्याण तथा स्वयं मे करुणा व प्रेम की भावना का विकास करके एक आदर्श समाज की स्थापना कर सके तथा मैत्री, प्रेम, दया, परोपकार और देश प्रेम के भावों का साम्राज्य स्थापित कर सके।

बाल मन मे संस्कार का विकास कैसे हो? “पंचतंत्र” के रचनाकार श्री विष्णू शर्मा ने पंचतंत्र की कहानियों में पशुओं और आम लोगों के माध्यम से विविध घटनाएं और प्रसंग इस प्रकार सृजित किया है कि उनकी हर कथा में मानवीय मूल्य यथा मैत्री, एकता, पारिवारिक प्रेम, देशभक्ति, करुणा, त्याग, सहनशीलता आदि मूल्यों समाहित हैं। पंचतंत्र में विष्णु शर्मा ने कहा है – “जिस प्रकार किसी नये पात्र का कोई संस्कार नहीं रहता, ठीक उसी प्रकार बालकों की स्थिति होती है।” अतएव कहानीयों के माध्यम से उन्हें प्रेरणा देकर उनमे संस्कार विकसित करना चाहिए। ’हितोपदेश‘ ’सिंहासन बत्तीसी‘ ’कथासरित्सागर‘ आदि ऐसी ही कृतियां हैं जो न केवल बालमन को आकृष्ट करती हैं, वरन वे उनमे एक उच्च संस्कार का विकास करती हैं। इस विषय पर एक दक्षिण भारतीय मासिक हिन्दी पत्रिका “चंदामामा” जो श्री बी नागी रेड्डी के द्वारा संपादित की जाती थी तथा मासिक पत्रिका “नंदन” की चर्चा भी प्रासंगिक है। ये दोनों पत्रिकायेँ केवल बालमन के उपयुक्त कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं, वरन बच्चों को अच्छा बनने के लिए एक उच्च संस्कारित आदर्श का निर्माण करने के लिए प्रेरित करती हैं। राजस्थान आकदमी की पत्रिका –“मधुमती” का बाल साहित्य विशेषांक तथा नारायण लाल परमार द्वारा रचित “वाणी ऐसी बोलिए” तथा श्रीमती इंदिरा परमार द्वारा रचित “अच्छी आदतें” बाल मन को सही मार्ग दिखाकर तथा उनके मन मे अच्छे संस्कार उत्पादित करती है”।

बच्चे राष्ट्र की धरोहर होते है, जिनमें हमारा अतीत सोता है, वर्तमान करवट लेता है और भविष्य अंकुरित होता है। विकसित होने पर यही बच्चे अपनी योग्यता के बल पर वह जब बुराइयों से लड़ते हैं और अपने समाज एवं देश में एक नई चेतना भरते हैं, तब वह राष्ट्र विकसित होकर उन्नतशील देशों के समक्ष खड़ा होने योग्य हो जाता है। बेताल पचीसी व सिंहासन बत्तीसी जैसी कहानी संग्रह बालक के मन मे राष्ट्र के प्रति अपने गौरव तथा कर्तव्य की भावना को जाग्रत करती है। सुभद्रा कुमारी चौहान की “झांसी की रानी” के बोल “खूब लड़ी मर्दानी” उनमे राष्ट्र गौरव व उसके लिए मर मिटने की भावना का विकास करते हैं। समकालीन साहित्य मे राजस्थान साहित्य अकादमी मे प्रकाशित श्री विपुल ज्वाला प्रसाद के द्वारा रचित “आओ करे देश से प्यार” भी इसी क्रम मे प्रासंगिक है। वास्तविकता मे बाल साहित्य बच्चों को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रभावित करके उनमे एक संस्कारित चरित्र का निर्माण करता है, यही कारण हे कि राहीजी बाल कविताओं को मात्र निरर्थक तुकबंदी का खेल नहीं मानते वह उन्हें किसी न किसी जीवनमूल्य अथवा संदेश का संवाहक मानते हैं।

पंडित रामनरेश त्रिपाठी की कविता “प्रार्थना” आज भी बच्चों में आध्यात्मिक भावना का स्वतः संचार करती है जैसे-’हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए” इस छोटी से कविता में कवि ने बालमन की नैतिक अभिव्यक्ति को शब्द प्रदान करते हुए लयात्मक और गेय बनाया हैं। विमला शर्मा का उपन्यास “एक था सिपाही” बालमन मे साहस वृत्ति उत्पन्न करता है। रूसी लेखक अकार्ड गैदर का बाल उपन्यास “तीमूर और उसकी टोली” बच्चों मे संगठन की भावना का विकास करता है तथा बाल व्यक्तित्व के विकास मे योगदान देता है। टालस्टाय की कहानी “बड़ों से अच्छे बच्चे” मे बच्चों का झगड़ा बड़ो का झगड़ा बन जाता है, बच्चे तो तुरंत मेल कर लेते हैं, लेकिन बड़े तो झगड़ते रह जाते है। इसी कर्म मे प्रासंगिक है। राजस्थान साहित्य अकादमी मे प्रकाशित डा0 (सुश्री) लीला मोदी की कहानी “दीवार ढह गई” जिसमे घर के बटवारे के मध्य दो बालकों के मध्य दोस्ती का सजीव चित्रण प्रदरशित किया गया है । यह कहानी वस्तुत: मित्रता की भावना का मानव का मानव से प्रेम स्थापित करती है।

बाल साहित्य का लक्ष्य बच्चों के मानसिक धरातल पर उतारकर उन्हें रोचक ढंग से नई जानकारियां देना है। बच्चों को जो अच्छा लगता है, उसे ग्रहण करने में सकुचाते नहीं हैं और जो सामग्री उन्हें थोपी हुई लगती है, उसे नकारने में कदापि संकोच नहीं करते हैं। अज्ञेय के अनुसार “बेशक बच्चा संसार का सर्वाधिक संवेदनशील यंत्र नहीं है। वह चेतनशील प्राणी है अपने परिवेश का समर्थ सर्जक है। वह स्वंय स्वतंत्रचेता है, क्रियाशील है और जो कार्य अपनी अन्तःप्रेरणा से करता है।” इस संबंध में खलील जिब्रान की यह पंक्ति उल्लेखनीय है, “’‘तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो, लेकिन विचार नहीं। क्योंकि उनके पास अपने विचार होते हैं।‘‘ परंतु बालकों मे अपार जिज्ञासा होती है उनकी इसी जिज्ञासा का उपयोग उनके मानसिक विकास मे करना होता है “उपयोगी आविष्कार”, “पर्वत की पुकार” ,”रंगो की महिमा’, “विज्ञान के मनोरंजक खेल” आदि बालकों के ज्ञान का संवर्धन करते हैं। डा श्याम मनोहर व्यास के द्वारा लिखित पहेलियाँ “अणु-परमाणु के टुकडे किये”, “ऐसा बली है कौन”। तीन नाम उसने दिये, इलेक्ट्रान, प्रोटान तथा न्यूट्रान।” आदि उनके ज्ञान का संवर्धन करती हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने “बाल-बोधिनी” नाम से बालिकाओं के लिए पत्रिका निकाली थी जिसमे बालिकाओं के लिए सिलाई कढ़ाई चूल्हा चौका तथा तथा अन्य सामाजिक विषयों पर रोचक तथा ज्ञान वर्धक सामग्री थी । इन्हीं की प्रेरणा से 1882 मे “बाल दर्पण” नमक पहली बाल पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ था। विज्ञान प्रगति तथा आविष्कार नामक पत्रिकाएँ बालकों को न केवल सामान्य जानकारियाँ वरन नवीनतम वैज्ञानिक व तकनीकी जानकरियाँ भी देती है।

