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प्रेमकाव्य लेखन प्रतियोगिता , “तलाश”

“तलाश”

वे वक्त के साथ

अपने आपको बदल लेते हैं |

हम उनके भीतर

झाँकते है |

निहारते हैं

उनकी परछाईयों को |

उनके प्रेम

कभी दिखते नहीं |

हमें खोजते-खोजते

और कितने वक्त 

गुजर जाते हैं |

उनकी सादगी और

मायुशी को पढ़ने की

कोशिश करते हैं |

फिर 

खो जाते हैं

उनके चेहरे पर 

खींची लकीरों में |

शब्दों को पहचान पाना |

और उनके प्रेम की

थाह लगाना |

मेरे लिए 

सागर में 

डूबने जैसा है |

जहाँ तैरना नहीं आता 

मेरे और अथाह सागर के बीच

सिर्फ गहराईयाँ ही रह जाती हैं |

वहाँ हमें कोई दूसरा

बचाना नहीं आता |

हम तलाशते

अपने प्रेम को

जिससे जीवन हमें

सजाना नहीं आता |

भटकते रहे

तलाश करते रहे

राहों पर कई काँटे चुभते रहे

जिस काँटे को हमें 

खुद निकालना नहीं आता |

और प्रेम उसी बीच में

उलझकर रह जाता है

फूल और काँटों की तरह |

जिससे कभी हमें  

सुलझना नहीं आता |

 

  के.एम.रेनू

  शोधार्थी

 हिंदी विभाग

 दिल्ली विश्वविद्यालय