निः स्वार्थ प्रेम…!!!
मन की दीवारों के भीतर,
मौन धरे वो कौन पड़ा..?
अहम और निःस्वार्थ प्रेम में,
हर क्षण सोचे है कौन बड़ा..??
निःस्वार्थ प्रेम की परिभाषा में,
अहंकार का मान नहीं,
फिर सबल रूप लेकर इस मन में,
अडिग अचल सा कौन अड़ा..!
कैसे परित्याग करे बेबस मन,
पुरुषत्व भाव…मन पर छाए,
पुरुष सबल…नारी है अबला,
ऐसे विचार ही क्यूं आए..?
वो सहन करे अभिमान पुरुष का,
ऐसी परिपाटी क्यूं बना दिए..?
फिर विजय पताका अहम भाव की,
लेकर जन जन में उड़ा दिए..!!
वो प्रेम सुधा की वर्षा लेकर,
नित नए वेश है दिखलाती,
बेटी, भगिनी, अर्धांगिनी बन,
मातृत्व भाव भी सिखलाती..!!
मद, मान, दर्प, अभिमान भरे,
इस जग को तुमने साधा है,
निःस्वार्थ प्रेम के धागों से,
अगनित रिश्तों को बांधा है..!!
अविरल प्रेम सरोवर पर,
अभिमान मेरा भारी है क्यूं..?
है पतन सुनिश्चित अहम भाव से,
हृदय द्वंद जारी है क्यूं..??
“ऋषि” हृदय जो अहम बसा,
हे ईश्वर…! संघार करो…!!
जन – जन में हो… निःस्वार्थ प्रेम,
ये भाव प्रभु संचार करो…!!
सादर🙏