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हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम

हिन्दी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम

सूरज के प्रसाद

भाषाविद्

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय

ईमेल पता : [email protected]

 

सारांश (Abstract):

इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) ने वैश्विक समाज को जिस तीव्र गति से परिवर्तित किया है, उसने जनसंचार माध्यमों (Mass Communication Media) के स्वरूप, भाषा, सामग्री और प्रभाव क्षेत्र को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत शोध पत्र “हिंदी का वैश्विक फलक और जनसंचार माध्यम” हिंदी भाषा की सूचना-प्रौद्योगिकी में भागीदारी और उसकी संभावनाओं की व्यापक समीक्षा करता है। लेख में दर्शाया गया है कि कैसे सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक—प्रौद्योगिकी (Technology), सूचना (Information) और भाषा (Language)—परस्पर जुड़कर जनसंचार की दिशा और दशा को बदल रहे हैं।

इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि कंप्यूटर, इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब जैसे उपकरणों की सहायता से सूचना का त्वरित संप्रेषण संभव हुआ है, जिसमें भाषा की भूमिका केंद्रीय है। लेख यह भी रेखांकित करता है कि हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी में समाविष्ट करने हेतु विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हुए हैं, जैसे देवनागरी आधारित की-बोर्ड, इंस्टी कोड, यूनिकोड, भाषायी सॉफ्टवेयर और वेब आधारित टूल्स का विकास। हिंदी भाषा को कंप्यूटर और इंटरनेट के साथ जोड़ने की यह प्रक्रिया, न केवल भारत के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी के विस्तार में सहायक सिद्ध हो रही है।

वेबसाइट निर्माण, ई-मेल सेवा, ऑनलाइन भाषा शिक्षण सॉफ्टवेयर, हिंदी आधारित चैट और ब्राउज़र सिस्टम जैसे अनेक उपकरणों के माध्यम से हिंदी को डिजिटल माध्यम में सशक्त बनाया गया है। शोध यह प्रतिपादित करता है कि यदि भाषा की सुबोधता, सरलता और ग्राह्यता को प्राथमिकता दी जाए, तो हिंदी न केवल सूचना संप्रेषण का सशक्त माध्यम बन सकती है, बल्कि वैश्विक संवाद की भाषा भी बन सकती है। लेख का निष्कर्ष यह है कि डिजिटल मीडिया में हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है और भविष्य में हिंदी विश्व की प्रमुख सूचना भाषा बनने की क्षमता रखती है।

बीज शब्द (Keywords):
हिंदी, सूचना प्रौद्योगिकी, जनसंचार, कंप्यूटर, इंटरनेट, भाषा शैली, यूनिकोड, देवनागरी, वेबसाइट, वेब सामग्री, डिजिटल मीडिया, तकनीकी भाषा

