डॉ प्रियंका मिश्रा की दो कविताएं
1
कितनी बदल गयी है दुनिया
कितनी बदल गयी है दुनिया
यह स्वीकारा जायेगा
या जिसने यह पाप किया
वह पापी मारा जायेगा ?
इन्द्रलोक के ऐरावत हो
ऐसा जाना जाता था
गौरी सुत का रूप तुम्हीं हो
गणपति माना जाता था
पहला भोग तुम्हें लगता है
फिर दूजों को जाता है
बुद्धि विनायक कहकर,तुमको
पहले पूजा जाता है
अब तक जो पढ़ती आई मैं
लगा कथानक झूठ रहा
मैं मानव हूँ सबका रक्षक
अभी भरम यह टूट रहा
अगर कथानक सच्चे हैं, तो
ऐसी बात कहाँ से आयी
गर्भवती मां के सम्मुख वह
काली रात कहाँ से आयी
जंगल से बाहर आयी थी
केवल क्षुधा मिटाने को
नहीं पता था निकल पड़ी
अपनी तकदीर लुटाने को
मानव पर विश्वास किया था
उसको उसका सूद मिला
अन्ननास के फल के अन्दर
बदले में बारूद मिला
जाने कितना भटकी होगी
दर्द लिये वह राहों में
अपनी व्यथा सुनाती होगी
खुद ही खुद को आहों मे
तीन दिनों तक जल में रहती
अपना गर्भ बचाने को
एक अकेली ही काफी थी
वह कोहराम मचाने को
मानवता कितनी ओछी है
यह उसने बतलाया है
बेजुबान होकर उसने
अहिंसा का पाठ पढ़ाया है
मानवता ऐसे कृत्यों से
तार-तार हो जाती है
इस भारत की गौरवगाथा
शर्मसार हो जाती है
2
मन की बात कही होती
विपदाओं को पीठ दिखाना कर्म नहीं है मानव का
बिना लड़े ही प्राण गंवाना धर्म नहीं है मानव का
मौत भले आयी हो सर पर दूर भागने लगती है
मानव प्रण के सम्मुख विपदा स्वयं कांपने लगती है
अगर बढ़ाकर हिम्मत थोड़ा मन की बात कही होती
मन हल्का कुछ हो जाता फिर निश्चित मौत नहीं होती
सबके जीवन में संकट कोई न कोई रहता है
साहस नहीं तोड़ता जिससे हर संकट को सहता है
सुख दुख है जीवन का संगम इससे कोई बचा नहीं
जिसने हार मान ली दुख से उसने कुछ भी रचा नहीं
मातु पिता को नहीं पता था क्या देना क्या लेना है
जिसको पाला पोस अब तक उसको कंधा देना है
मंजिल पाने के हित में शोलों पर पैर धरे होते
पाते सह अनुभूति मेरी यदि अपनी मौत मरे होते
मेरी कलम चला करती है स्वाभिमान के आदर में
मेरी कविता लिप्त नहीं रण छोड़ भाग के जाने में
यह कविता है बूढी आँखों के बेबस लाचारी की
बीच सफर में छोड़ गये जो केवल उस नाराजी की
यह कविता है मातु पिता के पावन उन संबंधों पर
जिनपर उनको जाना था वह लाश रखी जिन कंधों पर
डॉ. प्रियंका मिश्र