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कैसे प्रिय पर अधिकार करूं…??

रचना शीर्षक :
” कैसे प्रिय पर अधिकार करूं : एक अन्तर्द्वन्द “
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तुम प्रेम गीत का राग चुनो,
मैं कर्कश ध्वनि विस्तार करूं,
प्रणय मिलन कैसे हो फिर,
कैसे प्रिय पर अधिकार करूं…!

मधुर मिलन की बेला में,
तुम चन्द्र सदृश दैदीप्यमान,
मेरे मुख का सब तेज क्षीण,
कैसे प्रिय से अभिसार करूं…!

तुम विवश हृदय से प्रेम सुमन,
अर्पित करके कर्तव्य मुक्त,
मैं अविरल प्रेम की अभिलाषा ले,
कैसे प्रिय का प्रतिकार करूं…!

द्वय भाव लिए तुम उन्मुख हो,
अनुतप्त हृदय और मुख प्रसन्न,
अभिनय मुझमें कण मात्र नहीं,
कैसे प्रिय से व्यवहार करूं…!

परिणय विधान है सृष्टि का,
मन से मन का जब मिलन पूर्ण,
बंधन तन का, परिणय नहीं,
कैसे यह भाव प्रसार करूं…!

है द्वंद मेरे अंतर्मन में,
मैं दोष मुक्त या दोष युक्त,
पर तेरा कोई दोष नहीं,
कैसे प्रिय का परिहार करूं…!

कर्तव्य बोध की मर्यादा में,
बरबस बंधक तुम बन बैठे,
मैं भी तो स्वार्थ के वशीभूत,
कैसे प्रिय से प्रतिसार करूं…!
कैसे प्रिय पर अधिकार करूं…!!

सादर🙏