1

महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतू कविता : “नारी शक्ति”

नारी शक्ति के क्या कहने, सारे जग में सब जाने
सेना हो या हो पुलिस, दौड़ हो या हो अंतरिक्ष! 
हर जगह लहरा रही, नारी अपना परचम
शिक्षा हो या हो मेडिकल, स्थल हो या हो जल! 
आईएएस हो या आईपीएस,पर्वत हो या हो बाॅक्सिंग
हर जगह स्त्री ने, साबित किया है खुद को! 
चाहे जन्म देना हो फिर, या सहना हो तकलीफ कोई
सबकुछ अपने अंदर, समेट कर रह जाती वही! 
शक्ति के बिना लगते हैं, शिव भी अधूरे
“दर्श” नारी की शक्ति, करती हर काम पूरे! 

नाम- धीरज कुमार शुक्ला “दर्श”

पद- जिलाध्यक्ष, झालावाड़ स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया, राजस्थान

पता- ग्राम व पोस्ट पिपलाज, तह. खानपुर ,जिला झालावाड़, राजस्थान, (326038) भारत

मोबाइल अंक/वाट्सएप अंक- 7688823730

Email- dheerajkumarshukla99




औरत की इच्छा

 
                       औरत की इच्छा 
                    ————–
 
चट्टानों के बीच कैद एक शीतल सी धारा जल की |
बाहर आने को व्याकुल है,व्यथा कहे किससे मंन की| 
 
ऊँचा मस्तक किये खड़े हैं , अहंकार के मद में चूर |
ज्वालामुखी धधकता मन में, व्यथा सुनेंगे क्या ये क्रूर |
 
ये पाषाण मुझे समझे हैं , मैं शीतल सी सलिला हूँ |
क़ैद किये हैं मुझे युगों से, जाना केवल अबला हूँ |
 
अबला जिसको समझ रहे हैं,परम शक्ति है उसका नाम |
नादानी में भूल रहे हैं,  होगा इसका क्या परिणाम |            
                                       
जितने महारथी जन्में हैं , शूरवीर ,योद्धा ,अभिराम| 
सबने पहले चलना सीखा ,अबला के आँचल को थाम|
 
अति बलवान समझते खुद को ,अहंकार दिन -दूना है 
तूने दबा रखा धरती को , तुझे चरण अब छूना है|
 
डॉ. ज्योति मिश्रा 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
 



औरत की इच्छा

 
                       औरत की इच्छा 
                    ————–
 
चट्टानों के बीच कैद एक शीतल सी धारा जल की |
बाहर आने को व्याकुल है,व्यथा कहे किससे मंन की| 
 
ऊँचा मस्तक किये खड़े हैं , अहंकार के मद में चूर |
ज्वालामुखी धधकता मन में, व्यथा सुनेंगे क्या ये क्रूर |
 
ये पाषाण मुझे समझे हैं , मैं शीतल सी सलिला हूँ |
क़ैद किये हैं मुझे युगों से, जाना केवल अबला हूँ |
 
अबला जिसको समझ रहे हैं,परम शक्ति है उसका नाम |
नादानी में भूल रहे हैं,  होगा इसका क्या परिणाम |            
                                       
जितने महारथी जन्में हैं , शूरवीर ,योद्धा ,अभिराम| 
सबने पहले चलना सीखा ,अबला के आँचल को थाम|
 
अति बलवान समझते खुद को ,अहंकार दिन -दूना है 
तूने दबा रखा धरती को , तुझे चरण अब छूना है|
 
डॉ. ज्योति मिश्रा 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
 



बस , ऐसी लहर देना है

शब्द तो भाव के भूखे है, 

अभाव है,तो पूरी तरह से रखे हैं, 

भावना है,तो निश्चित उसमें शक्ति है,

शक्ति का मनुहार ही उसकी भक्ति है, 

सशक्त संबोधन से संज्ञायूं दौडी आती हैं, 

जोश भर देने से फिर शक्ति सहित आती हैं, 

शब्दो के भाव से ही बाण का प्रभाव है,

विशेषण के आवेग से आता उसमें वेग प्रवाह है,

उमंग भरे शब्दो से,मधुमास बने वनजारा है,

शब्द की शक्ति से अभेद्य राजमुकुट भी हारा है,

शब्दभेदी बाणों से पृथ्वीराज का आगाज़ है,

इसी से मिटे मुहम्मद गोरी का साम्राज्य है, 

भाव भरे नि:शब्द में यदि भरे सर्वनाम है,

रस-रंग से मुकुट का करते काम तमाम है,

मत समझें शब्द शक्ति से अर्थशक्ति बलवान है,

यह तभी तक टिके हैं जब तक रचना मेहरबान है,

शिवाजी के जोश से छूटे औरंगजेब का पसीना है, 

भाट होकर नहीं , हमें चाणक्य बनकर जीना है,

पहाडों को जो डुबो दे, बस ऐसी लहर देना है,

मदहोशी के रात में अब ऐसी खबर देना है,

क्रिया के वेग से तडपती उमंग का प्रभात हो,

शब्द मुक्त मात्राओं पर फिर आघात हो

दिशाहीन चुटकुले यूँ सशक्त दिशा बने,

“कबीर “या”नीरज” की वही विधा बने,

“महादेवी” के “पथ के राही” से हो मनन,

हो “भारत भारती ” जन का मनन।




बस इतना ही बहुत है

भले ही मजधार में, 

जीवन की नौका हो,

मैं हूँ और तुम भी हो 

बस इतना ही बहुत है ।1।

नीरव में ठहरी कश्ती, 

साहिल का पता नहीँ, 

तुम हो बस खेवनहार, 

बस इतना ही बहुत है।2।

धीमी गति की नौका में, 

चप्पू भी पास नहीं है, 

हौसला है, इन बाजू में ,

बस इतना ही बहुत है ।3।

इस ओर हम बाजू का, 

उस ओर, तुम बाजू से, 

यूँ लहर पर चप्पू मारेंगे, 

बस इतना ही बहुत है ।4।

हो भले ही ,निर्जन थल,

खुशी का पर्व बनायेंगे,

हम हैं, तुम हो, धीरज है,

बस इतना ही बहुत है ।5।

बस्ती बसेगी हौसले से, 

हस्ती नहीं कभी मिटेगी, 

इन साँसों में गर्माहट है, 

बस इतना ही बहुत है ।6।

जहाँ पर हम दोनों रहेंगे,

इतिहास भी वहीं रचेगा, 

भरोसा है हमें तुम पर,

बस इतना ही बहुत है ।7।