इक्कीसवीं सदी में मानव समाज में एक ऐसी प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ, जिसने देखते ही देखते हमारे निजी, सामाजिक-सरकारी और व्यावसायिक जीवन में एक आक्रामक की तरह प्रवेश किया और निरंतर परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति के साथ वर्तमान समाज को सूचना समाज में परिवर्तित कर दिया। यूनेस्को की व्याख्या के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी एक शास्त्रीय, तकनीकी, प्रबंधकीय एवं अभियांत्रिकी शाखा है, जो सूचनाओं के तंत्र को विकसित करके उसका प्रयोग कंप्यूटर के माध्यम से करते हुए मानव और मशीन के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को सुदृढ़ और सबल बनाती है। दूसरे शब्दों में सूचना प्रौद्योगिकी कंप्यूटर, संचार और इलैक्ट्रॉनिकी का वह समन्वित रूप है, जिसमें सूचना प्रणाली के विशिष्ट आयामों और उसकी प्रासंगिकता की खोज के द्वारा सूचना उत्पादन, विश्लेषण, भंडारण, संचरण आदि कार्य किए जाते हैं, जिसके महत्त्वपूर्ण अंग हैं- सूक्ष्म संसाधक, डेटा भंडारण तंत्र और डेटा संचरण तत्त्व।
सूचना प्रौद्योगिकी एक सरल तंत्र है, जो तकनीकी उपकरणों के सहारे सूचनाओं का संकलन, प्रक्रिया एवं संप्रेषण करता है। सूचना प्रौद्योगिकी के तीन प्रमुख घटक हैं-प्रौद्योगिकी, सूचना और भाषा। इस प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण भूमिका है कंप्यूटर प्रौद्योगिकी की। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी ‘‘सूचना संसाधन और संप्रेषण अभियांत्रिकी’’ की सबसे ज्यादा कारगर प्रौद्योगिकी है। इससे जितनी बड़ी क्रांति हमारे सामाजिक जीवन में आई है उससे कहीं बड़ी क्रांति सूचना प्रौद्योगिकी में आई है। कंप्यूटर हमारे निजी, सामाजिक, सरकारी, व्यावसायिक तथा वाणिज्यिक क्रिया-कलापों में हमें अनंत सुविधाएँ और लाभ प्रदान करता है और हमारा श्रम और समय बचाने के साथ-साथ अद्यतन सूचनाओं के प्रति हमें सजग रखता है।

कंप्यूटर का विकास बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक में सन् 1935 में चार्ल्स बेवेज द्वारा बनाए गए ‘नालिटिकल एंजिन’ से हुआ, जिसकी कार्यप्रणाली बहुत-कुछ आज के आधुनिक कंप्यूटर जैसी ही थी। सन् 1944 में हावर्ड विश्वविद्यालय द्वारा ‘‘आई बी एम’’ और यू एन नेवी’’ के सहयोग से मार्क-1 नामक यंत्र का निर्माण हुआ। इस क्रम में 1946 में कंप्यूटर युग का सूत्रपात हुआ जो सन् 1955 से 1971 तक गति और कार्यक्षमता की दृष्टि से विकसित हुआ और उसमें नए आयाम भी सम्मिलित होते गए। आज कंप्यूटर आकार में छोटा और वजन में हल्का होकर विशाल मेन फ्रेम से छोटा होकर टेबलटॉप, लैपटॉप, पामटॉप, रिस्टटॉप और जेब में सिमट गया है। वहीं कंप्यूटर बहुप्रयोजनी भी हो गया है। इससे अब न केवल टाइपिंग और मुद्रण का काम ले सकते हैं बल्कि फोन, फैक्स कर सकते हैं, फोटो खींच सकते हैं, गाना सुन सकते हैं, रिकॉर्डिंग कर सकते हैं, वीडियो चलचित्र देख सकते हैं, केल्कुलेटर, घड़ी, डायरी का काम ले सकते हैं और इंटरनेट व वेबसाइट्स का उपयोग करके सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, खरीदारी कर सकते हैं, डाक्टरी सलाह ले सकते हैं, शिक्षण प्रशिक्षण दे-ले सकते हैं, पूरी दुनिया में विभिन्न स्थानों पर बैठे लोग कांफ्रेसिंग कर सकते हैं और ज्ञान-विज्ञान की नई-नई जानकारी मिनटों में प्राप्त कर सकते हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के संदर्भ में कंप्यूटर के उपकरण हैं- इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब। सूचना और संचार के क्षेत्र में दूरसंचार, संचार माध्यम, कंप्यूटर, कंप्यूटर-विषयक क्षेत्र आदि प्रमुख क्षेत्रों का विकास 20वीं सदी के अंतिम दशक में अति तीव्र गति से हुआ है। इन सबमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इंटरनेट व वेबसाइट का प्रवेश है। यह एक ऐसी प्रौद्योगिकी है जिसमें विश्वव्यापी नेटवर्क में हजारों कंप्यूटरों को एक कंप्यूटर के साथ जोड़ा गया है।

इस संदर्भ में प्रौद्योगिकी से तात्पर्य उन उपकरणों से है जो दृश्य-श्रव्य रूप में सूचना को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने के माध्यम होते हैं- इनमें कंप्यूटर, इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब, मोडेम, स्केनर, वीडियो कैमरा, साउंड कार्ड, टेलीफोन, प्रिंटर, सर्वर, सैटेलाइट आदि शामिल हैं। आज इस प्रौद्योगिकी में बहुत तेजी से विकास हो रहा है और दो से अधिक प्रौद्योगिकी युक्तियों को जोड़ने से इंटरनेट को सीधे टीवी के पर्दे पर देखना, मोबाइल फोन पर इंटरनेट की सुविधा और वायरलेस प्रौद्योगिकी से केबल के बिना इंटरनेट चलाना संभव हो गया है। इस प्रकार नवीनतम सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के सम्मिश्रण से संसाधनों का नेटवर्क, सामाजिक जानकारी और बुद्धि के सभी प्राप्य रूपों की वृद्धि के असीम अवसर पैदा हुए है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब में विभिन्न स्तरों पर जो परिवर्तन, परिवर्धन और प्रगति हुई है इससे न केवल आम जनमानस को प्रेरणा मिली है बल्कि व्यापारियों उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, अधिकारी वर्ग और यहाँ तक कि राजनीतिज्ञों का भी ध्यान आकर्षित हुआ है। ई-मेल, ई-कॉमर्स, ई-गर्वनेंस, ई-ऐजुकेशन, ई-कम्यूनिटीज़, डाटा-प्रबंधन सूचना पुनः प्राप्ति आदि के माध्यम से इसने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर सूचना प्रौद्योगिकी को एक नवक्रांति के रूप में स्थापित कर दिया है।

सूचना प्रौद्योगिकी का दूसरा घटक है-सूचना। सूचना से तात्पर्य उस कथ्य या सामग्री से है जो इंटरनेट या वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से उपलब्ध होती है। ये सूचनाएं दो प्रकार की होती हैं- सामान्य सूचनाएँ और ज्ञानात्मक सूचनाएँ। सामान्य सूचनाएँ प्रायः तात्कालिक महत्व की होती हैं, जैसे व्यापारिक, व्यावसायिक, राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सूचनाएँ। ज्ञानात्मक सूचनाओं का संबंध ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों या अनुशासनों से होता है। ज्ञानात्मक सूचनाएँ अधिक स्थायी प्रकृति की होती हैं और उनका उपयोग प्रायः संदर्भ गं्रथों की तरह होता है, जैसे ज्ञान-विज्ञान संबंधी जानकारी, शब्दकोश, विश्वकोश, थिसॉरस, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, शिक्षण-प्रशिक्षण संबंधी सामग्री आदि।

स्थायित्व की दृष्टि से भी सूचनाएँ दो प्रकार की होती हैं- स्थिर, और परिवर्तनशील। स्थिर सूचनाएँ काफी समय तक इंटरनेट-वर्ल्ड वाइड वेब पर उसी रूप में बनी रहती हैं। उनमें जल्दी-जल्दी या कम समयांतराल पर बार-बार परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती है या बहुत कम आवश्यकता होती है, जैसे- साहित्य, ज्ञान-विज्ञान की सामग्री, इतिहास, विश्वकोश, शब्दकोश, शिक्षण-प्रशिक्षण सामग्री आदि से संबंधित जानकारी। परिवर्तनशील सूचनाएँ वे हैं, जिन्हें हर कुछ मिनटों, घंटों, दिनों या महीनों में अद्यतन करते रहने की आवश्यकता होती है, जैसे-समाचार, विमान-रेल आगमन-प्रस्थान संबंधी सूचना, खेल कमेंट्री, क्रय-विक्रय संबंधी सूचना, रोजगार-पदों का विज्ञापन, संस्थाओं की गतिविधियों का विवरण आदि।

सूचना प्रौद्योगिकी का तीसरा घटक है- भाषा व भाषा शैली। भाषा सूचना प्रौद्योगिकी का मुखपृष्ठ है, जिसकी सहायता से प्रयोक्ता अंकित सूचना को ग्रहण करता है। जिस भाषा में सूचना अंकित होती है, यदि प्रयोक्ता उस भाषा को न समझ सके तो इस प्रौद्योगिकी से उसे कोई लाभ होने वाला नहीं है। आज इंटरनेट की 83 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। इसलिए अँग्रेजी भाषा-भाषी देशों या अंग्रेजी जानने वाले प्रयोक्ताओं को कोई समस्या नहीं है। यह समस्या उन देशों की है जहाँ का भाषा-समाज अंग्रेजी नहीं जानता और अपनी स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं का ही प्रयोग ज्यादा करता है। चूँकि सूचना प्रौद्यागिकी का उद्देश्य सामाजिक विकास और जन कल्याण है, अतः यह आवश्यक है कि इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री लोगों तक उनकी भाषा के माध्यम से पहुँचे। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि भाषा का स्थानीकरण और विस्तारीकरण करके समस्त कंप्यूटर परिवेश और इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब की कथ्य सामग्री को प्रयोक्ताओं की स्थानीय-प्रादेशिक भाषाओं में प्रस्तुत किया जाए। इसके अंतर्गत वांछित भाषाओं में कंप्यूटर के पर्दे पर दिखाई देने वाले सभी कमांड, आदेश, संकेत, त्रुटि-संदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया के अंग बनें। इसके अलावा इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर प्रदर्शित समस्त सूचना-सामग्री प्रयोक्ता की अपेक्षित भाषा में उपलब्ध हो और कथ्य सामग्री की भाषा शैली का सरल, सुबोध और ग्राह्य होना भी अत्यंत आवश्यक है इसलिए प्रायः वाक्य अत्यंत छोटे रखे जाते हैं, सरल और बोधगम्य शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जहाँ अत्यावश्यक हो, कथन स्पष्ट और संक्षिप्त रखे जाते हैं। कथन इतना सुबोध और आकर्षक होना चाहिए कि वह प्रयोक्ता को बाँधकर रख सके अन्यथा प्रयोक्ता कभी भी साइट को छोड़कर जा सकता है।

इस संदर्भ में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में सामग्री का निर्माण करते समय भी ये सभी बातें विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य हैं। जहाँ तक हो सके अनुवादपरक और क्लिष्ट भाषा-शैली से बचना आवश्यक है। इंटरनेट व वर्ल्ड वाइड वेब पर सामग्री का विकास करते समय इसके तीन पक्षों पर ध्यान देना आवश्यक होता है-चयन, प्रस्तुतीकरण और भाषा शैली। सामग्री के चयन में प्रयोक्ताओं की जरूरतों, उनकी रूचि के विषयों और समसामयिक महत्त्व के मुद्दों को ध्यान में रखा जाता है। प्रयोक्ता किन-किन प्रयोजनों का उद्देश्यों से किस प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त करना चाहता है, इसका विश्लेषण या पूर्वानुमान करना आवश्यक है।

सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी
भावों, विचारो और मानवीय संबंधों को प्रकटीकरण के लिए भाषा जरूरी है। भाषा के साथ ‘राष्ट्र’, ‘राज’, ‘संपर्क’, जुड़ जाने से भाषा का मूल्य और अधिक बढ़ जाता है। तकनीक और सूचना तकनीक से भाषा को जोड़कर इसे हर भारतीय तक पहुँचाना राजभाषा का ध्येय और लक्ष्य है। दूसरी ओर हिंदी को विश्व फलक पर स्थापित करना भी भारत सरकार के साथ-साथ हर भारतीय का कर्तव्य है। आज सूचना-प्रौद्योगिकी की क्रांति के दौर में सामान्य सूचनाओं के साथ-साथ ज्ञानात्मक सूचनाएँ भी निरंतर हिंदी में उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। इस दिशा में विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ विभिन्न वैज्ञानिक व विद्वान निरंतर प्रयत्नशील हैं।

कंप्यूटर पर हिंदी
हिंदी तथा भारतीय भाषाओं को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ने के लिए सन् 1971-72 में सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए कंप्यूटर में देवनागरी व अन्य भारतीय लिपियों के उपयोग के लिए ‘फोटो टाइप टर्मिनल’ का विकास किया। सन् 1980 में शब्द संसाधन की दृष्टि से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में मुद्रण के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति ने जन्म लिया। इसी क्रम में सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों की अनेक संस्थाओं के सक्रिय सहयोग से पहले यांत्रिक टाइप राइटर के मॉडल पर कुंजी पटल का विकास किया गया और बाद में हिंदी सहित अन्य सभी भारतीय भाषाओं की लिपियों के लिए वर्णमाला की ध्वनि और वर्णमाला के वर्णों के वितरण, उनके उच्चारण स्थान के आधार पर एक समन्वित कोड विकसित किया गया जिससे एक ही कुंजी से सभी भारतीय भाषाओं (उर्दू को छोड़कर) की लिपियों के समान ध्वनि वाले अक्षर टंकित हो सकें। इसके आधार पर जो कोड विकसित किया गया वह ‘इंस्टी कोड’ (इंडियन स्टैंडर्ड कोड इन्फॉमेंशन इंटरचेंज) कहलाता है और की-बोर्ड का मोड इनस्क्रिप्ट कहलाता है। इसके आधार पर अक्षरों के लिए निर्धारित कुंजी से सभी भारतीय लिपियों में टाइप किया जा सकता है और अन्य भाषा में लिप्यांतरण भी किया जा सकता है। इसी आधार पर अंग्रेजी की वर्णमाला के अक्षरों की ध्वनियों के अनुसार भारतीय भाषाओं के अक्षरों को भी अंग्रेजी के लिए निर्धारित की – बोर्ड पर ही टंकित किया जा सकता है।

इसे ध्वन्यात्मक (फोनेटिक) या एक्ज़िक्युटिव या एंग्लो-इंडो की-बोर्ड मोड कहते हैं। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में टाइप करने के लिए कुंजीपटल में तीन विकल्प हैं- टाइपराइटर, इनस्क्रिप्ट और फोनेटिक। प्रयोक्ता सुविधानुसार इनका उपयोग करके अपना काम हिंदी या अन्य भाषाओं में कर सकते हैं। कुंजीपटल के विकास के बाद कंप्यूटर पर अपेक्षित भाषा में काम करने के लिए आवश्यकतानुसार अनुप्रयोग ‘हिन्दी सॉफ्टवेयरों’ के निर्माण का सिलसिला आरंभ हुआ। भारत सरकारी की सी-डेक संस्था ने 1988 में आई.आई.टी. कानपुर के सहयोग से बहुभाषी कंप्यूटिंग तथा इलेक्ट्रानिकी ‘जिस्ट’ ग्राफिक्स एंड इटेलिजेंस बेस्ड स्क्रिप्ट टेक्नोलॉजी प्रणाली प्रदान की। इसके माध्यम से अंग्रेजी के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डी-बेस, लॉटस, वर्डस्टार, कोबोल आदि में कार्य होने लगा। इसके बाद सरकारी व गैर-सरकारी भारतीय वैज्ञानिकों ने विंडोज़ प्लेटफार्म व परिवेश में काम करने वाले अनेक फोंट्स व सॉफ्टवेयर जैसे -लीप ऑफिस, इज्म, ट्रांसनेम, जिस्टशैल, लिप्स, मल्टी प्वाइंट अक्षर फॉर विंडोज़ आकृति आफिस सॉफ्टेक का अक्षर, देवेबेस, लेजर कंपोज़र, हिंदी का आलेख वराह, श्रीलिपि एपीएस आदि का निर्माण किया।

इस बीच माइक्रोसॉफ्ट की भारत स्थित कंपनी ने सन् 2000 में एम एस ऑफिस विंडोज में हिन्दी सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं को भी सम्मिलित किया और सन् 2003 में भारत सरकार से किए गए करार के अनुसार विंडोज के समस्त परिवेश, सभी आदेश, संकेत, त्रुटिसंदेश तथा प्रक्रिया, विवरण आदि विकसित करके कंप्यूटर की आंतरिक प्रक्रिया का अंग बना दिया। इसी क्रम में भारत सरकार ने आगे कदम बढ़ाते हुए उक्त सभी फोंट्स व यूनिकोड फोंट्स एवं की-बोर्ड ड्राइवर, टु्रटाइप फोंट्स के हिंदी भाषा मल्टीफोंट्स की-बोर्ड इंजन, हिन्दी भाषा के यूनिकोड आधारित की-बोर्ड ड्राइवर, हिंदी के लिए सभी प्रकार के फोंट्स कोड एवं स्टोरेज कोड का परिवर्तक, भारतीय ओपन ऑफिस का हिंदी भाषा संस्करण, हिन्दी में फायरफॉक्स ब्राउसर, हिन्दी में जीआईएम मल्टी प्रोटोकॉल संदेशवाहक, हिंदी में ई-मेल क्लाइंट, हिंन्दी ओसीआर, हिंदी एवं अंग्रेजी के लिए आसान टाइपिंग अनुशिक्षक, हिंदी के लिए एकीकृत शब्द संसाधक, अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश, हिंदी भाषा के शब्द वर्तनी जाँचकर्ता, हिंदी भाषा का शब्दनुवाद टूल एवं हिंदी के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच प्रणाली आदि का विकास कर इसे आम जनता तक मुफ्त पहुँचाने की व्यवस्था की।

इसके अतिरिक्त आईबीएम द्वारा विकसित साफ्टवेयर में हिंदी के 65000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिंदी और हिंदुस्तानी, अँगं्रेजी के लिए आवाज पहचानने की प्रणाली का विकास भी किया गया है जो शब्दों को पहचानकर कंप्यूटर पर लिपिबद्ध कर देती है। एचपी कंप्यूटर ने एक कदम और आगे बढ़कर ऐसी तकनीक विकसित की है, जो हाथ से लिखी हिंदी लिखावट को पहचानकर कंप्यूटर में लिपिबद्ध कर सकती है। इस प्रकार कंप्यूटर में हिन्दी के प्रयोग की सुविधा के साथ कंप्यूटर का पूरा परिवेश व प्रक्रिया आदि की हिंदी में उपलब्ध उक्त सुविधाओं से अंग्रेजी न जाने वाले भी अब अपना काम कंप्यूटर पर हिंदी में कर सकते हैं।

इंटरनेट व वेबसाइट पर हिंदी
इंटरनेट ने सूचनाओं के विश्वव्यापी आदान-प्रदान को अपने तंत्रजाल में बाँध लिया है। यह प्रणाली विश्व के विभिन्न देशों में करोड़ों लोगों द्वारा प्रयुक्त की जा रही है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इसका आविष्कार होने से अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं तथा रोमन लिपि का वर्चस्व रहा। अंग्रेजी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रेंच, जापानी, अरबी, स्पेनिश आदि भाषाएँ कंप्यूटर के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गई हैं, वहीं हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए यह एक चुनौती है। लेकिन इंटरनेट के फलक पर वेब दुनिया डॉट कॉम (इंडिया) लि. ने हिंदी पोर्टल का विकास कर इस चुनौती को स्वीकार किया और 23 सितम्बर 1999 को इंटरनेट पर हिन्दी की क्षमता के दर्शन हुए। वेब दुनिया के इस कार्यक्रम में मेल, चैट, खोज आदि भी सम्मिलित हैं। सॉफ्टवेयर कंपनी सुवि इन्फॉमेंशन सिस्टम, इंदौर ने हिंदी में निशुल्क ई-मेल सेवा का श्रीगणेश किया है। इस पैकेज में लिप्यांतरण की सुविधा भी है। रोमन में टाइप पत्र दूसरे छोर पर देवनागरी में प्राप्त हो सकता है।

इस प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी भाषा का प्रचलन निरंतर बढ़ रहा है। जहाँ माइक्रोसॉफ्ट, याहू, रेडिफ, आदि विदेशी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट पर हिंदी को स्थान दिया है और बीबीसी ने हिंदी की वेबसाइट विकसित की है, वहीं राजभाषा विभाग ने भी अपनी हिंदी वेबसाइट पर मशीनी अनुवाद और लिप्यांतरण हेतु ‘मंत्र’ पैकेज उपलब्ध कराया है और हिंदी में वेबपेज विकसित करने हेतु ‘प्लग इन’ पैकेज तैयार किया है, जिससे कोई भी व्यक्ति, संस्थान अपना वेबपेज हिंदी में प्रकाशित कर सकता है। भाषा शिक्षण की दिशा में भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने सी-डेक के सहयोग से ‘लीला हिन्दी सैल्फ लर्निंग’ पैकेज सॉफ्टवेयर तैयार किया जा अब इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। इस पैकेज से पाठों में आए वाक्यों, शब्दों और वर्णों का मानक उच्चारण सुन सकते हैं और बार-बार अभ्यास भी कर सकते हैं। लीला पैकेज लर्न इंडियन लेंग्वेज थ्रु आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के द्वारा सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी के माध्यम से सीखने की सुविधा उपलब्ध है। हिंदी शिक्षण की दृष्टि से मल्टीमीडिया सीडी-रोम ‘गुरू’ भी महत्वपूर्ण है।

इंटरनेट पर आसानी से हिंदी में काम कर सकते हैं। वेब साइट्स हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ ग्रहण कर सकते हैं। इंटरनेट व वेबसाइट पर सूचनाएँ अंकित करने के लिए सूचना संप्रेषण की आवश्यक प्रविधि के साथ भाषा और शैली की सुबोधता, सरलता, सहजता को ध्यान में रखकर हिंदी में वेबसाइट्स का निर्माण करके आवश्यक सामान्य सूचनाएँ और ज्ञान विज्ञान संबंधी ज्ञानात्मक सूचनाएँ जन-जन के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी की बढ़ती पैठ को देखते हुए प्रसिद्ध अंग्रेजी भाषाशास्त्री डेविड ग्राडोल ने विश्लेषण करके बताया है कि ‘‘हिन्दी 2050 में दुनिया की नंबर एक भाषा होने जा रही है। दूसरा स्थान चीनी और तीसरा स्पेनिश का होगा।’’ इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी वर्तमान इक्कीसवीं सदी में अन्य भाषाओं के साथ सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेगी।

सन्दर्भ –
1. हिन्दी भाषा का अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भ – भोलानाथ तिवारी, पाण्डुलिपि प्रकाशन दिल्ली।
2. दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी – डी.डी. ओझा, ज्ञान गंगा, प्रकाशन, दिल्ली।
3. जनमाध्यम और पत्रकारिता – प्रवीण दीक्षित, सहयोगी साहित्य संस्थान, महेश्वरी मोहाल, कानपुर।
4. जन संचार माध्यमों में हिन्दी, कुमार चन्द्र क्लासिक पब्लिकेशन्स कम्पनी, नई दिल्ली, 2000।
5. जन संचार और विकास बनर्जी, अंजन कुमार, जनसंचार केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी, 1995।
6. संचार क्रांति और विश्व जन माध्यम – प्रेमचन्द पांतजलि, अनिल अंकित।
7. सूचना प्रौद्योगिकी और जन माध्यम – प्रो. हरि मोहन तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।
8. जनसंचार – राधेश्याम शर्मा, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़।
9. साइबर स्पेस और मीडिया – सुधीश पचौरी, प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली।
10. संचार माध्यमों का प्रभाव – ओम प्रकाश सिंह, क्लासिकल पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली।
11. आधुनिक जन संचार और हिन्दी – प्रो. हरि मोहन, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली।