माँ
माँ
(माँ, स्वयं विधाता का प्रतिरूप है और इस संसार में नारी शक्ति – माँ पर दुनियाभर में अनंत काव्य सृजन किए गए हैं, किए जा रहे हैं। उन्हीं में से मेरी कविता के रूप में सभी माताओं को यह कविता समर्पित है)
जब दुनिया में आई सहमी डरी थी घबराई
मां का स्पर्श पाकर अपार सुकून था पाया
मां ने मुझे सीने लगाकर पीड़ा को था भुलाया
दुग्धामृत पीकर और पिलाकर दोनों हुए थे कृतार्थ
मां के आंचल में विराजते स्वयं विधाता परमार्थ
मां जब भी मुझको दूध पिलाती
पल्लू से ढक कर दुनिया की बुरी नजर से बचाती
सिर पर प्यार भरा हाथ फेरती, एक टक मैं उन्हें निहारती रहती
जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मां की चिंता को बढ़ाया
घर परिवार की मर्यादा सत्य धैर्य का पाठ पढ़ाया
मेरा जीवन कर्ज है तेरा, जो कभी चुका ना पाऊं
जब भी पुनर्जन्म पाऊं, तेरी कोख तेरा आंचल पाऊं
जब भी तुम्हें देखती हूं मंत्रमुग्ध हो जाती हूं
तुम इतनी अच्छी और तुम इतनी सच्ची हो मां
तुम्हें लिखना संभव नहीं, मेरे शब्दों में इतनी जान नहीं मां
मेरी मां क्या है, मैं ही जानूं मेरी इच्छा है
यही मेरी मां की परछाई बनूं
मां मेरे पास रहे, ना रहे मैं कहीं भी रहूं
आपका आशीर्वाद रूप सदा मेरे साथ रहे
इतना मान सम्मान दो अपनी माता को
औरत बनाते वक्त अफसोस ना हो विधाता को
धन्य हो, हे ईश्वर धरती पर अपना एक रूप मां का बनाया
मैंने तो समूचा संसार अपनी मां में पाया
कवयित्री
पिंकी “हरि” भार्गव
माता-पिता- श्रीमती सुमित्रा देवी श्री मनीराम भार्गव
भार्गव हिंदी भवन
कराला, उत्तर पश्चिम, दिल्ली