पढना केवल बौद्धिक अनुभव नहीं है उसके द्वारा भावनात्मक अनुभवों की भी प्राप्ति होती है।‘ पढने से हास्य, रुचि, प्रसन्नता, उत्साह और महत्त्वाकांक्षा का विकास होता है। बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है और बौद्धिक ज्ञान की भी वृद्धि होती है। जीवन जीने की कला और उसके उद्देश्यों को प्राप्त करना ही मानव का कर्तव्य होता है किन्तु यदि वह जीवन व्यवहार की कला नहीं जानता तो उसे सफलता नहीं मिलेगी। जोना स्पाइरी कृत “हीडी” एक ऐसी कहानी है जिसमे प्रकृति प्रेम सादा सरल जीवन एवं उच्च विचारों का संदेश है। लेखिका ने एक अनाथ बच्ची के माध्यम से कथा प्रस्तुत की है। बर्फ से ढके पहाड़ों पर चमकती चाँदनी का सौंदर्य, घाटियों मे गुंजती संगीत जैसी धुन, जंगली फूलों तथा तितलियों के खेल के मध्य एक शहरी लड़की “कलाज” की कहानी है जिसके पैर बेकार है लेकिन आलापस की खुली हवा एवं प्रकृति की गोद मे रहकर वह स्वस्थ हो जाती है। बालमन मे प्रकृति के प्रति प्रेम उत्पन्न करने वाली यह कहानी प्राकृतिक सौंदर्य के द्वारा भावनात्मक व संवेगात्मक विकास का उदाहरण है।

इसी प्रकार बालमन मे मानवीय सम्बन्धों को विकसित करने के लिए उपयुक्त बाल साहित्य भी लिखा गया है। अंग्रेज़ी लेखक जान रस्किन की रचना “किंग आफ द गोल्डन रिवर” कथा मानवीय प्रकृति व मानवीय प्रवृत्तियों का ऐसा जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है कि पाठक अभिभूत रहा जाते हैं।

बालमन मे पशुओं के प्रति प्रेम को विकसित करने के लिए कई कहानियाँ साहित्य हमारे मध्य उपस्थित हैं यथा भारतीय साहित्य की “आधुनिक मीरा” “श्रीमती महादेवी वर्मा” की कहानी “गिल्लू” जिसमे एक गिलहरी के बच्चे के साथ उनके संस्मरण तथा “नीलकंठ” जिसमे एक मोर के साथ उनके संस्मरण तथा “मेरे बचपन के दिन” आदि मे उन्होने बालमन को प्रेरित कर उसमे पशुओं के प्रति प्रेम को जगाया है । इसी प्रकार साहित्य का नोबल पुरस्कार पाने वाले अंग्रेज़ साहित्यकार “रुडयार्ड किपलिंग” की पुस्तक “जंगल बुक्स” जिसमे जानवर बोलने वाले पात्र हैं (जिसमे मोगली बालमन का अत्यंत लोकप्रिय पात्र है।) इस पुस्तक मे लेखक ने काम क्रोध, लोभ, मोह, आकांक्षा प्रेम जैसे मानवीय मूल्यों को उकेरा है तथा इसमे अनेक ऐसी घटानाओं का समावेशन है जो यह दर्शाती हैं कि प्रेम व सहानुभूति से खूंखार जानवरों को भी वश मे किया जा सकता है। ये सभी पुस्तकें बालमन को न केवल इस संसार के समस्त जीव जंतुओं से प्रेम करना सिखाती है। ये पुस्तकें उनके मन मे मानवीय सवेदना विकसित कर उनके उचित भावनात्मक, मानसिक आत्मिक तथा संवेगात्मक विकास को सुनिश्चित करती हैं। यही वजह कि ये सभी पुस्तके सीबीएसई के पाठ्यक्रम मे प्रथम ही सम्मिलित की जा चुकी है। 

बच्चे को जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है, उसके जीवन को दिशा देना उसे सही राह दिखाना भी उतना ही आवश्यक होता है। परंतु यह तभी संभव जब ऐसे साहित्य का सृजन हो जो बालकों को भावनात्मक दृष्टि से संबल दे सके उनमे धैर्य सहनशीलता त्याग स्नेह जैसे मानव मूल्य तथा संवेग व भावों का विकास हो सके। बच्चे स्वभाव से ही समझदार तथा संवेदनशील होते हैं परंतु फिर भी उन्हें भावनात्मक रूप से उचित संरक्षण की आवश्यकता होती है अतएव बालको का लगाव उसी साहित्य से होता है जो उसके अपने परिवेश से संबन्धित होता है। सामान्यतया बाल मन की कल्पना शक्ति अत्यंत प्रखर व उर्वर होती है कि वे कहानी व कविताओं मे दिये गए सूक्ष्म संकेतों से ही उन्हे सजीव बना लेते हैं तथा कहानी के पात्रों को अपने निजी जीवन से जोड़ लेते हैं। उनकी जिज्ञासा इतनी तीव्र व प्रबल होती है है कि वह विश्व के हर कोने के विषय मे जानना चाहता है यही बालको का विशेष गुण हे जिसका उपयोग कर सभी शिक्षक(माँ, गुरु तथा अध्यापक) उन्हें शिक्षा व विश्व के उस समस्त ज्ञान को प्रदत्त कर सकते हैं जो उसके विकास के लिए आवश्यक है साथ ही उसमे रचनात्मक विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास कर सकते है । बाल साहित्य मे “डेनियल डफ़ो की रचना “रॉबिन्सन क्रुसों” जिसमे रोमांच तथा साहसिक अभियान समाविष्ट है तथा क्रुसों ,एक नाविक जो एक निर्जन द्व्वीप पर छूट जाता है तथा वर्षों तक अकेला रहता है । वास्तविकता मे यह एक सच्चे नाविक की कहानी है। इसी प्रकार क्रिस्टोफर कोलम्बस की सामुद्रिक साहसिक खोजों पर आधारित तथा काल्पनिक व वास्तविक घटनाओं से परिपूर्ण वर्ष 1928 मे वाशिंगटन इर्विंग के द्वारा लिखी गई काहनी संग्रह “ए हिस्ट्री आफ द लाइफ एंड वायाज़ आफ क्रिस्टोफर कोलम्बस” (3 वाल्यूम) आदि कहानियाँ वास्तव मे बालमन की जिज्ञासा को चतुर्मुखी विकास की ओर ले जाती हैं। इसी प्रकार अमरीकी लेखक “एडगर राइस बरो” ने भी टारजन श्रंखला की पुस्तकों के द्वारा बचपन मे ही जंगल मे भटक गए एक लड़के की कहानी प्रस्तुत की है । इसी प्रकार जोनाथन स्वीफ्ट ने गुलीवर ट्रेवल्स मे एक ऐसे नाविक की कथा का वर्णन किया है जो रोमांचक यात्रा करता है तथा एक ऐसे द्व्वीप पहुंचता है, जहाँ के निवासी बौने है, वहा सभी उसे दैत्य समझ लेते है । उनसे संघर्ष के बाद एक ऐसे देश पहुँच जाता है जहां के निवासी विशालकाय हैं। वहाँ उनके सामने वह स्वयं बौना प्रतीत हाओता है इस हास्यपूर्ण कहानी मे भी बालमन की जिज्ञासा व भाव का संवर्धन होता है। ये समस्त कहानिया, बाल साहित्य वस्तुत: बालमन की जिज्ञासा को जाग्रत व प्रबल कर उसमे अधिक ज्ञान ग्रहण करने विश्लेषण करने तथा उसके चतुर्मुखी विकास करने की संभावना बनाता है।

बालमन की समस्याओं को भी लेखको ने प्रदर्शित कर उनके मन को भी टटोला गया है साथ ही उन्हे दिशा देने का प्रयास भी किया गया है यथा एक दक्षिण भारतीय मासिक हिन्दी पत्रिका “चंदामामा” जो श्री बी नागी रेड्डी के द्वारा संपादित की जाती थी, मासिक पत्रिका “नंदन” तथा “सुमन सौरभ” जैसी बड़े होते बच्चो की पत्रिका मे अनेकों ऐसी काहानियों का समावेशन किया है जो न केवल उनको मन को संबल प्रदान करती हैं वरन उनके बाल मन की समस्याओं को संबोधित कर उन्हें सुलझाती हैं । इसी प्रकार “ बच्चों की परी कहानिया” इसी प्रकार एक बच्ची का यह भ्रम दूर करती है कि उसकी माँ उसे प्यार नही करती है, जबकि अंत मे उसे अपनी भ्रांति का हल मिल जाता है ।

