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प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता,, बसंत उत्सव हेतु

ग़ज़ल,,,,,

फूलों की खुशबुओं से महकता जिगर रहा।।

जब तक किसी हसीन का कांधे पर सर रहा।।

 

देखा जो उसे दूर से अहसास हुआ यूं।

जैसे फलक से चांद ज़मीं पर उतर रहा।।

 

मुद्दत गुजर गई है छुए उसके जिस्म को।

हाथों में मगर आज भी उसका असर रहा।।

 

बाहों में चांद आ गया खुशियां समेटकर।

जबतक तुम्हारे साथ हमारा सफर रहा।।

 

फूलों की तरह जिंदगी मेरी महक गई।

उल्फत वफ़ा खुलूस का ऐसा असर रहा।।

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बृंदावन राय सरल सागर एमपी

13/1/2021

प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु