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“प्रेम-काव्य लेखन प्रतियोगिता”- जल उठे दीप

जल उठे दीप

जल उठे दीप दोऊ ,आरती तो सजाने दे

भावना का भोग , इस देवी को चढ़ाने दे |

हँसी की तरंगिणी को ,कान घुल जाने दे

मिश्री की चाशनी का, स्वाद थोड़ा आने दे |

मीठी तान बाँसुरी की ,फिर छिड़ जाने दे

राधा-कान्हा प्रेम गीत ,फिर गुनगुनाने दे |

जल उठे—————-चढ़ाने दे |

मंदिरों की घंटियों से,आत्मा का पाप धुले

ह्रदय तरंगिणी को ,डुबकी लगाने दे |

साधन को पूर्ण आज ,साधिका से होने दे

प्रेम जल गगरी से ,आत्मा भिंगोने दे |

जल उठे———–चढ़ाने दे |

 

कवयित्री -प्रेमशीला सिंह

मौलिक स्वरचित रचना

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