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समसामयिक दोहे

  • दोहे ,,,
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  • इच्छाएं घर से चलीं,कर सोलह श्रृंगार।।
  • लौटी हैं बेआबरू, हो घायल हर बार।।
  • 2,,,
  • आंधी से अनुबंध कर, चुप हैं पीपल आम।।
  • पौधों को सहना पड़े,इस छल के परिणाम।।
  • 3,,,,
  • विपदा बस जब कृषक ने,बेचा अपना खेत।।
  • मिट्टी रोई फूटकर, मैंडैं हुईं अचेत।।
  • 4,,,,
  • रस्ता है कांटो भरा, हम हैं नंगे पांव।।
  • आंखों पर पट्टी बँधी, बहुत दूर है गांव।।
  • 5,,
  • मृगतृष्णा सी जिंदगी, जिसमें भटके लोग।।
  • जीवन जल संदर्भ है,इक अनुपम संयोग।।
  • 6,,,
  • होंठों पर ताले लगे, पैरों में जंजीर।।
  • उसपर भी हम ढो रहे, पर्वत जैसी पीर।।
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  • उस जंगल सी जिंदगी, कैसे करें कबूल।।
  • जिसमें बट पीपल नहीं,उगते सिर्फ बबूल।।

बृंदावन राय सरल सागर एमपी।

वरिष्ठ कवि एवं शायर सागर मप्र।

मोब,,,7869218525

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