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तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तरक़्क़ी पसंद ग़ज़लगो : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

डॉ. वसीम अनवर

असिस्टेण्ट प्रोफेसर

उर्दू और फ़ारसी विभाग

डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश
[email protected], 09301316075

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शख़्सियत किसी तआरुफ़ की मुहताज नहीं है। उर्दू के जिन शौअरा  को आलमी शौहरत नसीब हुई उनमें फ़ैज़ का नाम भी शामिल है। तरक़्क़ी-पसंद शायरों में फ़ैज़ का नाम सबसे नुमायां है। उनकी शायरी का आग़ाज़ तहरीक की इब्तिदा से पहले हो चुका था, लेकिन शौहरत तहरीक में शमूलीयत के बाद ही मिली। फ़ैज़ के इब्तिदाई कलाम में रूमान की चाशनी और रिवायत की पाबंदी नज़र आती है, लेकिन बाद के कलाम में असरी मसाइल का शऊर उनके कलाम पर ग़लबा पा लेता है। उन्होंने रूमानी रिवायात से कभी इन्हिराफ़ नहीं किया और अपनी शायरी को रूमान और हक़ीक़त का संगम बना दिया। इन्होंने शऊरी तौर पर नज़म को अपने इज़हार का ज़रीया बनाया, इस लिए उनकी नज़मों में भरपूर तग़ज़्ज़ुल पाया जाता है। फ़ैज़ की शायरी में तग़ज़्ज़ुल की सहरकारी का ज़िक्र करते हुए रशीद हसन ख़ां लिखते हैं:
”फ़ैज़ की असल ख़ूबी उनका वो पैराया-ए-इज़हार है जिसमें तग़ज़्ज़ुल का रंग-ओ-आहंग तहनशीन होता है। यही तर्ज़-ए-बयान उनकी शायरी का इम्तियाज़ी वस्फ़ है। ताबीरात की नुदरत, तश्बीहों की जिद्दत और लफ़्ज़ों का इंतिख़ाब-ओ-तर्तीब का वो ढंग जिससे नग़्मगी की लहरें उभरती रहती हैं उस के अहम अज्ज़ा हैं।“(1)
फ़ैज़ के कलाम में नज़्मों की तादाद ग़ज़लों से ज़्यादा है। लेकिन उनकी बेपनाह मक़बूलियत में ग़ज़लों का अहम हिस्सा है। फ़ैज़ ज़िंदगी का गहरा शऊर रखते हैं, उनके यहां तबक़ाती आवेज़िश की समझ मौजूद है, वो इन्क़िलाब चाहते हैं, इन्क़िलाब का इंतिज़ार करते हैं, लेकिन उनकी शायरी में हंगामा-आराई नहीं है। फ़ैज़ की शायरी शेअरियत और तग़ज़्ज़ुल से भरपूर है जिसका तज़किरा करते हुए लुतफ़-उर-रहमान लिखते हैं:
”फ़ैज़ ने तग़ज़्ज़ुल और शेअरियत में इन्क़िलाब को इस तरह हल कर दिया है कि अख़्तर शीरानी की रूमानियत इक़बाल के इन्क़िलाब से या दूसरे लफ़्ज़ों में अख़तर की अज़रा, इक़बाल के मर्द-ए-क़लंदर से हम-आग़ोश हो गई है, तग़ज़्ज़ुल का यही रस शेअरियत की यही दिल-कशी फ़ैज़ को इक़बाल के बाद उर्दू का सबसे अहम और मक़बूल शायर बनाती है।“ (2)
फ़ैज़, इक़बाल के बाद उर्दू का सबसे अहम शायर है, इस क़ौल से इख़्तिलाफ़ की गुंजाइश है, लेकिन उन्होंने तग़ज़्ज़ुल और शेअरियत से अपनी शायरी को रिवायात से इस तरह जोड़ा कि वो इर्तिक़ा का उगला क़दम नज़र आती है। दूसरा पहलू ये है कि इक़बाल के बाद फ़ैज़ ने उर्दू नज़्म और ग़ज़ल दोनों में इतनी शौहरत पाई जो किसी दूसरे शायर को नसीब ना हुई।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लगोई के मुताले से उनके फ़िक्र-ओ-फ़न का बतदरीज इर्तिक़ा नज़र आता है। फ़ैज़ की इब्तिदाई शायरी में रूमानी लब-ओ-लहजा और रिवायती अंदाज़ में इशक़-ओ-मुहब्बत और हुस्न व अदा की पेशकश का अंदाज़ मिलता है:
दोनों जहां तेरी मुहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

