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महिला दिवस काव्य प्रतियोगिता हेतु…रचना शीर्षक ” बेटी “

बेटी…!!!

बेटे की चाह में देखो तो,
कैसे बेटी वो छोड़ गए,
मुख मयंक आभा से कैसे,
वो क्रूर हृदय मुख मोड़ गए…!

हरि इच्छा के जो है अधीन,
वो भी तुमको स्वीकार नहीं,
क्यूं कोख दिया फिर बेटी को,
जब थी वो अंगीकार नहीं…!

परित्यक्त भाव से पुरित हो,
तुमने बेटी का त्याग किया,
निज जननी को भी भूल गए,
हा धिक…! कैसा दुष्पाप किया…!

इक मां ने तुझको जन्म दिया,
इक मां को ही तुम त्याग रहे,
जिस श्वास वायु से जीवित रहे,
उस वायु से ही तुम भाग रहे…!

करके अनाथ उस बेटी को,
बेटे की चाह में रोते हो,
चित्कार रुदन सुनते सुनते,
कैसे भर नींद तुम सोते हो…!

पशुवत सा व्यवहार लिए,
तुम मानव रूप में जन्म लिए,
हो विवेक से हीन मूर्ख,
कैसे कैसे ये अधर्म किए…!

अब बेटी की रक्षा को तुम,
हे ईश्वर…! इक संधान करो,
जिनको स्त्रीत्व का बोध नहीं,
हे ईश्वर…! निः संतान करो…!!

सादर🙏😊