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“देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता” हेतु कविता – जाग वीर  

जाग वीर  

जाग वीर वीरता भर ,निंद्रा का तू त्याग कर दे

भारती के आन पर तू, प्राण का बलिदान कर दे

प्रस्थान कर सीमाओं पर, अरि को तू ललकार दे

नरमुंड  सजा के थाल में , तू भारती को दान कर दे |

बाहुओं को लौह कर तू ,सीने को तू चट्टान कर ले

अग्नि से तू आग ले ,लपट ज्वालामुखी का भर ले  

भस्मासुर का रूप धर ,और दुश्मनों के प्राण हर ले

शेर बन दहाड़ उठ तू ,हाथियों का बल तू भर ले |

सागर से बड़वाग्नि ले ,गर्जन-तर्जन तू रोर भर दे

ला सुनामी तीव्रतर  तू ,विनाश तू विनाश कर दे

सोता सागर जाग जा तू, दुश्मनों का नाश कर दे

काट अरि के मुंड को तू ,कंदुक बना उछाल दे  | 

काल तू विकराल बन जा ,दुश्मनों का नाश कर दे

अपने पौरुष के तू बल से , धरा अम्बर को कँपा दे

है अमावस  रात गहरी , बन के सूरज प्रकाश दे

अंधकार घोर घिरा है ,रात्रि  को विहान कर दे |

 

कवयित्री-प्रेमशीला सिंह

मौलिक स्वरचित रचना

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