फ़ैज़ की शायरी का अहम मौज़ू रूमानियत है। रूमानियत उन की तबीयत का अहम उंसर है, वो ज़िंदगी की उलझनों परेशानीयों और तल्ख़ियों का सामना एक हस्सास शायर की तरह करते हैं। उनकी इश्क़िया शायरी में खासतौर पर महबूब की शख़्सियत उनके लिए जमालियाती लज़्ज़तों और लताफ़तों का मर्कज़ बन जाती है। अदा-ए-हुस्न की मासूमियत ख़्वाब-ए-नाज़,रंग-ओ-बू का तूफ़ान, बहार-ए-शबाब रसीले होंट, अहमरीं आँखें, मख़मलें बाहें, रंग पैराहन, बज़्म-ए-अंजुम, आबशार, सुकूत ख़्याल-ओ-शऊर की दुनिया से ले कर ख़ाक-ओ-ख़ून में लुथड़े जिस्म झुलसी हुई वीरानियां,चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द, पुर-असरार कड़ी दीवारों, मक़तल गाहों सख़्ता अश्कों और तारीक शिगाफ़ों तक उनके जमालियाती शऊर का एहसास दिलाते हैं:
सहल यूं राह-ए-ज़िंदगी की है
हर क़दम हमने आशिक़ी की है

फ़ैज़ की ग़ज़लों में रूमानी अंदाज़ के पस-ए-पर्दा इन्क़िलाब का जज़्बा उभरता है। फ़ैज़ की तबीयत में रूमान रचा बसा हुआ था और इन्क़िलाब उनकी फ़ितरत थी। फ़ैज़ के बेहतरीन अशआर वही हैं जहां रूमान-ओ-इन्क़िलाब की मिली जुली कैफ़ीयत पाई जाती है। उन्होंने पुराने अल्फ़ाज़-ओ-तराकीब और क़दीम तशबीह-ओ-इस्तिआरे को अपनाते हुए इश्तिराकी ख़्यालात-ओ-असरी हक़ीक़तों को पेश करने की कोशिश की है:
हिम्मत-ए-इल्तिजा नहीं बाक़ी
ज़बत का हौसला नहीं बाक़ी
इक तेरी दीद छिन गई मुझसे
वर्ना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी

फ़ैज़ ने क्लासिकी अलफ़ाज़-ओ-तराकीब और तशबीहात-ओ-इस्तिआरात में बड़ी कामयाबी के साथ सयासी-ओ-इन्क़िलाबी मफ़ाहीम की नई जिहत का इज़ाफ़ा कर दिया है। इन्होंने गुल-ओ-बुलबुल और क़फ़स-ओ-सय्याद के हवाले से ही अपने ज़माने के मसाइल को ग़ज़ल में बयान किया है। यही वजह है कह उन की शायरी क़दीम-ओ-जदीद का ख़ूबसूरत संगम बन कर उभरती है:
चमन पे ग़ारत-ए-गुल-चीं से जाने क्या गुज़री
क़फ़स से आज सबा बेक़रार गुज़री है
दर-ए-क़फ़स पे अंधेरे की महर लगती है
तो फ़ैज़ दिल में सितारे उतरने लगते हैं

क्लासिकी रिवायात और समाजी हक़ीक़त निगारी के इम्तिज़ाज से फ़ैज़ की शायरी जिला पाती है। वो रिवायत का दामन अपने हाथ से नहीं छोड़ते। फ़ैज़ ने ग़ज़लगोई में तग़ज़्ज़ुल की ख़ुसुसियात का ख़ास ख़्याल रखा है। मुख़्तलिफ़ तरक़्क़ी-पसंद शौअरा बग़ावत और नारेबाज़ी पर उतर आते हैं, लेकिन फ़ैज़ कभी बग़ावत पर नहीं उतरते वो सिर्फ़ इन्क़िलाब का इंतिज़ार करते हैं। उनकी ग़ज़लें रूमान और इन्क़िलाब का ख़ूबसूरत संगम हैं:
फिर निकला है दीवाना कोई फूंक के घर को
कुछ कहती है हर राह हर इक राहगुज़र से
फिर आग भड़कने लगी हर साज़-ए-तरब में
फिर शोले लपकने लगे हर दीदा-ए- तर से

फ़ैज़ ने क्लासिकी शायरी से भरपूर इस्तिफ़ादा किया है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में रिवायती अलफ़ाज़ और तशबीया वास्ता रह को नए मअनी दिए हैं। उनकी हर ग़ज़ल में दो तीन ऐसे अशआर ज़रूर मिल जाते हैं जिन पर रिवायत की गहिरी छाप नज़र आती है। फ़ैज़ रिवायत में इस क़दर खोए हुए नज़र आते हैं कि उनका कलाम शुरू से आख़िर तक रिवायती रंग-ओ-आहंग से मुतास्सिर दिखाई देता है। मुतअद्दिद उस्ताद शौअरा मीर, सौदा, दर्द, ग़ालिब, मोमिन, दाग़ और इक़बाल के असरात वाज़िह तौर पर दिखाई देते हैं। बुहूर, रदीफ़ व क्वाफ़ी के साथ साथ इन असातिज़ा के लब-ओ-लहजा फ़ैज़ के कलाम में जलवागर नज़र आता है। फ़ैज़ की ग़ज़लिया शायरी की एक अहम ख़ूबी ये है कि इन्होंने असरी सियासी-ओ-समाजी सूरत-ए-हाल को क्लासिकी अल्फ़ाज़-ओ-तराकीब और इस्तिआरात-ओ-अलामात के ज़रीये पेश किया। इन्फ़िरादी और जज़्बाती तजुर्बात को इसी क्लासिकी ज़बान में बयान किया है। फ़ैज़ हर हाल में शायरी की इफ़ादीयत और मक़सदीयत के क़ाइल हैं और असरी हिस्सियत और सयासी शऊर को नुमायां एहमीयत देते हैं:
तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साक़ी
तलख़यई मए को तेज़-तर कर दे

मेरी ख़ामोशियों में लर अज़ां है
मेरे नालों की गुम-शुदा आवाज़

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भेदल फ़रेब हैं ग़म-ए-रोज़गार के

मुक़ाम फ़ैज़ कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सो-ए-दार चले

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे
हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क-ए-सितम करते रहेंगे

कर्ज़-ए-निगार-ए-यार अदा कर चुके हैं हम
सब कुछ निसार राह़-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम

आरज़ू मंदी फ़ैज़ की शख़्सियत की ग़ैरमामूली तवानाई को ज़ाहिर करती है। ज़िंदगी के सख़्त तरीन हालात में भी उनकी शायरी में उदासी और नाउम्मीदी जगह नहीं पाती। वो हर हाल में चराग़-ए-आरज़ू से अपने दिल-ओ-दिमाग़ को रोशन रखते हैं। ये हौसला, उम्मीदावर आरज़ू मंदी उनकी शायरी का क़वी उंसर है:
दिल ना उम्मीद नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

उनमें लहू जला हो हमारा कि जान-ओ-माल
महफ़िल में कुछ चिराग़ फरोज़ां हुए तो हैं

शायरी और नस्र का एक बुनियादी फ़र्क़ तरन्नुम, नग़्मगी और मौसीक़ी है। शायरी की तशकील में मौसीक़ी का बड़ा अमल दख़ल होता है। शायरी का मौसीक़ी से वही रिश्ता है,जो चांद का चांदनी से और फूल का ख़ुशबू से होता है। मौसीक़ी एक आफ़ाक़ी ज़बान कही जाती है, जिससे हर ज़ी-रूह लुतफ़ अंदोज़ होता है। फ़ैज़ की शायरी में ग़िनाइयत और मौसीक़ीयत अपनी दिल-कशी रखती है। उनके यहां मौसीक़ी आमेज़ रवां बहरों का इंतिख़ाब, सूतियाती सतह पर मिसरों में लफ़्ज़ी बर्ताव-ओ-तख़लीक़ी ज़बान का एहतिमाम और रदीफ़ व क़्वाफ़ी के मौज़ूं इंतिख़ाब से अशआर में नग़्मगी और तरन्नुम पैदा होता है
हर इक क़दम अज़ल था हर इक गाम ज़िंदगी
हम घूम फिर के कूचा क़ातिल से आए हैं

फ़ैज़ की ग़ज़लों में नए अल्फ़ाज़-ओ-तराकीब कम ही नज़र आते हैं, लेकिन पैरा-ए-इज़हार ख़ुद इनका वज़ा करदा है। उन्होंने अपने तख़लीक़ी जोहर से मुरव्वजा तराकीब राइज अल्फ़ाज़ और रिवायती तशबीहात-ओ-अलामात को ही इस्तिमाल करते हुए एक नया जहां मअनी अता किया है। ग़ज़ल की सबसे बड़ी ख़ूबी रमज़ियत व ईमाइयत है, यानी दो मिसरों के दरमियाँ की ख़ला क़ारी अपने ज़र्फ़ के मुताबिक़ पुर करने की कोशिश करता है। फ़ैज़ की ग़ज़ल में मुतअद्दिद मुक़ामात पर क़ारी अपने अंदाज़ में सोचने पर मजबूर होता है। रम्ज़-ओ-ईमा से ग़ज़ल के अशआर में माअनवियत की तकमील होती है और क़ारी और शायर के दर्मयान इन्फ़िरादी हम-आहंगी पैदा होती है। ये हम-आहंगी एक सयाक़-ओ-सबॉक् की मुतक़ाज़ी होती है:
आते आते यूँही दम को रुकी होगी बहार
जाते-जाते यूँही पल-भर को ख़िज़ां ठहरी है

फ़ैज़ के तख़लीक़ी मुहर्रिकात में जद्द-ओ-जहद आज़ादी, इश्तिराकियत, ज़ाती तजुर्बात-ओ-एहसासात और बैन-उल-अक़वामी मसाइल की ख़ासी एहमीयत है। फ़ैज़ हक़ीक़त और रूमान के शायर हैं, उनके कलाम में ग़म-ए-जानाँ और ग़म-ए-दौरां की कोई हदबंदी नहीं है, बल्कि एक ही पैकर में यकजा हो गए हैं। फ़ैज़ का जमालियाती एहसास, इन्क़िलाबी फ़िक्र पर क़ुर्बान नहीं होता और ना ही इन्क़िलाबी फ़िक्र जमालियाती एहसास पर क़ुर्बान होती है बल्कि इन दोनों की आमेज़िश और रिवायत से इस्तिफ़ादा करते हुए इज़्हार के नए नए पैरायों की तलाश उनकी इन्फ़िरादियत की ज़ामिन हैं
मुक़ाम फ़ैज़ कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

