महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु कविता- शक्ति स्वरूपा नारी
पुरुषों से समानता की चाह में,
नारी महानता क्यों भूल रही?
आधुनिकता की होड़ में,
अपनी मर्यादाएँ क्यों तोड़ रही?
प्रभु ने जन्मजात पृथक् गुण दिए,
फिर कैसे मानूं कि भेद नहीं!
गुणों में अग्रणी सन्नारी ,
वेदों में भी मतभेद नहीं |
नारी तो स्वयं शक्तिस्वरूपा,
किसी दृष्टि से अबला नहीं |
सुसंस्कारों को विस्मृत करने में,
किसी दृष्टि से उसका भला नहीं |
समानता की मृगमरीचिका में,
शक्ति का ह्रास कर रहीं |
प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में,
दासता का आभास कर रहीं |
न्याय-अन्याय के धरातल पर,
लिंग का सर्वथा कोई भेद नहीं |
नारी पर हुए अत्याचार पर,
नारी भी सम्मिलित मात्र पुरुष नहीं |
अन्याय के पूर्ण विरोध के लिए,
आत्मशक्ति संग्रह आवश्यक, पौरुष नहीं|
कोमल देहयष्टि सहायक सृष्टि में,
संप्रभुता हेतु आवश्यक मति, देह नहीं|
– डॉ. उपासना पाण्डेय