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प्रेम काव्य लेखन प्रतियोगिता हेतु ‘प्रेम आहुति”

प्रेम आहुति

एक दिवस मानस पटल पर,

हर निश्चित रंग अटल पर ।

एक नवीन चित्र उभर कर आया,

जो विस्मित उर को कर लाया ॥

                नदिया के उस ओर किनारे,

                घने पेड़ों की छांव सहारे ।

                गाँव दिखा विस्मित और अद्भुत,

                बिसरा दे जो सुध-बुध ॥

पगडंडी से किया गमन,

देखा अद्भुत एक भवन ।

भव्य दिखे पर पड़ा विरान,

नीरव जैसे हो शमशान ॥

                भवन मध्य में एक साध्वी,

                अलक बिखेरे लगे बावरी ॥

                बैठी तुलस्य पात्र सहारे,

                कुम्लाही सी हाथ पसारे ॥

वहाँ होकर भी वहाँ न होकर,

दूर क्षीतिज भावों में खोकर ।

एक ओर एक टक निहारती,

बैठी है समय बिसारती ॥

                कब प्रातः हुई कब सूर्य उगा,

                कब साझं ढली कब चन्द्र चला ।

                इसे ज्ञात नहीं ये जीवित होकर,

                अनन्त हुई ये सीमित होकर ॥

पवन चले इस भवन मध्य,

चलती है इसकी श्वास भी ।

एक चित्र मानस पर अंकित,

एक इसे विश्वास भी ॥

                एक नाम के पीछे देखो,

                सारा विश्व भुलाया इसने ।

                इससे भी अनजान बेचारी,

                क्या खोया क्या पाया इसने ॥

हुआ परम् सौभाग्य सभी का,

एक सुबह फिर ऐसी आई ।

समस्त प्राणी हर्षित से देखे,

एक अजब हलचल सी छायी॥

                एक सिद्ध योगी महान्,

                उस गाँव के मध्य पधारे ।

                हर प्राणी ने किया वन्दन,

                हर प्राणी ने पैर पखारे ॥

आशीष अनेकों दिए उन्होंने,

समस्त ग्राम का किया भ्रमण ।

सबसे सबकी दुविधा जानी,

सुना सभी से सबका विवरण ॥

                जब गुजरे वो योगी बाबा,

                उस साध्वी के भव्य भवन से ।

                कुछ संदेश पहुँचे बाबा तक,

                उस भवन की दुःखी पवन से ॥

चरण थम गए वही अचानक,

देखा भवन व्याकुल से मन से ।

जोड़ लिए कर दोनों अपने,

श्रद्धा छलकी वहाँ नमन से ॥

                दृष्टि सबकी उठी भवन पर,  

                जागी शंका सबके मन में ।

                बोले बाबा एक बावरी,

                रहती है इस विरह भवन में ॥

यादों में डूबी बेसुध सी,

बैठी रहती है आंगन में ।

आपने किया नमन यहाँ पर,

रहा छिपा क्या श्रद्धेय नमन में ॥

                बाबा रहे मौन मगर,

                मौन भवन में किया प्रवेश ।

                संग चले वो प्राणी सारे,

                जो थे उनके अनुचर विशेष ॥

बाबा बोले अरे साध्वी !

