काव्य धारा -11
चलो आज हम राम को खोजे
कहाँ हम आ गए खुद
को खोजते भटकते
नगर की हर डगर पर
तेरा नाम लिखा हैं
तेरी अवनि का कण कण
एक दर्पण के जैसा हैं।
तेरी अवनि के कण कण
में तेरा रूप देखा हैं
कोई राम कहता हैं
कोई भगवान कहता हैं।
हर सांसो की धड़कन में
एक राम लाया हूँ।
मानवता के मूल्यों का
भगवान लाया हूँ।।
सुबह और शाम कल कल कलरव
करती सरयू की धाराए परम् पावन माटी को मैं साथ लाया हूँ।।
मर्यादाओं की भीड़ में मार्यादा को
खोजता साकेत के पुरुषोत्तम का
श्री राम लाया हूँ।।
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश