Uchit pratiyogita ( Basant Utsav )
——-“अलौकिक भूलोक”——-
पर्वतों की श्रृंखलायें, गान गायें शान का
प्रतीक वनस्पति बृक्षादि हैं, तेरे आत्मसम्मान का I
तूफान शीत बरसात में भी, अडिग रहना धर्म है
प्रदत्त जिनसे जल व फल, निष्कपट इनका कर्म है II
शरद में उस हिमपतन से, ढकें ये पर्वत श्रेणियाँ
बसंत ऋतु में ताप से, कटतीं इस हिम की बेड़ियाँ I
समतलों में लहलहाती, भाजी अन्न की खेतियाँ
फिर मरुस्थलों की शान है, ये चमचमाती रेतियाँ II
सरितप्रवाह को धन्य है, सबके जीवन संचार हेतु
खिलते प्रसून मिलती सुगन्धि, उऋण न हों आभार हेतु I
प्रकृति की देन है, निज फलती फूलती सभ्यता
अनेक में सब एक हैं, यह आदिकालीन भव्यता II
त्रिदिशों से घेराव है इस, समुद्रतटीय सीमान्त की
मध्ये खग मृग गाथा गयें, उल्लेखनीय वेदान्त की I
आर्यभूमि एक अंश है मित्रो, इस बसुंधरा के अंग का
फिर क्यों न नाश हो जो उजाड़े, निष्ठुर व पापी दवंग का II
हरित नीला जगमगाता, घूमित संतुलित लोक यह
टिमटिमाता अन्तरिक्ष से, दृष्टिगोचर हो परलोक यह I
अलौकिक आकर्षक सौम्यभूमि, तू सर्व सम्पन्न व ओतप्रोत
केवल कमी है रक्षकों की, भक्षकों का है अथाह स्रोत II
करते प्रण हैं वचनबद्ध, तिरस्कृत न होने देँगे कभी
पर्यावरण स्वच्छता सम्पदा पर, ध्यान बाँटेंगे सभी I
समा जाना है एक दिन सभी को, तेरे ही अन्तःकरण
जन्म से ही “गज” जीव होता, बसुधे स्वतः तेरी शरण II
———————–गजराज सिंह————————