भारत मां का यौवन
भारत मां का यौवन
भारत मां के यौवन को न छेड़ों ,
ये मुश्किल से संवरा है ।
श्रृंगार झलकता है, स्त्री से कलित,
इसके क्षोभ से सुरक्षित रहो न ।।
ललाट पर आभा है कश्मीर की,
हृदय में मध्यप्रदेश संवरता है ।
बजती है कन्याकुमारी सी झंकार पैरो में ,
हिन्द सागर पैरों को निर्मल कर जाता है ।।
एक हाथ अरूणांचल से आंचल संवारे ,
एक हाथ सूरत से गहने सवारे ।
जन्मदात्री व पालनहार में कोई फर्क नहीं ,
भारत मां की शान में हर बेटा खड़ा है ।।
कौन संहार चाहे, जीवंतता कोई चाहे
देश की नशों में रक्त प्रवाह दिखता है ।
कौन सा दावन मानव शरीर से मुक्ति चाहे ,
जब मां की प्रतिष्ठा पर कोई अंगुली उठा दे ।।
कौन वीर भूलता है, अपनी वीरता को
उसकी वीरांगना वीर पुत्र ही जनती है ।
फिर से बन जाती है ,कोई नई कहानी
जब वो वीर पुत्र मैदान में खड़ा करती है ।।
कौन सा पुत्र कलंकित खुद को करे,
उससे पहले वो शहादत प्राप्त करे ।
विश्वासघात उसके खून में नही तो ,
दुश्मन फिर उम्मीद क्यों ये रखे ।।