नमन तुझे शतबार मेरा ।

अभी अंकुरित मेरे मन में,

आदर और सम्मान तेरा ॥

                स्वार्थ से अन्धा विश्व सकल ये,

                स्वार्थ से अर्चन करता है ।

हर पल फल की इच्छा लेकर,

देव का पूजन करता है ॥

तू मानव को देव बनाकर,

ध्यान उसी का धरती है ।

प्रेम पुष्प ऐसे अर्पित कर,

हर पल पूजा करती है ॥

तूने जग बिसराया सारा,

तुझे याद वो एक रहा ।

तेरे अन्दर भक्ति का सागर,

आज यहाँ मैं देख रहा ॥

छल और कपट से मुक्ति,

सदा से तूने पाई है ।

तेरी ये अनन्य भक्ति,

तुझे कहाँ ले आई है ॥

निःस्वार्थ ये श्रुद्धा तेरी,

जिसे नमन मैं करता हूँ ।

प्राणियों में जो शंका जागी,

उसे शमन मैं करता हूँ ॥

आराध्य मगर वो तुझको भूला,

जाने क्या वो तेरा त्याग ।

वो लिप्त अपने भोगों में,

तूने वरण किया वैराग ॥

वो आराध्य आराध्य नहीं,

एक मानव साधारण है ।

तेरी ये अन्धी भक्ति ही,

तेरे दुःख का कारण है ॥

वो वह नहीं जो तू समझे,

सकल विश्व ये कहता है ।

तेरी ये भक्ति का सागर,

व्यर्थ उधर को बहता है ॥

चेतन्य हो गई वही साध्वी,

जो अब तक जड़भूत बनी ।

  और उसकी निर्बल वाणी,

उसके भावों की दूत बनी ॥

बोली बाबा मैं निर्बल हूँ,

विवाद नहीं मैं कर सकती ।

आप जैसे विद्वान पुरूष से,

शास्त्रार्थ नहीं मैं कर सकती ॥

पर मेरा प्रश्न एक है,

उत्तर अवश्य देते जाना ।

वरन् मैं श्वासों को त्यागूँ,

पवन सकल लेते जाना ॥

जिस पर मेरा जन्म हुआ,

भारत भूमि कहलाती है ।

यहाँ भक्ति सच्ची हो तो,

अन्धी ही हो जाती है ॥

यहाँ पर पत्थर पूज-पूज कर,

हमने देव बनाए है ।

यहीं पर पत्थर कभी गणेश,

कभी महादेव कहलाए है ॥

मैंने क्या गलत किया गर,

मनु पुत्र को पूजा है ।

मेरा अटल विश्वास वही है,

और नहीं कोई दूजा है ॥

यदि वो आराध्य नहीं बन पाया,

दोष नहीं उसका होगा ।

अवश्य मेरी भक्ति गागर का,

कोण कोई रिसता होगा ॥

अवश्य मेरी पूजा में कोई,

त्रुटी शेष रही होगी ।

सर्वस्य किया अर्पण फिर भी,

कमी विशेष रही होगी ॥

यदि ये मेरा भाव सत्य है,

अवश्य बने वो मेरा देव ।

सिद्ध हो जाएगा स्वतः ही,

मिथ्या कहते थे लोग सदैव ॥

मेरी भक्ति की ये शक्ति,

श्रेष्ठ उसे बना डाले ।

आंधी आये वो भावों की,

पृथ्वी समस्त हिला डाले ॥

पर बाबा में इस जड़ता से,

थकती थकती जाती हूँ ।

पर पथराई आँखो से फिर भी,

रस्ता तकती जाती हूँ ॥

अब वो मानव पुत्र मेरा,

वो देव मेरा उद्धार करे ।

आज अन्तिम आहुति प्राणों की,

मेरी वो स्वीकार करें ॥

निढ़ाल हो गई उसकी काया,

प्राण नहीं अब शेष रहें ।

पलकों पर पुष्प् रूप कुछ,

अश्रु ही अवशेष रहे ॥

छोड़ गई पिंजरे को अपने,

दिव्य प्रकाश में लीन हुई ।

श्रेष्ठतम साधक के पद पर,

पल भर में आसीन हुई ॥

प्रश्न अधूरा छोड़ गई वो,

उत्तर उसे अब देगा कौन ।

हाथ जोड़कर, शीष झुकाकर,

खड़े हुए सब प्राणी मौन ॥

बाबा बोले धन्य साध्वी,

धन्य तेरा वो देव है ।

विश्व की हर पूजा से बढ़कर,

मानव प्रेम सदैव है ॥