एक तथ्य फिर स्पष्ट करना होगा उपरोक्त उदाहरण मे से कई पुस्तकों मे से कई पुस्तक बच्चो के लिए नही लिखी गई थी परंतु फिर भी चूंकि बालमन के लिए उपयुक्त थी अतएव बालमन ने उन्हें अपना लिया।

परिणाम व चर्चा

बालक मे चरित्र के विकास के लिए वाल साहित्य की भगवान राम व कृष्ण, जवाहर लाल नेहरू व मोहन दास, करम चंद गांधी ,वल्लभ भाई पटेल, बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि महान देशभक्तों पर लिखी गई बाल कहानिया ही नही,वरन गिल्लू नीलकंठ जैसे संस्मरण भी सहायक होते हैं ।भगत सिंह तथा अब्राहम लिंकन ने ऐसे ही बाल साहित्य को पढ़कर अपने चरित्र व भविष्य का निर्माण किया था ।

हितोपदेश,सिहासन बत्तीसी, बेताल पचीसी तथा बिष्णु शर्मा कृत पंचतंत्र जैसी कहानियाँ,दक्षिण भारतीय मासिक पत्रिका चंदामामा, नन्दन जैसी मासिक पत्रिकाए तथा राजस्थान साहित्य अकादमी का बाल साहित्य विशेषांक की कुछ कहानिया निश्चित रूप से बालमन मे अच्छे संस्कार का निर्माण करतीं हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान की “झांसी की रानी” ,विपुल ज्वाला प्रसाद की “आओ करे देश से प्यार” जैसी कई रचनाएँ तथा बाल दर्पण जैसी पत्रिकायें, बालमन मे न केवल राष्ट्रीय चरित्र का विकास करतीं है, वरन राष्ट्र के प्रति मर मिटने की भावना का विकास करती है।

 हिन्दी रचना “पर्वत की पुकार” तथा अग्रेज़ी स्पाइरी कृत “हीडी” जैसी रचनायेँ बालमन मे प्रकृति के प्रति प्रेम जाग्रत करती है। वही भारतीय साहित्य की “आधुनिक मीरा” “श्रीमती महादेवी वर्मा” की कहानी “गिल्लू” जिसमे एक गिलहरी के बच्चे के साथ उनके संस्मरण तथा “नीलकंठ” जिसमे एक मोर के साथ उनके संस्मरण तथा “मेरे बचपन के दिन” आदि मे उन्होने बालमन को प्रेरित कर उसमे पशुओं के प्रति प्रेम को जाग्रत करती हैं। इसी प्रकार अंग्रेज़ साहित्यकार “रुडयार्ड किपलिंग” की पुस्तक “जंगल बुक्स” मे अनेक ऐसी घटानाओं का समावेशन है जो यह दर्शाती हैं कि प्रेम व सहानुभूति से खूंखार जानवरों को भी वश मे किया जा सकता है तथा यह जीव जन्तुओं के प्रति प्रेम को विकसित करती है ।

 वहीं जान रस्किन की रचना “किंग आफ द गोल्डन रिवर” कथा, रूसी लेखक अकार्ड गैदर का बाल उपन्यास “ तीमूर और उसकी टोली, टालस्टाय की कहानी “बड़ों से अच्छे बच्चे” तथा राजस्थान साहित्य अकादमी मे प्रकाशित डा0 (सुश्री) लीला मोदी की कहानी “दीवार ढह गई” जैसी बाल कहनियाँ मानवीय प्रकृति व मानवीय प्रवृत्तियों का का चित्रण कराते हुये मित्रता की भावना का, मानव का मानव से प्रेम तथा मानवीयता की भावना का विकास करती है।
 “ए हिस्ट्री आफ द लाइफ एंड वायाज़ आफ क्रिस्टोफर कोलम्बस” (3 वाल्यूम), अमरीकी लेखक “एडगर राइस बरो” ने भी टारजन श्रंखला तथा डेनियल डफ़ो की रचना “रॉबिन्सन क्रुसों” आदि कहानियाँ वास्तव मे बालमन की जिज्ञासा को चतुर्मुखी विकास की ओर ले जाती हैं।

 

निष्कर्ष- हिन्दी बाल साहित्य मे ऐसी पर्याप्त रचनाएँ जो बालकों का चतुर्मुखी विकास तथा संवर्धन करने मे सक्षम है तथा उसका अध्ययन बालमन के सभी पक्षों का विकास करता है। इसी प्रकार विश्व के बाल साहित्य मे भी ऐसी कई अनुपम रचनाए है जो बालमन के चतुर्दिक विकास को सुनिश्चित करता है श्री के शंकर पिल्लई द्वारा बाल साहित्य के सन्दर्भ में “चिलड्रन बुक ट्रस्ट” की स्थापना 1957 मे की गई थी अब हमारे देश मे पर्याप्त साहित्य है जो बालकों का चतुर्मुखी विकास को सुनिश्चित करता है।

आभार-

सृजन आस्ट्रेलिया अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका का धन्यवाद जिन्होने भारत के बाहर भी हिनी का प्रसार को अपना ध्येय बनाया है तत्पश्चात उन सभी पुस्तकों के लेखकों व प्रकाशकों का धन्यवाद जिनकी पुस्तकें पढ़कर मै इस शोधलेख को लिखने मे मै सक्षम हो सका ।

सन्दर्भ-

  1. डा श्याम सिंह शशि, भारतीय बाल साहित्य और विश्व परिदृश्य,हिन्दी साहित्य पत्रिका, प्रकाशन 01 नवम्बर 2007

  2. डा0 दिविक रमेश,हिन्दी का बाल साहित्य: परम्परा, प्रगति और प्रयोग,(हिन्दी कहानियाँ, लेख,लघु कहानियाँ, निबंध, नाटक, कहानी,आलोचना, उपन्यास, बाल कथाएँ, प्रेरक कथाएँ)- गद्य कोश ( org)

  3. यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय, बाल साहित्य का उद्भव एवं विकास(आलेख),साहित्य शिल्पी (https://www.sahityashilpi.com/2016/02/baal-sahitya-history-article-yadunandan-prasad-upadhyay.html)

  4. विजय शंकर मिश्र, आजकल: बाल साहित्य-परम्परा और आधुनिकता बोध: पृष्ठ सं011

  5. डा0 बच्चन सिंह, आधुनिक साहित्य का इतिहास, पृष्ठ सं0270

  6. रेखा जोड़ एवं डा0 राजेश कुमार, हिन्दी बाल साहित्य: आवश्यकता एवं महत्व, जर्नल आफ एडवांस्ड एंड स्कोलरली रिसर्चेज इन अलाइड एजुकेशन, अकतूबर 2013

  7. लल्ली प्रसाद पाण्डेय, बाल सखा,इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद, पृष्ठ 23, अक्तूबर 1999

  8. डा0 स्वाती शर्मा, हिन्दी बाल साहित्य मे डा सुरेन्द्र विक्रम का योगदान,हिन्दी साहित्य निकेतन ,बिजनौर,उ0 प्र0 ,पृष्ठ 29, वर्ष 2012

  9. डा अरुणा, मुस्कराता गुलाब, राजस्थान साहित्य अकादमी, 2010

  10. नवीन रश्मि : हिन्दी के श्रेष्ठ बालगीत,सरस्वती बिहार,दिल्ली, पृष्ठ 36 वर्ष 1994

  11. डा0 सुरेन्द्र विक्रम,बाल साहित्य के विविध आयाम, अनुभूति प्रकाशन इलाहाबाद पृष्ठ 125 वर्ष 1998

  12. डा0 निरंकारी देव सेवक, बालगीत साहित्य इतिहास और समीक्षा ,उ0प्र0 हिन्दी संस्थान पृष्ठ 1,17 वर्ष 1983

