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“मंज़िल तक कैसे पहुँचें”

हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
तुम तो ऐसे बिछुड़े जैसे
मेले में खोया बालक,
अक्सर मिलता कभी नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
गर तुम केवल रूठे होते
तो तुम्हें मना लाते,
हम किंकर्तव्यविमूढ़ हुए
क्योंकि तुम्हारा
कोई पता नहीं,
लेकिन ऐसा तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
राहों में धूल बहुत है
पांवों में छाले भी हैं,
फिर भी चलना पड़ता है
क्योंकि ठहरना
अब कोई बात नहीं,
पर यह पीड़ा तब होती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
सपनों की दीपशिखाएँ
अब भी जलती रहती हैं,
मन का मंदिर खाली है
फिर भी आशा
पूरी तरह से राख नहीं,
पर यह विरह तभी गहराता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
याद तुम्हारी आती जैसे
साँझ ढले घर लौटे पंछी,
लेकिन मेरे आँगन में
अब वैसी कोई
मधुर बरसात नहीं,
और यह सूना सा लगता
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
फिर भी मन को समझाते हैं
धैर्य धरा का धर लेते हैं,
शायद फिर मिल जाओ तुम
यह आशा भी
पूरी तरह से समाप्त नहीं,
पर मिलन कठिन हो जाता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
इस जीवन की हर डगर पर
एक भरोसा रख लेते हैं,
शायद फिर से साथ चलो
यह सपना भी
पूरी तरह से मिथ्या नहीं,
पर मंज़िल दूर ही रहती है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।
हम मंज़िल तक पहुँचें कैसे
जब संग तुम्हारा
अपने साथ नहीं,
ऐसा अक्सर तब होता है
जब भाग हमारा
अपने साथ नहीं।