“देशभक्ति-काव्य लेखन प्रतियोगिता ” हेतु कविता – वीरों को देश का वन्दन
वीरों को देश का वन्दन
उन वीरों को देश का वन्दन, जो प्राणों को वारे हुए हैं,
अपनी खुशबू दे के वतन को, आज वो चाँद-सितारे हुए हैं ।
हम धरती पर हों या ना हों, देश का सूरज चमके हरदम,
प्रण जो लिया है दोहराएंगे, जब तक तन में रहता है दम,
जिनके डर से देश के दुश्मन, तन-मन-धन से हरे हुए हैं ।
आज मुझे सौभाग्य मिला है, कहती है सिन्दूर की लाली,
देश के हित सर्वस्व दिया है, मौन ह्रदय है खाली-खाली,
पूरित कर संकल्प को अपना, आज सभी के प्यारे हुए हैं ।
वीर सपूत को अर्पित करके, मन पिघला पर आँख न बहता,
गोदी के थे जो किलकारी, प्राण थमा पर शौर्य दे बढ़ता,
मेरे कुल का उज्ज्वल दीपक, घर-घर के उजियारे हुए हैं ।
स्वर्ण सा चितवन हो गयी माटी, मेरा दुख कौन है बाँटे,
गलते तन की भीगी आँचल, दिन और रात कैसे काटे,
कण-कण बिखरी मेरी ममता, वीर शहीद दुलारे हुए हैं ।
जिनके यश की अमर कहानी, गीतों में फिर गाया जाये,
हर बालक के मन मन्दिर में, बिम्ब उसी का छाया जाये,
जय-हिन्द के उद्घोष-गुंजित – गाँव, गली, गलियारे हुए हैं ।
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