फ़ैज़ की शायरी में इश्तिराकी ख़्यालात और असरी हक़ायक़ की अक्कासी साफ़ नज़र आती है। उन्होंने ग़ज़लों में पुराने अल्फ़ाज़-ओ-तराकीब और क़दीम तशबीह-ओ-इस्तिआरे को नए मफ़ाहीम बख़्शे हैं। बाक़ौल नसीम अब्बासी:
”फ़ैज़ का सबसे बड़ा कमाल ये है कि उन्होंने ग़ज़ल के पुराने डिक्शन को नए मफ़ाहीम और मतालिब बख़श दिए। ज़ाहिर है कि ये काम हर शायर के बस का नहीं। पुराने अल्फ़ाज़ इस्तिआरात और तराकीब फ़ैज़ की ग़ज़लों में नई अलामत बन कर आते हैं और असरी सच्चाइयों और हक़ीक़तों की तरफ़ इशारा करते हैं।“(3)

फ़ैज़ मुनफ़रद शायर हैं,उनकी इन्फ़िरादियत के ताल्लुक़ से अब्दुल मुग़नी लिखते हैं:
”…………वो एक बहुत ही मुन्फ़रिद फ़नकार हैं, अपने ख़्यालात के इज़हार के लिए बंधे टिके साँचों पर इक्तिफ़ा नहीं करते उन्हें अपनी इन्फ़िरादियत और इस की मौज़ूं तशकील के लिए आइद होने वाली ज़िम्मेदारी का पूरा शऊर है……(4)

मजमूई तौर पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू शायरी की तारीख़ में एक अहम मुक़ाम रखते हैं उन्होंने अपने दौर के कई मौज़ूआत और वाक़ियात को तख़्लीक़ी सतह पर महसूस करके नज़ाकतों और लताफ़तों से पेश किया है। फ़ैज़ नर्म लहजे से तल्ख़ बात भी इस तरह कह देते हैं कि अल्फ़ाज़-ओ-तराकीब की शीरीनी व शगुफ़्तगी ज़ाया नहीं होती। तरक़्क़ी-पसंद ग़ज़ल में क़दीम-ओ-जदीद की बेहतरीन मिसालें फ़ैज़ के इलावा किसी और के यहां नज़र नहीं आती हैं। इस हसीन इम्तिज़ाज ने तरक़्क़ी-पसंद उर्दू ग़ज़ल में तहदारी पैदा कर दी है। फ़ैज़ बे-शक तरक़्क़ी-पसंद शायर हैं लेकिन उनके यहां आम तरक़्क़ी पसंदों की बेबाकी नज़र नहीं आती। वो बुलंद आहंग और घन-गरज की बजाय इशारों किनायों में वही बात कह जाते हैं जो औरों ने चीख़ पुकार के साथ कही है। वो अपने अह्द के एक ऐसे नुमाइंदा शायर हैं जिन्हों ने मौज़ू और फ़न के ख़ूबसूरत इम्तिज़ाज से काम लिया। फ़ैज़ तरक़्क़ी-पसंद शायरी के एक अहम सतून की हैसियत रखते हैं। उनकी तरक़्क़ी-पसंद ग़ज़लिया शायरी ने उर्दू ग़ज़ल के इर्तिक़ा में जो नुमायां किरदार अदा किया है वो नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश है। उर्दू शायरी में एक हस्सास, दर्द मंद, इन्सान दोस्त और फ़न शनास शायर की हैसियत से उनका नाम हमेशा ज़िंदा रहेगा
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हवाशी

  1. फ़ैज़ और उस की शायरी – रशीद हसन ख़ां, रिसाला बोहरान जोधपुर, स. 10
  2. तरक़्क़ी-पसंद शायरी लुतफ़ उर रहमान सह माही ज़बान-ओ-अदब पटना (अक्तूबर ता दिसंबर 1986 ), स. 50
  3. नकद-ए-फ़ैज़ – नसीम अब्बासी:। स. 43
  4. जादहई एतिदाल – अब्दुल मुग़नी:। स. 211

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Dr. Waseem Anwar
Assistant Professor
Department of Urdu & Persian
Dr. H. S. Gour University, Sagar M. P. 470003
[email protected], 09301316075