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बेटी और नारी अंतराष्ट्रीय महिला दिवस प्रतियोगिता हेतु

1–बेटी और नारी

नन्ही परी की किलकारी
गूंजे घर मन आँगना।।
कहता कोई गृहलक्ष्मी
आयी घर आँगन की गहना।।
बेटी आज बराबर बेटों के
फर्क कभी ना करना।।
बेटी बेटा एक सामान
बेटी बेटों की परिवरिश
दो आँखों से ना करना।।
पड़ती बेटी बढती बेटी
अभिमान सदा ही करना।।
शिक्षित बेटी सक्षम बेटी
परिवार समाज के संस्कार
का रहना।।
बेटियां हर विधा हर क्षेत्र में
आगे बढ़ती देख रही है दुनियां
शिक्षित समाज में फिर भी
बेटी को संसय भय में पड़ता
है जीना।।
माँ बाप सुबह शाम ईश्वर से
करते प्रार्थना ।।
विद्यालय से शकुसल वापस
आ जाए बेटी तो कहते शुभ
दिन है अपना।।
नगर गली चौराहे पे नर भक्षी
पिचास गिद्ध दृष्टि से कब
कर दे दानवता का नंगा नाच
बेटी का मुश्किल हो
जाए जीना।।
बेटी अनमोल रत्न है जजनी
मानव की नारी की कली कोमल।।
आवारा भौरों का संस्कार से क्या
लेना देना।।
समाज को शर्मसार कर देते
बेटी नारी मर्यादा का तार तार
करते।।
पुरुष समाज के आहंकार
विकृत होता समाज ।।
टूट जाती मर्यादाये मिट जाता
लोक लाज।।
मानवता की पीड़ी में कही कभी
दानवता की सुनाई दे जाती पद
चाप।।
बेटी नारी की जिम्मेदारी
का एहसास ।।
बेटी शक्ति स्वरुप नारी
विराट रूप।।
बेटी सक्षम शिक्षित नारी
समाज राष्ट्र की गौरव मान।।

2–वर्तमान का परिवेश और बेटी नारी

विकसित होते पल प्रहर
समाज संस्कार पर प्रश्न
अनेको।।
शिक्षा मर्यादा संस्कार का
आधार ।।
आवारा भौरों की शक्ल में
नर भक्षी और शैतान ।।
आवारा भौरों को आकर्षित
करता वर्तमान का परिवेश
समाज।।
दुःशासन क्या चीर खिंचेगा
वस्त्र नहीं पुरे तन पे पाश्चात
श्रृंगार।।
सुपनखा के कारण हुआ था
राम रावण का भीषण संग्राम।।
सुपनखा अब फैसन है
रावण जैसा भाई नहीं है आज।।
कृष्णा किसकी लाज बचाये
बचा नहीं अब लोक लाज।।
बेटी अस्मत इज़्ज़त नहीं
सुरक्षित घर में
रिश्तों की मर्यादा आये दिन अब टूटती
भय दहसत में बेटी पल पल
पल घुटती मरती।।
घर बाहर चारो और बेटी
नहीं सुरक्षित।।
दोष सनाज का बेटी बेटो
की हया लाज अब छुटी।।
बेटी नारी नव दुर्गा अवतारी
दुष्ट दलन की दुर्गा काली।।
बेटी बेटो में हो सभ्यता
की समझदारी नकल
नहीं किसी की अपनी
पहचान की हो बेटी नारी।।
पुरुष समाज में दलित
दासता की ना हो बेटी
नारी मारी।।
बेटी की जाती धर्म तो मात्र
शिक्षा सक्षम मजबूत इरादों
की बेटी नारी।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर