“मेरे भी सपने हैं “
“मेरे भी सपने हैं”
नारी हूं मैं वस्तु नहीं
मेरे भी सपने हैं।
जननी हूं मैं सृष्टि की
नवजीवन मुझसे पाता।
केवल जननी नहीं मात्र
मैं भी हूं जग की ज्ञाता।
शक्ति तुझको मिली अधिक
बांधा जिसने वे थे अपने।
नारी हूं मैं वस्तु नहीं
मेरे भी सपने हैं ।
सभी क्षेत्र में कदम बढ़ाया
आगे चलकर दिखलाया।
ज्ञानचक्षु खोला कितनों का
कितनों को है सिखलाया।
खड़े आज भी दानव जैसे
प्रगति देख लगते वे तपने।
नारी हूं मैं वस्तु नहीं
मेरे भी सपने हैं।
तरह तरह के उपक्रम करते
बस नारी करे गुलामी।
तुच्छ सोच ले यही सोचते
उनकी वह करे सलामी।
विकसित होता देश मगर
लगते वे टूटी माला जपने।
नारी हूं मैं वस्तु नहीं
मेरे भी सपने हैं।
डॉ सरला सिंह स्निग्धा
दिल्ली