मत हो कृतघ्न…!!!
वो तुच्छ समझता था जिसको…
उसने ही उसका साथ दिया…
वक़्त ज़रा बदला उसका…
देखो कैसे अभिशाप दिया…
जो ना दे कुछ वो दाता तो…
अपमान भला यूं क्यूं करना…
दुष्ट निकम्मों मक्कारों का…
सम्मान भला यूं क्यूं करना…
जिससे ही आज प्रतिष्ठा उसकी…
जिससे ही आज सब मंगल है…
कैसे सब भूल चुका देखो…
ये उसके मन का जंगल है…
धिक्कार तुझे उन एहसानों का…
जिनको तू आज भूला बैठा…
जिन तख्तों पर बैठा इस युग में…
उनको ही आज हिला बैठा…
धिक्कार तुम्हे उन उपकारों का…
दाता से तुमने प्राप्त किए…
है अधीर तू इतना क्युं…
जो ऐसे तल्ख आघात किए…
एहसान ज़रा तुम मानो तो….
थोड़े से एहसानों का..
जो नहीं मिला इस जन्म तुझे…
मत गला घोंट अरमानों का…
जो मिला मुझे उस ईश्वर से…
देखो उसमें ही “ऋषि” मग्न…
जो नहीं मिला उस ईश्वर से…
देखो मत होना कभी कृतघ्न…
सादर🙏🏻🙏🏻