संबंधों में अपनापन हो…!!!
शीर्षक : “संबंधों में अपनापन हो”
रिश्तों के उपवन में जब,
मधुर पुष्प का सूनापन हो,
प्रेम वृक्ष का अवरोपड़ हो,
और संबंधों में अपनापन हो…!
धन कुबेर की चाह लिए,
सब व्याकुल मन से भाग रहे,
स्वजन सदृश संपत्ति छोड़,
बेचैन हृदय ले जाग रहे…!
क्यूं रिश्तों को तुम तौल रहे,
धन के कुछ ओछे कांटों पर,
सब अपनों को तुम छोड़ रहे,
मरघट जैसे कुछ घाटों पर…!
जो बांध सको खुद को अपनों से,
ऐसे बंधन का भान करो,
प्रेम डोर ना टूट सके,
ऐसा कोई संधान करो…!
तुम रिश्तों की परिपाटी को,
धन के प्रभाव से मुक्त करो,
“मैं” के स्वभाव को त्याग सको,
और सरल भाव से युक्त करो…!
जीवन के भौतिक सुख में जब,
प्रेम भाव का सूनापन हो,
प्रिय को प्रेम पुष्प अर्पित हो,
और संबंधों में अपनापन हो…!!
सादर,
ऋषि देव तिवारी