  13. बाल साहित्य समीक्षा : मासिक पत्रिका, राष्ट्र बंधु कानपुर पृष्ठ 12 वर्ष 1983

  14. स्वतंत्रतोत्तर हिन्दी बाल कथा साहित्य , विश्व श्रंखला के विशेष संदर्भ मे

  15. स्वतंत्रतोत्तर हिन्दी बाल साहित्य,डा0 कमाना सिंह, आलेख प्रकाशन, पृष्ठ 30 वर्ष 2008

  16. डा0 शकुंतला कालरा , बाल साहित्य का स्वरूप और रचना संसार, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 2002, पृष्ठ 242,251

  17. अनु. डा0 विष्णू स्वरूप, ग्रिम की कहानियाँ

  18. जय प्रकाश भारती, बाल साहित्य का इतिहास, अखिल भारतीय दिल्ली,2000,पृष्ठ 24

  19. विपुल ज्वाला प्रसाद, आओ कर देश से प्यार, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर,2010 (https://web.archive.org/web/20140101215814/http://rsaudr.org/show_artical.php?&id=3624, Accessed on 31/07/2020)

  20. डा रेणू साह -बाल साहित्य रचना मे बाल मनोविज्ञान का योग राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर, 2010

  21. हिन्दी बाल साहित्य : एक अध्ययन-डा0 हरिकृष्ण देवसरेआत्माराम एंड संस नई दिल्ली पृष्ठ 314 वर्ष 1969

  22. हिन्दी बाल साहित्य : एक अध्ययन-डा0 हरिकृष्ण देवसरे, आत्माराम एंड संस नई दिल्ली पृष्ठ 26,6, 314 वर्ष 1969

  23. हिन्दी बाल साहित्य के सरोकार -डा0 हरिकृष्ण देवसरे, यश पब्लिकेशन, नई दिल्ली पृष्ठ 3 वर्ष 2012

  24. बाल साहित्य रचना और समीक्षा – डा0 हरिकृष्ण देवसरे, शकुन प्रकाशन, नई दिल्ली पृष्ठ 4 वर्ष 2012

  25. हिन्दी बाल साहित्य विविध परिदृश्य – डा0 सुरेन्द्र विक्रम, अनुभूति प्रकाशन इलाहाबाद,पृष्ठ 73

  26. भारतीय बाल साहित्य के विविध आयाम- डा0 रमाकांत, हिन्दी संस्थान, उ0 प्र0 पृष्ठ 108 वर्ष 1996

  27. भारतीय बाल साहित्य के विविध आयाम- विनोद चंद्र पाण्डेय,राष्ट्र भाषा परिषद लखनऊ पृष्ठ 35 वर्ष 2000

  28. पंचशील शोध समीक्षा-डा0 हेतु भारद्वाज,पंचशील प्रकाशन,जयपुर,पृष्ठ 126, वर्ष 2009

  29. हिन्दी बाल साहित्य की रूपरेखा- डा0 प्रसाद, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 176,1985

  30. बाल गीत साहित्य (इतिहास और समीक्षा)-निरंकारीदेव सेवक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,लखनऊ पृष्ठ 95

  31. बाल साहित्य मेरा चिंतन –डा0 हरिकृष्ण देवसरे ,मेघा बुक्स दिल्ली पृष्ठ25, 198, वर्ष 2002

  32. हिन्दी बाल साहित्य और विमर्श –ऊषा यादव एवं राजकिशोर सिंह सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ 9,13,157,वर्ष 2014

  33. श्री राम गोपाल राही, बाल सभा मे नेहरू जी पर राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर,2010

  34. डा0 श्याम मनोहर व्यास, विज्ञान पहेलियाँ, राजस्थान साहित्य अकादमी, 2013

  35. प्रकाश मनु, राजस्थान साहित्य अकादमी, नवम्बर 2013

  36. यजुर्वेद 6/5 पं श्री राम शर्मा आचार्य संस्कृति संस्थान बरेली,उ0 प्र0

  37. संस्कृति के चार अध्याय –रामधारी सिंह दिनकर –जवाहरलाल नेहरू

  38. आओ गुन गुनाओ –परशुराम शुक्ल शेखर प्रकाशन,पृष्ठ 3,1991

 

 

 

 




तेरी गली से

तेरी गली से शब ओ रोज़ मुस्कुराते हुए
मै जा रहा था फ़क़त तित्लीयाँ उड़ाते हुए !!

तेरे हुज़ूर जो आया तो ये ज़रूर हुआ
तु रो पड़ा था मेरा क़द ज़रा बढाते हुए !!

तेरे लबों से तो कुछ ऐसी आशनाई थी
सुबह से शाम हुई उंगलीयां सजाते हुए !!

मुझे पता था कि हर ज़ख्म भर ही जाता है
हर एक ज़ख्म पे हंसता था चोट खाते हुए !!

दर – ए – सुकून तो आई नहीं कभी दुनिया
दर – ए – हबीब मगर आई ग़म मनाते हुए !!

मेरे हुक़ूक़ मुझे इस तरह से मिलते हैं
कि जैसे भीख मिले तेरे दर से जाते हुए !!




मै क्या कहूं

मै क्या कहूं की साथ मेरे क्या नहीं हुआ
अच्छा भला किया था पर अच्छा नहीं हुआ !!

कैसे करेगा मुझसे नदामत का तज़किरा
जिसको कभी यक़ीन भी पक्का नहीं हुआ !!

वो भी किसी की ज़ात से मन्सूब हो गया
बिछ्डे़ हुए तो उसको भी हफ़्ता नहीं हुआ !!

ऐसे भी ना तमाम हुई आपकी गज़ल
हर शेर हो गया मगर मक़्ता नहीं हुआ !!

मुर्शिद मुझे हमेशा ही इक ग़म सताएगा
सौ झूठ बोल कर भी मै सच्चा नहीं हुआ !!

इक ग़म-शनास शख्स की तन्हाईयों को देख
फ़िर मै किसी के इश्क़ में अन्धा नहीं हुआ !!




आंदोलन में ‘उत्सव’ जैसा रसास्वादन, पिज्जा-बर्गर, चाय-कॉफी सब हाजिर

सुशील कुमार’नवीन’

खाने को पिज्जा, लच्छा परांठा, तंदूरी नान,तवा नान, चिल्ला, डोसा वो सब हैं। जो मसालेदार खाने वालों को चाहिए। देसी चटखारे के लिए मक्के की रोटी, सरसों का साग, दाल तड़का, कढ़ी,चावल, राजमा जितना चाहो उतना छक लो। मीठे में देसी घी का हलवा, गर्म जलेबी, लड्डू, बूंदी तो हैं ही। हरियाणवीं तड़का लिए बाजरे की रोटी, अलुणी घी, लाल मिर्च की चटनी लंगर के प्रसादे को और चार चांद लगा रही हैं।

     लस्सी-दूध भरे बड़े-बड़े ड्रम नजदीकी गांवों से बिना कहे पहुंच रहे हैं। सुबह उठते ही गर्म चाय तैयार मिल रही है। पीने को पानी की पैक्ड बोतल हर वक्त उपलब्ध है। इम्युनिटी बढ़ोतरी के लिए बादाम का काढ़ा बनाया जा रहा है। बिछाने के लिए गद्दे, ओढ़ने के लिए रजाई, गर्म मोटे कम्बल। मिनी थियेटर तक साथ लिए हैं। मनोरंजन के लिए रोज पंजाबी-हरियाणवीं कलाकार बिन बुलाए पहुंच रहे है। यूँ लग ही नहीं रहा कि किसान दिल्ली बार्डर पर आंदोलन पर हैं। इन्हें देखकर तो यही लगता है मानो किसी बड़े उत्सव का आयोजन यहां हो रहा है। 

   आंदोलन जारी हुए दो हफ्ते होने को है। आमतौर पर ज्यों-ज्यों आंदोलन लंबा खींचता जाता है। उसके बिखराव की संभावनाएं और अधिक होती चली जाती हैं। आंदोलनकारियों के हौंसले तक जवाब देने लग जाते हैं। भीड़ लाखों से हजारों, हजारों से सैंकड़ों में पहुंच जाती है। पर यहां मामला इतिहास के सामने नया उदाहरण प्रस्तुत करने जा रहा है।

  सेवा भाव में सिखों का कोई सानी नहीं है। लंगर क्या होता है, इसकी सही परिभाषा यही बता सकते हैं। सेवा में वैरायटी की इनके पास भरमार है। हम प्रायः देखते है जब भी कोई इनकी धार्मिक यात्रा का जिस भी शहर या बड़े गांव में आगमन होता है तो वहां के स्थानीय धर्मप्रेमियों की सेवाभाव अतुलनीय होती है। मीठे पानी की छबील, हलवा, छोले-पुरी तक ही ये सीमित नहीं होते। हर छोटी से बड़ी चीज सेवाभावियों द्वारा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। खास बात सेवा करने वाले भी कोई साधारण नहीं होते हैं। बड़े-बड़े अफसरों,खिलाड़ियों, सिने कलाकारों, राजनेताओं को देखा जा सकता है। यही भाव किसान आंदोलन की जड़ें जमाये हुए है।

इसे और अधिक मजबूती हरियाणा वालों का ‘सहयोग का लंगर’ प्रदान कर रहा है। हरियाणा की तरफ से आने वाले हर वाहन में आटे की बोरियां, सब्जी, दाल, दूध, लस्सी इतना अधिक मात्रा में पहुंच रहा है। दिल्ली आंदोलन में भागीदारी निभा रही अंतरराष्ट्रीय योगा एथलीट कविता आर्य के अनुसार वहां किसी चीज की कमी नहीं है। लस्सी-दूध के टैंकर अपने आप पहुंच रहे है। किसी ने जलेबी का लंगर चला रखा है तो किसी ने लड्डू-बर्फी का। कोई गन्ने का जूस पिला रहा है तो कोई किन्नू, गाजर का मिक्स जूस। साबुन, तेल जो चाहिए, सेवा भाव में हाजिर है। मच्छर आदि न काटे, इसके लिए कछुआ छाप, गुड नाइट आदि क्वाइल यहां तक ओडोमास क्रीम तक मिल जाएगी। 

सोशल एक्टिविस्ट सुशील वर्मा बताते हैं कि यहां लगता ही नही कि कोई आंदोलन चल रहा है। मैनेजमेंट गजब का है। देशी के साथ विदेशी फीलिंग यहां महसूस की जा सकती है। पैक्ड बोतल में पानी चाहिए तो वो भी मिल जाएगा। पिज्जा, बर्गर सब तैयार मिलते हैं। काय-कॉफी की कोई कमी नहीं। स्नेक्स भी अलग-अलग प्रकार के। बिस्किटस की दुनियाभर की वैरायटी। आंदोलन भले ही रोड पर चल रहा हो, पर बंदों ने अपने जीवन शैली को अपने ही स्टाइल में बरकरार रखा हुआ है। ट्रेक्टर ट्रालियां रेन बसेरों का रूप लिए हैं। कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन हैं। रजाई-गद्दों की कोई कमी नहीं। सेवा करने वाले कुछ पूछते नहीं, अपने आप काम लग जाते हैं। कोई किसी को काम की नहीं बोल रहा। सब के सब भोर होते ही ड्यूटी सम्भाल लेते हैं। आंदोलन कब खत्म होगा इसका किसी को पता नहीं। बस जम गए तो जम गए। एक ही आवाज खाली हाथ नहीं लौटेंगे।

फ़ोटो:गूगल

(नोट:लेख ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर है।इसे कोई व्यक्तिगत रूप में न लें।)

लेखक:

सुशील कुमार ‘नवीन’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद है।

96717-26237




नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लगोई

नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लगोई

डॉ वसीम अनवर

सहायक प्रोफेसर

उर्दू और फ़ारसी विभाग

डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश
[email protected], 09301316075

नज़ीर अकबराबादी उर्दू के पहले अवामी शायर तस्लीम किए जाते हैं। वो अवाम के शायर थे और इन्होंने अवामी ज़िंदगी के मसाइल को अपनी शायरी का मौज़ू बनाया। वो ज़िंदगी के हर पहलू पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं और शिद्दत से महसूस करते हुए शायरी का जामा पहना देते हैं। आम तौर पर उन्हें नज़्म के शायर की हैसियत से शौहरत-ओ-मक़बूलियत हासिल है और बहैसीयत नज़्म निगार उनकी अज़मत से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन नज़ीर की ग़ज़लें भी अपनी एहमीयत रखती हैं। जो उन्हें ग़ज़लगो शायरों की सफ़ में जगह दिलाने के लिए काफ़ी हैं।
नज़ीर अकबराबादी के शेअरी सफ़र का आग़ाज़ एक ऐसे वक़्त हुआ जब उर्दू ग़ज़ल के अज़ीम शायर मीर तकी मीर की मक़बूलियत बाम-ए-उरूज पर थी। अकबराबाद ( आगरा ) में जब नज़ीर ने मीर के साथ एक मुशायरे में शिरकत की और हिम्मत के साथ एक ग़ज़ल पढ़ी तो मीर तकी मीर उस नौजवान शायर का कलाम सुनकर मुतवज्जा हुए और नज़ीर के कलाम की तारीफ़ की। इस से ये बात वाज़िह है कि नज़ीर ने अपनी शायरी बड़े जोश-ओ-ख़ुरोश से शुरू की। इस वाक़्या का ज़िक्र करते हुए वहाब अशर्फ़ी लिखते हैं:
“एक रिवायत में है कि नज़ीर ने मीर तकी मीर से भी मुलाक़ात की थी या एक बज़्म में दोनों शरीक हुए थे।“(1)
नज़ीर की ग़ज़ल का मतला था:
नज़र पड़ा इक बुत परीवश, निराली सज-धज नई अदा का
जो उम्र देखो तो दस बरस की पे क़हर-ओ-आफ़त ग़ज़ब ख़ुदा का
इस के बाद नज़ीर की शौहरत और मक़बूलियत में इज़ाफ़ा हुआ और उनका शुमार अच्छे शायरों में होने लगा।
नज़ीर अकबराबादी अपने वक़्त के पहले शायर हैं जिन्होंने ज़माने की डगर को एक तरफ़ छोड़कर शायरी की, क्यों कि ये ज़माना ग़ज़लगोई के उरूज का ज़माना था, और इस दौर में ज़्यादातर ग़ज़लें ही लिखी जाती थीं। लेकिन नज़ीर ने नज़्म निगारी की तरफ़ तवज्जा की और इस में मुकम्मल कामयाबी भी हासिल की, लिहाज़ा नज़्म निगारी का बाक़ायदा आग़ाज़ नज़ीर ने ही किया। चूँकि उस ज़माने में ग़ज़ल मक़बूल-ए-ख़ास-ओ-आम थी, इस लिए नज़ीर भी वक़तन फ़वक़तन ग़ज़ल में तब्अ-आज़माई करते रहे। उनकी ग़ज़लों में रिवायती अंदाज़ के इलावा ग़म-ए-इशक़ और कैफ़-ए-इशक़ की ख़ुसुसियात पाई जाती हैं।
ग़ज़लों में उनका उस्लूब पूरी तरह दुनिया की ना-गुफ़्ता बही से मुताल्लिक़ है, लिहाज़ा वो लिखते हैं:
तल्ख़ी-ए-मर्ग जिसे कहते हैं अफ़सोस, अफ़सोस
इक दिन सब के तईं ज़हर ये खाना होगा
नज़ीर की ग़ज़लें भी इन्फ़िरादी शान रखती हैं। इन ग़ज़लों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। नज़ीर के बारे में ये कह कर दामन बचाना मुश्किल है कि उनकी ग़ज़लों में मामूली क़िस्म के जज़्बात की तर्जुमानी की गई है और उनमें ग़ज़ल की रवायात को सही तौर पर बरता नहीं गया। ये बात ज़रूर है कि उनके कलाम में ऐसी ग़ज़लें ख़ासी तादाद में मौजूद हैं। नज़ीर एक जीनियस इन्सान थे यही वजह है कि उन पर सौक़ियत का इल्ज़ाम लगाया गया और मुताद्दिद तज़किरा निगारों ने उन्हें शायरों की सफ़ में शुमार नहीं किया। शेफ़्ता ने गुलशन-ए-बेख़ार, में लिखा है कि:
“इस के बहुत से अशआर सौक़ियों की ज़बान पर जारी हैं और उन अशआर पर नज़र रखते हुए उसे शायरों की सफ़ में शुमार ना करना चाहिए।“(2)
लिपट लिपट के में इस गुल के साथ सोता था
रक़ीब सुबह को मुँह आँसूओं से धोता था
नज़ीर के दीवान में काफ़ी तादाद में ग़ज़लें मौजूद हैं इन ग़ज़लों का तसलसुल रिवाज के मुताबिक़ नहीं था शायद इसी वजह से इस ज़माने के दूसरे शायर और तज़किरा निगारों ने उनके कलाम को एहमीयत नहीं दी। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने अपने तज़किरे आब-ए-हयात मैं नज़ीर को जगह नहीं दी। शेफ़्ता, नज़ीर को बाज़ारी शायर कह कर नज़रअंदाज कर देते हैं सय्यद अहमद देहलवी ने भी नज़ीर के बारे में इतना इशारा किया है
”बाज़ दिल्ली के तज़किरा-हाय-शौअरा जमा करने वालों ने सिर्फ इतना लिखा है कि वो एक मुल्ला मकतबी सहत-ए-अलफ़ाज़ से मुअर्रा पुरगो और अवामुन्नास बल्कि जुहला की ज़बान बोलने वाला था।“(3)
नज़ीर की ग़ज़लों में नज़्मिया शायरी के असरात साफ़ दिखाई देते हैं उनकी ग़ज़लों में एक किस्म का तसलसुल पाया जाता है लेकिन ये तसलसुल नज़्म जैसा नहीं, इबादत बरेलवी रक़मतराज़ हैं:
“नज़ीर की ख़ूबी ये है कि उन्होंने इस तफ़सील व जुज़ईआत और जिद्दत और उपज को ग़ज़ल के लिए गवारा बना दिया है उनकी बेशतर ग़ज़लें तसलसुल की हामिल हैं। ये तसलसुल इस जोश और वलवले का नतीजा है जिसने उनके यहां तफ़सील-ओ-जुज़ईआत के अनासिर को पैदा किया है लेकिन ये तसलसुल नज़्म की सूरत इख़तियार नहीं करता। बल्कि उनकी ग़ज़लों में मूड की हम-आहंगी के रूप में ज़ाहिर होता है।“(4)
नज़ीर की ग़ज़ल-ए-मुसलसल का एक हिस्सा मुलाहिज़ा हो:
ये जो उठती कोन्पल है जब अपना बर्ग निकालेगी
डाली डाली चाटेगी और पत्ता पत्ता खा लेगी
होनहार बरवा के पत्ते चिकने चिकने होते हैं
बहुत नहीं कुछ थोड़े ही दिन में बेल फंग को आ लेगी
अभी तो किया है छुटपन है नादानी है बे-होशी है
क़हर तो इस दिन होवेगा जब अपना होश सँभालेगी
नाज़ अदा और ग़मज़ों के कुछ और ही कतरेगी गुल फूल
सीन लगावट चितवन का भी और ही इत्र निकालेगी
काजल मेहंदी पान मिस्सी और कंघी चोटी में हर-आन
क्या-क्या रंग बनावेगी और क्या-क्या नक़्शे ढालेगी
जब ये तन गदरावेगा और बाज़ू बाँहें होंगे गोल
इस दम देखा चाहिए क्या-क्या पेट के पांव निकालेगी
किस-किस का दिल धड़केगा और कौन मलेगा हाथों को
पकेंगे जब अंगया में ये कच्चे सेब उछालेगी
नज़ीर ने ग़ज़ल की हैय्यत में मौज़ूआती ग़ज़लें लिखने पर तवज्जा दी, ग़रज़ नज़ीर की ग़ज़ल उस दौर के दूसरे ग़ज़लगो शौअरा से मुख़्तलिफ़ नज़र आती हैं। ग़ज़ल का हर शेअर एक इकाई होता है इस का दूसरे अशआर से बराह-ए-रास्त कोई ताल्लुक़ नहीं होता है, लेकिन नज़ीर की ग़ज़लों में चीदाकारी के बजाय एक तसलसुल है जिसकी वजह से उनकी ग़ज़लों पर भी नज़्मों का गुमान होता है:
तन-ए-मुर्दा को क्या तकल्लुफ़ से रखना
गया वो तो जिससे मुज़य्यन ये तन था
कई बार हमने ये देखा कि जिनका
मुशब्बन बदन था मुअत्तर कफ़न था
जो क़ब्र कुहन उनकी उखड़ी तो देखा
ना उज़ु-ए-बदन था ना तार-ए-कफ़न था
नज़ीर आगे हमको हवस थी कफ़न की
जो सोचा तो नाहक़ का दीवानापन था
नज़ीर अकबराबादी ने नज़्मों की तरह ग़ज़लों में भी मंज़र-निगारी के नमूने मौजूद हैं। नज़ीर अपनी ग़ज़लों में ख़ूबसूरत मनाज़िर की तस्वीरकशी करते हैं। ये बात ज़हन नशीन रखनी चाहिए कि मनाज़िर की तस्वीरकशी में उन्हें दर्जा-ए-कमाल हासिल है। एक ग़ज़ल में आंधी का मंज़र इस तरह पेश किया है, मुलाहिज़ा हो:
बगोले उठ चले थे और ना थी कुछ देर आंधी में
कि हमसे यार से आ हो गई मुड़भेड़ आंधी में
जता कर ख़ाक का उड़ना दिखा कर गर्द का चक्कर
वहीं हम ले चले उस गुल-बदन को घेर आंधी में
नज़ीर की शायरी में दुनिया-भर के मौज़ूआत शामिल हैं, तंज़-ओ-ज़र्राफ़त का अंसर भी ख़ासा नुमायां है। तंज़-ओ-ज़र्राफ़त को नज़ीर ने बतौर-ए-ख़ास नहीं अपनाया बल्कि ये ख़ुसुसियत कलाम-ए-नज़ीर में ज़िमनी तौर पर पैदा हो गई है। चंद अशआर मुलाहिज़ा हो:

अगर वो शोला-रू पूछे मेरे दल के फफूलों को
तो उस के सामने इक खोशा-ए-अंगूर ले जाना
जो ये पूछे कि अब कितनी है उस के रंग पर ज़र्दी
तो यारो तुम गुल सद्बर्ग या काफ़ूर ले जाना
नज़ीर की शायरी में फ़िक्र-ओ-फ़लसफ़ा की तलाश बेसूद है। ज़िंदगी की रंग-रलियाँ और ज़िंदगी के हल्के फुल्के मुआमलात उनकी शायरी के मौज़ूआत हैं। नज़ीर को चुटकुलेबाज़ शायर कहा जाता है। ख़ुद नज़ीर ने अपनी ग़ज़ल के एक शेअर में अपनी चुटकुलेबाज़ी की तरफ़ इशारा किया है शेअर मुलाहिज़ा हो
सब जानते हैं चुटकुलेबाज़ी नज़ीर की
इस के हर सुख़न में है अय यार चुटकुला
नज़ीर की ग़ज़लों में जज़्बात-ओ-एहसासात और क़लबी वारदात को पेश किया गया है। जो उनके दिल पर गुज़रती है साफ़ वही बात अशआर में ढल जाती हैं। यानी वो आप-बीती को अपने अशआर का मौज़ू बनाते हैं। इबादत बरेलवी नज़ीर के बारे में लिखते हैं:
”नज़ीर इन ग़ज़लों में बग़ैर किसी झिजक के वो सब कुछ समो देते हैं जवान पर गुज़रती है जिससे वो दो-चार होते हैं या दो-चार होने की उन्हें तमन्ना है।“(5)
नमूना-ए-कलाम मुलाहिज़ा फ़रमाएं:
तमाम रात थी और कुहनीयाँ-ओ-लातें थीं
ना सोने देता था मुझको ना आप सोता था
नज़ीर ने अपनी ग़ज़लों में जो माहौल पैदा किया है वो ताय्युश का माहौल नहीं है, ताय्युश पसंदी अगर जिस्मानी तौर पर नहीं तो कम अज़ कम ज़हनी और जज़्बाती तौर पर एक ग़ैर सेहत मंदी की दलील ज़रूर है। नज़ीर की ग़ज़लों में ताय्युश पसंदी का ख़्याल ना होने के बराबर है। किसी हद तक  बोवल्हव्सी उसी को कह सकते हैं लेकिन ये बोवल्हव्सी भी एक सेहतमंद इन्सान की बोवल्हव्सी है:
लिखें हम ऐश की तख़्ती को किस तरह ए जां
क़लम ज़मीन के ऊपर दवात कोठे पर
नज़ीर ग़ज़ल के तक़ाज़ों से पूरी तरह वाक़िफ़ थे और उनकी ग़ज़लों में रिवायती इशक़ के नमूने मौजूद हैं। उनकी ग़ज़लों में ज़िक्र-ए-महबूब की उम्दा मिसालें दिखाई देती हैं। नज़ीर अपनी ग़ज़लों के अशआर में इशक़-ओ-आशिक़ी के मज़ामीन पेश करते हैं। उनके इश्क़िया अशआर अपना मुनफ़रद रंग रखते हैं। नज़ीर के चंद अशआर मुलाहिज़ा हों:
कल उस के चेहरे को हमने जो आफ़ताब लिखा
तो उसने पढ़ के वो नामा बहुत इताब लिखा
इस परी रू से चला फिर दिल लगाने को नज़ीर
क्या कहें ये शख़्स भी कोई अजब दीवाना है
नज़ीर के तसव्वुर-ए-इशक़ के मुताल्लिक़ शकील उल रहमान रक़म तराज़ हैं:
”नज़ीर की ग़ज़लों में दो पैकरों की मुहब्बत अपनी सरशारी और रूमानियत से मुतास्सिर तो करती ही है साथ ही इशक़ का ऐसा तसव्वुर भी सामने आ जाता है जो इशक़-ए-इलाही और इशक़ दरवेश की अंदरूनी कैफ़ीयत और इस के रद्द-ए-अमल को नुमायां और ज़ाहिर करता है। उनकी ग़ज़लों में महबूब गोश्त पोश्त का पैकर भी है और ज़ात-ए-इलाही भी। शरार-ए-हुस्न के शोले से तूर जल कर ख़ाक हो जाता है और गुल-बदन के दिल में थोड़ी सी हमदर्दी आशिक़ के अंदर एक गुलज़ार पैदा कर देती है। नज़ीर के विज़न में कुशादगी पैदा होती है। तो ख़ुरशीद, आफ़ताब, सुब्ह-ए-गुलज़ार, तेशा, पहाड़, बर्क़ वग़ैरा के इस्तिआरे बड़े पुरकशिश बन जाते हैं। महबूब के जमाल का ज़िक्र आता है तो चोटी की गुंधावट, ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ, ग़ुंचा-दहन, रंग-ए-गुल, बोसे का नशा, ज़ुल्फ़ पर शिकन वग़ैरह से इस पैकर की तस्वीर बनाई जाती है। तन की सफ़ाई, तन की नरमी, मख़मल सा पाँव का तलवा,सब्ज़ धानी कुर्ती वग़ैरह उर्दू ग़ज़ल में पहली बार जलवा बनते हैं।“(6)
ख़ुदा के वास्ते गुल को ना मेरे हाथ से लो

मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी
मुझे तो उसपे निहायत ही रशक आता है
कि जिसके हाथ ने पोशाक तेरे तन की सी
देखकर कर कुर्ती गले में सब्ज़ धानी आपकी
धान के भी खेत ने अब आन मानी आपकी
नज़ीर की ग़ज़लों ने उर्दू ग़ज़ल को एक नई तवानाई का एहसास और ख़ुद्दारी अता की। लेकिन इस ख़ुद्दारी की हदें ख़ुद-परस्ती से नहीं मिलती हैं। ये तवानाई और ख़ुद्दारी एक मुतनासिब अंदाज़ और मुतवाज़िन कैफ़ीयत में सेहतमंद ज़िंदगी का सही एहसास दिलाती हैं। उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी से उकताहट और बे-ज़ारी नज़र नहीं आती है। नज़ीर के यहां नाउम्मीदी, मायूसी और ग़मगीनी भी नहीं है। उन्होंने इन चीज़ों पर क़लंदराना तौर पर क़ाबू हासिल किया।
नज़ीर की ग़ज़लों में तसव्वुफ़ पर मबनी अशआर की ख़ासी तादाद मौजूद है। मुख़्तलिफ़ मसाइल-ए-तसव्वुफ़ को बड़ी ही आसान ज़बान में बयान कर देते हैं। नज़ीर की ग़ज़ल का ये शेअर मुलाहिज़ा हो:
उस में क्या ताक़त जो मालिक हो कोई बुत ए नज़ीर
जान भी अल्लाह की और माल भी अल्लाह का
दुनिया की नापायदारी और बे-सबाती के मौज़ू पर नज़ीर के कई अशआर मिलते हैं। ये शेअर मुलाहिज़ा हो:
ना गुल अपना, ना ख़ार अपना, ना ज़ालिम बाग़बाँ अपना
बनाया, आह किस गुलशन में हमने आशयां अपना
हम क्यों ना अपने आपको रो लेवें जीते-जी
ए दोस्त कौन फिर करे मातम फ़क़ीर का
नज़ीर अपनी ग़ज़लों में एक मख़सूस तबक़े की तर्जुमानी करते हैं। जिसकी वजह से उनकी ग़ज़लों में इन्फ़िरादी रंग पैदा हो गया है। नज़ीर के इस इन्फ़िरादी रंग में ग़ज़ल का कोई आला मयार नहीं है। इबादत बरेलवी रक़मतराज़ हैं:
”नज़ीर ने ग़ज़लों के कई दीवान मुरत्तिब किए हैं। और दूसरे ये कि उनमें एक मख़सूस तबक़े की तर्जुमानी की गई है जिसके बाइस उनमें एक मख़सूस इन्फ़िरादी रंग पैदा हो गया है। इस रंग से इख़्तिलाफ़ किया जा सकता है इस को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। ये ठीक है कि नज़ीर की ग़ज़लों के इस मख़सूस रंग में ग़ज़ल का कोई आला मयार नहीं है ना उनमें पेश किए हुए ख़्यालात और जज़्बात-ओ-एहसासात में कोई बुलंदी और निखार है और ना उनमें कोई ग़ज़ल की रवायात को पेश-ए-नज़र रखने की कोशिश की गई है।“(7)
नज़ीर की ग़ज़लों का मुताला करने से अंदाज़ा होता है कि वो ग़रीबों, कमज़ोरों, मुफ़लिसों और निचले तबक़े के लोगों की नुमाइंदगी अपनी ग़ज़लों में करते हैं। वो हर मज़हब व मिल्लत के लोगों से यकसाँ तौर पर हमदर्दाना बरताव पसंद करते थे। प्रोफ़ैसर मुहम्मद हुसैन ने ठीक लिखा है
”वो इलम उल इन्सान से बहुत अच्छी तरह वाक़िफ़ थे। वो हिन्दुओं और मुस्लमानों, बच्चों और बूढ़ों, अमीरों और ग़रीबों, देहातियों और शहरियों, फ़क़ीरों और दुनिया दारों, संतों और ओबाशों सबसे मिलते-जुलते थे।“(8)
बेज़री फ़ाक़ाकशी मुफ़लिसी बे सामानी
हम फ़क़ीरों के भी हाँ कुछ नहीं और सब कुछ है
नज़ीर की नज़्मों की तरह ग़ज़लों में भी अलफ़ाज़ का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा देखने को मिलता है। वो ग़ज़ल में भी जुज़्ज़िआत निगारी में बड़ी क़ुदरत रखते हैं। ग़ज़ल में नज़ीर अकबराबादी ज़ोर-ए-बयान और ज़ख़ीरा-ए-अलफ़ाज़ पर ख़ुसूसी तवज्जा देते हैं। वो ऐसे अलफ़ाज़ भी ग़ज़ल में इस्तिमाल करते हैं, जो आम रिवायत से मुनासबत नहीं रखते। उनकी ग़ज़लों में अलफ़ाज़ का ज़ेर-ओ-बम, नशिस्त-ओ-तर्तीब इक तरन्नुम सा पैदा कर देती है। नज़ीर की ग़ज़ल का शेअर मुलाहिज़ा हो:
दिखा कर झमक दिल को निहायत कर गया बेकल
परी-रू, तुंद-ख़ू, सरकश, हटीला, चुलबुला, चंचल
नज़ीर की ज़बान के मुताल्लिक़ मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली कहते हैं कि नज़ीर की ज़बान अहल-ए-ज़बान कम जानते हैं। लिखते हैं
”नज़ीर अकबराबादी ने शायद मीर अनीस से ज़्यादा अलफ़ाज़ इस्तिमाल किए हैं, मगर उनकी ज़बान को अहल-ए-ज़बान कम जानते हैं।“(9)
नज़ीर ने अपनी ग़ज़लों में मुख़्तलिफ़ पकवान का भी ज़िक्र किया है। उनकी ग़ज़लों में ख़ैर, दलिया, वग़ैरह जैसे अलफ़ाज़ देखने को मिलते हैं। एक शेअर मुलाहिज़ा हो:
उधर तो क़र्ज़ हुआ और इधर ना आया यार
पकाई ख़ैर थी क़िस्मत से हो गया दलिया
नज़ीर की ग़ज़लों में नरमी घुलावट शामिल है वो अपनी ग़ज़लों में नरम सुबुक और शीरीं अलफ़ाज़ इस्तिमाल करते हैं और अंदाज़-ए-बयान में रख रखाव पाया जाता है। नज़ीर फ़ारसी अलफ़ाज़-ओ-तराकीब इस्तिमाल करने से गुरेज़ नहीं करते हैं, उनकी ग़ज़लों में फ़ारसी तराकीब और लफ़्ज़ी शान-ओ-शौकत का एहतिमाम है। ग़ज़ल के चंद अशआर मुलाहिज़ा हों:
ए सफ़-ए-मिज़गाँ तकलीफ़ हर तरफ़
देखती है क्या उलट दे सफ़ की सफ़
देख वो गोरा सा मुखड़ा रशक से
पड़ गए हैं माह के मुँह पर कलफ़
आ गया जब बज़्म में वो शोला-रू
शम्मा तो बस हो गई जल कर तलफ़
देखिए क्या हो बेतरह दिल की लगे हैं घात में
अश्वा-ए-पुर फ़रेब भी ग़मज़ा-ए-सेहरकार भी
उर्दू ग़ज़ल को नज़ीर ने एक नया आहंग भी दिया है जिसमें उनके नज़रिया-ए-हयात का बड़ा दख़ल है। बेबाकी और साफ़-गोई उनके मिज़ाज में थी। उनकी ग़ज़लों में भी बेबाकी का जारिहाना अंदाज़ मौजूद है। बेबाकी और बेसाख़तगी के इम्तिज़ाज से तफ़सील और वज़ाहत पैदा हो गई है। इस तफ़सील और वज़ाहत ने उनकी ग़ज़लों में किसी हद तक ढीली ढाली कैफ़ीयत पैदा कर दी है। इस वजह से उनकी ग़ज़लें निखरी हुई नज़र नहीं आती। लेकिन इस के बजाय एक जोश-ओ-वलवले और रिन्दी-ओ-सरमस्ती का एहसास ज़रूर होता है। नज़ीर इस जोश और वलवले, इस रिन्दी और सरमस्ती में इस तरह डूब जाते हैं कि उनके यहां ग़ज़ल की मुरव्वजा रम्ज़ियत और ईमाईयत, रिवायती अलामतें और इस्तिआरे भी नज़रअंदाज हो जाते हैं।
नज़ीर अकबराबादी ने जिस दौर में शायरी शुरू की वो मीर, सौदा और दर्द का ज़माना था इस दौर को उर्दू शायरी का अहद-ए-ज़र्रीं कहा जाता है। सौदा, मीर, और दर्द तो अपने ज़माने के बड़े शायर तस्लीम किए जाते थे। लेकिन जिस शायर ने अपनी ग़ज़लों में पसमांदा तबक़े की तर्जुमानी की उसे नज़र अंदाज कर दिया गया। नज़ीर अकबराबादी की ज़हनी और जज़्बाती तौर पर अवाम से गहरी वाबस्तगी थी। उन्हें अवाम के मज़ाक़, जज़्बात-ओ-एहसासात और मसाइल से दिलचस्पी थी उन्होंने ख़ुद को इन तमाम ख़ुसुसीआत से हम-आहंग कर लिया, जो अवाम में मौजूद थीं, और इन्ही ख़ुसुसीआत की तर्जुमानी वो अपने कलाम में करने लगे। इसी वजह से उनकी शायरी आम रवायत से मुख़्तलिफ़ नज़र आने लगी उन्होंने एक ऐसा रंग इख़्तियार किया जिसमें उनकी इन्फ़िरादियत साफ़ झलकती है।
नज़ीर ने तक़रीबन हर सिनफ़-ए-सुख़न में तब्अ-आज़माई की है। उनके कुल्लियात में ग़ज़ल, नज़म, क़सीदा, मसनवी, रुबाई, मुसद्दस, तर्जीह बंद, मुस्तज़ाद सभी कुछ मौजूद है। ज़िंदगी का कोई पहलू ऐसा नहीं जो उनकी नज़र से चूक गया हो, उन्होंने बेशुमार मौज़ूआत को अपनी तख़लीक़ात में जगह दी है। जिसके नतीजे में उनके यहां अलफ़ाज़ का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा पाया जाता है। नज़ीर ने ग़ज़ल में ज़बान के सही इस्तिमाल की एहमीयत को महसूस किया, लेकिन मौज़ू के एतबार से उन्होंने ज़बान में भी तबदीलीयां की हैं। वो नज़मों की तरह ग़ज़लों में भी अवाम की तर्जुमानी करते हैं, इस लिए बोल की चाल की ज़बान का इस्तिमाल हुआ है। नज़ीर की ग़ज़लों में एक रवानी और बेसाख़तगी है जो मौज़ू से हम-आहंगी का नतीजा है, इस लिए उनकी ग़ज़लिया शायरी में जो जिद्दतें हैं वो ग़ज़ल की क्लासिकी रवायात से पूरी तरह मुताबिक़त नहीं रखतीं बल्कि गहरे जमालियाती शऊर का नतीजा मालूम होती हैं। नज़ीर ने इस एतबार से ग़ज़ल के दायरे को वसीअ किया है और इस में नए इमकानात और नए तजुर्बात के लिए ज़मीन हमवार की है।

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हवाशी:

1          तारीख़ अदब उर्दू (जिल्द अव़्वल) –  वहाब अशर्फ़ी स249
2          बहवाला तारीख़ अदब उर्दू(जिल्द अव़्वल) – वहाब अशर्फ़ी स247
3          कलाम-ए-नज़ीर अकबराबादी – मर्तबा फ़ारूक़ अर्गली स13
4          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स304
5          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स297
6          नज़ीर अकबराबादी की जमालीयात – शकील-उल-रहमान स79
7          ग़ज़ल और मुताला-ए-ग़ज़ल – इबादत बरेलवी स296-297
8          नज़ीर अकबराबादी हिन्दुस्तानी अदब के मुअम्मार – मुहम्मद हसन स44
9          नज़ीर अकबराबादी की जमालीयात – शकील-उल-रहमान स25

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Dr. Waseem Anwar
Assistant Professor
Department of Urdu & Persian
Dr. H. S. Gour University, Sagar M. P. 470003
[email protected], 09301316075